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समान नागरिक संहिता और आर्य समाज
अंतिम संस्कार : विज्ञान बनाम शास्त्र विधि
जब किसी की मृत्यु होती थी तब भी 13 दिन तक उस घर में कोई प्रवेश नहीं करता था। यही Isolation period था। क्योंकि मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है। यह रोग हर जगह न फैले इसलिए 14 दिन का quarantine period बनाया गया। जो शव को अग्नि देता था उसको घर वाले तक नहीं छू सकते थे 13 दिन तक। उसका खाना पीना, भोजन, बिस्तर, कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे। तेरहवें दिन शुद्धिकरण के पश्चात, सिर के बाल हटवाकर ही पूरा परिवार शुद्ध होता था।
जबकि आर्य समाज पद्धति में ऐसा कुछ नहीं। इस रीति में 3 दिन में ही सबकुछ हो जाता है। लेकिन आज आर्य समाज के पंडितों(महाशय) का लगभग अकाल ही पड़ गया है। हमारे युवा दिनों में निगम बोधघाट पर आर्य समाज पद्धति से अंतिम संस्कार करने के अलग से चिता स्थल थे, लेकिन अब सब समाप्त कर दिए गए। और इस काम के लिए जितनी सरकारें दोषी हैं, उतना हिन्दू समाज भी। ये नेता तो अपनी कुर्सी और तिजोरी की खातिर कब क्या कर दें, कुछ नहीं पता। क्योकि पिछली सरकारों द्वारा सनातन पर इतने कुठाराघात किए जिस कारण आर्य समाज लगभग लुप्त ही हो गया है। अब कौन-सी सरकार आएगी कि आर्य समाज पुनः जीवित होगा। अभी देख लो, ये कुर्सी और तिजोरी के भूखे नेता सनातन पर प्रहार कर रही और हिन्दू चुप बैठा है। जिस दिन हिन्दुओं ने इन नेताओं और इनकी पार्टियों को अनदेखा कर सामाजिक बहिष्कार करना शुरू कर दिया इन्हे औकात पता चल जाएगी। लेकिन हिन्दू खामोश है जिस कारण हर कोई मजहब का पिद्दी न पिद्दी का शोरबा कुछ भी बोल देता है। न्यायालय तक हिन्दुओं को न्याय देने में वर्षों लगा देती हैं।
तब भी आप बहुत हँसे थे। bloody indians कहकर मजाक बनाया था। और आज भी बन रहा है। वर्ष 2022 में करवा चौथ वाले दिन न्यूज़ 18 पर अमिश देवगन के शो 'आर पार' में चर्चा में, सहभागी हिन्दू महिला ने घूँघट को लेकर मौलाना रशीदी का जो पलीता बनाया था देखते ही बनता था। पहली बार उस सम्मानित महिला को 'इतने विकराल रूप' में देखा था। काश, दोनों स्टूडियो में होते, रशीदी को अपनी ऋग्वेद पर गलत बयानी के लिए शो छोड़कर जान बचाकर भागना पड़ता। क्योकि एंकर देवगन पहले ही हथियार डाल दिए कि 'मुंह में हाथ दिया है तो सुनना पड़ेगा। ऐसे में रशीदी को बचाता कौन? ऐसे ही सनातन विरोधियों को ईंट का जवाब पत्थर से देना होगा। किसी अन्य चैनल ने रशीदी द्वारा ऋग्वेद पर व्हाट्सअप ज्ञान देने के दुस्साहस को प्रमुखता नहीं दी, क्यों? जबकि नूपुर शर्मा को हर चैनल अपनी TRP के चक्कर में कई दिनों तक चर्चा करते रहे। केवल एक चैनल 'नवभारत' पर एंकर सुशांत सिन्हा ने समस्त मुल्ला, मौलवी और इस्लाम विशेषज्ञों को खुली चुनौती थी कि "बताएं नूपुर शर्मा गलत है या तुम्हारी किताबे", लेकिन किसी में सच बोलने की हिम्मत नहीं हुई। नूपुर शर्मा विवाद में Jaipur Dialogue, Sach, News Nation पर 'इस्लाम क्या कहता है' ने तो अनेक ऐसे मुद्दों को खड़ा कर दिया, जिसका किसी मौलवी से लेकर किसी इस्लामिक विद्वान तक के पास कोई जवाब नहीं था। चर्चा दो मुसलमानों