Showing posts with label #Bihar Assembly Election. Show all posts
Showing posts with label #Bihar Assembly Election. Show all posts

बिहार की हर सीट पर तेजस्वी का चेहरा चुनाव लड़ रहा है… गईल भैंस पानी में

साझे की हांड़ी हमेशा बीच चौक पर ही फूटती है, जो लोकसभा 2024 चुनाव में INDI गठबंधन के नाम से बनी हांड़ी अब 2025 में बिहार विधान सभा चुनाव में फूटती दिख रही है। अभी कुछ ही दिन पहले कांग्रेस युवराज राहुल गाँधी ने बिहार के मुस्लिम क्षेत्रों में पिकनिक मनाई थी। यानि जमीन तेजस्वी की और भीड़ RJD की मजे ले गया युवराज राहुल। लेकिन अपना मुस्लिम वोट लुटवाकर बिहार के युवराज तेजस्वी को बहुत देर में होश आया।    
बिहार चुनावी साल में है। राजनीतिक यात्राओं/सभाओं का मौसम है। बयानों की बाढ़ है। इसी में बहकर आया है तेजस्वी यादव का एक बयान है। उनका कहना है कि बिहार की सभी 243 सीटों पर उनका चेहरा चुनाव लड़ रहा है।

एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, इस बार तेजस्वी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा। चाहे बोचहां हो या मुजफ्फरपुर। तेजस्वी लड़ेगा। मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि मेरे नाम पर वोट दें।

लालू प्रसाद यादव की पारिवारिक पार्टी राजद चाहती है कि इस बार चुनाव में INDI गठबंधन तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर उतरे। कांग्रेस, लेफ्ट सहित राजद के अन्य छोटे सहयोगी इससे कन्नी काट रहे हैं।

तेजस्वी यादव के नाम से क्यों डर रहा INDI गठबंधन

इसका एक कारण यह बताया जाता है कि कांग्रेस को लगता है कि तेजस्वी यादव के चेहरे के साथ चुनावी मैदान में जाने पर उसे अगड़ों का जो छिटपुट वोट बिहार में मिल रहा है, वह भी उसके हाथ से निकल जाएगी। साथ ही यह भी बताया जाता है कि सहयोगी दल तेजस्वी यादव के नाम पर मु​हर नहीं लगाकर, ज्यादा से ज्यादा सीट देने के लिए राजद पर दबाव बढ़ाना चाहते हैं।

इसी बौखलाहट में तेजस्वी यादव ने ‘तेजस्वी बिहार के सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा’ का दंभ भरा है। पर इस फेर में वे भूल गए नाम या चेहरा, केवल कुछ शब्द भर नहीं होते हैं। केवल तस्वीर ही नहीं होती है। नाम और चेहरा, इतिहास और जनता की स्मृतियों का प्रतीक भी होते हैं।

जिस नाम और चेहरा से तेजस्वी यादव को राजद की बागडोर मिली है, उसका इतिहास कुछ ऐसा है, उसकी स्मृतियाँ बिहार के लोगों के मस्तिष्क में कुछ इस तरह अंकित है, कि वह नाम और चेहरा को तेजस्वी यादव के लिए बोझ बना देती है। ऐसे में यह बयान न केवल INDI गठबंधन के भीतर चल रहे द्वंद्व को उजागर करता है, बल्कि बिहार के लोगों के भीतर उस डर को भी पैदा करता है, जिससे पीछा छुड़ाकर वे यहाँ तक पहुँचे हैं।

बिहार को डराता है तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा

बिहार से ही आने वाले वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने अपनी पुस्तक ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय’ में 2019 के आम चुनावों से पहले एक प्रजेंटेशन का हवाला देते हुए लिखा है, “इस प्रजेंटेशन में सवाल हुआ- अगर आप (दो बड़े उद्योपतियों का नाम लिया गया, जिसमें एक भगोड़ा है तो दूसरा लंबे समय तक जेल में रहा, जिनके नाम का खुलासा करना उचित नहीं होगा) इनका नाम लेते हैं तो आपके जेहन में क्या छवि आती है? जवाब था- फ्रॉड की। लेकिन जब नरेंद्र मोदी का नाम लेते हैं तो क्या जवाब होता है? एक ऐसा नेता जो कोई भी बड़ा निर्णय ले सकता है, चाहे विकास के एजेंडे पर हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा।”

