1992 की बॉलीवुड फिल्म ‘बेमिसाल’ के एक सीन में अमिताभ बच्चन ने कहा था, “कश्मीर को छोड़कर, भारत के सभी हिल स्टेशन अंग्रेजों ने खोजे थे, कश्मीर को मुगलों ने खोजा था।” यह बात उन्होंने राखी गुलजार यानी कविता से कही थी। उस वक्त कविता मुगल शासकों की ‘शानदार संगीत, चित्रकला और वास्तुकला’ के लिए तारीफ कर रही थीं और जोर दे रही थीं कि उनका कोई मुकाबला नहीं है। तब अमिताभ ने मजाकिया अंदाज में जवाब दिया कि उनकी सबसे बड़ी देन तो ‘मुगलाई खाना’ है।
यह क्लिप 2022 में फिर से सामने आई और वायरल हो गई। लोगों ने इस बात पर नाराजगी जताई कि फिल्म इंडस्ट्री किस तरह लगातार सच को तोड़-मरोड़कर पेश करती है, ताकि हमलावरों को महिमा मंडित किया जा सके। वैसे भी यह हिंदू-विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए बदनाम रही है।
अब 2026 की बात करें, तो ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने उस फिल्मी सीन को अपने तरीके से लिखा है। इसमें मुगल वंश को ‘भाषा, खान-पान, वास्तुकला, संगीत, कला और मिली-जुली संस्कृति’ का श्रेय दिया गया है। साथ ही, व्यंग्य करते हुए यह भी जोड़ा गया है कि इसी वंश की वजह से 2014 में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई।
The Mughals brought language, food, architecture, music, art and syncretism to India. And they brought Narendra Modi’s party to power https://t.co/XX1e6m40ve
— The Economist (@TheEconomist) April 20, 2026
“What have the Mughals ever done for us?” शीर्षक वाला लेख 19 अप्रैल 2026 (रविवार) को प्रकाशित हुआ। इसके साथ यह टैगलाइन थी कि भारत के सबसे महान मुस्लिम साम्राज्य ने अपनी सबसे शक्तिशाली हिंदू पार्टी का निर्माण कैसे किया।
यह मुस्लिम शासकों का स्तुतिगान है, जो यह बताता है कि मुगलों ने भारत को समृद्ध बनाया। लेकिन, मुगलों के प्रभाव के बिना भी भारत की हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक सभ्यता थी। यह दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। इसकी अर्थव्यवस्था मजबूत थी। कला और विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियाँ थीं। साहित्य में योगदान था और जिसकी एक समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत थी।
बाबर ने मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। वह परिवारिक झगड़ों और लड़ाइयों में बार-बार मिली हार के कारण अपने पैतृक घर फरगना (जो अब उज़्बेकिस्तान में है) से बेदखल हो गया। इसकी वजह से वह भारत की ओर रुख किया। उसे यहाँ की अपार धन-संपदा और संसाधनों ने आकर्षित किया था। वह इस्लामी आक्रमणकारी था।
इस्लामवादियों से लेकर श्वेत उपनिवेशवादियों तक— सभी भारत को लूटने आए थे। इसका शोषण करने आए थे। इसमें वे सफल भी रहे। आक्रमणकारी किसी भी तरह से यहाँ के मूल निवासियों का धर्म परिवर्तन करवाना चाहते थे। मुगलों का उद्देश्य भी कुछ ऐसा ही था।
मुगलों ने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया: एक हास्यास्पद तर्क
‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक, “उन सभी में, मुगलों का शासन सबसे लंबे समय तक चला। 21 अप्रैल को पानीपत की पहली लड़ाई के ठीक 500 साल पूरे हो रहे हैं; यह वह समय था जब तैमूरलंग और चंगेज खान के मध्य एशियाई वंशज बाबर (इसीलिए ‘मुगल’, जो ‘मंगोल’ शब्द से बना है) ने दिल्ली के अंतिम सुल्तान को हराया था।