के बीच होने के कारण कोई 'संर तन से जुदा' गैंग सक्रीय पाया। वातानुकूलित कमरों में बैठे मौलानाओं को जवाब देने की बजाए पसीने पोंछते देखा गया। अगर किसी हिन्दू ने किसी अन्य मजहब के बारे में चर्चा को गलत तरीके से पेश करने वाले के विरुद्ध हमारा मीडिया उसकी गिरफ़्तारी की मांग को लेकर छाती पीट रहे होते। किसी हिन्दू द्वारा सनातन पर गलत टिप्पणी करने पर देखो मीडिया कितना उछालता है, यानि हिन्दू को हिन्दू से लड़ाओ और अपनी TRP बढ़ाओ। हमारी मीडिया भी किसी छद्दम सेक्युलरिस्ट नेता से कम नहीं।
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| शास्त्र विधि के अनुसार अंतिम यात्रा से पूर्व अंतिम बार सुहागन की मांग भरायी |
आज भी गांवों में एक परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं। जब कोई भी बहू लड़की या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी बूढ़ी लोटे में जल लेकर, हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वही जल बहाती नहीं हों, तब तक। खूब मजाक बनाया था न।
इन्हीं सवर्णों को और ब्राह्मणों को अपमानित किया था जब ये गलत और गंदे कार्य करने वाले माँस और चमड़ों का कार्य करने वाले लोगों को तब तक नहीं छूते थे जब क वह स्नान से शुद्ध न हो जाय। ये वही लोग थे जो जानवर पालते थे जैसे सुअर, भेड़, बकरी, मुर्गा, कुत्ता इत्यादि जो अनगिनत बीमारियाँ अपने साथ लाते थे।
ये लोग जल्दी उनके हाथ का छुआ जल या भोजन नहीं ग्रहण करते थे तब बड़ा हो हल्ला आपने मचाया और इन लोगों को इतनी गालियाँ दी कि इन्हें अपने आप से घृणा होने लगी।
यही वह गंदे कार्य करने वाले लोग थे जो प्लेग, टी बी, चिकन पॉक्स, छोटी माता, बड़ी माता, जैसी जानलेवा बीमारियों के संवाहक थे और जब आपको बोला गया कि बीमारियों से बचने के लिए आप इनसे दूर रहें तो आपने गालियों का मटका इनके सिर पर फोड़ दिया और इनको इतना अपमानित किया कि इन्होंने बोलना छोड़ दिया और समझाना छोड़ दिया।
आज जब आपको किसी को छूने से मना किया जा रहा है तो आप इसे ही विज्ञान बोलकर अपना रहे हैं। Quarantine किया जा रहा है तो आप खुश होकर इसको अपना रहे हैं ।
पर शास्त्रों के उन्हीं वचनों को तो ब्राह्मणवाद/मनुवाद कहकर आपने गरियाया था और अपमानित किया था।
आज यह उसी का परिणति है कि आज पूरा विश्व इससे जूझ रहा है।
याद करिये पहले जब आप बाहर निकलते थे तो आप की माँ आपको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ इत्यादि देती थी रखने को।
यह सब कीटाणु रोधी होते हैं।
शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें।
लेकिन सब आपने भुला दिया।
आपको तो अपने शास्त्रों को गाली देने में और ब्राह्मणों को अपमानित करने में उनको भगाने में जो आनंद आता है शायद वह परमानंद आपको कहीं नहीं मिलता।
अरे समझो अपने शास्त्रों के level के जिस दिन तुम हो जाओगे न तो यह देश विश्व गुरु कहलायेगा।
तुम ऐसे अपने शास्त्रों पर ऊँगली उठाते हो जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति के मूर्ख 7 वर्ष का बेटा ISRO के कार्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाए।
