कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर मोदी सरकार की चुप्पी को लेकर केंद्र पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सरकार का ये रुख भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है। सोनिया गांधी के इस हमले पर बीजेपी ने पलटवार किया है। 2011 में लीबिया में गद्दाफी की मौत के समय यूपीए की सरकार थी, लेकिन तब सरकार ने गद्दाफी की मौत पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया था और न ही कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई थी।
"2011 में जब लीबिया में नाटो हमलों के बीच भागते समय मुअम्मर गद्दाफी की हत्या हुई थी, तब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। उस समय भारत और लीबिया के बीच मजबूत संबंध थे। वर्ष 2004 से 2007 के बीच भारत के सात मंत्रियों ने लीबिया का दौरा किया था, जिनमें तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी भी शामिल थे। इसके बावजूद गद्दाफी की मृत्यु पर न तो कोई औपचारिक शोक संदेश जारी किया गया और न ही कोई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई। उस समय न तो 'नैतिक जिम्मेदारी' पर भाषण दिए गए और न ही 'सभ्यतागत संबंधों' का हवाला देकर सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया। "
विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति का संचालन भावनात्मक या राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के आधार पर किया जाता है। भारत ने वर्तमान संकट के दौरान संयम, संप्रभुता के सम्मान और तनाव कम करने की अपील लगातार दोहराई है। यह कहना कि भारत चुप है, तथ्यों का सरलीकरण है। कूटनीति सार्वजनिक मंचों पर आक्रामक बयान देने का नाम नहीं, बल्कि परदे के पीछे संतुलित और सावधान संवाद की प्रक्रिया है।
कहा गया कि आज खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक रह रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या केरल से है। उनकी सुरक्षा, रोजगार और परिवारों की स्थिरता भारत सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण कुछ स्थानों पर सीबीएसई स्कूलों की परीक्षाएं स्थगित होने की खबरें भी सामने आईं, जिससे भारतीय छात्रों के शैक्षणिक जीवन पर असर पड़ा। ऊर्जा क्षेत्र और समुद्री परिवहन में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के सामने भी प्रत्यक्ष जोखिम की स्थिति बनी। ऐसे में कोई भी गैर-जिम्मेदाराना बयान सीधे भारतीय समुदाय को प्रभावित कर सकता है।
कांग्रेस नेतृत्व पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह चुनिंदा मुद्दों पर ही मुखर होता है। आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के समय वैसी तीखी प्रतिक्रिया नहीं दिखी, जैसी आज सरकार की कूटनीतिक भाषा पर दिखाई जा रही है. विदेश नीति को सांप्रदायिक या चुनावी नजरिए से देखना क्या उचित है, यह भी बहस का विषय बना हुआ है।
ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई का रिकॉर्ड भी चर्चा में है। बीते वर्षों में उन्होंने कई बार भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी की। दिल्ली दंगों को लेकर बयान, कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर टिप्पणियां, तथा नागरिकता संशोधन अधिनियम पर प्रतिक्रिया—इन सब पर भारत ने सार्वजनिक आक्रामकता से बचते हुए संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया। 2017 में उन्होंने कश्मीर के मुसलमानों के समर्थन की अपील की थी। इसके बावजूद भारत ने संबंधों को पूरी तरह से तनावपूर्ण दिशा में नहीं जाने दिया।
2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भी तेहरान की प्रतिक्रिया को लेकर भारत में निराशा रही थी। उस समय की रिपोर्टों में संकेत मिले थे कि ईरानी मीडिया के कुछ हिस्सों ने पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति दिखाई थी। इसके बावजूद भारत ने संवाद के दरवाजे बंद नहीं किए।
इतिहास के एक और अध्याय की ओर इशारा किया जा रहा है। यूपीए सरकार के दौरान भारत ने 2005, 2006 और 2009 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के खिलाफ मतदान किया था। उस समय भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर वार्ता चल रही थी और भारत ने पश्चिमी देशों के साथ कदम मिलाया। तब “सभ्यतागत संबंधों” की चर्चा उतनी प्रमुख नहीं थी, जितनी आज की राजनीतिक बहसों में दिखाई देती है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य भी महत्वपूर्ण है. मौजूदा घटनाक्रम पर दुनिया के अधिकांश प्रमुख देशों ने अत्यधिक तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। रूस जैसे देश, जिन्हें ईरान का करीबी माना जाता है, उन्होंने भी संतुलित भाषा का प्रयोग किया है। यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों ने भी संयम बरता है। ऐसे में भारत पर यह अपेक्षा करना कि वह सबसे मुखर और आक्रामक बयान दे, क्या व्यावहारिक है?
विशेषज्ञों का कहना है कि विदेश नीति को “चयनात्मक आक्रोश” के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय स्थिरता और नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि होती है। भारत की ऊर्जा जरूरतें, खाड़ी देशों के साथ आर्थिक संबंध और वहां बसे करोड़ों भारतीयों का भविष्य किसी भी बयान से जुड़ा होता है।
अंततः यह बहस ईरान या लीबिया से अधिक घरेलू राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती दिख रही है। सवाल यह है कि क्या विदेश नीति को नैतिकता की सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनाया जाए या रणनीतिक संतुलन का उपकरण समझा जाए? 2011 में भी भारत ने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी थी और आज भी वही सिद्धांत लागू होता दिखाई देता है।
भारत कब और कैसे बोलेगा, यह उसका संप्रभु निर्णय है। हर स्थिति में ऊंची आवाज ही प्रभावी कूटनीति का प्रमाण नहीं होती। कई बार संयम ही सबसे सशक्त संदेश होता है। यही राज्यकला है, और यही परिपक्व कूटनीति की पहचान भी।
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