हालांकि बंगाल के कई साल से जो भी हालात चल रहे हैं, उन्हें देख कर कोई भी कह सकता है कि ममता सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। लेकिन एक बात पर पहले गौर करनी होगी कि क्या बंगाल की जनता का कोई दोष नहीं है। 2021 के चुनाव में ममता की TMC को जनता ने 48. 02 % वोट देकर 215 सीट दी यानी दो तिहाई से भी ज्यादा। ममता यदि निरंकुश हुई तो उसके लिए दोषी जनता भी कम नहीं है।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
वर्ष 1994 में SR Bommai के एक केस में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए दिशा निर्देश तय कर दिए थे कि किन हालत में ऐसा किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया कि कानून और व्यवस्था की समस्या संवैधानिक तंत्र टूटने के समान नहीं है। दंगे, विरोध प्रदर्शन या आपराधिक गतिविधि या अन्य अशांति का तात्पर्य राज्य के संवैधानिक ढांचे का पूरी तरह से टूटना नहीं है।
अनुच्छेद 356 लागू करने के लिए राज्य में संवैधानिक तंत्र का पूरी तरह से टूटना ज़रूरी है। संवैधानिक तंत्र के टूटने में ऐसी स्थिति शामिल हैं जहां।
राज्य का शासन पंगु हो जाता है और सरकार असंवैधानिक तरीके से काम कर रही होती है;
या संविधान के मूल सिद्धांतों को बनाए रखने में विफलता, जैसे कि विधानसभा को बुलाने में विफल होना या न्यायिक निर्णयों को लागू करने से मना करना या राज्य सरकार का कोई ऐसा कार्य जो देश की अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालता है (अर्थात अलग राष्ट्र की घोषणा)।
अब इन सब बातों को देख कर यही कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाना संभव ही नहीं छोड़ा।
लेकिन मेरा फिर भी मानना है कि यह सब दिशा निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने जो दिए उन पर भी समय समय पर सुप्रीम कोर्ट में बैठने वाले जजों के अलग मत हो सकते हैं और अलग व्याख्या हो सकती है।
यदि देखा जाए तो ममता ने बांग्लादेशी और रोहिंग्याओं की बंगाल में घुसपैठ करा कर देश की अखंडता और संप्रभुता को निश्चित रूप से खतरे में डाला है और सुप्रीम कोर्ट में Social Activist संगीता चक्रवर्ती ने 2021 में याचिका दायर करके मांग की थी कि बंगाल में ऐसे 2 करोड़ घुसपैठियों को बाहर निकलने के आदेश दिए जाएं लेकिन अदालत ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ तो राष्ट्रपति शासन न लगाने का कार्यक्रम तय कर दिया और दूसरी तरफ ख़राब हालात को ठीक करने की इच्छा नहीं है।
इसमें भी कोई शक नहीं है कि ममता सरकार पंगु हो चुकी है क्योंकि वह अब कुछ लोगों के ही कब्जे में है और जब सरकार जनहित में काम न कर रही हो तो उसे पंगु ही कहा जा सकता है।
यदि राष्ट्रपति शासन लगा दिया तो सुप्रीम कोर्ट सबसे पहले इस बात पर तवज्जो देगा, कि जिस सरकार के पास 73% विधायक हैं आप उनकी सरकार को कैसे बर्खास्त कर सकते हैं और मोदी को बदनाम करने के लिए कोर्ट में ही टूल किट काम कर जाएगा।
लेकिन ऐसा नहीं है कि मोदी इसका इलाज नहीं करेगा और राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जाएगा, वह ऐसे हालात में लगाया जाएगा जब कोर्ट भी दखल नहीं दे पाए। कभी कभी समाज की सुखप्राप्ति के लिए बहुत लोगों को बलिदान होना पड़ता है जैसे कंस वध से पहले भगवान के अनगिनत भक्तों को यातनाएं झेलनी पड़ी थी। ऐसे बहुत उदाहरण मिल सकते हैं। अंत ममता शासन का भी होगा लेकिन शांति से नहीं होगा।


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