उसके द्वारा स्थापित साम्राज्य, अपने चरमोत्कर्ष पर, दुनिया के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। इसके शासकों ने भारतीय राजशाही की रीतियों को अपनाया, स्थानीय लोगों से विवाह किए, और वास्तव में वे भारतीय ही बन गए (अंग्रेजों के विपरीत)। उनकी उपलब्धियाँ भारतीय ही हैं,”
मुगल साम्राज्य की धन-संपदा और सत्ता का स्रोत वह भारतीय भूभाग ही था, जिसे उन्होंने सदियों तक लूटा-खसोटा। उन्होंने देश की फलती-फूलती प्राचीन रीतियों और परंपराओं का लाभ उठाकर नई संरचनाएँ खड़ी कीं। इन संरचनाओं का निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा केवल स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके किया गया था। बाद में इन्हें ‘समन्वय के प्रतीक’ स्मारक के रूप में महिमामंडित किया गया।
वे अपनी लूटी हुई धन-संपत्ति को अपनी मूल मातृभूमि तक नहीं ले जा सके, क्योंकि उन्हें अपने ही सगे-संबंधियों द्वारा वहाँ से खदेड़ दिया गया था। बाबर ने वापस जाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हो पाया।
दरअसल वे भारत में किसी प्रेम या लगाव के कारण नहीं, बल्कि केवल मजबूरी के कारण रुके रहे। भारत के प्रति उनके तथाकथित प्रेम का एक और प्रमाण इस बात से मिलता है कि बाबर के पार्थिव अवशेषों को, उसकी इच्छानुसार काबुल ले जाकर दफनाया गया। वह उसी स्थान को अपना ‘घर’ मानता था।
वामपंथी-उदारवादी खेमा (लेफ्ट-लिबरल ब्रिगेड) आमतौर पर आक्रमणकारियों की निंदा का तो स्वागत करते हैं, लेकिन तब नहीं, जब वे अत्याचार भारत या हिंदुओं के विरुद्ध किए गए हों। ऐसे कृत्यों को नजरअंदाज कर दिया जाता है या उन्हें सही ठहराने जाता है। जैसा कि इस लेख (कॉलम) में देखा जा सकता है, उनका गुणगान किया जाता है।
इसी क्रम में, ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी मजाक उड़ाया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया, क्योंकि प्रधानमंत्री ने भारत के उस इतिहास का जिक्र किया था, जिसमें भारत को विदेशी शक्तियों के अधीन रहना पड़ा।
इतिहासकारों ने माना कि मुगलों ने मंदिरों तोड़ा, साथ ही दावा किया कि इसे उनका अपमान नहीं माना जा सकता। ‘जजिया’ लगाना, हिंदुओं का नरसंहार और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन, जिनका जिक्र इस्लामी शासकों ने खुद अपनी लेखनी में किया था, उन्हें उसने आसानी से नजरअंदाज कर दिया।
हालाँकि वह गुट जो छोटी-मोटी घटनाओं को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ‘उकसावा’ करार देता है, वह हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थानों पर हुए हमलों को अपमान नहीं मानता। वह यह कहना चाहता है कि इसे आस्था पर हमला नहीं समझा जाना चाहिए। ध्यान दें तो हिंदू-विरोधी आचरण को सामान्य सी बात मानता है।
इसके बाद लेखक ने कहा, “उन्होंने भारत के पास जो कुछ भी था, सब ले लिया। साथ ही, यह विचारधारा पूछती है कि बदले में उन्होंने हमें क्या दिया?” फिर मुगलों का गुणगान करना शुरू कर देता है।
मुगलों के जरिए भारत का परिचय फारस से हुआ, जिन्होंने भारतीय भाषा में योगदान दिया- द इकोनॉमिस्ट
लेख में जोर देकर कहा गया, “उनके ऊपर दिए गए उद्धरण के मूल 28 शब्दों में से, एक-चौथाई शब्द फारसी के जरिए भारत में आए। यह बात मुस्लिम भारत के इतिहासकार रिचर्ड ईटन बताते हैं। मुगल दरबार की भाषा ने उत्तरी भारत की ज्यादातर भाषाओं को प्रभावित किया है। सच तो यह है कि हिंदी और हिंदू—दोनों ही ‘हिंद’ शब्द से आए हैं। यह उस नदी का फारसी नाम है, जिसे अंग्रेजी में ‘इंडस’ (और इस तरह ‘इंडिया’) कहा जाता है। लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद में ‘हिंदू’ शब्द जोड़ने के अलावा, मुगलों ने हमारे लिए और क्या किया है?”
