अधूरा सच बेहद घातक होता है। सोरोस और कांग्रेस की propagandist हेले लिंग ने दिखा दिया मोदी और देश विरोध का अन्तर

एक बार एक बड़े धर्मगुरु अमेरिका पहुंचे। वहां पहुंचते ही एक पत्रकार ने उन्हें परेशान करने की नीयत से पूछा - Do you want to see any nude club? (क्या आप नंगो का क्लब देखना पसंद करेंगे? )
धर्मगुरु ने चौंकते हुए पूछा - what, is there a nude club here too? (क्या, यहां नंगो का क्लब भी है?)
दूसरे दिन अख़बार की सुर्खियां थीं।
धर्मगुरु ने अमेरिका की धरती पर कदम रखते ही पहला सवाल पूछा - "is there a nude club here too?"
जिसने भी अख़बार पढ़ा वही चौंक गया - अरे बाप रे!
तथ्यात्मक रूप से ये बिल्कुल सत्य बात है। अमेरिका की धरती पर धर्मगुरु के मुंह से निकले पहले शब्द यही थे पर क्या ये सच, सच था? अख़बार की सुर्खियां जो कह रही थी बात बिल्कुल उसके विपरीत थी। एक अधूरे सच ने भावार्थ बदल दिए थे।
जब भी किसी देश के प्रधानमंत्री दूसरे देश की यात्रा पर होते हैं तो उनकी कूटनीतिक वार्ता के बाद औपचारिक तौर पर एक साझा प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की जाती है। जिसमें दोनों देशों के प्रधानमंत्री मंच साझा करते हैं। पहले मेहमान और फिर मेज़बान देश के प्रधानमंत्री ओपचारिक तौर पर एक दूसरे का धन्यवाद करते हैं, दोनों पूर्व से तैयार अपना वक्तब्य पढ़ते हैं जिसमें वार्ता में शामिल कूटनीतिक मुद्दों पर बने आपसी सहयोग की बात करते हैं, यदि कोई समझौता (MOU) हुआ हो तो उसकी चर्चा करते हैं। फिर हाथ मिलाते हैं और मंच से चले जाते हैं। हां यदि पहले से तय हो तो दोनों प्रधानमंत्री दूसरे देश के पत्रकार के एक या दो सवाल का जवाब देते हैं पर यहां ये बात पहले ही तय कर ली जाती है कि कौन सा पत्रकार सवाल पूछेगा, जैसा हर देश में होता है और अमूमन ये भी तय कर लिया जाता है कि क्या सवाल पूछा जाएगा। कोई पत्रकार ऐसा सवाल नहीं कर सकता जिससे दो देशों के संबंधों को प्रभावित करने वाली कूटनीतिक असहजता पैदा न हो इसलिए संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग का यही प्रोटोकॉल है। पूरी प्रेस ब्रीफिंग का एक-एक मिनट पूर्णतः स्क्रिप्टेड होता है।
इस समय देश में सबसे ज्यादा चर्चा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नार्वेजियन पत्रकार हेले लिंग के प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। ये सच भी है पर ये अधूरा सच है। तो सच क्या है? भारत - नार्वे के प्रधानमंत्रियों की साझा प्रेस ब्रीफिंग में पत्रकारों के सवाल लेने का समय प्रोटोकॉल में शामिल ही नहीं था। ना तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रेस से कोई सवाल लिया ना ही नार्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे ने प्रेस से कोई सवाल लिया। दोनों ने प्रेस ब्रीफिंग की हाथ मिलाया और मंच से चल दिए। लेकिन उसी समय नार्वे की propagandist पत्रकार हेले लिंग ने अपना कैमरा भारत के प्रधानमंत्री पर फोकस किया और चीख कर कुछ सवाल दाग दिए। स्वाभाविक है कोई भी प्रधानमंत्री ऐसी स्थिति में जवाब नहीं देगा। यहां अधूरा सच ये है कि भारत के प्रधानमंत्री ने हेले के प्रश्नों का जवाब नहीं दिया पर पूरा सच ये है कि वो प्रश्न समुचित तरीके से पूछे ही नहीं गए थे बल्कि उनका अनुत्तरित रहना बिल्कुल तय था बस इस काम के मिले धन को वसूलने के लिए एक वीडियो रिकॉर्डिंग होनी थी वो हो गई।
ये नार्वे सरकार की व्यवस्था की विफलता थी। किसी मेहमान प्रधानमंत्री के साथ ये व्यवहार सर्वथा अनुचित था और कूटनीतिक संबंधों के लिए प्रतिकूल भी। शायद नार्वे की सरकार ने हेले द्वारा प्रोटोकॉल के इस उल्लंघन को समझा और हेले के ट्विटर-इंस्टा एकाउंट को सस्पेंड कर दिया।
भारत के प्रधानमंत्री की अस्मिता में गुस्ताख़ी की इस घटना को भारत के नामचीन पत्रकार जिस तरह उद्धृत कर रहे हैं वो अचंभित करता है। होना तो ये चाहिए था कि हमें प्रोटोकॉल की असफलता पर, हेले के गरिमाहीन व्यवहार पर प्रश्न उठाना चाहिए था।
देश के प्रधानमंत्री जब विदेशी दौरे पर जाते हैं तो वो व्यक्ति विशेष नहीं होते बल्कि अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं ऐसे में जब कोई आउट ऑफ बॉक्स जाकर हमारे प्रधानमंत्री के समक्ष घटिया व्यवहार करता है तो ये बात निसंदेह निंदनीय है। आप प्रधानमंत्री से सवाल पूछिए, उनकी नीतियों की आलोचना कीजिए किन्तु किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर जो मुद्दा है ही नहीं, साफ़-साफ fabricated झूठ दिखता है उस पर आपका ये रवैया?
मुझे दो बातें याद आती हैं -
1. जब भारत ने अमेरिका से बैर मोल लिया था तब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था - मुझे व्यक्तिगत हानि उठानी पड़ेगी।
2. फ़िल्म धुरंधर देख कर ये धारणा पुष्ट हुई कि हर देश में दुसरे देशों के एजेंट(sleeper cells) होते हैं जो घटनाओं को अपने आका देशों के मुताबिक़ मोड़ने की कोशिश कर देश में अराजकता पैदा कर अपने आका को गुप्त समर्थन देते है ताकि जनता उनकी गद्दारी को न भांप सके। लेकिन दुर्भाग्य से हमारा समूचा विपक्ष भारत विरोधियों के हाथ की कठपुतली बन जनता को गुमराह करने का कोई मौका नहीं चूक रहा। हिन्दुओं को जातिगत सियासत में विभाजित कर मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथ मजबूत कर रहा है।
हिन्दुओं को Secularism के नशे को छोड़ सनातन पर कीजड़ फेंकने वालों से पूछना चाहिए क्या तुममें से किसी में ईसाई और इस्लाम की कुरीतियों पर बोलने की हिम्मत है?
मोदी विरोध और भारत विरोध के फ़र्क को समझना तो होगा!

No comments: