नूपुर शर्मा से लेकर अब बिहार मुख्यमंत्री नितीश कुमार हिजाब नकाब तक टीवी परिचर्चाओं में इस्लाम की असलियत सामने आ रही है जो साबित कर रहा है कि कट्टरपंथी मुसलमान और तथाकथित सेक्युलर हिजाब और बुर्का के नाम पर किस तरह मुस्लिमों को बहकाया जा रहा है। लेकिन मुसलमान इन लोगों के मकड़जाल में फंस सच्चाई समझने की कोशिश नहीं कर रहा।
डॉ नुसरत परवीन का बुर्का पहन पहचान छुपा कर नौकरी का नियुक्ति पत्र लेने जाना कहां तक जायज़ है। इतना ही ख्याल है अपनी पहचान या मज़हबी सोच का तो नौकरी करने की क्या जरूरत है, घर बैठो। एक डॉ शाहीन है जो फरीदाबाद के अल फलाह विशवविद्यालय से आतंकी की रूप में गिरफ्तार हुई थी, उसके कहा कि वो “लिबरल” है बुर्का नहीं पहनती। ये क्या Bacward है और कल को इसकी पहचान भी संदिग्ध होती तो क्या होता?
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| लेखक चर्चित YouTuber |
अपनी लड़कियों को बुर्के में रखना चाहते हैं लेकिन अपनी खुद की शादी के लिए सोनाक्षी सिन्हा जैसी सुंदर हिन्दू लड़की चाहिए। लव जिहाद में फंसा कर मारने के लिए सुंदर हिंदू लड़कियां चाहिए जिन्हें बर्बाद करने के पैसा मिलता है।
कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से पहले स्कूलों में हिजाब का भूत सवार हुआ था और करोड़ो की संपत्ति फूंक दी दंगाइयों ने। मामला हाई कोर्ट गया जहां 3 जजों की पीठ ने स्कूलों में हिज़ाब को नियमों के विरुद्ध बता कर स्वीकृति देने से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में अपील हुई लेकिन पीठ बनी दो जजों की और दोनों ने अलग अलग निर्णय कर दिए (Split Verdict)। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ नहीं बनाई । जो भी गंभीर मुद्दे होते हैं मुस्लिमों के, उन पर न्यायपालिका में “सुई पटक सन्नाटा” छा जाता है। क्योंकि इस विषय पर उन्हें पता है कि यदि उन्होंने स्कूलों में हिज़ाब की अनुमति दे दी तो फिर अदालत में भी हिज़ाब/बुर्का शुरू हो जायेगा।
नवंबर 2024 में जम्मू हाई कोर्ट में एक महिला वकील Syed Ainain Qadri एक घरेलु हिंसा के केस में पैरवी करने निक़ाब पहन कर पेश हुई (the niqab covers the face, leaving only the eyes visible)। उस रिपोर्ट से ऐसा नहीं लगा कि जैसे वो पहली बार कोर्ट गई हो - लेकिन माननीय न्यायाधीश ने उसे निकाब हटाने के लिए कहा जिससे उसकी Professional के तौर पर पहचान को परखा जा सके (to verify her identity as a professional) लेकिन उसने ऐसा करने से मना कर दिया और कहा कि यह पहनना उसका मौलिक अधिकार है। अदालत ने नियमों को देखने के लिए कहा लेकिन रजिस्ट्रार ने बार कौंसिल के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि ड्रेस कोड में “बुर्का या हिज़ाब/निकाब की अनुमति नहीं दी गई है”। अगर उसे अनुमति दे दी गई होती तो आज सुप्रीम कोर्ट समेत सभी हाई कोर्ट में महिला वकील बुर्के या हिज़ाब में नज़र आती।
ऐसे मामले उठाने का मतलब केवल अराजकता फ़ैलाने से है। उमर अब्दुल्ला नीतीश पर बरस रहा है कि अगर वो किसी हिंदू लड़की के साथ ऐसा करे तो कैसा लगेगा। महबूबा मुफ़्ती कह रही है महिला का हिज़ाब खीचना बुढ़ापे का असर था या मुसलमानो का अपमान (जबकि वो हिज़ाब नहीं था पूरा बुर्का था जिसकी वजह से चेहरा पूरा ढाका हुआ था )।
ये लोग भूल जाते है कि अशोक गहलोत ने एक राजस्थानी महिला का घूंघट हटा दिया था और कहा था घूंघट प्रथा ख़त्म हो गई लेकिन मुस्लिम महिला को बुर्के में बात की। गहलोत के हिंदू महिला का घूंघट हटाने पर तो मीडिया ने कोई रिपोर्टिंग नहीं की और किसी सेकुलर ढक्कन नेता ने कुछ नहीं कहा। महबूबा की बेटी मौका देख कर ही हिज़ाब पहनती है। इधर अरफ़ा खानुम आजकल मीडिया में बहुत फुदक रही है, वो भी कभी हिज़ाब या बुर्का नहीं पहनती।
जरूरत से ज्यादा स्वतंत्रता लोगों का मानसिक संतुलन बिगाड़ देती है। कुछ दिन तो गुजारो अफगानिस्तान में मुस्लिम महिलाओ।

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