पिछले दिनों दिसंबर में नीतीश कुमार के मुस्लिम महिला डॉक्टर का बुर्का थोड़ा से सरकाने पर बड़ा हंगामा हुआ। बाद में कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि वह महिला वास्तव में बांग्लादेशी थी लेकिन इसकी पुख्ता जानकारी मुझे नहीं मिली। अब पता चला है कि उसने 7 जनवरी को ड्यूटी ज्वाइन की लेकिन उसके बाद वह छुट्टी पर चली गई जबकि नौकरी ज्वाइन करते ही किसी तरह की छुट्टी किसी भी करम चारि को नहीं मिलती।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
उसके बाद 8 जनवरी से बिहार के आभूषण व्यापारियों ने The All India Jewellers and Gold Federation (AIJGF) ने सुरक्षा कारणों से बुर्का, हिजाब, masks या हेलमेट पहन कर दुकानों में एंट्री पर रोक लगा दी। ऐसा प्रतिबंध कभी पहले महाराष्ट्र में भी लगाया गया था।
इस कदम को उठाने से न केवल चोरी पर रोक लगाना संभव होगा बल्कि बड़ी डकैती भी रुक सकेंगी।
अभी नीतीश कुमार के बुर्का खिसकाने पर हल्ला हुआ था लेकिन सर्राफा बाज़ारों के इस प्रतिबंध पर कोई हंगामा शुरू नहीं हुआ है। बहुत सी दुकानों के मालिक CCTV कैमरा लगाने में सक्षम नहीं होते और इसलिए उनकी दुकानों में बुर्के में महिलाओं द्वारा चोरी की सम्भावना अधिक होती है। विदेशों के तो कई वीडियो सामने आएं हैं जिनमें बुर्के को पूरा गोदाम बना हुआ दिखाया गया है जबकि वहां CCTV कैमरे अनिवार्य होते हैं।
बुर्का हर उस स्थान पर बैन होना चाहिए जहां से मुस्लिम महिला कोई लाभ उठा सके। वोट डालने के समय चेहरा खुला होना चाहिए; राशन लेने के लिए चेहरा खुला होना चाहिए; पहचान पत्र बनाते हुए तो चेहरा बंद हो ही नहीं सकता; यात्रा के समय जरूरत पड़ने पर चेहरा दिखाना अनिवार्य होना चाहिए। और मुस्लिम समाज के ठेकेदारों को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का पहनना जरूरी है। अगर जरूरी है तो अरफ़ा खानुम, राणा अय्यूब और सबा नकवी जैसे महिलाएं बिना बुर्का पहने बुर्का पहनने की वकालत कैसे कर सकती है? यह दोहरा मापदंड उचित नहीं है। बुर्के की वकालत करने वाली ऐसी महिलाओं को कुछ महीने के लिए अफगानिस्तान भेजना चाहिए जिससे बुर्के का भूत उतर जाए।
आज कट्टरपंथी इस्लामिक मुल्क ईरान विद्रोह के मुहाने पर खड़ा है जहां महिलाएं खुले आम सड़कों पर बुर्का उतार कर फ़ेंक रही हैं और जला भी रही हैं। हर किसी बात के लिए गाज़ा की तरफ देखने और सीखने की बजाय ईरान की तरफ भी देखना चाहिए।

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