यूरोपीय देशों को आग लगाने वाले मुस्लिम शरणार्थी ही हैं जो अब उन देशों की अर्थी निकाल रहे हैं

सुभाष चन्द्र

सीरिया के गृहयुद्ध के समय एक बच्चे की फोटो दुनिया भर में वायरल की गई जिसके आधार पर यूरोपीय देश पिघल गए और लाखों लोगों को अपने यहां शरण दी और शरणार्थी का दर्जा दिया और वो ही शरणार्थी उन्हीं शरण देने वाले देशों की अर्थी निकाल रहे हैं। लेकिन याद रहे किसी इस्लामिक देश ने सीरिया से लोगों को अपने यहां रहने की जगह नहीं दी।

एक पैटर्न सामने नज़र आ रहा है कि हर देश में जहां भी आग लगी, वहां फिलिस्तीन का झंडा लहराया गया है चाहे वो इटली की पीसा टावर हो, फ्रांस की एफिल टावर हो या 143 साल पुराना टाउन हॉल, इंग्लैंड की सड़कें, भारत का जंतर मंतर या प्रियंका वाड्रा का बैग हो - ओवैसी ने तो “जय फिलिस्तीन” का नारा लगा दिया।

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इस पैटर्न को देख कर कोई भी समझ सकता है कि इन देशों में आग लगाने के पीछे सीधा बेशक फिलिस्तीन न हो लेकिन उसकी आड़ में हमास और उसकी साथी संगठन रहे हैं। लेकिन गलती किसकी है?

यूरोप के लगभग सभी 27 देश इज़रायल को दरकिनार कर फिलिस्तीन का साथ देते हैं। वो फिलिस्तीन का साथ नहीं दे रहे बल्कि उसके नाम पर हमास को परोक्ष समर्थन दे रहे हैं। ये देश फिलिस्तीन और इज़रायल के बीच Two State Solution का समर्थन करते हैं जबकि भूल जाते हैं कि इज़रायल इन यूरोपीय देशों के कुछ काम आ सकता जबकि फिलिस्तीन की आड़ में दुनिया भर में मुस्लिम हमास के पीछे चल कर आग लगा सकते हैं जैसे अभी हो रहा है। लेकिन सब्र रखो, ये मुस्लिम समुदाय के हूती ही ईरान के साथ अल्लाह के घर सऊदी अरब को भी आग लगा रहे हैं।

Germany, France, Italy, Belgium, Spain और Belgium ने ईरान युद्ध में डोनाल्ड ट्रंप का साथ नहीं दिया। कोई बड़ी बात नहीं होगी कि इन सभी देशों में Deep State, George Soros के साथ मिलकर तख्ता पलट की कोशिश कर रहा हो।

लेकिन एक बात डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका को समझ लेनी चाहिए कि जिस तरह इस्लामिक ताकतें अमेरिका में पैर पसार रही हैं, उनका अगला निशाना अमेरिका भी हो सकता है। जैसे यूरोप के देश आज जल रहे हैं, कल को अमेरिका भी जल सकता है। ट्रंप ने फ्रांस के साथ आज कुछ सहानुभूति प्रकट की है लेकिन वह बेमानी है, उसे अपने प्रशासन को देखना चाहिए वो क्या कर रहा है?

अमेरिका के Vice President JD Vance ने भारतीयों को लेकर घटिया टिप्पणी करते हुआ कहा “ H-1B visa workers as “indentured servants” and referred to certain tech practices as “visa mills” while defending a US government freeze/suspension on PERM green-card labor certifications affecting major tech and IT companies (including several Indian IT firms like Infosys, TCS, and Wipro). आज कह रहा है कि उसके शब्दों का चयन ठीक नहीं था। अमेरिका के उपराष्ट्रपति हो कोई भड़भूजे नहीं हो जो मन में आया बोल दिया।

यूरोप के देशों में वैसे ही शिक्षा सुधार के नाम पर दंगे शुरू किए गए जैसे भारत में कॉकरोचों ने शुरू करने की कोशिश की थी। इसमें तो कोई शक नहीं कॉकरोचों की फंडिंग अमेरिका ने की जो इस बात से साबित होता है कि सैम पित्रोदा George Soros से 10 billion डॉलर मांग रहा है मोदी को हटाने के लिए।

यूरोपीय देशों में लगी आग से सबसे ज्यादा ख़बरदार अमेरिका को होना चाहिए क्योंकि वहां नारे लग रहे हैं Make America Islamic स्टेट।

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