आज से नहीं अमेरिका 150 साल से भी ज्यादा समय से ग्रीनलैंड को हड़पने/खरीदने की कोशिश में लगा हुआ है। यह अमेरिका की कोई ट्रंप काल में नई इच्छा पैदा नहीं हुई है।
कब कब अमेरिका ने ग्रीनलैंड के लिए प्रयास किए, यह देखते हैं।
1860 के दशक में, संयुक्त राज्य अमेरिका ग्रीनलैंड को मुख्यतः उसकी रणनीतिक आर्कटिक स्थिति, प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों (कोयला, खनिज, मत्स्य-संपदा) और ब्रिटिश प्रभाव का मुकाबला करने के लिए हासिल करना चाहता था। विशेष रूप से अलास्का के अधिग्रहण के बाद अमेरिका ने इसे अपनी “मैनिफेस्ट डेस्टिनी” के हिस्से के रूप में देखा, ताकि वह प्रमुख व्यापारिक और सैन्य मार्गों पर प्रभाव और नियंत्रण बढ़ा सके। हालांकि, समय के साथ कांग्रेस का समर्थन कम होता गया और उस समय कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं दिया गया;
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| लेखक चर्चित YouTuber |
-1950 अमेरिका के विदेश मंत्री James F Byrnes ने डेनमार्क के अधिकारियों से ग्रीनलैंड को लेने के लिए बात की;
-2019 में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने प्रथम कार्यकाल में सार्वजनिक रूप से ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा व्यक्त की और उसे एक “real estate deal” बताया;
-लेकिन अब वेनेजुएला पर कब्ज़ा करने के बाद ग्रीनलैंड का भूत सवार है ट्रंप पर और उसके लिए चाहे उसे NATO को ही क्यों न तोडना पड़े और EU से भी संबंध विच्छेद क्यों न करने पड़े। ट्रंप अबकी बार ग्रीनलैंड को कब्ज़ा करने के पीछे कारण बता रहे हैं कि अगर हम इसे नहीं लेंगे तो रूस और चीन वहां आकर बैठ जाएंगे।
वर्ष 1860 में तो कोई रूस और चीन का खतरा नहीं था अमेरिका को ग्रीनलैंड में लेकिन तब भी अमेरिका उसे पाने के लिए उत्सुक था अपना दायरा North America में बढ़ाने के लिए।
ये सब चर्चा मैंने गूगल सर्च से जानकारी प्राप्त करके की है लेकिन उसी सर्च में मुझे यह भी मिला कि रूस ने ग्रीनलैंड पर आधिपत्य जमाने की कोई कोशिश नहीं की लेकिन रूस ग्रीनलैंड द्वीप पर उसकी Strategic Arctic Location की वजह से निगरानी रखता है और रूस का यह भी मानना है कि ग्रीनलैंड वासी रूस के साथ मिलने के लिए वोट कर सकते हैं। यह हो सकता है अमेरिका नहीं चाहता क्योंकि इससे वह रूस और चीन के लिए जवाब नहीं बन सकता।
चीन जरूर ग्रीनलैंड पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है क्योंकि ग्रीनलैंड के पास प्रचुर मात्रा में Rare Earth Minerals हैं और उसकी Arctic Location भी चीन के लिए उपयोगी है। चीन ने Mining और Infrastructure में निवेश के जरिए ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की कोशिश की है लेकिन ग्रीनलैंड/डेनमार्क/US अवरोध के कारण वह सफल नहीं हुए। वैसे भी अमेरिका के ग्रीनलैंड में Pituffik Space Base होते हुए चीन के ग्रीनलैंड को हड़पने की संभावना शून्य है। फिर ट्रंप को कैसे चिंता है कि अगर ग्रीनलैंड अमेरिका का नहीं हुआ तो चीन और रूस उस पर कब्ज़ा कर लेंगे।
इसलिए लगता है रूस और चीन ग्रीनलैंड में अभी बहुत सफल नहीं है और ट्रंप एक बहाना तलाश रहे हैं उस पर कब्ज़ा करने का। हो सकता है वो इसी बहाने से NATO से बाहर निकलना चाहते हैं।
Geopolitics में आज कुछ भी संभव है। NATO के कई देश ट्रंप/अमेरिका के बहुत करीब माने जाते हैं और अगर आज ट्रंप उनसे अलग हो सकते हैं तो कोई बड़ी बात नहीं कल को वह इजराइल से भी किनारा कर लें।

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