मुफ्त बाँटने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी (साभार: SCI/भास्कर)
आज स्कूलों में वितरित होने वाले mid-day meal पर खूब राजनीति होती है। लेकिन जब प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे तब हर छात्र/छात्रा को पाव भर दूध पीने को मिलता था कोई राजनीति नहीं हुई। इतना ही नहीं कटरों में भी दूध बंटता था। आर्थिक रूप से कमजोर यानि निर्धन छात्र/छात्राओं से केवल Boy/Girl फण्ड लिया जाता था। जबकि आज तो ड्रैस और किताबें देने के साथ-साथ उनके बैंक खातों में भी एक राशि सरकार की तरफ से दी जा रही है। उसके बावजूद कुछ NGOs किताबें वितरित कर रहे हैं, क्यों? सरकार क्यों नहीं ऐसे NGOs की जाँच करवाती? क्या ये गुप्त घोटाला नहीं?
दूसरे, सरकार द्वारा BPL में फ्री राशन लेने वालों की आर्थिक स्थिति की अगर जाँच करे कम से कम 60 से 70 प्रतिशत लोग हर तरह से धन सम्पन्न मिलेंगे। क्या यह वास्तविक गरीब लोगों के अधिकार का हनन नहीं किया जा रहा? सरकार कब इस योजना का दुरुपयोग करने वालों पर कार्यवाही करेगी?
चुनावी रेवड़ी बाँटने की पीएम मोदी की चिंता पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अब मुहर लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (12 फरवरी 2025) को कहा कि चुनाव से पहले रेवड़ी बाँटने की प्रथा के कारण लोग काम नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें मुफ्त मे राशन और पैसा मिल रहा है। वहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में नकदी बाँटने की खिलाफ याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया।
जहाँ तक चुनावों में नकदी और शराब बाँटने का रिवाज देश में पहले चुनाव से लेकर आज तक चल रहा है और पता नहीं कितने चुनावों तक चलता रहेगा। वास्तव में चुनावों में हार-जीत इन बिकाऊ वोटों से ही होता है।
मुफ्त चीजें बाँटने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायाधी ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने शहरी क्षेत्रों में बेघर लोगों के आश्रय के अधिकार से संबंधित मामले की सुनवाई करते हुए चुनाव से पहले मुफ्त चीजें देने की प्रथा पर असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि बेघर लोगों को मुख्यधारा के समाज में शामिल किया जाना चाहिए।
जहाँ तक बेघर या झुग्गी-झोंपड़ी वालों पक्का घर देने की है, सरकार को समय-समय पर इस बात की जाँच करनी होगी कि क्या वहां रहना वाला वही जिसे मकान आबंटित किया गया था। इस बात की भी गुप्त जाँच करनी चाहिए कि मकान लेने वाले का पहले कोई आवास था या नहीं।
गौरतलब करने वाली बात यह है कि मुस्लिम क्षेत्रों में हिन्दू मकानों पर राल टपकाने और किसी बिल्डर द्वारा फ्लैट्स बनाने पर एकदम खरीदार मुस्लिम ही होता है। अगर मुस्लिम गरीब है तो फ्लैट खरीदने के लिए पैसा कहाँ से आता है इस बात की गंभीरता से जाँच जरुरी है। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक इसकी जाँच करनी होगी।
कल्लन स्वीट्स जामा मस्जिद के पास केवल शाम के समय वृद्ध महिला अपनी जवान बेटी के साथ भीख मांगती थी, लड़की इतनी चरित्रवान की अगर किसी ने उसके आंचल में 10 का नोट डाल दिया कभी निगाह ऊपर कर 10 रूपए देने वाले को देखती नहीं थी। निगाह नीची ही रहती थी। उसकी 2 टैक्सियां चल रही थी और उस जवान लड़की के निकाह में कार और खाने में चिकन और मटन(दूसरा मीट नहीं) यानि भिखारी के पास भी कितना धन। दूसरे, कुछ भिखारियों ने आने-जाने की रिक्शा कर रखी हैं।
बेरोजगारी के दिनों कहीं आवेदन करने रजिस्ट्री करवाने डाकखाने जाना पड़ता था। एक दिन रजिस्ट्री करने बाबू से पूछा कि 'रोज सुबह मनीऑर्डर की खिड़की पर भिखारियों की ही लम्बी लाइन देखता हूँ।' बाबू ने जवाब दिया कि 'बेटा जिसने एक महीने जामा मस्जिद डाकखाने में ड्यूटी दे दी कभी किसी भिखारी को 1 पैसा नहीं देखा।' जवाब अटपटा सुन पूछने पर जवाब मिला 'यह इनका व्यापार है नौकरी नहीं।'
जस्टिस गवई ने कहा, “दुर्भाग्य से इन मुफ्त सुविधाओं के कारण… लोग काम करने को तैयार नहीं हैं। उन्हें मुफ्त राशन मिल रहा है। उन्हें बिना कोई काम किए ही राशि मिल रही है।” पीठ ने कहा, “हम उनके प्रति आपकी चिंता की सराहना करते हैं, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होगा कि उन्हें समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जाए और राष्ट्र के विकास में योगदान करने की अनुमति दी जाए।”
केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन को अंतिम रूप देने के लिए काम कर रही है, ताकि शहरी क्षेत्रों में बेघर लोगों को आश्रय प्रदान करने सहित कई मुद्दों का समाधान किया जा सके। इस पर पीठ ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि केंद्र के मिशन को लागू करने में कितना समय लगेगा। इस मामले की सुनवाई 6 सप्ताह बाद होगी।

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