अब भी कहता हूँ अपने शास्त्रों का सम्मान करना सीखो। उनको मानो। बुद्धि में शास्त्रों की अगर कोई बात नहीं घुस रही है तो समझ जाओ आपकी बुद्धि का स्तर उतना नहीं हुआ है। उस व्यक्ति के पास जाओ जो तुम्हे शास्त्रों की बातों को सही ढंग से समझा सके।
लेकिन गाली मत दो उसको जलाने का दुष्कृत्य मत करो।
जिसने विज्ञान का गहन अध्ययन किया होगा वह शास्त्र वेद पुराण इत्यादि की बातों को बड़े ही आराम से समझ सकता है correlate कर सकता है और समझा भी सकता है।
आप भले ही किसी भी जाति/समाज से हों धर्म के नियमों का पालन कीजिये इससे इहलोक और परलोक दोनों सुधरेगा।
॥सर्वे भवन्तु सुखिनः सवेँसनतु निरामया:॥
जब जवाहर लाल नेहरू के आर्य समाजी स्वामी विद्यानंद विदेह जी ने झापड़ मारा
वो सच्चाई जो देश और आमजनों से छिपाया गयी। जब जवाहरलाल नेहरू के मुँह पर जोरदार झन्नाटेदार झापड़ मारा था स्वामी विद्यानंद विदेह जी ने।
कारण ?कारण यह है कि नेहरू ने एक समारोह के अपने भाषण में कहा कि हिन्दू आर्य समाज के लोग हिंदुस्तान में शरणार्थी हैं।
इतना सुनते ही .....स्वामी विद्यानंद विदेह जी जो उस समारोह के मुख्य अतिथि थे, वे तत्काल उठे और मंच पर ही नेहरू के मुँह पर एक झन्नाटेदार झापड़ मारा और नेहरू से माइक छींनते कहा कि .......आर्य समाज के लोग शरणार्थी नहीं हैं ये हमारे पूर्वज हैं और ये ही इस हिंदुस्तान के मूलनिवासी है।
An image of Pandit Jawaharlal Nehru has gone viral with the claim that it was taken when he was slapped by Swami Vidyanand for saying Aryans were refugees in India. #FakeBoleKauwaKaate investigates the authenticity of the viral image. pic.twitter.com/qRjmtjDZLU
— The Times Of India (@timesofindia) October 17, 2019
साथ ही स्पष्ट रूप से कहा कि नेहरू ही तुम्हारे पूर्वज अरेबिक हैं। और तुम्हारे शरीर में अरब का खून बह रहा है।
तुम इस महान देश के मूल निवासी नहीं हो तुम शरणार्थी हो। साथ ही कहा कि काश सरदार पटेल इस देश के प्रधानमंत्री होते तो य़ह सब नहीं देखना सुनना पड़ता (विदेह गाथा :- पृष्ठ 637 से साभार)
गो हत्या का विवाद आज से नहीं है बल्कि नेहरू जी के टाइम में भी था। कहते हैं कि एक बार संसद में गो हत्या का प्रस्ताव रखा गया था। जिस पर जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि अगर गो हत्या का प्रस्ताव परित होता है तो मैं अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा। शायद अरेबिक होने के कारण ही जवाहरलाल नेहरू से लेकर आज तक कांग्रेस गो हत्या की समर्थक है। 7 मार्च 1966 को इन्ही की बेटी इंदिरा गाँधी, तत्कालीन प्रधानमंत्री ने गो हत्या का विरोध कर निहत्ते साधु-संतों पर गोलियां चलवाकर पार्लियामेंट स्ट्रीट साधु-संतो की लाशों और खून से लाल हो गयी थी। साधु-संतों की गिरती लाशों और बहते खून से विचलित हो मान्य कृपालु जी महाराज ने इंदिरा गाँधी को श्राप दिया कि "हिमालय से आधुनिक वेशभूषा में एक तपस्वी आएगा जो कांग्रेस को ख़त्म कर देगा। ... जिस तरह गोपाष्टमी के दिन निहत्ते साधु-संतों से खून की होली खेली है, तेरी भी मौत गोपाष्टमी को ही होगी।" दूसरे, जब कुछ वर्ष पूर्व गो हत्या पर चर्चा हो रही थी, तब कांग्रेस ने ही गो मांस की पार्टी की थी।
