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एक युद्ध समाप्त हो सकता है तो दूसरा और भड़क सकता है, जिसके परिणाम घातक होंगे पूरे विश्व के लिए

सुभाष चन्द्र

कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा के दौरान पुतिन-मोदी की Chemistry देख कर जिस तरह यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भड़के थे और पुतिन समेत मोदी के लिए भी  अपमानित करने वाली भाषा प्रयोग की थी उसे देख कर यूक्रेन भारत के मित्र देशों की श्रेणी में तो नहीं माना जा सकता, लेकिन अब समाचार मिल रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी अगस्त में यूक्रेन की यात्रा पर जाएंगे। 

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अलग अलग मायने निकाले जा रहे हैं मोदी जी की यूक्रेन यात्रा के। लेकिन मेरा मानना है कि जैसे जैसे अमेरिकी चुनाव करीब आ रहा है जेलेंस्की को अमेरिकी मदद मिलना बंद होना निश्चित हो रहा है और अब जेलेंस्की युद्ध बंद कर Honourable Exit Route तलाश रहा है और यह उसे भी पता है और अमेरिका समेत पूरा यूरोप भी जानता है कि मोदी अकेला वो शख्स है जो राष्ट्रपति पुतिन को युद्ध रोकने के लिए प्रभावशाली ढंग से मना सकता है और शायद इसलिए ही जेलेंस्की ने युद्ध रोकने की पूरी तैयारी करके ही मोदी को यूक्रेन आने के लिए मनाया है। जेलेंस्की मोदी के सामने अपनी वो शर्तें रखेगा जिससे उसकी इज़्ज़त भी बनी रहे और युद्ध भी समाप्त हो जाए। यह मेरा आंकलन है लेकिन मुझे शंका है कि अमेरिका इस युद्ध को रुकने देगा, यह समय ही बताएगा।

दूसरी तरफ Hamas chief Ismail Haniyeh को इज़रायल द्वारा ईरान में मार गिराने के बाद ईरान, हमास, हिज़्बुल्ला, हूती की तरफ से इजराइल के साथ भयंकर युद्ध छिड़ने की संभावना बन रही है। देखना यह होगा कि कितने इस्लामिक देश ईरान के साथ युद्ध में साथ देते है क्योंकि ईरान के युद्ध में लीडर बनने का मतलब है इस्लामिक वर्ल्ड पर शिया प्रभुत्व कायम होना और यह सुन्नी बहुल इस्लामिक देश शायद कबूल नहीं करेंगे। 

हमास का इजरायल के साथ युद्ध एक पागलपन के सिवाय कुछ नहीं है और जो सोच हमास की हैं वह ईरान, हिज्बुल्लाह और हूती भी पाले बैठे हैं। इज़राइल के अस्तित्व को ये लोग मिटा देना चाहते हैं और यह सोच पूरे विश्व को हो सकता है एक अघोषित युद्ध में धकेल दे। विश्व के अनेक देशों में फलीस्तीन को समर्थन देने की आड़ में “हमास” को ही समर्थन दिया गया है।

यह युद्ध पागलपन है यह इसी बात से साबित हो जाता है कि अब तक 38000 लोग गाज़ा में मर चुके हैं और Ismail Haniyeh ने कहा था कि उसके परिवार के 60 लोग मारे गए हैं। भला क्या मिला लेकिन फिर इजराइल को ख़त्म करने का भूत सवार है।

और इजराइल के खिलाफ ईरान और अन्य कटटरपंथी आतंकियों संगठनों द्वारा छेड़ा गया युद्ध एक Christian+Jews बनाम इस्लाम  युद्ध में बदल सकता है और जिस तरह हर मुल्क में इस्लामिक ताकतें टकराव पैदा कर रही हैं चाहे वो जर्मनी हो, ब्रिटैन हो या अन्य यूरोपीय देश हों, हर मुल्क में गृह युद्ध की स्तिथि पैदा हो सकती है जिसमें भारत भी शामिल होगा। 

ऐसा कहा जा रहा है कि Ismail Haniyeh के उत्तराधिकारी का चयन आसान नहीं होगा जिसके दावेदार हैं Khaled Mashaal और Khalil al -Hayya, यह कहना है मिस्र अलकायदा के पूर्व-संस्थापक अबू मुहम्मद अल मसरी का। Khaled Mashaal वही लीडर है हमास का जिसने इज़रायल पर हमास के हमले  के कुछ दिन बाद 27 अक्टूबर को केरल के मल्लापुरम में Virtually भाषण देकर गाज़ा की unity के लिए call दी थी।

उसके हमास का चीफ बनने से हमास की एंट्री भारत में होने की पूरी सम्भावना है क्योंकि कांग्रेस और सेकुलर खरपतवार खुली बाँहों से उनका स्वागत करेंगे और नेतृत्व करेगा ओवैसी। यह एक अलग बहाना मिलेगा कांग्रेस को भारत को अस्थिर करने का। आने वाला समय चुनौतियों से भरा होगा भारत के लिए भी। हो सकता है Ismail Haniyeh जैसे क़तर में रहता था Khaled Mashaal छुप कर भारत में रहे और इजराइल उसे भारत में ठोक दे।