भारत में भाषाओं का सबसे विविध संग्रह मौजूद है, जो समय के साथ लगातार विकसित होता रहा है। भाषाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और समय के साथ आगे बढ़ती हैं। इसी तरह हिंदी का फारसी के साथ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के एक ही पूर्वज है। हालाँकि हिन्दी की जड़ें संस्कृत में हैं। भाषाओं का यह जुड़ाव मुगलों के प्रभाव से ज्यादा, इन भाषाओं के मूल से संबंधित था।
अगर इसी तर्क को माना जाए, तो अंग्रेजी भाषा का श्रेय अंग्रेजों को दिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करना गलत, भ्रामक और ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। ठीक वैसे ही, जैसा कि मौजूदा तर्क है। इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि भाषा, कला और साहित्य के प्रसार के लिए दमन की जरूरत नहीं होती। कई देश बिना किसी की गुलामी किए भी विदेशी भाषाओं को अपना चुके हैं।
मुगलों ने भारतीय खान-पान और वास्तुकला में एक खास नजाकत जोड़ी- द इकोनॉमिस्ट
‘द इकोनॉमिस्ट’ ने मुगलों की तारीफ करते हुए उनके खान-पान पर जोर दिया। इन्हें अक्सर ‘मुगलाई’ कहा जाता है, इनमें तंदूरी व्यंजन और बिरयानी शामिल हैं।
“तंदूर—मिट्टी का एक ओवन जिससे परतदार नान और भुने हुए कबाब निकलते हैं— फारसी दुनिया से आया था। ठीक वैसे ही जैसे समोसे, शरबत, अलग-अलग तरह की मिठाइयाँ और बिरयानी आई थीं। बिरयानी पिछले दस सालों से लगातार डिलीवरी ऐप्स पर भारत में सबसे ज्यादा ऑर्डर की जाने वाली डिश रही है।
BJP का वह धड़ा, जो मौज-मस्ती का विरोधी है, वह मांस और अंडों को पसंद नहीं करता, लेकिन शाकाहारी लोग भी अच्छे तंदूरी पनीर का मजा लेते हैं। लेख में कहा गया है कि पनीर शब्द फारसी के ‘पनीर’ से आया है, जो एक तरह का चीज है और शायद अफगानों के जरिए भारत पहुँचा।
तंदूर का आविष्कार सिंधु घाटी और हड़प्पा सभ्यताओं में हुआ था। मध्य एशिया में बाबर के राज में चावल की खेती नहीं होती थी, जबकि बिरयानी का एक मुख्य हिस्सा चावल ही है। भारतीय उपमहाद्वीप मशहूर मसालों के लिए मशहूर रहा है। लेकिन यह विचार कि मसालों और मीट के साथ पकाया गया चावल एक बेहतरीन डिश बन सकता है, इसके लिए शायद मुगलों का ही शुक्रिया अदा करना होगा।
लेख के अनुसार, मुगलों के आने से पहले भारतीय लोग शायद संघर्ष कर रहे थे या बहुत ही साधारण भोजन पर निर्भर थे, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उनके पास स्वादिष्ट व्यंजन बनाने का ज्ञान और महारत नहीं थी। इसके बाद भारतीय मजदूरों और संसाधनों से तैयार की गई भव्य परियोजनाओं के लिए मुगलों की तारीफ की गई।
लेख में बताया गया, “भारत के दस सबसे मशहूर ऐतिहासिक स्थलों में से चार (जिनके लिए टिकट लगता है), जिन्हें स्थानीय पर्यटक सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं और विदेशियों की पसंद वाली सूची के छह स्थल मुगलों के ही बनवाए हुए हैं। इन दोनों सूचियों में ताजमहल सबसे ऊपर है। हर साल प्रधानमंत्री लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का भाषण देते हैं। यह दिल्ली में स्थित एक मुगल स्मारक है और भारत की अपनी पहचान के लिए इतना अहम है कि यह हमारे सबसे आम नोट के पीछे भी छपा हुआ है।”
विडंबना यह है कि इन इमारतों का निर्माण उस समय हुआ था, जब आम भारतीय (ज्यादातर हिंदू) मुगलों की तानाशाही और बर्बरता को झेल रहे थे। ये इमारतें मुगलों की बेहद आलीशान जीवनशैली की प्रतीक हैं और इन्हें उनके समृद्ध साम्राज्य की शान दिखाने के लिए ही बनाया गया था।
इसके अलावा उनके पास इस धन-दौलत को मध्य एशिया ले जाने का कोई विकल्प नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी मर्जी के मुताबिक और अपने फायदे के लिए ही इस धन का इस्तेमाल किया।
बहरहाल, ये सभी ऐतिहासिक स्थल पूरी तरह से भारत की संपत्ति हैं। चुनी हुई सरकार का पूरा अधिकार है कि वह इनका इस्तेमाल मुद्रा (नोटों) पर छापने के लिए करे या किसी अन्य काम के लिए। फिर भी, इससे इन स्थलों से जुड़ा इतिहास या मुगलों की वह धूमिल विरासत मिट नहीं जाती। दिलचस्प बात यह है कि उर्दू की नींव संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में है, फिर भी इस बात को खुलकर नहीं बताया जाता, क्योंकि ऐसा करने से मुस्लिम बादशाहों की बड़ाई करने वाले एजेंडे कमजोर पड़ जाएँगे।
शेरवानी, सितार और BJP की जबरदस्त बढ़त के लिए मुगल जिम्मेदार हैं- द इकोनॉमिस्ट
‘द इकोनॉमिस्ट’ ने शेरवानी और सितार को लेकर मुगलों की खूब तारीफ़ की। ये दोनों चीज़ें 16वीं और 18वीं सदी के बीच विकसित हुई थीं। इसने इतिहासकार जदुनाथ सरकार का हवाला देते हुए कहा, “मध्यकालीन भारत के लोकप्रिय धर्म सूफीवाद, उर्दू भाषा और कला—विजेताओं और पराजितों की साझा विरासत थे। इन्होंने इन दोनों को आपस में जोड़ने का काम किया।
लेख में अकबर के कथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ के उस घिसे-पिटे और उबाऊ ढोंग का प्रचार किया, जिसने हिंदू महाकाव्यों का अनुवाद करवाया था। साथ ही, उस समुदाय के खिलाफ चलाए गए अपने हिंसक अभियानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। मानो यह महिमामंडन ही काफी न हो, इस लेख ने हिंदू मान्यताओं का उपहास उड़ाते हुए यह दावा भी कर दिया कि अगर राम जन्मभूमि पर ‘बाबरी मस्जिद’ न होती, तो ‘भगवा पार्टी’ (BJP) कभी सत्ता में नहीं आ पाती।
लेख में कहा गया, “1990 में, जब पार्टी के पास संसद में केवल 16% सीटें थीं, तब उसने एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया। इसमें रामजन्मभूमि स्थल पर एक मंदिर बनाने की माँग की गई। इसे रामायण के नायक भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता है। उस जगह पर एक मस्जिद खड़ी थी, जिसे पहले मुगल बादशाह बाबर के शासनकाल में बनवाया गया था।”
इसमें कहा गया, “1992 में, BJP के अधिकारियों की मौजूदगी में एक भीड़ ने उस मस्जिद को ढहा दिया। इस घटना से पूरे देश में हिंसा की आग भड़क उठी, जिसने पार्टी के जनाधार को मजबूत किया और अंततः उसे सत्ता के शिखर तक पहुँचा दिया। 2024 की शुरुआत में, जब मोदी ने उस बहुप्रतीक्षित मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की, तब तक उनकी पार्टी के पास 56% सीटें हो चुकी थीं। पिछले एक दशक में पार्टी ने मुगल-कालीन शहरों के नाम बदलने, मुगलई खान-पान को नकारने और इतिहास की किताबों से मुगलों का जिक्र मिटाने पर ही अपना सारा ध्यान केंद्रित कर रखा है।”
