कहीं दिए अरबों डालर, कहीं किया युद्ध और कहीं बनाई रणनीति: लुइजियाना से अलास्का तक अमेरिका ने कैसे फैलाईं अपनी सीमाएँ, अब ग्रीनलैंड कब्जाने का प्लान


नए साल 2026 की शुरुआत में ही डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर में हलचल मचा दी है। अमेरिका वेनेजुएला पर हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अपने साथ ले आया। इस कदम के बाद अमेरिका ने कहा कि वे वेनेजुएला के तेल के 30 से 50 मिलियन बैरल का इस्तेमाल करेंगे और स्पष्टीकरण दिया कि यह कार्रवाई लोकतंत्र बहाल करने और सुरक्षा की वजह से की गई है। लेकिन बहुत देशों ने इसे अतंरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है।

वेनेजुएला के बाद ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड को भी अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता’ बताया है और कहा कि वह इसे हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इन विकल्पों में सैन्य कार्रवाई भी शामिल है, ताकि रूस और चीन जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को टाला जा सके। लेकिन ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और दोनों ने साफ कहा है कि वे अमेरिका को अपना हिस्सा नहीं बनने देंगे।

अगर इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग न देखकर इतिहास के साथ जोड़ा जाए, तो अमेरिकी का पुरानी कहानी सामने आती है। अमेरिका पहले भी कई बार पैसे, ताकत और मौके का इस्तेमाल करके अपना सीमा दायरे को बढ़ा चुका है। लुइजियाना की खरीद हो, अलास्का का सौदा हो या हवाई और प्रशांत द्वीपों पर पकड़। हर बार वजह अलग बताई गई, लेकिन तरीका लगभग वही रहा।

अब वेनेजुएला में असर बढ़ाने की कोशिश और ग्रीनलैंड को प्राथमिकता बताना उसी पुराने पैटर्न की याद दिलाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह समझना भी जरूरी है कि अमेरिका कैसे सीमा दायरे बढ़ा रहा है और क्यों अगली बारी ग्रीनलैंड की हो सकती है।

लुइजियाना सौदा: पैसे से अमेरिका का सबसे बड़ा सीमा विस्तार

 अमेरिका का दायरा बढ़ने की कहानी की शुरुआत लुइजियाना सौदे से होती है। यह घटना बताती है कि अमेरिका ने सबसे पहले पैसों के दम पर कैसे अपना आकार कई गुना बढ़ाया। साल 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइजियाना नाम का एक बहुत बड़ा इलाका खरीद लिया। उस समय यह इलाका आज के अमेरिका के करीब एक-तिहाई हिस्से के बराबर था।

उस दौर में फ्रांस के शासक नेपोलियन को यूरोप में युद्ध लड़ने के लिए पैसों की जरूरत थी। वहीं अमेरिका को डर था कि अगर यह इलाका किसी ताकतवर देश के हाथ में रहा, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसी मजबूरी और मौके का फायदा उठाकर अमेरिका ने सिर्फ 15 मिलियन डॉलर में यह पूरा इलाका खरीद लिया। उस समय यह रकम बड़ी लगती थी, लेकिन बाद में यह सौदा अमेरिका के इतिहास का सबसे सस्ता और सबसे फायदेमंद सौदा साबित हुआ।

फ्लोरिडा, टेक्सास से अलास्का: एक ही सोच से अमेरिका का फैलाव

लुइजियाना सौदे के बाद धीरे-धीरे अमेरिका ने अपने कदम आगे बढ़ाए। अगली बारी फ्लोरिडा की आती है। फ्लोरिडा पहले स्पेन के कब्जे में था, लेकिन उस समय स्पेन कमजोर हो चुका था और इस इलाके को ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। अमेरिका को डर था कि फ्लोरिडा उसके लिए खतरा बन सकता है। आखिरकार 1819 में Adams-Onis Treaty हुआ और फ्लोरिडा अमेरिका को मिल गया।

इसके बाद टेक्सास। टेक्सास पहले मैक्सिको का हिस्सा था, लेकिन वहाँ बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक बस चुके थे। हालात ऐसे बने कि टेक्सास ने खुद को अलग देश घोषित कर दिया। कुछ साल बाद 1845 में टेक्सास अमेरिका में शामिल हो गया। यह कोई जमीन खरीदने का सौदा नहीं था, बल्कि राजनीतिक चाल और ताकत का इस्तेमाल से किया गया विस्तार था।

इसी दौर में ओरेगन टेरिटरी को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन आमने-सामने थे। दोनों देशों के बीच टकराव हो सकता था, लेकिन अंत में बातचीत का रास्ता निकला। नतीजतन 1846 की Oregon Treaty के तहत यह इलाका बाँट लिया गया और आज का ओरेगन और वॉशिंगटन अमेरिका के हिस्से में आ गया।

फिर आया सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़, मेक्सिको-अमेरिका युद्ध। यह युद्ध 1846 से 1848 तक चला। युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका को बहुत बड़ा इलाका मिला, जिसमें आज का कैलिफोर्निया, एरिजोना, न्यू मैक्सिको, नेवाडा और यूटा शामिल है। इसे Mexican Cession कहा जाता है। अमेरिका ने कुछ पैसा दिया, लेकिन असल में यह जमीन युद्ध के बाद उसकी ताकत के कारण मिली।

इसके कुछ साल बाद 1853 में Gadsden Purchase हुआ। अमेरिका ने मैक्सिको से एक छोटा-सा मेसिला वैली इलाका खरीदा। अमेरिका की वजह थी कि उसे रेलवे लाइन बिछानी थी। 78 हजार स्क्वायर किलोमीटर की जमीन भले ही छोटी थी, लेकिन अमेरिका ने भविष्य को देखते हुए यह सौदा किया।

