बात निकलेगी तो बहुत दूर तक जाएगी लेकिन शांतिदूतों और उनके समर्थकों पर भारत सरकार ने ऐसा झन्नाटेदार थप्पड़ मारा है सभी को चिंतन करने की जरुरत है। 122 आतंकी संगठनों की मदद करने वाला ईरान जब बुर्का/हिजाब और नकाब का विरोध करने वाली महिलाओं पर अत्याचार करता है, पाकिस्तान का तत्कालीन राष्ट्रपति जिया उल हक़ जब हज़ारों फिलिस्तीनों द्वारा पाकिस्तान नहीं छोड़ने पर गोली से भून देता है, शायद जकार्ता कुछ ही साल पहले पाकिस्तान सेना को खरीद अपने मुल्क से लाखों फिलिस्तीनों को 72 हूरों के पास पहुँचाने का काम करता है आदि आदि सभी मुस्लिम कट्टरपंथी और उनके समर्थकों के घरों में ऐसा मातम पसर जाता है शायद उनके घर की महिलाएं अपने मित्रों साथ भाग गयी हैं। किसी भी कट्टरपंथी में सच्चाई सुनने और बर्दाश्त करने का माद्दा नहीं। इन लोगों की दुकान ही धमकियों और उपद्रव करने पर ही चलती है।
तस्लीमा नसरीन द्वारा पुस्तक "लज्जा" लिखने पर इतना ज़ुल्म किया कि अपने जन्मस्थान को छोड़ना पड़ा। इतना ही सलमान रुश्दी पर फतवा दे दिया जाता है, लेकिन किसी में अनवर शेख के खिलाफ एक लब्ज बोलने की हिम्मत नहीं, जिसने इस्लाम को बेनकाब कर दिया। उसकी किताबें पढ़ लोग इस्लाम छोड़ रहे हैं। और अब अली सीना की किताब भी वही काम कर रही है।
जब प्रख्यात बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की जान खतरे में थी, तब दुनिया के किसी भी देश ने उन्हें शरण नहीं दी।
इस्लामिक देश तो दूर, यूरोप तक ने हाथ खड़े कर दिए।
यही नहीं, जब शेख हसीना अपदस्थ हुईं, तब भी अधिकांश इस्लामिक देशों ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए। दोनों ही स्त्रियाँ तस्लीमा और हसीना अकेली, असहाय और चौराहे पर खड़ी थीं।
उस समय यदि किसी ने साथ दिया, तो वह भारत था।
भारत ने जिसे भी मित्र बनाया, उससे कभी विश्वासघात नहीं किया। यदि भारत का सहारा न मिला होता, तो शायद आज न तस्लीमा जीवित होतीं और न हसीना।
यह कटु सत्य है कि जिस पूर्वी पाकिस्तान को संवार-संभाल कर भारत ने बांग्लादेश के रूप में खड़ा किया, वही आज वहाँ के हिंदुओं की पीठ में छुरा घोंप रहा है।
यह कोई नई कहानी नहीं है। बांग्लादेश के कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर अत्याचार का इतिहास पुराना है। तस्लीमा नसरीन का विश्वप्रसिद्ध उपन्यास “लज्जा” आज भले आसानी से न मिले, लेकिन जिन्होंने पढ़ा है, वे उसकी पीड़ा नहीं भूल सकते।
वह उपन्यास सच्ची घटनाओं पर आधारित था, मानवता को झकझोर देने वाला, रूह कंपा देने वाला।
उसकी सबसे दर्दनाक पंक्ति थी-
“अब्दुल, एक-एक कर करो, वह मर जाएगी…”
यह वह बेबस चीख थी एक हिंदू माँ की, जिसकी 16 वर्षीय बेटी को अब्दुल और उसके साथियों ने उठा लिया था।
दर्द से टूटी माँ गिड़गिड़ाकर कहती है-
“आधे लोग मेरे साथ कर लो, उसे छोड़ दो।”
लेकिन दरिंदों का दिल नहीं पसीजा। मासूम बेटी की जान चली गई, और माँ ने उन्हीं में से एक का खंजर अपने सीने में उतार लिया। यही थी लज्जा की भयावह सच्चाई।
कट्टरपंथी मौलानाओं ने तस्लीमा के खिलाफ “सर तन से जुदा” के फरमान जारी किए। किसी तरह वह भारत पहुँचीं और आज निर्वासन का जीवन जी रही हैं, जैसे शेख हसीना।
अच्छा हुआ कि तस्लीमा और हसीना भारत आ सकीं। वरना दीपूचंद्र दास की तरह उन्हें भी पेड़ से बाँधकर जला दिया जाता।
फिर भी, इस अमानवीय यथार्थ पर कोई “लज्जा-2” लिखेगा, और वही लिख पाएगा, जिसके हाथ न काँपें, होंठ न थरथराएँ और आत्मा न चीख उठे।
इतिहास ने स्वयं को एक बार फिर दोहरा दिया है। जिगर पर पत्थर रखकर समय ने अपने माथे पर यह रक्तरंजित कथा लिख दी है।
क्षमा करें अटल जी, आज के दौर का यही कड़वा गीत है, इसलिए आपकी पंक्तियों का सहारा लेना पड़ा।
आज बांग्लादेश में जो हो रहा है, उसे देखकर देश के जनरल_अरोड़ा और फील्ड मार्शल मानेकशॉ की आत्माएँ भी विचलित हो उठी होंगी।
हर कोई तस्लीमा या हसीना नहीं होता, जिसे संकट में भारत का आँचल नसीब हो,,,,,
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