रक्षा बंधन पर अनेक कथाएं प्रचलित हैं। संक्षेप में इतना ही कहना है कि बहन जब भाई के प्रेम का धागा बांधती है तो भाई को संकटमुक्त होने की प्रभु से कामना करती है, उसके पलटे अगर भाई बहन को कुछ रूपए देकर अपना कर्तव्य निभाना समझता है जिसकी बहन की भाई के प्रति प्रेम की कीमत से बहुत कम होता है। बहन अपने प्रभु प्रेम का धागा बांधने से पहले परमपिता से अपने भाई की मंगल कामना करती है। भाई बहन का यही विश्वास है जिसे हर देवी-देवता भी स्वीकार करते हैं। बहन भाई से कोई पैसे की उम्मीद नहीं करती बल्कि आपसी प्रेम की भूखी होती है।
सृष्टि के पालनकर्ता, वैकुण्ठ के स्वामी और समस्त ब्रह्मांड के रक्षक भगवान श्रीहरि विष्णु अनंत वैभव और दिव्य ऐश्वर्य से युक्त अपने वैकुण्ठ धाम में विराजमान रहते हैं। जहाँ हर क्षण आनंद, शांति और भक्ति का प्रवाह होता है। वहाँ किसी प्रकार का दुःख, भय या अभाव नहीं होता। माता लक्ष्मी सदैव भगवान के चरणों की सेवा में रहती हैं और देवता समय-समय पर उनके दर्शन के लिए उपस्थित होते हैं। परंतु एक समय ऐसा आया जब वैकुण्ठ का वातावरण असामान्य रूप से शांत हो गया। भगवान विष्णु अपने दिव्य सिंहासन पर उपस्थित नहीं थे। दिन बीतते गए, फिर सप्ताह और फिर कई महीने निकल गए, लेकिन प्रभु वैकुण्ठ वापस नहीं लौटे। माता लक्ष्मी का हृदय चिंता से भर उठा। उन्हें ज्ञात था कि उनके स्वामी किसी विशेष उद्देश्य से गए हैं, परंतु वे उन्हें वापस नहीं ला पा रही थीं। पूरा वैकुण्ठ मानो अपने स्वामी के बिना अधूरा हो गया था।
एक दिन देवर्षि नारद अपनी वीणा बजाते हुए वैकुण्ठ पहुँचे। उन्होंने देखा कि जहाँ सदैव आनंद का वातावरण रहता था, वहाँ आज एक गहरी उदासी छाई हुई है। उन्होंने माता लक्ष्मी को प्रणाम किया और विनम्रता से पूछा, “माते, आपके मुख पर यह चिंता क्यों है? क्या तीनों लोकों में सब कुशल है?” माता लक्ष्मी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “देवर्षि, जिनके होने से ही सबका कल्याण होता है, वही आज वैकुण्ठ में नहीं हैं। मेरे स्वामी भगवान विष्णु पाताल लोक में हैं।” नारद चकित रह गए। उन्होंने आश्चर्य से पूछा, “पाताल लोक? जहाँ असुरराज बलि का राज्य है? प्रभु वहाँ क्या कर रहे हैं?” माता लक्ष्मी ने दुख भरे स्वर में उत्तर दिया, “यही तो मेरी पीड़ा है। मेरे स्वामी स्वयं असुरराज बलि के द्वारपाल बनकर रह रहे हैं।”यह सुनकर नारद भी विस्मित रह गए। उन्होंने पूछा, “माते, यह कैसे संभव हुआ? देवताओं के रक्षक, सृष्टि के पालनकर्ता और वैकुण्ठपति स्वयं किसी असुर के द्वारपाल कैसे बन सकते हैं?” तब माता लक्ष्मी ने कहा, “इस रहस्य के पीछे एक लंबी कथा है—एक भक्त की अटल प्रतिज्ञा, एक गुरु की दूरदर्शिता, भगवान की लीला और उस भक्ति की कथा जिसने स्वयं भगवान को भी वचन निभाने के लिए बाध्य कर दिया।”
बहुत समय पहले प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र महादानी राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में प्रसिद्ध था। वह असुर कुल में जन्मे अवश्य थे, परंतु उनके भीतर भगवान विष्णु के प्रति गहरी श्रद्धा थी। वे धर्म का पालन करते थे, प्रजा का कल्याण करते थे और याचक को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे। उनके दान और पराक्रम की ख्याति इतनी फैल चुकी थी कि देवता भी उनकी प्रशंसा करते थे। किंतु धीरे-धीरे उनके भीतर एक सूक्ष्म अहंकार जन्म लेने लगा। उन्हें विश्वास हो गया कि उनकी शक्ति और दान के सामने अब कोई उनका सामना नहीं कर सकता।
