क्या कांग्रेस में नेताओं को आत्मसम्मान की चिंता नहीं? हाईकमान के चक्कर में राजस्थान, मप्र और पंजाब में डूबी कांग्रेस, अब कर्नाटक की बारी, खरगे बोले- हाईकमान फैसला लेगा! यानि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह खड़के भी सिर्फ शो-पीस

किसी भी पार्टी में अध्यक्ष से बड़ा कोई पद नहीं होता। अध्यक्ष के कन्धों पर पार्टी का भविष्य होता है। लेकिन कांग्रेस में स्थिति एकदम उल्टी है। कांग्रेस में अध्यक्ष कोई भी हो जो निर्णय लेना है गाँधी परिवार को, क्यों? फिर अध्यक्ष किस लिए? जब कोई भी निर्णय गाँधी परिवार को ही लेना है तो कांग्रेस में क्या गुलामों का जमावड़ा है? जिस तरह कोई गुलाम अपने आका से बिना पूछे कोई काम नहीं कर सकता वही हाल का कांग्रेस का है। 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री होते हुए 10 जनपथ की आज्ञा के बिना कुछ बोलने या करने का अधिकार नहीं था वही हालत अध्यक्ष मल्लिकार्जुन की है। यानि जब तक कांग्रेस का जनाजा नहीं निकल जाएगा कांग्रेस का धुरंधर से धुरंधर नेता गुलामी की बेड़ियाँ नहीं तोड़ पाएगा। इन गुलामों को नहीं मालूम की परिवार की कीमत ही तुम्हारी वजह से है। जिस दिन गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ आज़ाद नहीं होंगे जनता में परिवार से कहीं ज्यादा इज्जत तुम लोगो की होगी। यह कटु सत्य है और कड़वी गोली को खाकर आत्मसम्मान जीना सीखो। 
        गुलामों की तरह हाथ बांधे खड़े प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के आगे सारे नेता ; यही सिलसिला आज भी कायम है  

कर्नाटक में हाल ही में कई कांग्रेसी विधायकों ने अपनी ही पार्टी की कांग्रेसी सरकार के कामकाज पर गहरा असंतोष जताया है। सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली राज्य सरकार में सहकारिता मंत्री के.एन राजन्ना ने कुछ दिन पहले ही सितंबर के बाद राज्य में क्रांतिकारी राजनीतिक घटनाक्रम और बदलाव का संकेत देते हुए टिप्पणी की थी। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें फिर से शुरू हो गई हैं। पार्टी हलकों में मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के बदलाव की भी चर्चा है। यहां तक कि सियासी हलकों में विवादों में घिरे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बदलाव के बारे में भी कयास लग रहे हैं। कर्नाटक कांग्रेस में अंदरूनी कलह के संकेतों के बीच, राज्य के प्रभारी और पार्टी महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला कर्नाटक का दौरा कर सभी विधायकों के साथ अलग-अलग बैठकें कीं हैं। इस पर मीडिया के सीधे सवालों का जवाब देते हुए सुरजेवाला ने गोल-मोल जवाब दिया कि सरकार और विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज की जांच हो रही है। यानी उन्होंने ये तो माना कि कर्नाटक सरकार में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। इसीलिए उन्हें राज्य के दौरे पर विधायकों के रोष को शांत करने के लिए आना पड़ा है।

 कांग्रेस पर सुरजेवाला के पर्दे को मल्लिकार्जुन खरगे ने तार-तार कर दिया

कर्नाटक के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने जिस अंसतोष पर छीना सा पर्दा डालने का असफल कोशिश की है, उसके पार्टी अध्यध मल्लिकार्जुन ने सरेआम कर दिया है। एक बार फ‍िर कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया को बदलने की चर्चा शुरू हुई तो कांग्रेस अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मीडिया से कह द‍िया, “कर्नाटक मामले में हाईकमान फैसला करेगा।” यह भी और भी दिलचस्प तथ्य है कि कांग्रेस जब भी संकट की स्थिति या बदलाव की बयार चलती है, तो पार्टी नेता एक ही लाइन पर आकर खड़े हो जाते हैं और कहने लगते हैं क‍ि अंतिम फैसला तो ‘हाईकमान’ ही करेगा। आपको याद होगा कि पंजाब, राजस्‍थान से लेकर मध्‍य प्रदेश तक में भी जब कांग्रेस और सरकार के बीच पेच फंसा तो यही शब्‍द वहां के प्रभारी और दूसरे कांग्रेस नेताओं के थे। तो क्‍या कर्नाटक भी उसी राह पर चल निकला है? क्‍या ज‍िस तरह इन तीनों प्रदेशों में कांग्रेस की नैया डूब गई, ठीक वैसा ही कर्नाटक में पेंच फंस गया है?
