आज कांग्रेस और इसकी गुलाम पार्टियां द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त का विरोध करने की असली वजह सोनिया गाँधी गाँधी द्वारा भारत की नागरिक नहीं होते हुए वोट डालने के अधिकार के दुरूपयोग किये जाने के मुद्दे से ध्यान भटकाना है। यानि कांग्रेस ने सत्ता में रहते किस-किस तरह सत्ता, संविधान और सरकारी संस्थाओं का दुरूपयोग किया।
देश की सत्ता पर लंबे समय तक कांग्रेस यानी नेहरू-गांधी परिवार का नियंत्रण रहा। इस दौरान नियम, कानून और संविधान की धज्जियां उड़ाई गईं। राजनीतिक प्रभाव और सरकारी तंत्र पर एकाधिकार की वजह से लोकतंत्र और देश की सुरक्षा को ताक पर रखकर मनमाना फैसला किया गया। चुनाव आयोग का भी अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस की आलाकमान सोनिया गांधी के भारतीय नागरिक बनने से पहले मतदाता सूची में नाम दर्ज होना “सत्ता के दुरुपयोग” का एक क्लासिक उदाहरण है। लेकिन इस मामले ने 46 साल बाद एक बार फिर देश की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल पैदा कर दी। जब सोमवार (21 सितंबर) को दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने अपने एक आदेश से सोनिया गांधी को मुश्किल में डाल दिया।
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— ꜱʜɪᴠ ᴮᴴᵁ (@ShivBHU) September 21, 2026
सोनिया गांधी के वोटर केस में कोर्ट का बड़ा फैसला
दिल्ली की अदालत ने जांच से जुड़ा पुराना फैसला रद्द किया है ।
ज्ञात रहे कि 1980 की वोटर लिस्ट में नाम होने को लेकर शिकायत की गयी थी और शिकायत में नागरिकता से पहले मतदाता सूची में नाम दर्ज होने का आरोप लगाया गया था।… pic.twitter.com/MIR4Kgu0PC
राउज एवेन्यू कोर्ट का नए सिरे से सुनवाई का आदेश
दरअसल, राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोमवार को मजिस्ट्रेट कोर्ट के वर्ष 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सोनिया गांधी का भारतीय नागरिकता मिलने से पहले मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के आरोपों की जांच से इनकार किया गया था। विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने मामले को वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट में भेजते हुए शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई करने और कानून के अनुसार कारणों के साथ आदेश पारित करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी। अदालत ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में इस बात पर उचित चर्चा नहीं की गई कि शिकायत में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि आदेश में तथ्यों और कानून पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
शिकायत में सोनिया गांधी पर जालसाजी का आरोप
यह मामला राउज एवेन्यू कोर्ट की सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की ओर से दाखिल शिकायत से जुड़ा है। अधिवक्ता विकास त्रिपाठी ने राउज एवेन्यू कोर्ट के मजिस्ट्रेट के समक्ष एक याचिका दायर की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि सोनिया गांधी का नाम वर्ष 1980 में नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल किया गया था, जबकि उन्होंने आधिकारिक तौर पर 30 अप्रैल 1983 को भारत की नागरिकता प्राप्त की थी। याचिका में यह भी दावा किया गया कि 1982 में उनका नाम सूची से हटाया गया और 1983 में नागरिकता मिलने से पहले इसे फिर से जोड़ा गया, जो कथित तौर पर धोखाधड़ी या जालसाजी की ओर इशारा करता है।
धोखाधड़ी या जालसाजी हुई या नहीं, देखना जरूरी- कोर्ट
अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की याचिका पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने कहा कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता संसदीय लोकतंत्र में हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची में छेड़छाड़, किसी व्यक्ति का फर्जी तरीके से नाम शामिल करने, गैर-नागरिक का नाम जोड़ने या गलत घोषणा अथवा दस्तावेजों के इस्तेमाल जैसे आरोपों पर यह देखना जरूरी है कि क्या धोखाधड़ी या जालसाजी का संज्ञेय अपराध बनता है। कोर्ट ने कहा कि अब मजिस्ट्रेट शिकायत, पुलिस की रिपोर्ट और दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर कानून के मुताबिक कारणयुक्त आदेश पारित करेंगे। विशेष न्यायाधीश ने यह साफ किया कि पुनरीक्षण अदालत खुद मजिस्ट्रेट की भूमिका नहीं निभा सकती। इसलिए वह सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती। एफआईआर के लिए शिकायत पर निर्णय लेने का अधिकार संबंधित मजिस्ट्रेट के पास ही रहेगा।
पुलिस अधिकारी को नहीं सुना, थाने से रिपोर्ट भी नहीं मंगाई
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) के तहत जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। इस धारा के तहत मजिस्ट्रेट संज्ञेय अपराध की जांच के लिए पुलिस को निर्देश दे सकता है। कोर्ट के मुताबिक संबंधित पुलिस अधिकारी की दलीलें नहीं सुनी गईं और संबंधित थाने से स्टेटस रिपोर्ट भी नहीं मंगाई गई। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने दो कानूनी विकल्प थे। पहला, प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देना और दूसरा, बीएनएसएस की धारा 223 के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान लेकर आगे की कार्यवाही करना। लेकिन इन दोनों विकल्पों पर उचित विचार नहीं किया गया।