आर्य समाज अशोक विहार :राष्ट्र धर्म और संस्कृति का चिंतन : राष्ट्र जागरण में रहा है आर्य समाज का विशेष योगदान : विधायक राजेश गुप्ता
नई दिल्ली। यहां स्थित आर्य समाज अशोक विहार की ओर से आयोजित किए गए चार दिवसीय चारों वेदों के यज्ञ में विभिन्न विद्वानों के माध्यम से राष्ट्र धर्म और संस्कृति पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया । स्थानीय विधायक श्री राजेश गुप्ता ने इस अवसर पर कहा कि आर्य समाज का राष्ट्र जागरण में विशेष योगदान रहा है । इस संस्था ने अनेक क्रांतिकारी पैदा किये जिन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर राष्ट्र को आजाद करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
यज्ञ के ब्रह्म रहे राजू वैज्ञानिक ने निरंतर प्रत्येक सत्र में उपस्थित धर्म प्रेमी राष्ट्र प्रेमी सज्जनों का मार्गदर्शन करते हुए राष्ट्र और धर्म के प्रति गहन चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वेद का आदर्श और उत्कृष्ट चिंतन राष्ट्र और धर्म को अन्योन्याश्रित संबंध के साथ समन्वित करता है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति राष्ट्र और धर्म दोनों को समान रूप से लेकर चलती है । इसलिए भारत जैसे देश के लिए धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत पूर्णतया अमान्य है । उन्होंने कहा कि धर्महीन व्यक्ति कर्तव्य हीन होता है और जो कर्तव्य हीन हो जाता है उसका जीवन निरर्थक और दूसरों पर बोझ बन जाता है।आज की अधिकांश समस्याओं का कारण यही है कि व्यक्ति को धर्म का वास्तविक स्वरूप नहीं समझाया जा रहा है।
श्री वैज्ञानिक ने कहा कि वेद धर्म की व्यवस्था कर संपूर्ण सृष्टि को व्यवस्था के अंतर्गत लाने का श्रेष्ठ मार्ग बताता है। यदि आज हम धर्म की व्यवस्था के अंतर्गत अपने आप को लाकर स्थापित कर लें तो विश्व शांति बड़ी शीघ्रता से स्थापित हो सकती है।
इस अवसर पर भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता और सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि भारत के इतिहास का विलुप्तिकरण करने वाले पापी इतिहासकारों ने भारत के वीर वीरांगनाओं के साथ घोर अन्याय किया है। उन्होंने कहा कि निरर्थक रूप से ऐसे इतिहासकारों ने कबीर दास जी के देहांत के बारे में भी यह भ्रांति फैली दी कि जब वह मृतक हुए तो उनके मृत शरीर के फूल बन गए थे । जबकि इस सत्य को छिपा लिया गया कि उस समय रीवा के राजा वीर सिंह बाघेला और उनके सेनापति ढमेलचंद व उनके साथी कीर्तिमल और भीमपाल ने अपने अनेक बलिदान देकर उनके मृत शरीर का अंतिम संस्कार वैदिक विधि विधान से किया था।
डॉ आर्य ने कहा कि हमारे अनेक वीर वीरांगनाओं ने विभिन्न कालों में चोटी और जनेऊ की रक्षा के लिए ऐसे अनेक बलिदान दिए जिनसे धर्म संस्कृति की रक्षा हो पाना संभव हुआ। आज भी राष्ट्र को बचाने का काम वही लोग कर रहे हैं जो राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने को तत्पर है। डॉ आर्य ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की तभी रक्षा हो पाती है जब वहां के निवासी अपने मौलिक राष्ट्र चिंतन के प्रति समर्पित होकर काम करते हैं । अतः भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए वेद का राष्ट्र चिंतन और धर्म चिंतन आवश्यक है। जिसे प्राचीन काल से मंदिर ही देते आए हैं। आज भी ऋषि दयानंद जी की 200 वीं जयंती के अवसर पर आर्य समाज मंदिरों से ही राष्ट्र धर्म और संस्कृति का चिंतन निकल रहा है।