कांग्रेस का ‘हाईकमान’ तो भूत की तरह सब जगह पर मौजूद
दूसरी ओर मल्लिकार्जुन खरगे के ‘हाईकमान’ संबंधी शब्‍द पर बीजेपी भी मजे ले रही है। वो पूछ रही क‍ि जब कांग्रेस अध्‍यक्ष खरगे ही खुद कह रहे हैं क‍ि ‘हाईकमान फैसला करेगा’ तो पार्टी का असली नेता कौन है? बेंगलुरु साउथ से सांसद तेजस्वी सूर्या ने चुटकी ली, कांग्रेस का हाईकमान भूत की तरह है। अदृश्‍य, अनसुना, लेकिन हर फैसले पर असर डालता है। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष, जिन्हें लोग हाईकमान समझते थे, वे भी इसका नाम फुसफुसाते हैं और कहते हैं कि यह वे नहीं हैं। बीजेपी नेता आरोप लगाते हैं क‍ि सोनिया गांधी और उनके बच्चे- राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा- पर्दे के पीछे से पार्टी चलाते रहते हैं। अब यह पूरी तरह से एक्सपोज हो गया है कि मल्लिकार्जुन खरगे तो सिर्फ मुखौटा हैं। इसीलिए सवाल भी पूछा जा रहा क‍ि क्‍या अब कर्नाटक में लुट‍िया डूबने वाली है, क्‍योंक‍ि ऐसा ही कुछ पंजाब, राजस्थान, एमपी में भी हुआ था।
पार्टी में अपने खिलाफ असंतोष और घोटालों के घिरे CM सिद्धारमैया
दरअसल, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एक नहीं, कई मुश्किलों के बीच चौतरफा घिर गए हैं। उनको लेकर विधायकों में तो असंतोष है ही, दूसरी ओर उप मुख्यमंत्री से भी उनकी पटरी नहीं बैठ रही है। उनपर भ्रष्टाचार के तो आरोप हैं ही, सिद्धारमैया व अन्य के खिलाफ करोड़ों के घोटाले के सबूतों से छेड़छाड़ के लिए जांच करने और मामला दर्ज करने की भी मांग की गई है। शिकायत में मुख्यमंत्री के बेटे यतींद्र सिद्धारमैया का भी नाम है। इस शिकायत के बाद सीएम के साथ ही उनके पुत्र भी ईडी के रडार पर आ गए हैं। कहा भी गया है कि पाप का घड़ा आज नहीं तो कल फूटता जरूर है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के भी बरसों पुराने ‘पाप’ अब सबके सामने आने लगे हैं। यही वजह है कि सिद्धारमैया की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले पा रही हैं। करोड़ों के घोटाले में लोकायुक्त, ईडी की जांच और कोर्ट के कोड़े के बाद अब सिद्धारमैया के खिलाफ एक और नई शिकायत हुई है। उन पर आरोप लगा है कि उन्होंने पत्नी को 14 बेशकीमती प्लॉट दिलाने में ही अहम भूमिका नहीं निभाई, बल्कि मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (MUDA) के इस करोड़ों के घोटाले में जब अंगुलियां उनकी ओर उठने लगीं तो मुख्यमंत्री ने सबूतों को भी नष्ट कराने की अहम कोशिश की। प्रदीप कुमार नाम के व्यक्ति ने प्रवर्तन निदेशालय को लेटर लिखकर यह शिकायत दर्ज कराई है।
कर्नाटक भी कांग्रेस शासित उन राज्यों की राह पर चल निकला है, जहां बड़े कांग्रेसी नेताओं के बीच असंतोष के चलते सरकारें काम नहीं करा पाईं और फिर जनता ने उनकी छुट्टी कर दी
पंजाब: कैप्‍टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के झगड़ा
2021 में कैप्‍टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच राजनीतिक लड़ाई सड़कों पर आ गई थी। सिद्धू हर सूरत में कैप्टन को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतारना चाहते थे। लेकिन अमरिंदर सिंह पहले तो डटे रहे, लेकिन उनके झगड़े में हाईकमान महीनों तक मूकदर्शक बना रहा। नतीजा हुआ क‍ि पार्टी के द‍िग्‍गज नेता कैप्टन अमर‍िंदर सिंह को बाहर जाना पड़ा। सिद्धू नाराज हैं और पार्टी का जमीनी जनाधार ढह गया। तब कैप्टन अमरिंदर सिंह आर-पार की लड़ाई के मूड में दिखे थे। कैप्टन ने नवजोत सिद्धू को मूर्ख, जोकर और ड्रामेबाज तक कह दिया। पार्टी प्रधान होने के बावजूद कैप्टन ने सिद्धू के खिलाफ बयानबाजी की। यहां तक कि उन्होंने सिद्धू को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा तक बता दिया। उन्होंने कहा कि सिद्धू पार्टी के प्रदेश प्रधान हैं, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर ऐसा है तो वे मुझे कांग्रेस पार्टी से निकाल दे। इसके बाद हाईकमान ने कैप्टन को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया और बाद में हुए चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ासाफ हो गया।