सोनिया गांधी के नागरिकता से पहले वोटर बनने का मामला
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दिल्ली की राउज एवेन्यू सेशंस कोर्ट का निचली अदालत को आदेश
मजिस्ट्रेट कोर्ट ठोस वजहों के साथ आदेश जारी करें
शिकायतकर्ता, दिल्ली पुलिस की बात सुनकर नए सिरे से विचार करें- सत्र अदालत
मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ FIR… pic.twitter.com/OAT1xOpRO7
नाम शामिल करने और हटाने पर चर्चा नहीं की गई- कोर्ट
विशेष अदालत ने खास तौर पर इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि पुराने आदेश में 1980, 1982 और 1983 की मतदाता सूचियों में सोनिया गांधी के नाम शामिल होने, हटाए जाने और फिर शामिल किए जाने के क्रम पर पर्याप्त चर्चा नहीं की गई। अदालत के मुताबिक, शिकायत में लगाए गए आरोपों को देखते हुए यह स्पष्ट किया जाना जरूरी था कि इन घटनाक्रमों का कानूनी महत्व क्या है और शिकायत को पूरी तरह खारिज करने का आधार क्या था।
विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट के फैसले पर उठाया सवाल
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को इस स्तर पर केवल यह देखना था कि शिकायत में कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है या नहीं और क्या पुलिस जांच की जरूरत है। इसके बजाय आदेश में नागरिकता के मुद्दे पर चर्चा की गई, जो केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा विषय है। अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की शक्तियां होने का मतलब यह नहीं है कि पुलिस को मतदाता सूची में कथित फर्जी तरीके से नाम शामिल करने या गलत दस्तावेजों के इस्तेमाल की जांच करने से रोका जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने मूल दायित्व के तहत शिकायत में संज्ञेय अपराध के खुलासे पर विचार नहीं किया। इसी आधार पर पुराने आदेश को रद्द कर मामला वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट भेज दिया गया।
ACJM ने खारिज की थी सोनिया गांधी के खिलाफ शिकायत
11 सितंबर 2025 को एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) ने इस शिकायत को खारिज कर दिया था। मजिस्ट्रेट का तर्क था कि इस मामले में धोखाधड़ी या जालसाजी के बुनियादी कानूनी तत्वों का अभाव है और मतदाता सूची तैयार करना या उसमें संशोधन करना पूरी तरह से चुनाव आयोग (ECI) का अधिकार क्षेत्र है। मजिस्ट्रेट ने वर्ष 1980 की मतदाता सूची के जिस अंश पर भरोसा किया गया था, उसे भी बिना प्रमाणित कॉपी की फोटोकॉपी बताया था।
अब आगे क्या होगा?
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने मामले को वापस एसीजेएम अदालत के पास भेज दिया है। अब वहां शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई होगी। मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी की बात सुनने और जरूरी जांच के बाद इस सवाल पर कारणों के साथ आदेश देंगे कि शिकायत में लगाए गए आरोपों से कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। मामला अब 29 सितंबर को एसीजेएम के सामने सूचीबद्ध होगा। अदालत ने फिलहाल सिर्फ पुराने आदेश को रद्द करते हुए मामले पर कानून के मुताबिक नए सिरे से फैसला लेने को कहा है। इसलिए वर्तमान स्थिति में यह कहना सही होगा कि आरोप की न्यायिक जांच का रास्ता फिर खुल गया है।
दिल्ली की एक अदालत ने सोनिया गांधी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने से जुड़े मामले में सितंबर 2025 के आदेश को ‘सही तर्क’ की कमी के आधार पर द्वारका कोर्ट ने रद्द कर दिया. इस आदेश ने मामले की जांच के नए रास्ते खोल दिए हैं. pic.twitter.com/LFrxeqyBGD
— Indian Express Hindi (@IEhindi) September 21, 2026
सोनिया गांधी की व्यक्तिगत भूमिका की होगी जांच
सोनिया गांधी की नागरिकता प्राप्त करने से पहले मतदाता सूची में नाम होने का आरोप गंभीर संवैधानिक और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा सवाल उठाता है। लेकिन यह निर्धारित करना कि मतदाता सूची में नाम किसने, किस दस्तावेज के आधार पर और किस प्रक्रिया के तहत शामिल कराई तथा इसमें सोनिया गांधी की कोई व्यक्तिगत भूमिका थी या नहीं—यह जांच और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है। इसके तहत उस समय का मूल मतदाता सूची का रिकॉर्ड, पंजीकरण आवेदन, घोषणा और संबंधित निर्वाचन अधिकारियों की फाइलों की जांच जरूरी होगी।
बीजेपी ने राहुल गांधी और कांग्रेस से पूछा सवाल
सोनिया गांधी की 1980 की वोटर-लिस्ट एंट्री पर राउज एवेन्यू कोर्ट की टिप्पणी के बाद, बीजेपी प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने नए सवाल उठाए…
- क्या कांग्रेस और गांधी-वाड्रा परिवार ने फर्जी डॉक्यूमेंट के जरिए सोनिया गांधी, जो 1980 में भारत की नागरिक नहीं थी उनको वोट डलवाया ?
- क्या सोनिया गांधी को वोट डलवाने के लिए कांग्रेस और गांधी-वाड्रा परिवार ने फर्जी डॉक्यूमेंट्स बनाए? फर्जी डॉक्यूमेंट्स अगर कोई बनाता है तो भारतीय न्याय संहिता के सेक्शन 337 के तहत इसमें 7 साल की सजा भी हो सकती है।
- जिस संविधान की कॉपी लेकर राहुल गांधी घूमते हैं, जिसको उन्होंने कभी नहीं पढ़ा, उनको जवाब देना चाहिए कि आपकी माताजी ने 1980 में वोट कैसे डाला? किसने उनको फर्जी डॉक्यूमेंट बनवाने में मदद की?
- उस वक्त इंदिरा जी की सरकार थी। क्या इंदिरा गांधी की सरकार ने ऐसी मदद की? इस सवाल का जवाब राहुल गांधी को देना चाहिए।
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