चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल में कौन होगा? क्या सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था; नहीं, तो अब क्यों सवाल उठा रहा है सुप्रीम कोर्ट?

सुभाष चन्द्र

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बने कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश सी शर्मा की खंडपीठ ने सवाल उठाया है कि चयन पैनल में कैबिनेट मंत्री क्यों होना चाहिए? तीसरा व्यक्ति निष्पक्ष होना चाहिए

यह प्रश्न करने से पहले 2 मार्च, 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गौर करना चाहिए जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक कॉलेजियम बनाने के आदेश दिए गए थे। इस कॉलेजियम में प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष और चीफ जस्टिस को रखा गया था और यदि आधिकारिक नेता विपक्ष न हो, तो सबसे बड़े दल के नेता को विपक्षी नेता की जगह रखा जाएगा

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कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि “यह व्यवस्था संसद द्वारा इस बारे में कानून बनाए जाने तक लागू रहेगी” - यानी जब तक संसद कानून बना कर वैकल्पिक समिति/चयन प्रक्रिया निर्धारित नहीं कर देती तब तक कॉलेजियम जारी रहेगा 

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश 5 जजों की संविधान पीठ ने दिया था जिसमें न्यायाधीश शामिल थे

जस्टिस केएम जोसेफ, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस हृषिकेश रॉय, जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस अजय रस्तोगी यह निर्णय आयोग को स्वतंत्र बनाने के उद्देश्य से दिया गया था और जस्टिस जोसेफ ने बहुत प्रफुल्लित थे और उन्होंने कहा कि “अदालतें कानून नहीं बना सकती, यह मिथक बहुत पहले ही टूट चुका है” इसका मतलब था सुप्रीम कोर्ट संसद की तरह कानून बना सकता है उन्होंने इसके लिए टिप्पणी की थी कि जब संसद अपने किसी विशेषाधिकार उल्लंघन के लिए समन या दंडित करती है तो वह न्यायपालिका की भूमिका निभाते है मतलब हमने भी संसद के अधिकार का उपयोग किया है 

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपनी टिप्पणियों में एक तरह यह कहा कि चुनाव आयोग निष्पक्ष काम नहीं कर रहा है और इसलिए चयन प्रक्रिया के लिए कॉलेजियम बनाया गया है यह भाषा किसी भी विपक्ष दल की थी

लेकिन पीठ ने यह नहीं कहा था कि संसद अगर कानून बना कर कॉलेजियम से इतर कोई चयन समिति का गठन करती है तो उसमें कौन कौन सदस्य होने चाहिए? उसमें ये नहीं कहा गया था कि चयन समिति में चीफ जस्टिस को भी रखना जरूरी होगा तो फिर आप आज क्यों पूछ रहे है कि चयन समिति में कोई मंत्री कैसे हो सकता है? यानी आप अपने ही फैसले की समीक्षा कर रहे हैं?

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को साफ़ बताया है कि चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में न्यायिक प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है

CBI और Vigilance Chief की नियुक्ति में चीफ जस्टिस शामिल होता है लेकिन NJAC में कॉलेजियम में कानून मंत्री का होना आपको गंवारा नहीं था क्योंकि उसे आपने न्यायिक स्वतंत्रता में खलल माना था फिर आप कैसे कार्यपालिका के क्षेत्र में कैसे दखल दे रहे हैं? यह दोहरा मापदंड किस तरह उचित है?

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