अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में लगे खालिस्तानी नारे, आतंकी भिंडरावाले को सेना ने इसी दिन 42 साल पहले किया था ढेर

                                                                                                              साभार - न्यूज 18
पंजाब की ऐतिहासिक और धार्मिक धरती अमृतसर से एक बार फिर तनाव और संवेदनशीलता की तस्वीरें सामने आई हैं। ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी के मौके पर शुक्रवार को अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मंदिर (हरिमंदिर साहिब) परिसर में एक बार फिर ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे गूँज उठे। श्री अकाल तख्त साहिब के नजदीक बड़ी संख्या में कट्टरपंथी और उनके समर्थक इकट्ठा हुए, जिन्होंने हाथों में प्रतिबंधित संगठन और जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर लहराए

हर साल 6 जून की यह तारीख भारतीय राजनीति, सिख समुदाय और देश की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इसी दिन साल 1984 में भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर को भारी हथियारों से लैस आतंकियों के चंगुल से मुक्त कराया था। इस कार्रवाई के दौरान आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले को सेना ने ढेर कर दिया था। यही वजह है कि हर साल इस दिन भिंडरावाले और ऑपरेशन में मारे गए लोगों की याद में विशेष अरदास की जाती है, जिसकी आड़ में कट्टरपंथी तत्व हंगामा और नारेबाजी करते हैं।

इस बेहद संवेदनशील और तनावपूर्ण मौके को देखते हुए पंजाब पुलिस, खुफिया एजेंसियाँ और अर्धसैनिक बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर रहे। स्वर्ण मंदिर के आसपास के पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी। हालाँकि परिसर के भीतर नारेबाजी और पोस्टरबाजी के कारण माहौल में भारी तनाव देखा गया, लेकिन प्रशासन और सुरक्षाबलों की मुस्तैदी के कारण स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में बनी रही।

इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस ने पंजाब में खड़ा किया था भिंडरावाले नाम का भस्मासुर

इतिहास के पन्नों को पलटें तो जरनैल सिंह भिंडरावाले एक ऐसा नाम है जिसने पूरे पंजाब को आतंकवाद की आग में झोंक दिया था। शुरुआत में भिंडरावाले को खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस सरकार ने अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और अकाली दल के प्रभाव को कम करने के लिए बढ़ावा दिया था। लेकिन बाद में वही भिंडरावाले भस्मासुर बन गया और उसने पंजाब में सिखों के लिए एक अलग देश ‘खालिस्तान’ की हिंसक मांग शुरू कर दी।

भिंडरावाले का प्रभाव 1978 के बाद तेजी से बढ़ा और उसने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव का समर्थन करते हुए उग्रवाद का रास्ता चुन लिया। उसके इशारे पर पंजाब में हिंदुओं और निरंकारियों की सरेआम हत्याएँ होने लगीं। जब कानून का शिकंजा कसने लगा, तो भिंडरावाले ने अपने सैकड़ों हथियारबंद आतंकियों के साथ सिखों के सबसे पवित्र स्थल स्वर्ण मंदिर परिसर पर अवैध कब्जा कर लिया और उसे एक अभेद्य किले तथा आतंकी मुख्यालय में तब्दील कर दिया।

आतंकियों से सिखों के पवित्र स्थान को मुक्त कराने के लिए सेना ने चलाया था ऑपरेशन ब्लू स्टार

जब पंजाब में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और आतंकवाद चरम पर पहुँच गया, तब इंदिरा गाँधी सरकार के आदेश पर भारतीय सेना को ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार‘ चलाना पड़ा। 1 जून से 8 जून 1984 के बीच चले इस भीषण सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य स्वर्ण मंदिर परिसर को जरनैल सिंह भिंडरावाले और उसके घातक हथियारों से लैस समर्थकों से मुक्त कराना था। भारी गोलीबारी के बीच 6 जून 1984 को सेना ने भिंडरावाले को मार गिराया।

 इस सैन्य कार्रवाई के दौरान सिखों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल ‘श्री अकाल तख्त साहिब’ को भारी नुकसान पहुँचा था, जिसे सिख समुदाय का एक बड़ा वर्ग आज भी अपनी धार्मिक भावनाओं पर गहरी चोट और बेअदबी के रूप में देखता है। यही कारण है कि 42 साल बीत जाने के बाद भी यह मुद्दा भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना हुआ है और इसके जख्म आज भी ताज़ा हैं। इस ऑपरेशन के बाद देश का माहौल बिगड़ गया था और इसके प्रतिशोध में ही इंदिरा गाँधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी, जिसके बाद देश में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे।

इस बरसी के मौके पर स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद प्रदर्शनकारियों ने भारतीय राज्य के खिलाफ अपनी भड़ास निकाली। एक कट्टरपंथी संगठन के नेता ने वहाँ मौजूद भीड़ के सामने बयान देते हुए कहा, “1984 की सैन्य कार्रवाई ने पूरे सिख समुदाय को एक ऐसी गहरी पीड़ा दी है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। हमारे पवित्र अकाल तख्त पर हमला करके हमारी धार्मिक पहचान को कुचलने की कोशिश की गई थी। हम अपनी स्वायत्तता और हक की लड़ाई को हमेशा जिंदा रखेंगे और शहीदों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने देंगे।”

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