जस्टिस संजय करोल ने रिटायर होते हुए कह तो दिया कि जज भगवान नहीं होते, उससे भी गलती हो सकती है लेकिन कानूनों में जितने संशोधन करके अदालतों ने नए कानून बनाए हैं, उन्हें मिला कर कई संविधान लिखे जा सकते है।
रोज कानून की नई नई व्याख्या की जाती है। कभी संसद के बनाए हुए कानून को ख़ारिज कर दिया जाता और कभी कह देते हैं संसद के बनाए कानून में हम क्या कर सकते हैं।
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बेंच ने कहा ट्रायल कोर्ट का आदेश मौजूदा वैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है- बिना वैधानिक छूट के आजीवन कारावास जैसी विशेष श्रेणी की सजा देने का अधिकार केवल हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक अदालतों के पास है, ट्रायल कोर्ट के पास नहीं।
अगर ऐसी सजा देने का अधिकार हाई कोर्ट के पास भी है तो इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा 2014 में दी गई सजा (शेष जीवन जेल में बिताने) को पंजाब & हरियाणा हाई कोर्ट ने 2022 में बरक़रार रखा। यानी हाई कोर्ट ने अपने उचित अधिकार उपयोग किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन दोनों दोषियों की सजा को 25 साल के कठोर कारावास में बदल दिया।
प्रश्न यह उठता है कि जब ट्रायल कोर्ट को मुक़दमे की सुनवाई का अधिकार है और उसे कानून सम्मत सजा देने का भी अधिकार है तो आप उसके अधिकार को कैसे सीमित कर सकते हैं। ट्रायल कोर्ट ने सजा देते हुए यह तो नहीं कहा था कि दोषियों को अपील करने का अधिकार नहीं होगा। उन्होंने अपील की और हाई कोर्ट ने सजा को सही माना। ये आपके अधिकार क्षेत्र में था कि आप सजा को कम करें या बरक़रार रखें लेकिन ट्रायल कोर्ट के अधिकार को कम करना किस कानून में लिखा है, यह यह समझ से परे है।
फिर तो एक और नियम बना दीजिए कि ट्रायल कोर्ट बस यह निर्णय करेंगे कि आरोपी दोषी हैं या नहीं लेकिन अगर आरोपी दोषी हैं तो उस पर सजा बस हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट देगा। यह मजाक नहीं है क्या?
SC/ST 1989 के एक्ट में आपने जांच करना आवश्यक कर दिया जिसे सरकार ने सभी दलों से मिलकर 2018 में बदल दिया - अब उस संशोधन के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह तो संसद ने पास किया है, इसमें हम दखल नहीं दे सकते - फिर 1989 के एक्ट में कैसे दखल दिया जबकि वह भी संसद से ही पारित हुआ था -
चीफ जस्टिस की बेंच ने हाल ही में कहा कि अंतरात्मा की आवाज पर वंदे मातरम न गाने के लिए सजा नहीं दी जानी चाहिए - मतलब संसद का कानून तो गया घुइयाँ के खेत में। उनकी अंतरात्मा केवल इसलिए आवाज़ नहीं देती वंदे मातरम गाने के लिए कि उसकी अंतिम छंदों में माँ भगवती की आराधना है लेकिन उसी माँ भगवती की पूजा के गरबा में जाने के लिए उनकी अंतरात्मा तड़प उठती है। वो तो अंतरात्मा की आवाज़ पर सर तन से जुदा कर देते हैं, फतवे जारी किए जाते है तो संविधान और न्याय व्यवस्था को खुली चुनौती हैं।

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