इस अवसर पर सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय वैदिक विद्वान डॉ महेश विद्यालंकार ने अपना मार्गदर्शन देते हुए कहा कि भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए वेद का आदर्श राष्ट्रवाद और धर्म चिंतन अपनाना समय की आवश्यकता है । इसी प्रकार बहन संगीता आर्या ,वसुधा आर्या ,कविता आर्या के द्वारा भजनोपदेशन के माध्यम से विभिन्न विषयों को बड़ी गंभीरता, सरलता और सुरीले भजनों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। अंतिम सत्र की अध्यक्षता डॉ राकेश कुमार आर्य द्वारा की गई और कार्यक्रम का सफल संचालन यहां के पूर्व प्रधान रहे श्री प्रेम सचदेवा जी द्वारा किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में आर्य समाज के प्रधान श्री राकेश खुल्लड़ , श्रीमती आशा भटनागर, मंत्री श्री जीवनलाल आर्य, विजय अरोड़ा, कोषाध्यक्ष सुधीर सक्सेना, विजय जिंदल, किरण आनंद उप प्रधान विक्रांत चौधरी, किशोर आर्य आदि का विशेष योगदान रहा।
आर्य समाज नहीं फले-फूले… इसलिए हुई पंडित लेख राम की हत्या
इस्लामवादियों ने आर्य समाज को पनपने से रोकने के लिए सड़क पर हिंसा और हत्याओं का इस्तेमाल किया
एक लेखक हैं- डॉ. कोइनराद एलस्ट(Dr. Koenraad Elst)। इनकी एक किताब है- डिक्लॉनाइजिंग द हिंदू माइंड (Decolonizing the Hindu Mind)। इस किताब का एक चैप्टर विशेष रूप से इस बात से संबंधित है कि कैसे इस्लामवादियों ने आर्य समाज को नहीं पनपने देने के लिए सड़क पर हिंसा और हत्याओं का इस्तेमाल किया।
किताब के पेज नंबर 121 में कहा गया है कि स्वामी दयानंद की आर्य समाज की जीवनी (सत्यार्थ प्रकाश) में दावा किया गया कि इस्लाम की सार्वजनिक आलोचना के कारण, गंगा नदी के तट पर ध्यान करते समय उन पर मुसलमानों ने हमला किया था। कुछ मुस्लिम बहुल रियासतों में आपत्तिजनक अध्याय पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और 1944 में मुस्लिम बहुल प्रांत सिंध में भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।
Referenceshttps://t.co/M7kbVHJwih
— Daario Naharis (@_MysticSoul) April 3, 2021
Jack is a woke himself
— Ramen Das (@TravellingS) April 3, 2021
किताब के पेज नंबर 123 में बताया गया कि भारतीय मुसलमानों को धर्मान्तरण (घर-वापसी) करने के लिए प्रेरित करने के लिए हिंदू धर्म के शुद्धि कार्यकर्ताओं ने तर्क दिया कि उनके पूर्वजों पर इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए दबाव डाला गया या मजबूर किया गया। उनका कहना था कि मुस्लिम शासन की समाप्ति के बाद अब इस्लाम धर्म में बने रहने का कोई मतलब नहीं है।