राम मंदिर हिंदू धर्म का मूल आधार है। इसे महज एक चुनावी हथकंडा बताकर उसकी गरिमा को कम करने की कोशिश की गई। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि BJP ने इस मुद्दे का समर्थन किया था। इस मीडिया संस्थान ने बाबर को नायक के तौर पर दिखाया, जबकि वह मंदिरों को ढहाने वाला था। वहीं दूसरी ओर BJP को हिंदुओं के अधिकारों की पैरवी करने के कारण, एक खलनायक के तौर पर पेश किया गया।
लेख के आखिर में कहा गया, “ईंटों से बनी किसी इमारत को ढहा देना एक बात है, लेकिन उस संस्कृति को मिटाना कहीं ज्यादा मुश्किल है। यह पाँच सदियों से भी ज्यादा समय से भारत के खून और मिट्टी में रच-बस गई है। तो फिर उनके इस सवाल का सबसे अच्छा जवाब यही है कि मुगलों ने उनके लिए आखिर किया क्या है। उन्होंने राजनीतिक हिंदुत्व को उसका एक ऐसा ‘खलनायक’ दिया, जो हमेशा रहेगा और जिसके बिना उसका काम नहीं चल सकता।”
इंटरनेट यूजर्स ने जताई हैरानी
एक यूज़र ने इस पर टिप्पणी करते हुए लेक को बेतुका करार दिया। उसने लिखा “यह कहना कि मुगलों की वजह से ही नरेंद्र मोदी की पार्टी सत्ता में आई, कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे यह कहना कि हिटलर और नाजियों ने ही इजरायल देश बनाया था,”
वरुण ने मीडिया प्लेटफॉर्म से कहा कि वे अपने दायरे को केवल कला या संगीत तक ही सीमित न रखें, बल्कि सूर्य, चंद्रमा और हिमालय की रचना के लिए मुगलों का भी गुणगान करें।
Stating that "Mughals brought Narendra Modi’s party to power" is a bit like saying "Hitler and Nazis created the state of Israel."
— Openminded Fanatic (@Openatic) April 20, 2026
While the traumatic experiences of these regimes(Mughals in the case of Hindus and Nazis in the case of Jews) catalysed a defensive response that…
It seems these days in India, Marxist historians have been removed and Islamists have taken their place. Now no soft propaganda, it’s Direct Islamic narrative !! https://t.co/pIwQzPjJfl
— Monidipa Bose - Dey (মণিদীপা) (@monidipadey) April 21, 2026
While Mughals left cultural legacies, records show atrocities vs. non-Muslims, esp. Hindus:
— Grok (@grok) April 20, 2026
Baburnama (primary): Babur boasted slaughtering "infidels" at Chanderi, turning Dar-ul-Harb to Dar-ul-Islam; poem: "For Islam I battled Hindus... Thank God I became a Killer of…
‘द इकोनॉमिस्ट’ भी दूसरी मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों की तरह ही ऐसी कहानियाँ गढ़ने में माहिर है, जो भारत की उपलब्धियों का श्रेय विदेशियों को देती हैं। चाहे वे अतीत से जुड़ी हों या वर्तमान से। दरअसल ये भारतीय हिन्दू समाज की उपलब्धियों को नकारने का तरीका है।
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