जिस तरह केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोला है, उसे देख कर जस्टिस संजीव खन्ना से उसको मिली जमानत के फैसले की जांच होनी चाहिए

सुभाष चन्द्र

केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर अनेक आरोप लगाकर उन्हें CBI की अपील मामले से हटने की जिद की है और स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आपसे मुझे न्याय की उम्मीद नहीं है। उसे देख कर साफ़ लगता है कि 12 जुलाई, 2024 को जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जो उसे जमानत दी थी, उसमे बहुत बड़ा झोल था  

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केजरीवाल ने जस्टिस खन्ना की बेंच के सामने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के ही फैसले के खिलाफ अपील की थी जिसमें उन्होंने ED द्वारा केजरीवाल की गिरफ़्तारी को वैध कहा था और जमानत देने से मना कर दिया था जस्टिस शर्मा ने अनेक कारण दिए थे उसकी गिरफ़्तारी को वैध बताने के लिए लेकिन तब केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा के ऊपर कोई ऊँगली नहीं उठाई थी

जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस SVN Bhatti की पीठ ने ही ED के केस में कभी कहा था कि “money trail of ₹338 crore was tentatively established in the Delhi liquor policy case”. फिर भी उन्होंने जस्टिस दीपांकर दत्ता के साथ अन्य बेंच में केजरीवाल को जमानत दे दी यह निश्चित रूप से इशारा करता है कि केजरीवाल के वकील कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने जस्टिस खन्ना के साथ कुछ सांठगांठ की होगी जस्टिस खन्ना की तरह केजरीवाल को अब जस्टिस शर्मा से उसके पक्ष में फैसले की उम्मीद नहीं है जैसे पहले उसे अपने पक्ष में फैसला नहीं मिला

केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा को कलंकित करने के साथ ही यह साबित कर दिया कि जस्टिस खन्ना से उसे मनपसंद निर्णय मिला था क्योंकि वो उसके पसंद के जज थे सबसे बड़ी बात जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता ने ED द्वारा गिरफ़्तारी की वैधता को संवैधानिक मामला बता कर 5 जजों की बेंच के पास भेज दिया

हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को गिरफ़्तारी वैध करार देने में कोई समस्या नहीं हुई लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दो जज जस्टिस शर्मा के फैसले को नहीं काट (counter कर) सके, बस यही दोनों के फैसले पर संशय पैदा करता है जिसकी जांच होनी चाहिए, कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के जज होते हुए वे गिरफ़्तारी की वैधता पर फैसला क्यों नहीं कर सके कर नहीं सके या सिंघवी से Setting और Moneypower खेल कर गई? ये काम जस्टिस शर्मा के साथ नहीं कर पा रहा केजरीवाल

इतना ही नहीं सिंघवी ने ही ऐसी Setting की जो 5 जजों की बेंच आज करीब दो साल बाद भी नहीं बन सकी - अगर 5 जजों की बेंच ने गिरफ़्तारी को वैध ठहरा दिया तो केजरीवाल की जमानत स्वतः ही ख़त्म हो जाएगी - वैसे कोई भी legal expert  यह कभी नहीं कहेगा कि गिरफ़्तारी की वैधता में  किसी तरह का  गैर संवैधानिक प्रश्न हो सकता है - लेकिन मीलॉर्ड्स तो मीलॉर्ड्स हैं, कानून को जैसे मर्जी “interpret” कर सकते हैं और कर दिया -

जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता केजरीवाल की गिरफ़्तारी की वैधता में संवैधानिक प्रावधान तलाशने लगे और जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस महादेवन ने राष्ट्रपति को गैर संवैधानिक आदेश दे दिए - वो गैर संवैधानिक थे क्योंकि राष्ट्रपति से प्रश्नों के जवाब में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्वयं स्वीकार किया था कि सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति को आदेश देने का अधिकार नहीं है लेकिन फिर भी वे आदेश वापस नहीं लिए गए 

केजरीवाल का जस्टिस शर्मा के प्रति मर्यादाहीन आचरण देखते हुए, जस्टिस खन्ना और जस्टिस दत्ता के 12 जुलाई, 2024 के निर्णय की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए -

ED को चाहिए वह सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने 5 जजों की बेंच गठित करने के विषय को उठाए - यह आदमी छुट्टा नहीं घूमना चाहिए क्योंकि ये समाज के कोढ़ है -

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