सुप्रीम कोर्ट के जजों की मर्यादा; जस्टिस उज्जवल भुईया किस अधिकार से कॉलेजियम पर सरकार की शक्तियों को ललकार रहे हैं जबकि CJI कॉलेजियम को ख़त्म करने की बात की थी

सुभाष चन्द्र

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने 76 वें संविधान दिवस 26 नवंबर, 2025 को 4 महीने पहले वरिष्ठ अधिवक्ता Mathews J Nedumpara की NJAC को पुनर्जीवित करने की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई थी। वैसे चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने भी नेदुमपरा को उनकी याचिका पर सुनवाई करने की गोली पिलाई थी लेकिन बाद में 24 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से ही उनकी याचिका खारिज करा दी जबकि उसे सुनवाई के लिए चंद्रचूड़ जी ने स्वीकार किया था 

लेकिन कल जब Nedumpara ने अडानी/अंबानी के मामलों पर तुरंत सुनवाई होने की बात कही लेकिन उनकी याचिका नहीं सुनी जा रही, तब सूर्यकांत जी नाराज़ हो गए और उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि मेरी अदालत में सोच समझ कर बोलें और यह भी कहा कि आपकी याचिका सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में मौजूद ही नहीं है मौजूद कैसे होगी जब चंद्रचूड़ जी उसे बट्टे खाते लगवा दिया था

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एक तरफ चीफ जस्टिस NJAC शुरू करने की उम्मीद जगा रहे थे तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइया ने कॉलेजियम पर अपना ज्ञान बघार रहे हैं उन्होंने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि “केंद्र के अनुशंसा पर जजों का ट्रांसफर करके न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता नहीं किया जा सकता एक जज का केवल इसलिए ट्रांसफर नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कोई फैसला दिया है क्योंकि उससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता compromise होती है केंद्र सरकार का हाई कोर्ट के जजों के ट्रांसफर/पोस्टिंग में कोई रोल नहीं है और केंद्र नहीं कह सकता किस जज का ट्रांसफर करना है और किसका नहीं यह केवल न्यायपालिका का अधिकार क्षेत्र है और जब कॉलेजियम किसी ट्रांसफर पर कारण रिकॉर्ड करता है तो उसे केंद्र सरकार नहीं रोक सकती”

1981 के 1st Judge Case में SP GUPTA ने किसी कॉलेजियम की मांग नहीं की थी लेकिन यह मामला बढते बढ़ते कॉलेजियम के स्थापना पर ख़त्म हुआ जबकि इस कॉलेजियम का प्रावधान संविधान में नहीं था और इसकी स्थापना को संसद से भी मंजूरी नहीं मिली लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तानाशाह के रूप में कॉलेजियम को देश पर थोप दिया कॉलेजियम बना कर संसद के अधिकार को भी खाक में मिला दिया

इतना ही नहीं कॉलेजियम ने संवैधानिक प्रावधान को भी बदल दिया जिसमें चीफ जस्टिस से राष्ट्रपति द्वारा जजों की नियुक्ति के लिए Consultation की बात कही हुई थी लेकिन कॉलेजियम ने उसे Concurrence में बदल दिया। मतलब सुप्रीम कोर्ट/न्यायपालिका ने स्वयं ही ऐसा कानून बना कर संसद, कार्यपालिका और संविधान प्रमुख राष्ट्रपति सभी के अधिकारों पर हथौड़ा चला दिया

जस्टिस भुईया सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सदस्य भी नहीं हैं वे कभी चीफ जस्टिस भी नहीं बनेंगे और सुप्रीम कोर्ट के जजों की Seniority List में उनका नंबर 18 है ऐसे में क्या उनका सरकार को चुनौती देना क्या शोभा देता है?  

स्वतंत्रता किसी संस्था को ऐसी भी नहीं होनी चाहिए जो दूसरी हर किसी संस्था के अधिकार क्षेत्र में कानून के नाम पर हस्तक्षेप करे लेकिन खुद उनके कार्यों की समीक्षा कोई न करे एक बार प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान दिवस पर ही कहा था कि जब किसी संस्था पर कोई कंट्रोल नहीं होता तो उसे लक्ष्य से भटकने से कोई नहीं रोक सकता और 2 महीने बाद ही सुप्रीम कोर्ट के 5  जज सड़क पर आ गए थे प्रेस कॉन्फ्रेंस करने

कोई मेरी बात का बुरा न माने लेकिन लुटेरों और डकैतों के भी अपने इलाके होते है जहां वो किसी का दखल बर्दाश्त नहीं करते लेकिन वे खुद हर किसी के इलाके में मुंह मारते हैं

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