क्या राहुल ने लोकसभा कैंटीन से जाति बताकर चाय मंगवाई?

लोकसभा की सीढ़ियों पर बैठ डिस्पोजल कप में चाय पीते हुए। क्या कैंटीन वाले ने दलित समझ ऐसे कप में चाय दी?
राहुल गांधी ने कहा - चाय की दुकान पर दो तरह से कप रखे जाते हैं डिस्पोजल वाले जो फेक दिए जाते हैं वे दलितों के लिए और काँच वाले सवर्णो के लिए! कैसी हास्यास्पद बात है! इससे यह साबित होता है कि आज तक ये कभी चाय की दुकान पर गए ही नहीं।

और पूरे भारत पर कलंक लगाते हुए कह रहे हैं "यही पूरे हिंदुस्तान की रियलिटी है"। क्या यही भारत अपने देखा है? अगर आप यह कहे होते कि आज भी कहीं कहीं है तो समझ आता । आप पूरे भारत की ये रियल्टी बता रहे हैं।
आ गए आप भी उसी पर! वही जातिवादी राजनीति! वही धार्मिक राजनीति! अफसोस हुआ। आज बड़ी अतार्किक बात की आपने।
अब इसमें कोई शक नहीं रहा कि राहुल जितना बोलेंगे अपनी पार्टी का नुकसान करेंगे। राहुल की गूंज को युवा यदि झूठ की गूँज बनाकर पेश कर रहे हैं तो पार्टी के लिए शर्म की बात है। क्या तमाशा है कि बीएसएनल को बेच दिया, भारत में इन्डस्ट्री खत्म हो गई, स्टार्टअप बर्बाद हो गए, इसरो को बेच दिया जैसे फेक नैरेटिव फैला रहे हैं? कहां बेच दिया? कब बेच दिया? किसे बेच दिया? यूँ ही बक बक किए जा रहे हैं या कोई सच्चा आंकड़ा है आपके पास? और फिर आईआईटी की उस जेन जी लड़की के खिलाफ कर्नाटक में एफआईआर दर्ज करा दी जिसने आपके फेक नैरेटिव का भंडाफोड़ कर दिया?
बारह साल हो गए नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। लेकिन विपक्ष की कहानी आज भी वहीं से शुरू होती है—“मोदी सरकार ने किया ही क्या है?” सवाल सुनकर लगता है जैसे 2014 से 2026 के बीच देश रुका हुआ हो? सड़कें नहीं बनीं, रेल नहीं बदली, डिजिटल भुगतान नहीं आया, गरीबों के बैंक खाते नहीं खुले, टैक्स व्यवस्था में बदलाव नहीं हुआ, अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में कोई नई दिशा नहीं मिली और भारत दुनिया की अर्थव्यवस्था में आगे नहीं बढ़ा? मतलब न 370 हटी, न तीन तलाक हटा, न राम मंदिर बना, न सेना में आमूल क्रांति आई, न भारत मिसाइल और अत्याधुनिक सैन्य सामग्री का निर्यातक देश बना, न आर्थिक और सैन्य शक्ति बना?
तो फिर सवाल यह है कि क्या देश की जनता को दिखाई देने वाला बदलाव विपक्ष को दिखाई नहीं देता? या फिर विपक्ष की राजनीति का चश्मा कुछ ज्यादा ही मोटा हो गया है? माना कि विपक्ष का काम सरकार की आलोचना करना है। लोकतंत्र में यह जरूरी भी है। लेकिन आलोचना और नकारवाद में अंतर होता है। सरकार की नीतियों की कमियां गिनाइए, सवाल पूछिए, आंकड़े मांगिए, संसद में आइये, भ्रष्टाचार हो तो मुद्दा उठाइए? लेकिन अगर देश में कोई बदलाव हुआ है तो केवल इसलिए उसे नकार देना कि उसका श्रेय मोदी सरकार को मिल जाएगा, विपक्षी राजनीति की गंभीरता को कमजोर करता है।
GST आया, देश की जटिल अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को एक ढांचे में लाने की कोशिश हुई। इसमें समस्याएं भी आईं और सुधार भी हुए। लेकिन क्या इसे कोई सामान्य फैसला कहा जा सकता है? UPI आया और डिजिटल भुगतान ने आम आदमी की जिंदगी बदल दी। जिस देश में कभी छोटे भुगतान के लिए भी नकदी जरूरी समझी जाती थी, वहां आज चाय की दुकान से लेकर बड़े कारोबार तक मोबाइल से भुगतान हो रहा है। फिर भी विपक्ष पूछता है—“बड़ा काम क्या हुआ?” सरकार के काम गिनाना न तो हमारा मकसद है, न हमारा काम। यहीं से राजनीति का असली व्यंग्य शुरू होता है। अगर सरकार कुछ करे तो विपक्ष कहता है—“इसमें नया क्या है?”
अगर सरकार कुछ न करे तो विपक्ष कहता है—“सरकार सो रही है। सरकार योजना बनाए तो—“जुमला”। योजना सफल हो तो—“हमारे समय में भी शुरू हुई थी”।
और अगर योजना में समस्या आ जाए तो—“देखिए, मोदी सरकार फेल”? यानि समस्या काम में नहीं, शायद काम करने वाले के नाम में है। 12 सालों से यही सब चलते चलते विपक्ष अजीब मकाम पर आ पहुंचा है। अब कुछ भी हासिल करने की जिद हो गई है। लोकतंत्र के रास्ते न हो पाए तो सड़क के रास्ते छीन लेने की प्रवृत्ति विकसित हुई है। यह बेहद खतरनाक है । किसी भी तरह सत्ता हासिल करने की हनक में राहुल गांधी ने नेता प्रतिपक्ष होते हुए भी सब ताक पर रख दिया।
क्या यह स्वस्थ लोकतंत्र है?

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