पंडित लेख राम की ‘रिसाला-ए-जिहाद’ को लेकर मुसलमानों ने माँग की कि इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया जाए। अदालत में कई बहसों के बाद, वे 1896 में वो हार गए। लेकिन मार्च 1897 में लेखराम की हत्या कर दी गई। मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद (पैगंबर का दूत होने का दावा करने वाला इस्लाम के अहमदिया संप्रदाय का संस्थापक) सहित कुछ मुसलमानों ने इस हत्या की खुलेआम सराहना करते हुए कहा, “मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने एक पुस्तक प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने अल्लाह को अपनी भविष्यवाणी पूरी करने के लिए धन्यवाद दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि लेखराम हिंसक मौत मारा जाएगा।”
इसके बाद कई व्यक्तियों ने धमकी भरे पत्र प्राप्त करने की सूचना दी और पूरे प्रांत में दीवार पर रहस्यमय नोटिस दिखाई दिए। जिसमें कहा गया, “सभी हिंदुओं को इस्लामी नबियों को याद करने और उन पर विश्वास करने की चेतावनी दी जाती है; अन्यथा उन्हें लेख राम की तरह मार दिया जाएगा। शुद्धि सभा और आर्य समाज के सदस्यों को स्वयं को मृत पुरुष मानना चाहिए।” लेख राम के अंतिम संस्कार में 20000 लोग शामिल हुए थे। इसके बाद लाला मुंशी राम (बाद में स्वामी श्रद्धानंद के रूप में नियुक्त हुए) ने एक समाचार पत्र शुरू किया, जिसे लेखराम के उपनाम आर्य मुसाफिर, ‘आर्य यात्री’ के नाम से जाना जाता है।
किताब के पेज नंबर 127 में कहा गया है कि इस्लाम की आलोचना करने के कारण आर्य समाज को मानने वाले लोगों की हत्याएँ की गईं। हत्याओं से भयभीत होने के बावजूद कुछ लोग खड़े हुए और कहा कि आर्य समाज की नीति सही थी। जिसके बाद दंगे हुए। आर्य समाज के लोगों की हत्याओं और बाद के दंगों से माहौल थोड़ा अनियंत्रित हो गया, जिसमें पुलिस भी उनकी रक्षा करने में असफल रही।
पेज नंबर 317 में कहा गया कि आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने इस्लाम की आलोचना करते हुए एक किताब लिखी। हालाँकि यह कट्टरपंथियों को रास नहीं आया। इसमें उन्होंने काबा को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध करने वालों पर सवाल उठाते हुए पूछा, “अगर मक्का के काबा में काला पत्थर अल्लाह का प्रतिनिधित्व कर सकता है, तो क्या मोहम्मद और उसके भतीजे अली द्वारा नष्ट की गई काबा में 360 प्रतिमाएँ भी ईश्वरीय शक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं होनी चाहिए? उस सोमनाथ मंदिर में शिव लिंग क्यों नहीं है, जिसे मुस्लिम सेनाओं ने समय-समय पर नष्ट किया?”
दयानंद मुसलमानों को चुनौती देते हुए कहते हैं: “वे भी, जिन्हें आप मूर्तिपूजक कहते हैं, वे मूर्ति को भगवान नहीं मानते हैं। वे मूर्ति के पीछे के भगवान को पूजा करने के लिए मानते हैं। यदि आप मूर्ति विध्वंसक हैं, तो आप किब्ला (Qibla, पवित्र मस्जिद) नामक बड़ी मूर्ति को क्यों नहीं तोड़ते?”
किताब के पेज नंबर 324 में कहा गया है कि सातवीं शताब्दी के अरब में पैगंबर मोहम्मद के जीवन और कार्यों के संदर्भ के बिना “समकालीन भारतीय इस्लाम” का एक विषय के रूप में चर्चा करना बकवास है, क्योंकि मोहम्मद के मिशन और उनके उदाहरणों के बिना कोई इस्लाम नहीं। उदाहरण के लिए मोहम्मद के व्यवहार के स्थायी संदर्भ के बिना इस्लामी कानून का कोई वजूद ही नहीं। जिहाद की अवधारणा के पीछे का वास्तविक अर्थ और इरादा उस सबसे अच्छे स्रोत के आधार पर जाँचा जा सकता है, जहाँ से इस्लामी विद्वान अपने धर्म के अल्फ़ा और ओमेगा सीखते हैं।(साभार)











