आज के डिजिटल दौर में, जहाँ हर पल मोबाइल की घंटी और स्क्रीन की रोशनी जिंदगी पर हावी है, वहाँ हिमाचल प्रदेश की ऊझी घाटी एक अलग ही तस्वीर पेश करती है। कुल्लू जिले में मनाली से सटी इस घाटी के नौ गाँव आज भी अपनी सदियों पुरानी देव परंपराओं को उसी अनुशासन के साथ निभाते हैं। यहाँ आस्था किसी प्रतीक तक सीमित नहीं है बल्कि जीवन की दिनचर्या का हिस्सा है, जो समय और तकनीक दोनों से परे जाकर अपनी जगह बनाए हुए है।
हर साल मकर संक्रांति से शुरू होकर पूरे 42 दिनों तक इन गाँवों में स्वेच्छा से सन्नाटा छा जाता है। इस दौरान न टीवी चलता है, न रेडियो, न डीजे और न ही किसी तरह का शोर-शराबा। मोबाइल फोन साइलेंट मोड में रखे जाते हैं, ऊँची आवाज में बात करना वर्जित होता है और खेतों में काम तक रोक दिया जाता है। मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं और घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि देवताओं की तपस्या में कोई विघ्न न पड़े।
यह सब किसी सरकारी आदेश या प्रशासनिक दबाव से नहीं होता। यह अनुशासन यहाँ के आराध्य देवी-देवताओं के आदेश से जुड़ा माना जाता है, जिसे गाँववाले पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हैं। ऊझी घाटी की यह परंपरा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब आस्था गहरी हो, तो आधुनिकता उसे कमजोर नहीं करती बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व में रहकर भी शांति और संतुलन बनाए रखती है।
क्या है यह देव परंपरा, जो 42 दिन तक गाँवों को कर देता है खामोश?
ऊझी घाटी के इन गाँवों में मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन से गाँवों के आराध्य देवता गौतम ऋषि, ब्यास ऋषि, कंचन नाग और नाग देवता तपस्या में लीन हो जाते हैं और स्वर्ग प्रवास पर चले जाते हैं।
देवताओं की तपस्या को भंग न किया जाए, इसके लिए गाँवों में पुरी तरह शांति बनाए रखना अनिवार्य हो जाता है। इसी कारण मनोरंजन, शोर-शराबा, खेती-बाड़ी और यहाँ तक कि मंदिरों में नियमित पूजा भी रोक दी जाती है।
साभार – न्यूज 18गोशाल गाँव में मकर संक्रांति के दिन विधिवत पूजा-अर्चना के बाद देवालयों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। मंदिरों की घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि गलती से भी कोई घंटी न बज जाए। यह रोक 42 दिनों तक यानी फागली उत्सव तक लागू रहता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यदि इस दौरान देव आदेश का उल्लंघन हुआ तो प्राकृतिक आपदाएँ, फसल खराब होना या गाँव में अशांति जैसी घटनाएँ हो सकती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण इस परंपरा को पूरी गंभीरता से निभाते हैं।
किन गाँवों में लागू होता है देव प्रतिबंध?
कुल्लू जिले की ऊझी घाटी के नौ गाँव गोशाल, कोठी, सोलंग, पलचान, रुआड़, कुलंग, शनाग, बुरुआ और मझाच में देव परंपरा के तहत विशेष प्रतिबंध लागू रहते हैं। इन गाँवों के लोग अपने आराध्य देवताओं के आदेश को सामूहिक रूप से और पूरी आस्था के साथ निभाते हैं।
इन नियमों के तहत कहीं मनोरंजन के सभी साधन बंद रहते हैं, तो कहीं कृषि कार्य पूरी तरह निषिद्ध होता है। कुछ गाँवों में दोनों तरह की पाबंदियाँ एक साथ लागू होती हैं। गोशाल में टीवी, रेडियो और अन्य मनोरंजन साधनों पर पूर्ण रोक रहती है जबकि अन्य गाँवों में खेतों में काम करने या गोशालाओं से गोबर निकालने तक की अनुमति नहीं होती।
आधुनिक समय में भी इन गाँवों में 42 दिनों तक मोबाइल फोन का उपयोग बेहद सीमित रहता है। फोन केवल जरूरी कामों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं और सभी लोग उन्हें साइलेंट मोड पर रखते हैं।
घंटी बजना, रील्स या वीडियो चलाना, तेज आवाज में गाने सुनना, लाउडस्पीकर, डीजे या रेडियो का उपयोग पूरी तरह से रोक लग जाता है। यहाँ तक कि सीटी बजाना या ऊँची आवाज में बात करना भी देव आदेश का उल्लंघन माना जाता है। इस समय खेती-बाड़ी से जुड़े सभी कार्य रोक दिए जाते हैं। किसान न तो खुदाई करते हैं, न जुताई और न ही किसी अन्य कृषि गतिविधि में शामिल होते हैं। इन सभी नियमों का पालन ग्रामीण बिना किसी सवाल के श्रद्धा और अनुशासन के साथ करते हैं।
मंदिरों में नहीं होती पूजा
इस देव परंपरा की सबसे अनोखी बात यह है कि 42 दिनों तक मंदिरों में नियमित पूजा भी नहीं होती। गोशाल गाँव में कंचन नाग, गौतम ऋषि और ब्यास ऋषि के मंदिरों के कपाट विधिवत पूजा के बाद बंद कर दिए जाते हैं। इसी तरह सिमसा गाँव में देवता कार्तिक स्वामी के मंदिर के कपाट भी मकर संक्रांति से 12 फरवरी तक बंद रहते हैं।
साभार – न्यूज 18मंदिरों में लगी घंटियों को कपड़े से बांध दिया जाता है ताकि कोई श्रद्धालु गलती से भी घंटी न बजा दे। यह सब देवताओं को पूर्ण शांति देने के उद्देश्य से किया जाता है।
42 दिन बाद फागली उत्सव और देवताओं की भविष्यवाणी
42 दिनों का यह देव प्रतिबंध फागली उत्सव के साथ समाप्त होता है। इसी दिन देवताओं के स्वर्ग प्रवास से लौटने की मान्यता है। इस मौके पर गाँवों में भव्य उत्सव आयोजित किया जाता है। देवताओं का जोरदार स्वागत होता है और देव वाद्य यंत्रों की गूंज से घाटी फिर से जीवंत हो उठती है।
मान्यता है कि देवता लौटकर आने वाले साल में होने वाली घटनाओं के बारे में भविष्यवाणी भी करते हैं। मंदिर के अंदर मूर्ति पर लगाए गए मिट्टी के लेप को हटाया जाता है, जिसमें से कुमकुम, अनाज के दाने, सेब के पत्ते जैसी चीजें निकलती हैं। इन्हीं संकेतों के आधार पर सालभर की भविष्यवाणी की जाती है।
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