एक दिन उन्होंने अपने गुरु शुक्राचार्य से कहा, “गुरुदेव, मैंने अनेक यज्ञ किए, असंख्य दान दिए और अपने पराक्रम से स्वर्ग तक जीत लिया। अब केवल एक अंतिम अश्वमेध यज्ञ शेष है। उसके पूर्ण होते ही मैं तीनों लोकों का निर्विवाद स्वामी बन जाऊँगा।” शुक्राचार्य ने गंभीर स्वर में कहा, “राजन, तुम्हारी शक्ति महान है, परंतु सावधान रहो। देवता युद्ध में हार जाएँ तो छल का सहारा लेते हैं। तुम्हारे दादा प्रह्लाद को स्वयं भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त था। वे तुम्हारा विनाश नहीं करेंगे, परंतु तुम्हें रोकने का उपाय अवश्य करेंगे। मुझे किसी बड़ी लीला की आहट सुनाई दे रही है।” बलि मुस्कुराए और बोले, “गुरुदेव, यदि स्वयं भगवान विष्णु भी मेरे द्वार पर याचक बनकर आ जाएँ तो मैं उन्हें भी खाली हाथ नहीं लौटाऊँगा। मेरा वचन ही मेरा धर्म है।”
इधर देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे राजा बलि के बढ़ते प्रभाव को रोकें। भगवान ने मुस्कुराकर कहा कि किसी भक्त का अभिमान भी प्रेमपूर्वक दूर करना आवश्यक होता है। तब उन्होंने अदिति और कश्यप ऋषि के पुत्र के रूप में वामन अवतार धारण किया। उनका स्वरूप एक तेजस्वी ब्राह्मण बालक का था। उनके एक हाथ में कमंडल था, दूसरे हाथ में छाता और मुख पर अद्भुत दिव्य तेज था।
उधर राजा बलि का विशाल यज्ञ प्रारंभ हो चुका था। देश-देशांतर से ऋषि, मुनि और ब्राह्मण वहाँ उपस्थित थे। उसी समय यह तेजस्वी ब्राह्मण बालक यज्ञशाला में पहुँचा। राजा बलि स्वयं उठकर उनके स्वागत के लिए आए। उन्होंने आदरपूर्वक उनका पूजन किया और बोले, “हे ब्राह्मण कुमार, आपका स्वागत है। आज जो भी माँगेंगे, मैं अवश्य दूँगा। सोना, चाँदी, भूमि, गौएँ, हाथी, रथ—जो चाहें माँग लीजिए।”
वामन भगवान ने शांत स्वर में कहा, “राजन, मुझे अधिक की आवश्यकता नहीं। मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए, जिसे मैं अपने छोटे-छोटे चरणों से नाप सकूँ।” यह सुनकर बलि हँस पड़े। उन्होंने कहा, “बालक, तुम बहुत अल्प माँग रहे हो। मैं तुम्हें पूरा राज्य दे सकता हूँ। तीन पग भूमि से तुम्हारा क्या होगा?” वामन ने उत्तर दिया, “जिसे संतोष का धन मिल गया, उसे संसार की किसी और वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती।”
इतने में शुक्राचार्य ने अपने दिव्य ज्ञान से पहचान लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं। वे तुरंत राजा बलि के पास पहुँचे और बोले, “राजन, सावधान! यह भगवान विष्णु हैं। यह तुम्हारी परीक्षा लेने आए हैं। यदि तुमने इन्हें दान दे दिया तो सब कुछ खो दोगे। अपने वचन से पीछे हट जाओ।” लेकिन बलि ने विनम्रता से कहा, “गुरुदेव, यदि स्वयं भगवान मेरे द्वार पर याचक बनकर आए हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए और क्या होगा? मैं अपना वचन नहीं तोड़ सकता।”
जब संकल्प लेने का समय आया तो शुक्राचार्य ने अंतिम उपाय सोचा। उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण किया और उस पात्र की नली में प्रवेश कर गए जिससे संकल्प का जल निकलना था। जल बाहर नहीं निकला। बलि आश्चर्यचकित हो गए। तभी भगवान वामन सब समझ गए। उन्होंने पास पड़ी कुश घास का एक नुकीला तिनका उठाया और पात्र की नली में डाल दिया। वह तिनका सीधे शुक्राचार्य की आँख में जा लगा। पीड़ा से वे बाहर निकल आए और उसी कारण उनकी एक आँख की दृष्टि चली गई। जल बाहर निकला और राजा बलि ने अपना संकल्प पूर्ण कर दिया।
