जाति व्यवस्था को लेकर हिन्दुओं को घेरने वाले बता रहे पूला एंथनी को पहला ‘दलित’ बिशप: ईसाइयत अपनाने के बाद कैथोलिक को लीड करने वाला SC कैसे?

                                                         कार्डिनल बिशप पूला एंथनी (साभार-HT)
हैदराबाद के आर्कबिशप कार्डिनल पूला एंथनी को कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है। CBCI भारत में कैथोलिक क्रिश्चियंस का ऐसा संगठन है, जो धार्मिक नियम कानून तय करता है।
 

पूला एंथनी को अध्यक्ष चुने जाने को मीडिया में ऐसे दिखाया गया कि एंथनी देश के पहले ऐसे दलित क्रिश्चियन हैं, जो देश के लगभग 2 करोड़ कैथोलिक को लीड करेंगे!

दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे?

अब सवाल ये उठता है कि आखिर कोई दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे हो सकता है? ईसाई तो कैथोलिक होते हैं, प्रोटेस्टेंट होते हैं और जाति व्यवस्था तो हिंदुओं में होती है।

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र…अगड़ा-पिछड़ा, दलित-OBC ये सब तो हिंदुओं के वर्गीकरण हैं? फिर भला कार्डिनल एंथनी दलित कैसे हुए और ‘दलित’ रहते हुए वो ईसाइयत के प्रति कितने समर्पित हो सकते हैं। इसके बावजूद मीडिया में ये कहा जा रहा है कि वो दलित हैं! ईसाइयों में जब सब बराबर होते हैं, तो फिर कोई दलित कैसे हो गया।

ईसाइयत की किताब बाइबिल तक कहती है कि सब बराबर हैं, सबको गॉड ने बनाया है। सब गॉड के लिए बराबर हैं। भारत में गाँव-गाँव धर्मांतरण करवाती मिशनरियाँ यही बताती घूमती हैं कि सनातन छोड़ोगे, तो जाति व्यवस्था में ऊपर बढ़ोगे? ईसाई बनोगे तो बराबर हो जाओगे। जाति व्यवस्था से मुक्ति मिलेगी।

बराबरी की बात कह बरगलाते हैं मिशनरी

जो एसटी- एससी समाज के लोग ईसाइयत को अपनाते हैं, उनके लिए यह दलील दी जाती हैं कि वे जाति व्यवस्था से तंग आकर ईसाइयत की तरफ आकर्षित हुए।

लेफ्ट लिबरल लॉबी भी इसी बात को लेकर सनातन को गालियाँ देती है कि यहाँ जाति-व्यवस्था हावी है। यहाँ कथित नीची जातियों को बराबर नहीं माना जाता, यहाँ कथित तौर पर लोगों को मंदिरों में घुसने की आजादी नहीं है, यहाँ उन्हें दलित और अगड़ा-पिछड़ा में बांटा जाता है, इसीलिए लोग सनातन छोड़ कर ईसाइयत अपना लेते हैं।

तो ये जाति सूचक शब्द आखिर ईसाई बनने के बाद भी पूला एंथनी के साथ कैसे चिपका रह गया? और अगर ईसाई बनने के बाद भी कोई दलित रह जाता है, तब तो ईसाइयत अपनाने और धर्मांतरण को लेकर जो भी प्रचार-प्रसार किया जाता है, वह सब गलत है। इसका कोई जवाब ना लेफ्ट लिबरल लॉबी के पास होगा और ना सनातन को डेंगू मलेरिया बताने वाले नेताओं के पास!

मीडिया ने भी दलित कार्डिनल एंथनी की बात कही

कार्डिनल एंथनी कैसे इतने दूर तक पहुँचे और कैसे ये ऐतिहासिक है! मीडिया यही बताने में लगा है। चाहे इंडियन एक्सप्रेस हो या टाइम्स ऑफ़ इंडिया। हर कोई इस बात को हाईलाइट कर रहा है कि देखिए दलित व्यक्ति अब 2 करोड़ लोगों के धार्मिक तौर तरीके मैनेज करेगा!

उनकी कहानी बताने वाली ईसाईयत से जुड़ी वेबसाइट्स भी कार्डिनल एंथनी में ‘दलित’ को ढूँढ रही है। बताती हैं कि दलित माता-पिता के घर पैदा हुए एंथनी युवावस्था में मिशनरी की हेल्प से गरीबी से बाहर आए। अब मिशनरी की सहायता से कैसे कोई गरीब आदमी ‘गरीबी’ से बाहर निकलता है, ये सबको पता है। पैसे का लालच, पढ़ाई और इलाज का लालच धर्मांतरण के लिए आम बात है। इसको लेकर आए दिन घटनाएँ देशभर में घटती रहती हैं।

देश का संविधान भी नहीं मानता कि ईसाईयत में कन्वर्ट होने वाला दलित रह सकता है। उन्हें माइनॉरिटी कह सकते हैं, लेकिन SC/ST नहीं कहा जाता है।

ऐसे धर्मांतरण के मामलों को लेकर साल 2004 में रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाई गई। इस आयोग ने सिफारिश दी थी कि अनुसूचित जाति का दर्जा पूरी तरह से धर्म से अलग होना चाहिए और ईसाई और मुस्लिम दलितों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।

लेकिन UPA सरकार भी इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर पाई, क्योंकि ये आधार ही गलत है। ये सीधे तौर पर दशकों से हाशिये पर पड़े लोगों के साथ धोखा होगा। ईसाई-मुस्लिम बने लोग एससी-एसटी के अधिकारों पर डाका डालने लगेंगे।

कमेटी ने तो ये भी कहा था कि दलित क्रिश्चियन भी गैर बराबरी का शिकार है, लेकिन सवाल फिर वही है कि अगर ईसाईयत में सभी बराबर हैं तो गैर बराबरी कैसे और कोई पिछड़ा-दलित कैसे हो सकता है? सब तो चर्च जाने वाले और जीसस को मानने वाले हुए।

केरल में अगड़ा-पिछड़ा-दलित क्रिश्चियन

दरअसल ये ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल दिखाता है कि ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को खुद मिशनरियाँ ही बराबर नहीं मानती। जो बराबरी की बात कर पिछड़ों-दलितों और जनजातीय समाज के लोगों को बरगलाते हैं और धर्मांतरण करवाते हैं, वो पहचान तब भी नहीं छूटती जब कोई ईसाइयत के ऊँचे स्थान पर पहुँच जाता है।

केरल जैसे राज्यों में तो आज भी ईसाइयों के भीतर भयानक जातिवाद है। यहाँ कुछ ईसाई अपने को ऊँची जाति का बताते हैं और दलित से ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को हीन भावना से देखते हैं। मिशनरी यहाँ कुछ नहीं कर पातीं।

असल में बराबरी का फर्जीवाड़ा सिर्फ और सिर्फ उस सनातन को कमजोर करने के लिए है, जिसने ना सिर्फ समय आने पर अपने में बदलाव किए हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्थाएँ बनाई हैं कि पिछड़ों की भरपाई हो। आज राम मंदिर में पुजारी दलित समाज से हैं! किसी मंदिर में कोई नहीं पूछता कि आप किस जात से हो।

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