राजस्‍थान: जादूगर गहलोत और निक्कमे पायलट के बीच हाईबोल्ट ड्रामा
कमोबेश पंजाब जैसा ही कुछ राजनीतिक घटनाक्रम राजस्‍थान में भी हुआ। बस यहां किरदार दूसरे थे। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच में जमकर घमासान हुआ। पूरे पांच साल तक अशोक गहलोत और सच‍िन पायलट खेमों में खिंचाव बना रहा। पहले तो मूकदर्शक बना हाईकमान टालता रहा और मुद्दा लटकता रहा। जब वह थोड़ा एक्शन लेने के मूड में आया को गहलोत की राजनीतिक चालों ने हाईकमान के हो ही चारों खाने चित्त कर दिया। ना सिर्फ उन्होंने पायलट को सत्ता से दूर रखा, बल्कि हाईकमान के चाहने के बावजूद वे पार्टी अध्यक्ष नहीं बने। गहलोत और पायलट की लड़ाई के चलते पार्टी के कार्यकर्ता असमंजस में रहे, नतीजा जनता से दूरी बन गई। विधानसभा चुनाव में पार्टी सत्‍ता से बाहर हो गई।
मध्‍य प्रदेश: ज्‍यो‍त‍िराद‍ित्‍य सिंधिया की बगावत को हाईकमान ने हल्का समझा
एमपी की कहानी तो और भी ज्यादा दिलचस्प और हाईकमान की निष्क्रियता की मिसाल है। मध्य प्रदेश में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच हाईकमान सोचा रहा और कांग्रेस के हाथ से सत्ता के सूत्र निकल गए। आपको बता दें कि मध्य प्रदेश की राजनीति की कहानी में भी कांग्रेस हाईकमान का जबरदस्त पेच है। दरअसल, 2020 में जीत के बाद ज्‍यो‍त‍िराद‍ित्‍य सिंधिया की बगावत को हाईकमान हल्का समझता रहा। कांग्रेस हाईकमान से सिंधिया को हल्के में लेने का नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस की सरकार ही गिर गई और बीजेपी ने बिना चुनाव लड़े ही सत्ता हथिया ली। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ऐतिहासिक बहुमत से सत्ता में आई।
कर्नाटक में जमीनों के खेल में किए गए पाप होने लगे उजागर 
अब कर्नाटक में भी कांग्रेस के भीतर असंतोष की खबरें हैं। इसके साथ ही मल्‍ल‍िकार्जुन खरगे के बयान ने आग पर घी डाल दिया है, क्योंकि वे खुद कर्नाटक से हैं और फिर भी फैसला ‘दिल्‍ली’ पर छोड़ रहे हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनकी पत्नी पर भी जमीनों के खेल में ईडी शिकंजा कसती जा रही है। दिग्गज कांग्रेस नेता सिद्धारमैया के दबाव में मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) से उनकी पत्नी ने उस जमीन के बदले मैसूर के पॉश इलाके में 14 प्लॉट हासिल कर लिए, जो कानूनन उनकी थी ही नहीं। इस जमीन घोटाले मामले में मैसूर लोकायुक्त ने राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, उनकी पत्नी, साले और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। दूसरी ओर प्रवर्तन निदेशालय की टीम ने 30 सितंबर को इन सभी के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। ईडी की जांच से डरी सिद्धारमैया की पत्नी बीएन पार्वती अब MUDA को 14 विवादित प्लॉटों को वापस करने जा रही हैं। इससे यह अपने-आप ही साबित हो रहा है कि उन्होंने न सिर्फ घोटाला किया है, बल्कि अपनी गंभीर गलती मान भी ली है।
सीएम के बेटे यतींद्र सिद्धारमैया की भी 14 साइटों के अवैध अधिग्रहण में भूमिका
