सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ़्तारी से बच कर भागने वाले “अपराधियों” की मौज कर दी; नया कानून बना दिया

सुभाष चन्द्र

कल सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस उज्जवल भुइया की खंडपीठ ने एक नया कानून बना दिया कि अदालत के पास किसी अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने का तो अधिकार है, लेकिन वे उसे ट्रायल कोर्ट के समक्ष सरेंडर करने का निर्देश नहीं दे सकती क्योंकि ऐसा करना अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। 

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अभियुक्त की ने केवल जमानत याचिका नामंजूर की बल्कि उसे ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने और नियमित जमानत के लिए आवेदन करने का आदेश दिया था हाई कोर्ट के इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करते हुए सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने का अर्थ स्वत यह नहीं है कि अदालत अभियुक्त की “व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करते हुए” उसे सरेंडर के लिए मजबूर करे

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सरेंडर न करने के लिए कहने का प्रावधान कौन से कानून में है बल्कि सच्चाई यह है कि “अग्रिम जमानत” अदालतों द्वारा दे दी जाती है लेकिन अग्रिम जमानत” नाम से उसका भी कोई प्रावधान CRPC या BNSS में नहीं है

CRPC का सेक्शन 438 - “Anticipatory bail in India is applied for and adjudicated (accepted or rejected) under Section 438 of the CRPC, 1973. This section empowers the high court or the court of sessions to grant pre-arrest bail to any person apprehending arrest for a non-bailable offences”. 

ऐसे ही प्रावधान BNSS के section 482 में हैं लेकिन anticipatory bail शब्द उपयोग नहीं किया गया है

सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों ने यह कानून स्वयं ही बना दिया कि कोर्ट अभियुक्त को सरेंडर करने के लिए नहीं कह सकता जबकि ऐसा प्रावधान कहीं नहीं है इसकी जगह आप यह क़ानून भी तो बना सकते थे कि जिस पर non-bailable offence के आरोप लगे हैं उसे हर हाल में ट्रायल कोर्ट में पेश होना चाहिए यानी सरेंडर करना चाहिए

आरोपी छुपा बैठा है लेकिन वकील के जरिए “अग्रिम जमानत” की अर्जी लगा रहा है और अब जब सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि कोर्ट उसे सरेंडर करने के लिए नहीं कह सकता, तो आरोपी की तो मौज हो गई क्योंकि उसे पकड़ना तो बस पुलिस की जिम्मेदारी रह गई जिससे वो कहीं भी छुपता फिरेगा इसलिए ही पवन खेड़ा पकड़ में नहीं आ रहा

ऐसे निर्णयों से कानून से भागने वालों की मदद ही होगी कानून की नई परिभाषा ही बनानी थी तो वह अभियुक्त की पेशी के लिए बनानी थी न कि उसे छुट्टा घूमने की आज़ादी देने के लिए फिर जिस व्यक्ति पर non-bailable offence के आरोप हैं, उसकी “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का क्या मतलब है वह कोई भी हो सकता है और उसने कोई भी संगीन अपराध किया हुआ हो सकता है 

आप कानून बनाते हुए अभियुक्त को छूट तो दे सकते हैं लेकिन उसे कानून के सामने पेश होने के लिए कहने का कानून नहीं बना सकते पेश होने के लिए कहना या न कहना, दोनों ही प्रावधान CRPC और BNSS में नहीं है 

राष्ट्रपति को जस्टिस परदीवाला आदेश तो दे सकते हैं जबकि वह गैर कानूनी था, जो सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के reference में माना था, लेकिन एक अभियुक्त को कोर्ट में पेश होने के लिए नहीं कह सकते इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार के एक निर्णय के खिलाफ जस्टिस परदीवाला और जस्टिस महादेवन की पीठ ने कभी कोई Criminal case उनके पास भेजने की रोक लगा दी थी और वह भी कानूनी रूप से उचित नहीं थी जिसे फिर चीफ जस्टिस ने हाई कोर्ट के 13 जजों के protest letter के बाद पीठ द्वारा वापस लिया गया

कानून बनाएं लोकहित में और वैसे भी कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है। आप संसद को कानून में बदलाव के लिए सिफारिश कर सकते हैं

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