पूर्व कांग्रेसी नेता राधिका खेड़ा ने कहा कि, राजनीति की दुनिया में सबसे बड़ा दर्द वही झेलता है, जिसे पैदा होते ही कह दिया जाए कि "तू बड़ा होकर प्रधानमंत्री बनेगा।" वो सपना कितना सुनहरा होता है, लेकिन जब सालों बीतते हैं, चुनाव दर चुनाव निकल जाते हैं और इंतजार करते करते वो बच्चा बूढ़ा हो जाये तो दर्द तो स्वाभाविक है! फिर चाहे उस साठ साल के बच्चे को देश विरोधी ताकतों से ही क्यों न मिलना पड़े।
लेकिन कांग्रेस के भीतर की बेचैनी अब छुपाए नहीं छुप रही। प्रियंका गांधी का संसद में दिया गया भाषण, उनका सधा हुआ व्यवहार, महात्मा गांधी के विचारों पर उनकी संतुलित व्याख्या और प्रधानमंत्री की मौजूदगी में चाय चर्चा में शामिल होना। ये सब बातें राहुल गांधी की लॉबी को बिल्कुल रास नहीं आईं। इसी बीच, राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के दौरान रॉबर्ट वाड्रा का यह बयान कि प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री बनने की पूरी क्षमता रखती हैं, पार्टी के भीतर हलचल बढ़ाने के लिए काफी था।
कहा जा रहा है कि इन घटनाक्रमों से राहुल गांधी खासे नाराज़ हैं। उधर केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के बयान ने आग में घी डालने का काम किया। जब उन्होंने खुलकर कहा कि कांग्रेस के भीतर कई नेता राहुल की राजनीति से असंतुष्ट हैं और चुपचाप बदलाव की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
LoP जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए भी बार-बार विदेश जाकर भारत की निर्वाचित सरकार को कोसना कांग्रेस के जनाधार को लगातार कमजोर कर रहा है; यह सच्चाई अब छुपी नहीं है।
ज़रा याद कीजिए— अपने बेटे को नेहरू-गांधी विरासत से जोड़ने के लिए प्रियंका गांधी ने उसका नाम तक बदलकर रोहन राजीव गांधी वाड्रा रख दिया।
असलियत यह है कि कांग्रेस अब विचारों की नहीं, तीन चेहरों की पार्टी बनकर रह गई है। विरासत आगे बढ़ाने की चिंता इसलिए भी है क्योंकि राहुल गांधी न संतान वाले हैं, न उत्तराधिकारी वाले।
55 वर्ष की उम्र पार कर चुके राहुल राजनीति से ज़्यादा असमंजस में नज़र आते हैं। तुलना करें तो
प्रियंका गांधी अधिक संतुलित, ज़्यादा सौम्य और मंच पर कहीं अधिक प्रभावशाली दिखती हैं। उनकी भाषा में कटुता नहीं, असभ्य आक्रोश नहीं, बल्कि सधा हुआ आत्मविश्वास है।
राहुल गांधी की तरह वे सार्वजनिक मंचों पर असहज व्यवहार नहीं करतीं। उनका पहनावा, व्यक्तित्व और प्रस्तुति आज भी इंदिरा गांधी की याद दिलाती है; यह बात कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप से छूती है।
अब यह मानकर चलिए कि अगले 20 वर्षों तक कांग्रेस गांधी परिवार की परछाईं से बाहर निकल ही नहीं पाएगी। उसके बाद विरासत की अगली कड़ी रोहन राजीव गांधी वाड्रा के रूप में तैयार खड़ी है। रॉबर्ट वाड्रा तो स्वयं कई बार चुनावी राजनीति में उतरने की इच्छा जता चुके हैं।
देशभर का कांग्रेस संगठन इतना गहरे एक ही परिवार में उलझ चुका है कि किसी बाहरी नेता को आगे लाने की कल्पना से कार्यकर्ता आज भी घबरा जाते हैं।
साफ़ कहें तो कांग्रेस के लिए प्रियंका गांधी राहुल गांधी से कहीं अधिक स्वीकार्य चेहरा बन सकती है; लेकिन राहुल को हटाने का साहस यस-सर संस्कृति में पली पार्टी जुटा ही नहीं सकती।
और अब सवाल उठता है— क्या वाकई कांग्रेस में सब कुछ ठीक है? 83 वर्षीय खड़गे के हाथों में देश की सबसे पुरानी पार्टी सौंप देना राजनीति से ज़्यादा तमाशा लगता है।
हर फैसले पर “हाईकमान तय करेगा” कहने वाला अध्यक्ष असल में अध्यक्ष है भी या नहीं; यह सवाल खुद कांग्रेस के लिए शर्मनाक है।
एक तरफ़ बीजेपी है जो युवा नेतृत्व को तैयार कर भविष्य की नींव रख रही है, दूसरी ओर कांग्रेस बुजुर्ग दरबार सजाकर अतीत की बैसाखियों के सहारे आगे बढ़ने का भ्रम पाल रही है।
ऐसे माहौल में कांग्रेस का आगे बढ़ पाना लगभग असंभव ही लगता है। कांग्रेस में न चुनाव होते हैं, न नेतृत्व उभरता है ; यहाँ सब कुछ उत्तराधिकार से तय होता है।
और फिर यही लोग कहते हैं लोकतंत्र खतरे में है! यही वजह है कि कांग्रेस इतिहास बनती जा रही है और बीजेपी भविष्य।
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