ऐसे ही यदि आपसे यह पूछा जाए कि तेजस्वी यादव का नाम सुनते ही या फोटो देखते ही आपके जेहन में क्या छवि आती है? जाहिर है आपको लालू-राबड़ी का जंगलराज याद आ जाएगा।

राजद के सालों तक सत्ता से बाहर रहने के बाद भी, तेजस्वी को नए दौर का युवा नेता बताए जाने के बाद भी, उस जंगलराज उसका डर ऐसा है कि लोगों को लगता है कि उनके सत्ता में आने से अपराध का तंत्र फिर से मजबूत होगा।

  • तेजस्वी यादव का चेहरा बिहार के लोगों को उस दौर की याद दिलाता है, जब अपहरण उद्योग में बदल गया था। जब लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में पलायन करने को मजबूर कर दिए गए। जब देश के अन्य राज्य विकास की दौड़ में शामिल हो रहे थे तो जातिवाद और भ्रष्टाचार ने बिहार को कैद कर रखा था।
  • तेजस्वी यादव की राजनीति ‘MY समीकरण’ पर ही टिकी है। यह न केवल उनकी राजनीतिक जमीन को सीमित करता है, बल्कि यह समीकरण बहुसंख्यक जनता के लिए असुरक्षा की भावना भी पैदा करता है।
  • तेजस्वी यादव राजनीतिक तौर पर आज जहाँ हैं, वहाँ राजनीति में घिस-घिस कर नहीं पहुँचे हैं। वे वंशवाद की देन हैं। बिहार के लोगों पर राजद की ओर से थोपे गए हैं। क्रिकेटर से नेता बनने की अपनी यात्रा में उनके पास गिनाने/दिखाने के लिए ऐसा कुछ भी ठोस नहीं है जो उनके नाम और चेहरा से उभरने वाली छवि को बदल दे।
इसके उलट नीतीश कुमार ने भले समय-समय पर साझेदार बदले हैं, लेकिन मोटे तौर पर उनकी छवि ऐसे नेता की है जिसने बिहार के लोगों को अपराध और भय से छुटकारा दिलाया है। बिजली, सड़क, शिक्षा के क्षेत्र में सुधार किए हैं।
वहीं तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा, जिस विरासत और परिवार से जुड़ा है, उसकी राजनीति को लोग अपराध और भ्रष्टाचार से अलग कर नहीं देख पाते हैं। यही कारण है कि यदाकदा तेजस्वी यादव अपने भाषणों में भले रोजगार-विकास जैसी बातें कर लें, लेकिन जनता उन्हें उसी पुरानी राजनीति का उत्तराधिकारी मानती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जोड़ी ने बिहार में विकास की नई आकांक्षाओं को पैदा किया है। ऐसे तेजस्वी यादव का नाम और चेहरा इन आकांक्षाओं के दफन हो जाने का भय पैदा करता है।
अवलोकन करें:-
बिहार : सरकार बनने से पहले ही लूट शुरू : ‘माई-बहिन’ के नाम पर 200-200 रूपए वसूल रही RJD, तेजस्वी यादव समेत 4
बिहार में एक कहावत है- एक बेर साँप काटलक, दोसर बेर रस्सी देखिते कँपलौं। यानी भयावह अनुभव झेल चुके लोग उस तरह की किसी भी स्थिति की आहट से ही काँप उठते हैं। असल में तेजस्वी यादव वह ‘रस्सी’ हैं, जो जनता को ‘साँप’ की याद दिलाती है। ऐसे में सभी 243 सीट पर अपना नाम और चेहरा होने का उनका दंभ भरना, उस भयावह अतीत की याद दिलाता है जिसकी कल्पना मात्र से ही बिहार सिहरने लगता है।

राहुल गाँधी के हाथ स्टेयरिंग देकर तेजस्वी यादव ने मार ली पैर पर कुल्हाड़ी, CM Face के लिए कांग्रेस ने दिखाई आंखें, जनता तय करेगी मुख्यमंत्री

पिता लालू यादव के रहते तेजस्वी ने राहुल के हाथ स्टेयरिंग क्यों थमा दिया? जमीन तुम्हारी, कार्यकर्ता तुम्हारे और मेहनत तुम्हारी होने पर भी हालाँकि राहुल ने अपने यानि कांग्रेस की जड़ें मजबूत करने की कोशिश जरूर की, लेकिन नरेंद्र मोदी की माँ को मंच से गाली दिलवाकर कांग्रेस अपनी ही नहीं राष्ट्रीय जनता दल को भी इतना नुकसान पहुंचाने से तेजस्वी के हाथ से सत्ता भी चली गयी। अगर तेजस्वी बिना राहुल के प्रचार करते सत्ता नहीं तो सत्ता के पास पहुँच सकते थे। अभी भी समय है कांग्रेस से पलड़ा झाड़ खुद प्रचार करें। INDI गठबंधन के टूटने की परवाह नहीं करनी चाहिए। 
 
  
बिहार में कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा में कंधे से कंधा मिलाकर चलते राजद तेजस्वी यादव आधी बाजी तो हार गए हैं। दरअसल, यात्रा के बाद से कांग्रेस को लगता है कि बिहार की जनता उसके साथ है, इसलिए वह अब राजद से अपनी शर्तों पर ही गठबंधन करेगी। यानी कम से कम मनमाफिक 70 सीटें और NO सीएम फेस। बिहार के कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने सीएम फेस को लेकर पूछे गए सवाल पर दो टूक जवाब दे दिया कि चुनाव से पहले यह तय नहीं होगा और मुख्यमंत्री बिहार की जनता ही तय करेगी। इसके बाद कांग्रेस की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के पास अब कोई विकल्प नही रह गया है। कांग्रेस के तेजस्वी यादव को इस झटके के साथ ही बीजेपी ने भी तंज करते हुए कहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव के लिए महागठबंधन की ड्राइविंग सीट अब तेजस्वी के हाथ से छूट गई है। चुनाव से पहले सीएम फेस बनने के तेजस्वी यादव के सपने हवा-हवाई हो गए हैं। उधर तेजस्वी पर लालू के दूसरे लाल ने भी हमले तेज कर दिए हैं।

कांग्रेस-राजद में मतभेद शुरू, दोनों दल अलग यात्रा निकालेंगे
कांग्रेस ने बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकालकर तेजस्वी को झटका दे दिया है। इसके चलते अब कांग्रेस और राजद के बीच मतभेदों की शुरुआत हो गई है। वोटर अधिकार यात्रा में जहां दोनों दलों के नेता एकसाथ दिखे, वहीं अब दोनों ही दलों ने अलग-अलग यात्रा निकालने का फैसला ले लिया है। बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर दिल्ली में हुए कांग्रेस के मंथन के बाद बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने कहा कि अब राज्य में हर घर अधिकार यात्रा निकाली जाएगी। हम फिर से जनता के बीच हर घर अधिकार यात्रा लेकर जाएंगे। दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव बिहार अधिकार यात्रा निकालने का घोषणा की है। तेजस्वी की यात्रा 16 सितंबर से जहानाबाद से शुरू होगी और 20 सितंबर को वैशाली में खत्म होगी। यात्रा के दौरान तेजस्वी यादव लोगों से संवाद करेंगे।

तेजस्वी यादव के सीएम फेस बनने के सपने को चकनाचूर किया
इधर दिल्ली में तेजस्वी यादव के सीएम फेस बनने के सपने को चकनाचूर करते हुए बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने साफ-साफ कहा कि जनता ही तय करेगी कि कौन बनेगा बिहार के मुख्यमंत्री। चुनाव से पहले किसी को सीएम फेस बनाने पर कोई फैसला नहीं हुआ है। बता दें कि कुछ दिनों पहले राहुल गांधी भी महागठबंधन में सीएम फेस बनाने के सवाल को टाल गए थे। जबकि इससे पहले तेजस्वी यादव चापलूसी की सारी हदें पार करते हुए अभी से राहुल गांधी के अगले लोकसभा चुनाव का पीएम फेस बता रहे थे।

कम से कम मनमाफिक 70 सीटें और NO सीएम फेस- कांग्रेस
वहीं सीट शेयरिंग के सवाल पर अल्लावरू ने कहा कि, हम मानते हैं कि गठबंधन में नए साथी आएंगे तो सभी को कंप्रोमाइज करना होगा, तभी नए साथी को मौका मिलेगा। हर प्रदेश में अच्छी और खराब सीटें होती हैं। उन्होंने मीडिया को बताया कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में बिहार के नेताओं के साथ 2 घंटे तक सीट शेयरिंग पर मंथन हुआ। जिसमें सूत्र के जरिए पता चला कि कांग्रेस बिहार में कम से कम 70 सीटों पर लड़ेगी। यह सीटें भी कांग्रेस की मनमाफिक होंगी। इसके साथ ही कांग्रेस ने अलग से कोई मेनिफेस्टो नहीं करने का निर्णय लिया है। भाजपा नेताओं ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस चूंकि जीतने के बाद भी मेनिफेस्टों में किए गए वादों को पूरा नहीं कर पाती, इसलिए यहां घोषणा पत्र ही जारी नहीं करने जा रही है। कांग्रेस के कर्नाटक और हिमाचल के घोषणा पत्र इसके उदाहरण हैं।

तेजस्वी नहीं बनेंगे सीएम, कांग्रेस क्वालिटी सीटों पर ही लड़ेगी- पप्पू
बिहार के पूर्णिया सांसद और जन अधिकार पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने भी तेजस्वी यादव के खिलाफ मोर्चा खोला है। पप्पू यादव ने बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस की सीटों और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) नेता तेजस्वी यादव की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी पर बड़ा बयान दे दिया है। पप्पू यादव ने कहा कि तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री के उम्मीदवार नहीं है। तेजस्वी यादव के सीएम फेस के दावे पर उन्होंने कहा, “तेजस्वी यादव सिर्फ महागठबंधन के संयोजक हैं। महागठबंधन का सीएम फेस जनता तय करेगी कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा। विधायक अपने-अपने दल का नेता चुनेंगे, और फिर गठबंधन मिलकर अपने दल के नेता को तय करेगा। पिछले विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए कहा, “पिछली बार कांग्रेस को क्वालिटी वाली सीटें नहीं मिली थीं। इस बार कांग्रेस किसी भी सूरत में क्वालिटी सीटों पर समझौता नहीं करेगी।

तेजस्वी यादव के हाथ से बिहार चुनाव की स्टेयरिंग छिनी- गिरिराज
इस बीच बिहार चुनाव से पहले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने तेजस्वी यादव पर तगड़ा प्रहार किया है। गिरिराज सिंह ने कहा है कि तेजस्वी यादव के हाथ से स्टेयरिंग छिन गई है। इतना ही नहीं अब तेजस्वी यादव को उसके बड़े भाई तेज प्रताप यादव भी आंखें दिखाने लगे हैं। उन्होंन राजद-कांग्रेस के बारे में कहा कि महा-अंतर्कलह का शिकार महागठबंधन में अब सिर फुटौव्वल अपने चरम पर पहुंच गया है। तेजस्वी यादव मानें न मानें पर कांग्रेस ने इशारों में साफ कह दिया है कि उसकी नजर में तेजस्वी और राजद की क्या हैसियत है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि बिहार की राजनीति में एक बार फिर महागठबंधन की अंतर्कलह खुलकर सामने आ गई है। कांग्रेस ने साफ संकेत दे दिया है कि वह कम से कम 70 सीटें अपने हिस्से में चाहती है।

महागठबंधन ऐसी ट्रेन है, जिसकी हर बोगी इंजन बनना चाहती है
कांग्रेस ने राजद के खिलाफ अपना दांव चल दिया है। कांग्रेस इन सीटों का चयन खुद करेगी और केवल “जिताऊ सीटें” ही लेगी। उधर, सहनी की VIP पार्टी 60, माले 40 और जेएमएम व रालोजपा (पारस गुट) जैसी पार्टियां भी कम से कम 10-15 सीटों की मांग कर रही हैं। ऐसे हालात में राजद के हिस्से मुश्किल से 50-55 सीटें ही बचेंगी। केंद्रीय मंत्री सिंह ने कहा कि महागठबंधन दरअसल वह ट्रेन है जिसकी हर बोगी इंजन बनने की कोशिश में है। यही वजह है कि इस गठबंधन में एकजुटता कम और गड़बड़झाला ज्यादा है। सिंह ने कहा कि यह वही राजद है जो बाहर से खुद को विपक्ष का अगुआ दिखाने की कोशिश कर रही है, लेकिन भीतर से उसके सहयोगी ही उसके पैरों तले ज़मीन खींच रहे हैं। इसलिए तेजस्वी का कद लगातार बौना होता जा रहा है।

16 दिन, 23 जिले, 1300 किमी, 67 विधानसभा… ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से पहाड़ (बिहार) खोदने निकले थे राहुल गाँधी, चुहिया ने तेजस्वी यादव को कुतरा; तेजस्वी के मुद्दों का गायब होना


बिहार में राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा 16 दिन तक चली और अब खत्म हो चुकी है। ये यात्रा बिहार के 23 जिलों, 1300 किलोमीटर और 67 विधानसभा सीटों से होकर गुजरी। वैसे तो इस यात्रा का मकसद था बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोट चोरी का मुद्दा उठाकर जनता का समर्थन हासिल करना और इंडी गठबंधन को मजबूत करना। लेकिन नतीजा उल्टा रहा।

इस यात्रा की अगुवाई करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी न तो जनता का भरोसा जीत पाई गया, न ही गठबंधन के भीतर एकजुटता दिख पाई। यात्रा के दौरान विवाद, आपसी मतभेद और स्थानीय लोगों की उदासीनता ने इसे चर्चा का विषय बना दिया। आइए, इस यात्रा के हर पहलू को विस्तार से समझते हैं।

वोटर अधिकार यात्रा का मकसद और उसकी विफलता

राहुल गाँधी ने वोटर अधिकार यात्रा की शुरुआत सासाराम से की थी, जिसमें आरजेडी नेता तेजस्वी यादव उनके साथ थे। इसका लक्ष्य था वोट चोरी को बड़ा मुद्दा बनाना और बिहार की जनता को यह बताना कि उनके वोटिंग अधिकार खतरे में हैं। साथ ही इंडी गठबंधन को एकजुट दिखाकर तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाना भी इसका उद्देश्य था। लेकिन ये दोनों ही लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।

स्थानीय लोगों ने इस यात्रा को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट संजय कौशिक कहते हैं, “यात्रा का सबसे बड़ा नुकसान मुद्दे के चयन में हुआ। वोट चोरी का मुद्दा बिहार की जनता के बीच गूँज नहीं सका। लोग SIR (स्पेशल इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन) को जरूरी मानते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि वोटर लिस्ट में बाहरी लोग, घुसपैठिए और मृत वोटरों के नाम हटाए जाने चाहिए।” इस वजह से राहुल गाँधी को स्थानीय समर्थन नहीं मिला।

राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा की कवरेज ऑपइंडिया ने भी की। इस दौरान हमारी टीम ने लोगों से बातचीत की। लोगों ने राहुल गाँधी की इस यात्रा तो न सिर्फ खारिज किया, बल्कि उन्होंने बिहार SIR को बेहद जरूरी बताया। स्थानीय लोग तो घुसपैठियों की समस्या से परेशान भी दिखे।

यात्रा का रूट मैप भी मुस्लिम बहुल इलाकों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, ताकि इस समुदाय को इंडी गठबंधन की ओर आकर्षित किया जा सके। सासाराम, रोहतास से निकली यात्रा औरंगाबाद, गया, वजीरगंज, शेखपुरा, मुंगेर से होकर भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल होते हुए दरभंगा, सीतामढ़ी, बेतिया, फिर गोपालगंज, छपरा, भोजपुर होते हुए पटना में खत्म हुई। लेकिन यह रणनीति भी कारगर नहीं रही। आरा जैसे इलाकों में वामपंथी दलों को जोड़ा गया, लेकिन वहाँ भी भीड़ जुटाने में नाकामी मिली।

गठबंधन में खटास और तेजस्वी की छवि पर असर

इंडी गठबंधन में शामिल आरजेडी को उम्मीद थी कि यह यात्रा तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जिससे तेजस्वी की छवि को नुकसान हुआ। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट नचिकेता नारायण कहते हैं, “राहुल गाँधी ने तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से बचकर गठबंधन की अंदरूनी खटास को उजागर कर दिया।”

इसके अलावा आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच सीट बँटवारे को लेकर भी तनाव सामने आया। यात्रा से पहले चर्चा थी कि कॉन्ग्रेस को महागठबंधन में 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी। लेकिन यात्रा के बाद लगता है कि कॉन्ग्रेस कुछ ज्यादा सीटें हासिल कर सकती है। फिर भी जमीनी स्तर पर इसका कोई खास फायदा नहीं दिखता।

विवादों ने डुबोई वोटर अधिकार यात्रा की नैया

यात्रा के दौरान कई विवादों ने इसे और कमजोर किया। सबसे बड़ा विवाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के शामिल होने पर हुआ। स्टालिन 27 अगस्त को मुजफ्फरपुर में यात्रा में शामिल हुए। लेकिन उनकी पार्टी डीएमके के नेताओं के पुराने बयान लोगों को याद आ गए।

डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने बिहार और यूपी के लोगों को ‘टॉयलेट साफ करने वाला’ कहा था, जबकि स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने सनातन धर्म को बीमारी बताया था। बीजेपी प्रवक्ता प्रभात मालाकार ने कहा, “यह यात्रा बिहार और बिहारियों के अपमान की यात्रा थी। राहुल और तेजस्वी उन लोगों के साथ घूमे, जिन्होंने बिहार के डीएनए पर सवाल उठाए।”

दूसरा बड़ा विवाद दरभंगा में हुआ, जहाँ मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कहे गए। मोहम्मद रिजवी को इस मामले में गिरफ्तार किया गया। इस घटना का वीडियो वायरल हो गया और बीजेपी ने इसे पूरे देश में मुद्दा बनाया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम दौरे में कहा, “राहुल गाँधी को पीएम मोदी और उनकी दिवंगत माँ के लिए कहे गए अपशब्दों पर माफी माँगनी चाहिए।” खुद पीएम मोदी ने भी इस मुद्दे को जनता के सामने रखा। ऐसे में इस विवाद ने यात्रा की साख को और नुकसान पहुँचाया।

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार का रोल सीमित, बैकफुट पर रहे

यात्रा में पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को भी शामिल किया गया, लेकिन इनका रोल भी विवादों से अछूता नहीं रहा। पप्पू यादव को पूर्णिया में इस्तेमाल किया गया, लेकिन बाद में उन्हें मंच पर जगह तक नहीं दी गई। पटना में वे मंच के पीछे बैठे दिखे, जबकि उन्होंने तेजस्वी यादव को ‘जननायक’ तक कह दिया था। कन्हैया कुमार शुरुआत में यात्रा में दिखे, लेकिन बाद में गायब हो गए।

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसों को अभी भी आरजेडी कबूल करने को तैयार नहीं है। ऐसे में आरजेडी ने इन दोनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, जिससे गठबंधन में आपसी अविश्वास की खाई और गहरी हो गई।

तेजस्वी के मुद्दों का गायब होना

आरजेडी को उम्मीद थी कि इस यात्रा से तेजस्वी यादव को बिहार में इंडी गठबंधन का फ्रंट चेहरा बनाया जाएगा, लेकिन हुआ उल्टा। सारा फुटेज खा गए राहुल गाँधी। इसकी वजह से कॉन्ग्रेस और आरजेडी के बीच मतभेद भी सामने आ गई कि राहुल गाँधी तेजस्वी यादव पर हावी हो गए। इसकी वजह से यात्रा के समापन को बदल दिया गया और बेहद निराशा भरे माहौल में पटना में यात्रा को खत्म कर दिया गया।

बिहार में एक वर्ग है- जिसने सिर्फ जंगल राज की कहानियों को पढ़ा है, उस समय के बारे में सिर्फ सुना है, उन्होंने जंगलराज को जिया नहीं है। मतदाताओं के ऐसे वर्ग ने 20 सालों से नीतीश कुमार को ही सत्ता में बने देखा है। जंगलराज को न जानने वाले इस मतदाता वर्ग में एंटी इन्कमबेंसी फैक्टर बना हुआ था। यही वर्ग मजबूरी के विकल्प के तौर पर तेजस्वी यादव की तरफ भी देख रहे थे। 2020 में भी देख रहे थे, अभी भी देख रहे हैं।

यही वजह है कि तेजस्वी यादव कलम, रोजगार इन सब चीजों की बात भी करते थे। लेकिन कॉन्ग्रेस ने अपने वोट चोरी का जो फर्जी एजेंडा थोप दिया। उससे तेजस्वी यादव के मुद्दे खो गए। साफ है – कॉन्ग्रेस के वोट चोरी के एजेंडे ने तेजस्वी के इन मुद्दों को दबा दिया।

इन सब की वजह से जो नए मतदाताओं के बीच कलम-रोजगार जैसे मजबूरी के मुद्दों के बीत तेजस्वी उभर रहे थे, वो सब भी तेजस्वी और इंडी गठबंधन के हाथों से फिसल गए। नचिकेता नारायण कहते हैं, “कॉन्ग्रेस खुद को RJD के बराबर खड़ा करने में कामयाब रही। इसके अलावा उसे बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। वोट चोरी का मुद्दा लोगों ने नकार दिया। यात्रा के दौरान दिखाए गए सबूत या तो गलत निकले या जनता ने उन्हें स्वीकार नहीं किया।”

क्या मिला इंडी गठबंधन को?

यात्रा से इंडी गठबंधन को मिला-जुला फायदा हुआ। कॉन्ग्रेस के लिए यह संगठन को मजबूत करने का मौका था। संजय कौशिक कहते हैं, “बिहार में कॉन्ग्रेस का संगठन लगभग खत्म हो चुका था। इस यात्रा ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूँकी।” लेकिन वोटों में इसका कितना फायदा होगा, यह साफ नहीं है।
आरजेडी के लिए यात्रा फायदे का सौदा नहीं रही। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “RJD के लिए यह यात्रा फायदे का सौदा साबित नहीं हुई। उसे इकलौता फायदा मुस्लिम वोटों का बंटवारा रोकने का मिला। रणनीतिक रूप से उसे नुकसान ही हुआ।” हालाँकि, नचिकेता नारायण का मानना है कि राहुल और तेजस्वी की केमिस्ट्री से सीट बँटवारे और वोट ट्रांसफर में आसानी हो सकती है।
भाकपा (माले) जैसी छोटी पार्टियों को इस यात्रा से कुछ फायदा हुआ। पार्टी के जनरल सेक्रेटरी दीपांकर भट्टाचार्य पूरे 16 दिन राहुल के साथ दिखे, जिससे उनकी पार्टी की अहमियत बढ़ी।

क्या बदला बिहार का सियासी माहौल?

यात्रा के रूट में शामिल 67 विधानसभा सीटों में से 2020 में एनडीए ने 39 सीटें जीती थीं, जबकि कॉन्ग्रेस को सिर्फ 9 सीटें मिली थीं। राहुल गाँधी के सामने इन सीटों पर एनडीए की मजबूती को तोड़ने की चुनौती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यात्रा के समापन में पटना के गाँधी मैदान में बड़ी रैली की योजना थी, लेकिन भीड़ न जुटने की वजह से इसे रोडशो में बदल दिया गया। राहुल गाँधी जल्दी ही बिहार से निकल गए।

खोया ज्यादा, पाया कम

कुल मिलाकर इस यात्रा से पहले जो चर्चा थी कि इंडी गठबंधन में कॉन्ग्रेस को 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी, वो इस यात्रा के बाद बदल गया है। अब लगता है कि शायद कॉन्ग्रेस कुछ ज्यादा सीट झटक ले। हालाँकि इस यात्रा से ये भी साफ हो गया है कि कॉन्ग्रेस भले ही कुछ सीटें इंडी गठबंधन में ज्यादा ले ले, लेकिन जमीन पर उसका कोई फायदा नहीं मिलने वाला। क्योंकि सालों तक विपक्ष में रहने के बावजूद न तो कॉन्ग्रेस के पास कोई मुद्दा है और न ही आरजेडी के पास। ऐसे में राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा का जमीन पर कोई खास फर्क पड़ा हो, ऐसा बिल्कुल भी नहीं दिखता है।