भारत रूस के संबंधों से किसी को परेशान होने की क्या जरूरत है; अमेरिका चीन पाकिस्तान का दर्द एक तरफ और यूक्रेन की नासमझी दूसरी तरफ

 सुभाष चन्द्र

ऐसा नहीं है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच यह पहली शिखर वार्ता हुई हो लेकिन यह उस समय हुई जब वाशिंगटन में 9 से 11 जुलाई के बीच नाटो देशों की मीटिंग होनी थी। इस मीटिंग से पहले ही नाटो के सेक्रेटरी जनरल Jens Stoltenberg ने एक बार फिर कहा कि यूक्रेन को जल्द ही नाटो में शामिल किया जाएगा और यह ही रूस यूक्रेन युद्ध का मुख्य कारण था। 

प्रधानमंत्री मोदी मास्को 10 जुलाई को गए लेकिन उसके पहले 8 जुलाई को रूस ने कीव पर जबरदस्त हमला कर 50 से ज्यादा मिसाइल दाग दी और बच्चों समेत 36 लोगों की मौत हुई। उस हमले का मोदी की यात्रा से कोई संबंध नहीं था बल्कि नाटो की मीटिंग से एक दिन पहले यह हमला करके पुतिन ने नाटो को एक बार फिर संदेश दिया था कि यूक्रेन के लिए गलती मत करना। 

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भारत रूस के संबंध वैसे तो बहुत समय से प्रगाढ़ रहे हैं लेकिन वर्तमान में इन संबंधों की वजह मोदी और पुतिन की निजी घनिष्ठता है। यह अमेरिका को बर्दाश्त नहीं होता और इसलिए 26 जून को अमेरिका के उप-मंत्री कर्ट कैम्पबेल ने स्पष्ट कहा कि “भारत-रूस के गहरे रिश्तों पर अमेरिका को एतराज है और हमने अपनी चिंताओं से भारत को अवगत करा दिया है; इन रिश्तों की वजह से अमेरिका द्वारा भारत को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी देने की कोशिशों में असर पड़ सकता है”। यानी अमेरिका भारत को ब्लैकमेल करना चाहता है जो कोई समझदारी नहीं है। 

अमेरिका का यह दृष्टिकोण उसके अपने हित में भी नहीं है क्योंकि रूस ने कभी अपने  भारत से संबंधों के चलते भारत अमेरिका के रिश्तों पर रोक लगाने की कोशिश नहीं की। दूसरी तरफ ढाई साल से चल रहे रूस यूक्रेन युद्ध में अमेरिका ने हर तरह के प्रतिबंध रूस पर लगा कर भारत से अपेक्षा की कि वह उन प्रतिबंधों के अनुसार रूस से दूरी बना कर रखें खासकर क्रूड आयल का आयात न करे लेकिन मोदी ने एक नहीं सुनी। दरअसल अमेरिका इस युद्ध के चलते रूस को आर्थिक तौर पर दिवालिया कर देना चाहता था जिसे भारत ने बचा लिया और यह बात पुतिन अच्छी तरह जानते हैं।  

भारत रूस ने एक दूसरे के प्रति उस कहावत को चरितार्थ किया है जिसमें कहा गया है कि  

“friend in need is a friend indeed in English” जबकि अमेरिका इस पर कई बार खरा नहीं उतरा। मोदी और पुतिन के निजी संबंधों की वजह से मोदी खुल कर पुतिन को कहा था “यह युद्ध का समय नहीं है”।  

और कल फिर बड़े स्पष्ट शब्दों में पुतिन के साथ रात्रिभोज और शिखर सम्मेलन में कीव में बच्चों की मौत का मामला उठाते हुए कहा कि। “जब युद्ध में मासूम बच्चों की मौत होती है तो ह्रदय छलनी हो जाता है और यह दर्द बहुत भयानक होता है”। इसके साथ ही मोदी ने पुतिन को और भी साफ़ कहा कि “बम, बंदूक और युद्ध से शांति नहीं आ सकती”। यह बातें केवल एक सच्चा मित्र ही किसी मित्र को कह सकता है। 

परंतु यूक्रेन के जेलेंस्की ने समझदारी की कमी का परिचय देते हुए मोदी पर कटाक्ष किया है कि “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेता मास्को में दुनिया के सबसे खूंखार नेता को गले लगाता है”। मोदी का संदेश युद्ध से दूर रहने का पुतिन के लिए नहीं जेलेंस्की के लिए भी है क्योंकि जेलेंस्की अपने आप में रूस के सामने कोई हैसियत नहीं रखता अगर नाटो देश उसके साथ न होते। 

मोदी-पुतिन की दोस्ती में एक छुपा हुआ डर चीन को भी रहता है कि कहीं रूस चीन से अलग न हो जाए और मुझे लगता है भविष्य में ऐसा ही होगा क्योंकि रूस का तो भारत से साथ दे दिया अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते लेकिन कल चीन के साथ ऐसा हुआ ताइवान से छेड़छाड़ करके तो भारत किसी हालत में उसका साथ नहीं देगा।