ये तो अजब तमाशा हो गया कि सुप्रीम कोर्ट खालिद उमर, शरजील इमाम और गुलफ़िशा फातिमा की जमानत अर्जी पर 10 दिसंबर को फैसला सुरक्षित करता है और अगले दिन अतिरिक्त सेशन जज Rouse Avenue Court समीर बाजपेयी उसे बहन की शादी में शामिल होने के लिए 14 दिन की अंतरिम जमानत दे देते है।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
ऐसा कैसे संभव हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने जब उसकी नियमित जमानत (Regular Bail) की अर्जी पर आदेश सुरक्षित कर लिया तो ऐसे में तो किसी भी कोर्ट को किसी भी तरह की जमानत देने का कोई अधिकार ही नहीं होना चाहिए। फिर भी अतिरिक्त सेशन जज द्वारा अंतरिम जमानत देने का मतलब तो यह हो गया कि वह सुप्रीम कोर्ट से भी बड़े हो गए। आदेश में शर्त लगाई है कि वो किसी से नहीं मिलेगा केस के संबंध में सोशल मीडिया का उपयोग नहीं करेगा और अपना फ़ोन नंबर जांच अधिकारी को देगा। अगर वो फ़ोन पर किसी से बात कर लेगा तो कैसे उसके पीछे पीछे भागते रहोगे।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने फैसला सुरक्षित करते हुए सभी पक्षों को अपने अपने documents 18 दिसंबर तक कोर्ट में जमा करा दें जिसका मतलब है अदालत के शीतकालीन अवकाश शुरू होने से पहले 19 दिसंबर को फैसला सुना सकती है।
बहन की शादी का मामला खालिद उमर ने सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं उठाया जिससे वहां से ही अंतरिम जमानत मिल जाती लेकिन उसने अंतरिम जमानत मांगी अतिरिक्त सेशन जज से और उन्होंने दे भी दी।
मेरे विचार से सुप्रीम कोर्ट को इस पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और अतिरिक्त सेशन जज के आदेश को निरस्त कर देना चाहिए। खालिद उमर का वकील कपिल सिब्बल है और उसी ने ये गोलमाल करने की सलाह दी होगी। इसलिए खालिद से ज्यादा सुप्रीम कोर्ट को खबर कपिल सिब्बल की लेनी चाहिए जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट की एक तरह मानहानि हुई है। बहन की शादी में जाना है तो एक दिन की ही जमानत देनी चाहिए थी जिस दिन शादी है।

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