पौराणिक गाथा : भगवान नरसिम्हा जयंती पर लक्ष्मी नरसिम्हा कथा


हमारे भगवान इतने दयालु है कि तपस्या करने वाले को उसका मनचाह वरदान भी दे देते हैं, लेकिन वरदान देने उपरांत उस वरदान का तोड़ भी अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं। लंकाधिपति रावण को ही लीजिए। जिसे एक खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि रावण जैसा महाज्ञानी, महातपस्वी और महान पंडित न हुआ है और न ही होगा। रावण को बोध था कि उसकी मृत्यु किस कारण होगी और किसके हाथों होगी। माता सीता का हरण किया लेकिन अपने महल में नहीं महल से अलग उपवन में रखा। रावण को मालूम कि जगतजननी जगदम्बा को लेने मेरा काल यानि जगत के पालनहार विष्णु राम रूप में आकर मुझे मोक्ष दिलवाने आएंगे। इस बात का उल्लेख रामानंद सागर की कृति "रामायण" में कुम्भकर्ण के श्रीमुख से सुनने को मिलता है।   
कहते हैं कि रावण को तीन जन्मों में मुक्ति मिली थी और तीनों ही बार जगत के पालनहार विष्णु को अलग-अलग रूप में धरती पर आना पड़ा था। तीन जन्म थे रावण, कंस और हिरणकश्यपु। रावण के राम, कंस के लिए कृष्ण और हिरणकश्यपु के लिए नरसिम्हा अवतार।      
इसी तरह प्राचीन काल की बात है। सत्ययुग में, ब्रह्मा जी के वरदान से दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। वह इतना शक्तिशाली हो गया था कि देवता भी उससे भयभीत रहते थे। उसने घोषणा कर दी थी कि न वह आकाश में मरेगा, न धरती पर, न दिन में, न रात में, न अस्त्र से, न शस्त्र से। उसकी अहंकार की कोई सीमा न थी।

हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। बालक प्रह्लाद दिन-रात “नारायण, नारायण” का जाप करता। पिता के क्रोध को वह जानता था, फिर भी वह अपने आराध्य से विमुख नहीं हुआ। हिरण्यकशिपु ने पुत्र को मारने के अनेक प्रयास किए — विष दिया, हाथी से कुचलवाया, आग में फेंका, पहाड़ से गिरवाया — पर हर बार भगवान विष्णु ने प्रह्लाद की रक्षा की।
अंततः हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को चुनौती दी, “अगर तेरा नारायण सर्वव्यापी है तो वह इस खंभे में भी है?” प्रह्लाद ने निडर होकर कहा, “हाँ पिता, वह हर जगह हैं।”
जैसे ही हिरण्यकशिपु ने क्रोध में खंभा तोड़ा, उसमें से भगवान विष्णु का नरसिम्हा अवतार प्रकट हुआ — आधा नर, आधा सिंह। उनके शरीर से दिव्य ज्योति फूट रही थी। सिंह का मुख, नख, और दांत अत्यंत भयंकर थे, जबकि शरीर मनुष्य का था। नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को उठाया, द्वार के चौखट पर रखा (जो न धरती थी न आकाश), संध्या काल में (जो न दिन था न रात), और अपने नखों से उसका उदर फाड़ दिया। इस प्रकार ब्रह्मा के वरदान की शर्तें पूरी हुईं और दैत्यराज का अंत हुआ।
लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती।
नरसिम्हा अवतार इतने उग्र और क्रोधित थे कि सारा ब्रह्मांड काँप उठा। देवता, ऋषि-मुनि सभी भयभीत हो गए। कोई भी उनके सामने जाने का साहस नहीं कर पा रहा था। नरसिम्हा का क्रोध शांत न हो रहा था। उन्होंने हिरण्यकशिपु के रक्त से अपने नख धोए और सिंहनाद किया। पृथ्वी हिलने लगी।
तब लक्ष्मी जी, जो सदा विष्णु के साथ रहती हैं, प्रकट हुईं। वे अपने पति के इस भयंकर रूप को देखकर भी निर्भय थीं। लक्ष्मी जी ने सुंदर वस्त्र पहने, दिव्य आभूषण धारण किए और हाथ में कमल व धनुष-बाण लिए नरसिम्हा के समीप पहुँची।
वन की शांत जगह में, जहाँ प्रह्लाद खड़ा था, लक्ष्मी जी ने नरसिम्हा के सामने घुटनों के बल बैठे सिंह-पुरुष को देखा। उनका क्रोध अभी भी उफान पर था। लक्ष्मी जी ने धीरे से आगे बढ़कर नरसिम्हा का हाथ अपने हाथों में लिया। उनकी कोमल उँगलियाँ उस भयंकर नखों को छू रही थीं।
“प्रभु,” लक्ष्मी जी ने मधुर स्वर में कहा, “आपका क्रोध अब शांत हो। आपने धर्म की रक्षा की, भक्त की रक्षा की। अब संसार को आपके करुणामय रूप की भी आवश्यकता है।”
नरसिम्हा ने गर्जना की। उनकी आँखें अभी भी लाल थीं। लक्ष्मी जी ने डरते हुए भी उनका सिर अपने कंधे पर टिका दिया। उन्होंने अपने आँचल से नरसिम्हा के मुख का रक्त पोंछा। धीरे-धीरे नरसिम्हा का क्रोध कम होने लगा। लक्ष्मी जी की प्रेमपूर्ण दृष्टि और स्पर्श ने उनके हृदय को शांत किया।
तब लक्ष्मी जी ने कहा, “हे नरसिम्हा, आप मेरे पति हैं। मैं आपकी शक्ति हूँ, आपकी शांति हूँ। जब आप क्रोधित होते हैं तो मैं आपके पास आती हूँ। लक्ष्मी नरसिम्हा के रूप में आपकी पूजा हो।”
नरसिम्हा का क्रोध धीरे-धीरे शांत हुआ। उनकी आँखों में करुणा झलकने लगी। उन्होंने प्रह्लाद को आशीर्वाद दिया और लक्ष्मी जी को अपने वक्ष से लगा लिया। उस क्षण से वे लक्ष्मी नरसिम्हा कहलाए।
इस घटना के बाद लक्ष्मी नरसिम्हा की पूजा विशेष रूप से प्रचलित हुई। जो भक्त इनकी उपासना करता है, उसे धन, समृद्धि और शत्रु-नाश दोनों प्राप्त होते हैं। आंध्र प्रदेश के अहोबिलम मंदिर में नरसिम्हा के नौ रूपों की पूजा होती है, जहाँ लक्ष्मी जी भी विराजमान हैं।
कथा कहती है — जब अधर्म अपने चरम पर पहुँचता है, तब भगवान नरसिम्हा रूप में प्रकट होते हैं। लेकिन उनके क्रोध को शांत करने वाली केवल उनकी प्रियतमा लक्ष्मी ही होती हैं।
आज भी लाखों भक्त “लक्ष्मी नरसिम्हा” का जाप करते हैं। कहते हैं कि जो इस कथा को श्रद्धा से सुनता है, उसके घर में लक्ष्मी का वास और नरसिम्हा की सुरक्षा सदैव बनी रहती है।

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