अलास्का: कभी बेकार समझा गया, आज दुनियाभर की राजनीति का केंद्र

अलास्का को अमेरिका के विस्तार की कहानी में सबसे दिलचस्प अध्याय माना जाता है। साल 1867 में अमेरिका ने इसे रूस से खरीदा था। उस समय अमेरिका के भीतर ही लोग इस फैसले का मजाक उड़ाते थे। कहा जाता था कि अमेरिका ने बर्फ, बर्फ और सिर्फ बर्फ खरीद ली है। इसे ‘रूस की बेकार जमीन’ तक कहा गया। लेकिन समय ने साबित किया कि यह अमेरिका का यहा फैसला उसकी दूरगामी सोच का उदाहरण है।

अलास्का में बाद में सोना, तेल और गैस निकली। धीरे-धीरे यह इलाका अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा आधार बन गया। आज अमेरिका के पूरे तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा अलास्का से आता है। सिर्फ संसाधन ही नहीं, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद अहम है। अलास्का सीधे ‘रूस के बेहद करीब’ है और आर्कटिक क्षेत्र में भी अमेरिका की मौजूदगी को मजबूत करता है।

यही वजह है कि अलास्का सिर्फ राज्य नहीं, बल्कि अमेरिका का रणनीतिक हथियार बन चुका है। हाल के समय में अलास्का एक बार फिर चर्चा में आया था, जब डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के लिए इस जगह को चुना गया था।

अलास्का यह दिखाता है कि अमेरिका ने सिर्फ आज की जरूरत नहीं देखी, बल्कि भविष्य की ताकत को ध्यान में रखकर फैसले किए। जिस जमीन को कभी बेकार कहा गया, वही आज अमेरिका को ऊर्जा, सुरक्षा और वैश्विक राजनीति में बढ़त देती है।

अमेरिका की यही सोच आज ग्रीनलैंड को लेकर भी दिखाई देती है। जैसे अलास्का में बर्फ के नीचे खजाना निकला, वैसे ही ग्रीनलैंड में भी खनिज, तेल और रणनीतिक रास्ते छिपे हुए हैं। इतिहास बताता है कि अमेरिका जब किसी बर्फीली और दूर की जमीन में दिलचस्पी दिखाता है, तो उसके पीछे सिर्फ नक्शा नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की योजना होती है।

द्वीपों और छोटे क्षेत्रों के जरिए अमेरिका का फैलाव: समुद्री क्षेत्र में पकड़ मजबूत

अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि द्वीपों और छोटे-छोटे क्षेत्रों के जरिए भी दायरा बढ़ाया। ये इलाके रणनीतिक और समुद्री महत्व रखते थे। हर जगह अमेरिका ने अलग तरीका अपनाया। किसी को खरीदा, कभी युद्ध के बाद समझौता और कभी सीधे दबाव या कब्जा। इन इलाकों से अमेरिका ने नौसेना और व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत की।

सबसे पहले बात हवाई द्वीप (Hawaiian Island) की। हवाई पहले स्वतंत्र राज्य था, जहाँ रानी का शासन था। लेकिन अमेरिकी व्यापारियों और सेना के दबाव में 1898 में हवाई को अमेरिका में मिला लिया गया। यहाँ न खरीद हुई, न खुला युद्ध, बल्कि राजनीतिक दबाव और सत्ता पलट के जरिए अमेरिका ने इसे अपने अधीन किया।

इसके बाद आते हैं फिलिपींस और प्रशांत क्षेत्र के बड़े द्वीप। 1898 का स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद अमेरिका को फिलिपींस, गुआम (Guam) और प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) मिले। यह इलाके सीधे युद्ध और उसके बाद हुए समझौते से अमेरिका में शामिल हुए। यहाँ अमेरिका का मकसद समुद्री रास्तों और रणनीतिक बेस पर दबदबा बनाना था।

अमेरिका ने छोटे और दूरदराज के अटोल और द्वीप भी अपने अधीन किए। इनमें Midway Island, Wake Island, Johnston Atoll, Palmyra Atoll, Kingman Reef और American Samoa शामिल हैं। ये इलाके आकार में छोटे थे। अमेरिका ने इनमें सैन्य बेस बनाए, नौसेना के लिए रास्ते बनाए, जिससे प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ मजबूत हुई।

अगर अब तक की पूरी कहानी को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो बात साफ समझ आती है। अमेरिका का विस्तार कभी अचानक नहीं हुआ और न ही किसी एक तरीके को अपनाने से हुआ। उसने कभी जमीन पैसे देकर खरीदी, कभी समझौते और दबाव से ली, कभी युद्ध के बाद अपने कब्जे में की और कभी छोटो-छोटे क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपने पकड़ बनाई। अलास्का से लेकर हवाई द्वीप, हर जगह अमेरिका ने अपने फायदे को सबसे ऊपर रखा है।

ऐसे में आज जब वेनेजुएला की बात होती है, तो इतिहास अपने आप याद आता है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है। अमेरिका लंबे समय से वहाँ की राजनीति और सत्ता बदलाव में दिलचस्पी दिखाता रहा है। भले ही आज सीधे जमीन लेने की बात न हुई हो, लेकिन सत्ता पर असर डालकर और संसाधनों को नुकसान पहुँचाकर अमेरिका वही पुरानी रणनीति से अपना दायरा बढ़ाने का काम जरूर कर सकता है।

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