जैसे ही दान का वचन पूरा हुआ, ब्राह्मण बालक का स्वरूप बदलने लगा। उनका शरीर बढ़ता गया। वे आकाश से भी ऊँचे हो गए। उनका विराट त्रिविक्रम स्वरूप पूरे ब्रह्मांड में फैल गया। एक चरण में उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी और समस्त दिशाएँ नाप लीं। दूसरे चरण में स्वर्ग, महर्लोक, जनलोक, तपलोक और ब्रह्मलोक तक सब समा गया। अब तीसरा चरण रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा।
भगवान ने गंभीर स्वर में पूछा, “राजा बलि, तुमने मुझे तीन पग भूमि देने का वचन दिया था। दो पगों में सब कुछ नाप लिया गया। अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?” उस क्षण राजा बलि का समस्त अभिमान समाप्त हो चुका था। वे मुस्कुराए, हाथ जोड़कर भगवान के सामने झुक गए और बोले, “प्रभु, अब मेरे पास कुछ भी शेष नहीं है। केवल मेरा यह शरीर और मेरा अहंकार बचा है। कृपा करके अपना तीसरा चरण मेरे मस्तक पर रख दीजिए। यही मेरा अंतिम दान होगा।”
भगवान विष्णु उनके समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना चरण बलि के सिर पर रखा। उसी क्षण उनका अहंकार समाप्त हो गया और उन्हें परम शांति की प्राप्ति हुई। भगवान ने उन्हें सुतल लोक का स्वामी बना दिया और कहा, “हे बलि, तुमने दान, सत्य और वचनपालन की सर्वोच्च मर्यादा स्थापित की है। मैं तुम्हारे इस समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हूँ। इसलिए मैं स्वयं तुम्हारे सुतल लोक में निवास करूँगा और तुम्हारे द्वार का रक्षक बनूँगा, ताकि तुम प्रतिदिन मेरे दर्शन कर सको।”
इस प्रकार भगवान विष्णु स्वयं राजा बलि के द्वारपाल बनकर सुतल लोक में रहने लगे। यही कारण था कि वैकुण्ठ उनके बिना सूना हो गया और माता लक्ष्मी व्याकुल रहने लगीं।
समय बीतता गया। श्रावण मास की पूर्णिमा का पवित्र दिन आया। देवर्षि नारद ने माता लक्ष्मी को उपाय बताया। उन्होंने कहा, “यदि आप भगवान को वापस लाना चाहती हैं तो देवी बनकर नहीं, बल्कि एक बहन बनकर राजा बलि के पास जाइए।”
माता लक्ष्मी ने साधारण स्त्री का वेश धारण किया और सुतल लोक पहुँचीं। उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा। बलि ने भावुक होकर कहा, “आज से आप मेरी बहन हैं। बताइए, भाई से क्या चाहती हैं?” माता लक्ष्मी ने विनम्रता से कहा, “भैया, मुझे मेरा पति वापस चाहिए।”
राजा बलि सब समझ गए। उन्होंने भगवान विष्णु की ओर देखा और मुस्कुराकर बोले, “प्रभु, आपने मुझे अपना दर्शन देकर धन्य कर दिया। अब मेरी बहन अपने पति को वापस ले जाना चाहती है। एक भाई अपने वचन से पीछे नहीं हट सकता। मैं आपको मुक्त करता हूँ।”
भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले, “हे बलि, आज तुमने भाई-बहन के प्रेम को अमर कर दिया। यह दिन सदा रक्षाबंधन के पवित्र पर्व के रूप में मनाया जाएगा, जहाँ एक धागा केवल रक्षा का नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और वचन का प्रतीक बनेगा।”
भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ पुनः वैकुण्ठ लौट आए। लेकिन उन्होंने राजा बलि को यह वरदान भी दिया कि प्रत्येक वर्ष वे उनसे मिलने अवश्य आएँगे और उनका आशीर्वाद सदा उनके साथ रहेगा।
यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि भगवान केवल शक्ति से नहीं, सच्ची भक्ति, सत्य, वचनपालन और समर्पण से प्रसन्न होते हैं। जिसने अपना अहंकार भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया, उसके लिए स्वयं भगवान भी अपने दिव्य सिंहासन को छोड़ सकते हैं। यही कारण है कि आज भी राजा बलि को महान दानी, सत्यनिष्ठ और भगवान के परम भक्तों में गिना जाता है, और भगवान विष्णु की यह लीला भक्त और भगवान के बीच अटूट प्रेम और विश्वास का अमर प्रतीक मानी जाती है।
No comments:
Post a Comment