प्रदीप ने सत्ता का दुरुपयोग कर 14 साइटों को अवैध रूप से हासिल करने का आरोप लगाया गया है। ईडी को 2 अक्टूबर को लिखे पत्र में प्रदीप कुमार ने दावा किया, “सिद्धारमैया ने 8 जून 2009 से 12 मई 2013 के बीच और फिर 10 अक्टूबर 2019 से 20 मई 2023 के बीच कर्नाटक विधानसभा में विपक्षी दल के नेता के रूप में कार्य किया। सिद्धारमैया 13 मई 2013 से 15 मई 2018 के बीच कर्नाटक के सीएम भी थे। सिद्धारमैया के साथ-साथ उनके बेटे यतींद्र सिद्धारमैया, जिन्होंने 12 मई 2018 से 13 मई 2023 के बीच विधानसभा सदस्य के रूप में वरुणा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था, ने भी अपने माता-पिता सिद्धारमैया और पार्वती सिद्धारमैया के व्यक्तिगत आर्थिक लाभ के लिए अपने सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करके गंभीर अपराध किया है।” उन्होंने कर्नाटक के राज्यपाल से भी सिद्धारमैया द्वारा कानून के प्रावधानों के विपरीत 14 साइटों के अवैध अधिग्रहण के बारे में शिकायत की थी।
सीएम MUDA के अधिकारियों का इस्तेमाल करके सबूतों को नष्ट कर रहे
ईडी को भेजे शिकायती पत्र में उन्होंने आगे कहा है, “इस बीच सिद्धारमैया अपने आधिकारिक पद का इस्तेमाल कर रिकॉर्ड से छेड़छाड़ कर रहे हैं और खुद के साथ-साथ MUDA के अधिकारियों का इस्तेमाल कर सबूतों को नष्ट कर रहे हैं।” इससे पहले कार्यकर्ता स्नेहमयी कृष्णा, जो MUDA घोटाले में याचिकाकर्ता हैं, गुरुवार को बेंगलुरु में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के समक्ष पेश हुए। उन्होंने कहा कि MUDA मामले में हजारों करोड़ रुपये शामिल हैं। ED ने उन्हें तलब किया और कथित MUDA घोटाले से संबंधित सभी दस्तावेज और रिकॉर्ड पेश करने को कहा। यह कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ ED को की गई उनकी ईमेल शिकायत के संबंध में है।
MUDA बना हुआ है घोटालों का अड्डा, सिद्धारमैया का केस बड़ा उदाहरण
इस बीच याचिकाकर्ता स्नेहमयी कृष्णा ने कहा, “मैं अपने परिवार और अपनी आय पृष्ठभूमि से संबंधित कुछ आवश्यक दस्तावेजों जैसे पैन कार्ड, आधार कार्ड और अन्य के साथ ED अधिकारियों के समक्ष पेश होने आई थी। मैंने अपनी शिकायत से संबंधित दस्तावेज दिए हैं। सिद्धारमैया के मुद्दे को एक उदाहरण के रूप में लिया गया है। MUDA मामले में हजारों करोड़ रुपये शामिल हैं। इसलिए मैंने गहन जांच की मांग की है।” ईडी द्वारा कर्नाटक के सीएम पर कथित MUDA भूमि आवंटन घोटाले से जुड़े एक मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किए जाने के बाद, उनकी पत्नी ने MUDA आयुक्त को पत्र लिखकर प्राधिकरण द्वारा उन्हें आवंटित किए गए 14 प्लॉट को सरेंडर करने की पेशकश की।
उस जमीन के बदले 14 प्लॉट दिए, जो कानूनन सीएम की पत्नी की नहीं थी
आइये पहले जानते हैं कि मूडा (MUDA) का यह मुद्दा असल में क्या है। दरअसल, कई साल पहले अर्बन डेवलपमेंट संस्थान मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी ने रिहायशी इलाके विकसित करने के लिए किसानों से जमीनें ली थी। इसके बदले MUDA ने 50:50 की स्कीम दी। इसके तहत जमीन मालिकों को विकसित भूमि में 50 प्रतिशत साइट या एक वैकल्पिक साइट देने का प्रावधान किया गया। आरोप है कि MUDA ने 2022 में सिद्धारमैया की पत्नी पार्वती को मैसूरु के कसाबा होबली स्थित कसारे गांव में 3.16 एकड़ जमीन के बदले मैसुरु के एक पॉश इलाके में 14 साइट्स आवंटित की। इन साइट्स की कीमत पार्वती की जमीन की तुलना में की गुना ज्यादा थी। सबसे बड़ी बात तो यह कि इस 3.16 एकड़ जमीन पर भी पार्वती का कोई कानूनी अधिकार ही नहीं था। ये जमीन पार्वती के भाई मल्लिकार्जुन ने उन्हें 2010 में गिफ्ट में दी थी। MUDA ने इस जमीन को अधिग्रहण किए बिना ही सिद्धारमैया की पत्नी को प्लॉट आवंटन दे दिया।

No comments: