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रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला


डॉ विवेक आर्य, उगता भारत 

बचपन में हमें अपने पाठयक्रम में पढ़ाया जाता रहा है कि रक्षाबंधन के त्योहार पर बहने अपने भाई को राखी बांध कर उनकी लम्बी आयु की कामना करती है। रक्षा बंधन का सबसे प्रचलित उदहारण चित्तोड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ का दिया जाता है। कहा जाता है कि जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तोड़ पर हमला किया तब  चित्तोड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को पत्र लिख कर सहायता करने का निवेदन किया। पत्र के साथ रानी ने भाई समझ कर राखी भी भेजी थी। हुमायूँ रानी की रक्षा के लिए आया मगर तब तक देर हो चुकी थी। रानी ने जौहर कर आत्महत्या कर ली थी। इस इतिहास को हिन्दू-मुस्लिम एकता  तोर पर पढ़ाया जाता हैं।

अब सेक्युलर घोटाला पढ़िए

हमारे देश का इतिहास सेक्युलर इतिहासकारों ने लिखा है। भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम थे। जिन्हें साम्यवादी विचारधारा के नेहरू ने सख्त हिदायत देकर यह कहा था कि जो भी इतिहास पाठयक्रम में शामिल किया जाये।  उस इतिहास में यह न पढ़ाया जाये कि मुस्लिम हमलावरों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा, हिन्दुओं को जबरन धर्मान्तरित किया, उन पर अनेक अत्याचार किये। मौलाना ने नेहरू की सलाह को मानते हुए न केवल सत्य इतिहास को छुपाया अपितु उसे विकृत भी कर दिया।

रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ के किस्से के साथ भी यही अत्याचार हुआ। जब रानी को पता चला की बहादुर शाह उस पर हमला करने वाला है तो उसने हुमायूँ को पत्र तो लिखा। मगर हुमायूँ को पत्र लिखे जाने का बहादुर खान को पता चल गया। बहादुर खान ने हुमायूँ को पत्र लिख कर इस्लाम की दुहाई दी और एक काफिर की सहायता करने से रोका।

मिरात-ए-सिकंदरी में गुजरात विषय से पृष्ठ संख्या 382 पर लिखा मिलता है-

सुल्तान के पत्र का हुमायूँ पर बुरा प्रभाव हुआ। वह आगरे से चित्तोड़ के लिए निकल गया था। अभी वह गवालियर ही पहुंचा था। उसे विचार आया, "सुलतान चित्तोड़ पर हमला करने जा रहा है। अगर मैंने चित्तोड़ की मदद की तो मैं एक प्रकार से एक काफिर की मदद करूँगा। इस्लाम के अनुसार काफिर की मदद करना हराम है। इसलिए देरी करना सबसे सही रहेगा। " यह विचार कर हुमायूँ गवालियर में ही रुक गया और आगे नहीं सरका।

इधर बहादुर शाह ने जब चित्तोड़ को घेर लिया।  रानी ने पूरी वीरता से उसका सामना किया। हुमायूँ का कोई नामोनिशान नहीं था। अंत में जौहर करने का फैसला हुआ। किले के दरवाजे खोल दिए गए। केसरिया बाना पहनकर पुरुष युद्ध के लिए उतर गए। पीछे से राजपूत औरतें जौहर की आग में कूद गई। रानी कर्णावती 13000 स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गई। 3000 छोटे बच्चों को कुँए और खाई में फेंक दिया गया।  ताकि वे मुसलमानों के हाथ न लगे। कुल मिलकर 32000 निर्दोष लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

बहादुर शाह किले में लूटपाट कर वापिस चला गया। हुमायूँ चित्तोड़ आया। मगर पुरे एक वर्ष के बाद आया।परन्तु किसलिए आया? अपने वार्षिक लगान को इकठ्ठा करने आया। ध्यान दीजिये यही हुमायूँ जब शेरशाह सूरी के डर से रेगिस्तान की धूल छानता फिर रहा था। तब उमरकोट सिंध के हिन्दू राजपूत राणा ने हुमायूँ को आश्रय दिया था। यही उमरकोट में अकबर का जन्म हुआ था। एक काफ़िर का आश्रय लेते हुमायूँ को कभी इस्लाम याद नहीं आया। और धिक्कार है ऐसे राणा पर जिसने अपने हिन्दू राजपूत रियासत चित्तोड़ से दगा करने वाले हुमायूँ को आश्रय दिया। अगर हुमायूँ यही रेगिस्तान में मर जाता। तो भारत से मुग़लों का अंत तभी हो जाता। न आगे चलकर अकबर से लेकर औरंगज़ेब के अत्याचार हिन्दुओं को सहने पड़ते। 

इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर सरीखे इतिहासकारों ने इतिहास का केवल विकृतिकरण ही नहीं किया अपितु उसका पूरा बलात्कार ही कर दिया। हुमायूँ द्वारा इस्लाम के नाम पर की गई दगाबाजी को हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे और रक्षाबंधन का नाम दे दिया। हमारे पाठयक्रम में पढ़ा पढ़ा कर हिन्दू बच्चों को इतना भ्रमित  किया गया कि उन्हें कभी सत्य का ज्ञान ही न हो। इसीलिए आज हिन्दुओं के बच्चे दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे के दर्शन करने जाते हैं। जहाँ पर गाइड उन्हें हुमायूँ को हिन्दूमुस्लिम भाईचारे के प्रतीक के रूप में बताते हैं।

त्यौहार और मुहूर्त

सोशल मीडिया के कुछ फायदे हैं तो नुकसान भी हैं। ऐसा ही एक बड़ा नुकसान पिछले कुछ वर्षों में देखने को मिला कि हमारे हर त्यौहार को मुहूर्त के नाम पर छोटा कर रहे हैं।

हम बचपन में पूरा दिन राखी दिवाली और होली मनाते थे। ना कोई मुहूर्त की बात करता था ना ही समय देखकर कोई त्यौहार मनाते थे।

पिछले कुछ वर्षों में अजीब सा चलन चला है -इतने समय से इतने समय तक शुभ मुहूर्त है मतलब आप के त्यौहार को एक डेढ़ घंटे का कर दिया।

30 अगस्त को राखी रात्रि 9 बजे के बाद या 31 अगस्त को सुबह 7 बजे से पहले कितनी बहने भाई को राखी बांधने जा सकेंगी?

न जाने इसके पीछे किसका हाथ है, जो हमारे त्योहारों को समयनुसार समेटते जा रहे हैं

क्या आपने कभी किसी और धर्म के त्योहारों पर इस प्रकार का संदेश देखा है?

इस राखी पर भी एक संदेश चल रहा है कि राखी इतने समय से इतने समय तक 

 अरे भैया क्या यह संभव है कि देश की सभी बहने एक ही मुहूर्त में अपने भाई को राखी बांधे।

क्या भाई बहन के प्रेम के बीच में मुहूर्त आ सकता है? दोस्तों दिल खोलकर राखी मनाईये  सुबह से लेकर रात तक 

ईश्वर का दिया हुआ हर क्षण शुभ होता है। 

मद्रास हाई कोर्ट में मुस्लिम बहुल इलाके की याचिका : हिन्दू त्योहार ‘पाप’, हमारी गलियों से नहीं निकलने दें जुलूस

तमिलनाडु के पेरंबलुर जिले का वी कलाथुर मुस्लिम बहुल इलाका है, जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। यहाँ का बहुसंख्यक समुदाय हिन्दू मंदिरों से जुलूस या भ्रमण निकालने का लंबे समय से विरोध करता रहा है। इसी को लेकर मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, इलाके के कुछ स्थानीय मुस्लिम 2012 से हिन्दू जुलूसों को निकाले जाने का विरोध कर रहे थे। इन इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दू त्योहारों को ‘पाप’ करार दे रखा था। इसी को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता ने अनुष्ठानों और जुलूसों के संचालन के दौरान सुरक्षा प्रदान करने के लिए पुलिस से संपर्क किया था। आश्चर्य यह कि सुरक्षा एजेंसियों ने इन अनुरोधों को कुछ प्रतिबंधों के साथ मान भी लिया था।

देश में 'गंगा-जमुनी तहजीब' का भ्रमिक नारा, #intolernce (असहिष्णुता), 'संविधान की दुहाई' और 'सेकुलरिज्म की दुहाई' देने वाले आदि गैंगस्टर मद्रास के इन कट्टरपंथियों पर चुप क्यों? क्या इन सबके घरों में कोई अनहोनी हो गयी है? समय है इन कट्टरपंथियों के विरुद्ध खड़े होने का। कोर्ट ने तो अपना काम कर दिया, अब काम उन पाखंडी हिन्दुओं का है जो इन कट्टरपंथियों की हाँ में हाँ मिलाकर इन भ्रमित नारों को बुलंद कर रहे हैं। जब इन कट्टरपंथियों को इनकी अपनी कौम ही नहीं समझा सकी, तुम लोगों की क्या बिसात।  

इस मामले में सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एन किरुबकर्ण और पी वेलमुरुगन की 2 सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला सुनाया। बेंच ने धार्मिक असहिष्णुता को देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए खतरनाक बताया है। कोर्ट ने कहा कि अगर एक पक्ष से संबंधित धार्मिक त्योहारों के आयोजन का विरोध दूसरे धार्मिक समूह द्वारा किया जाता है, तो इससे दंगे और अराजकता फैल सकती है।

पुलिस उपाधीक्षक के हलफनामे को पढ़ने के दौरान मद्रास उच्च न्यायालय ने देखा कि 2012 के बाद से मंदिर के जुलूसों पर आपत्ति जताई गई थी। जबकि, उससे पहले इस तरह की कोई समस्या नहीं थी। न्यायालय ने जानकारी दी कि मंदिरों से जुलूस निकालने को लेकर कोर्ट की अनुमति के बावजूद मुस्लिम कट्टरपंथियों ने आपत्ति जताई। (डिस्ट्रिक्ट मुनिसीपैलिटी एक्ट 1920 के सेक्शन 180 ए के अनुसार)।

मद्रास हाई कोर्ट का फैसला 

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले के दौरान टिप्पणी की, “केवल इसलिए कि एक धार्मिक समूह विशेष इलाके में हावी है, इसलिए दूसरे धार्मिक समुदाय को त्योहारों को मनाने या उस एरिया की सड़कों पर जुलूस निकालने से नहीं रोका जा सकता है। अगर धार्मिक असहिष्णुता की अनुमति दी जाती है, तो यह एक धर्मनिरपेक्ष देश के लिए अच्छा नहीं है। किसी भी धार्मिक समूह द्वारा किसी भी रूप में असहिष्णुता पर रोक लगाई जानी चाहिए।”

अदालत ने आगे कहा, “इस मामले में, एक विशेष धार्मिक समूह की असहिष्णुता उन त्योहारों पर आपत्ति जताते हुए दिखाई जा रही है, जो दशकों से एक साथ आयोजित किए जा रहे हैं। गलियों और सड़कों से निकलने वाले जुलूस को सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित करने की माँग की गई क्योंकि इलाका मुस्लिम बहुल है यहाँ कोई भी हिन्दू त्योहार या जुलूस नहीं निकाला जा सकता है।”

इस मामले में जजों ने एक साथ दोहराया कि इलाके में एक धार्मिक समूह का वर्चस्व होने के कारण दूसरे धार्मिक समूहों और जुलूसों को इलाके से नहीं हटा सकते। न्यायालय ने तर्क दिया कि अगर इस तरह के मामलों को स्वीकार किया गया, तो कोई भी अल्पसंख्यक समुदाय देश के ज्यादातर हिस्सों में अपने त्योहारों को मना ही नहीं पाएगा। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विरोध से धार्मिक लड़ाई झगड़े बढ़ेंगे, दंगे भड़केंगे, जिसमें जानें जाएँगी और जानमाल का भारी नुकसान झेलना पड़ेगा।