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दो दिन में 2 हाई कोर्ट हिंदू लड़की की मुस्लिम लड़के से शादी के लिए अलग अलग फैसला दे गए; जबकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले ही फैसला दे चुका है; रोचक मामला है, पढ़िए

सुभाष चन्द्र

कायदे में जब सुप्रीम कोर्ट किसी मामले पर फैसला कर चुका होता है तो फिर उसी विषय में किसी हाई कोर्ट द्वारा अपनी समझ से अलग फैसला देने का कोई औचित्य नहीं रहता।  

वर्ष 2019 की 22 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एन वी रमना और जस्टिस एम् एम् शांतानागौदर ने एक फैसले में साफ़ कहा था कि -

“किसी हिन्दू महिला की किसी मुस्लिम पुरुष के साथ शादी अनियमित या अवैध है लेकिन उसकी शादी से पैदा होने वाली संतान वैध है, और उसे अपने पिता यानी मुस्लिम पुरुष की संपत्ति में अधिकार है”

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केरल हाई कोर्ट ने कहा था कि मोहम्मद इलियास और वल्लियम्मा (जो शादी के समय हिन्दू थी) का बेटा (शम्सुद्दीन) वैध है और पिता की संपत्ति में हिस्सा पाने का हकदार है

इस फैसले के खिलाफ शम्सुद्दीन के सौतेले भाई सुप्रीम कोर्ट गए और दलील दी कि वल्लियम्मा शादी के समय हिन्दू थी, और क्योंकि उसने मुस्लिम धर्म स्वीकार नहीं किया था इसलिए उसके पुत्र शम्सुद्दीन का इलियास की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है इलियास की मौत के बाद शम्सुद्दीन ने उसकी संपत्ति में हिस्सा मांगा था

अदालत ने कहा था कि मुस्लिम कानून के अनुसार शादी कोई धार्मिक बंधन ना हो कर नागरिक अनुबंध (Civil Contract) है जिसमें 3 तरह की शादी होती है --वैध, अनियमित और अमान्य (Valid, Irregular and Void).

जाहिर है वैध शादी तो मुस्लिम समुदाय में करने से ही मानी जाएगी

अदालत ने कहा--उनका मानना है कि किसी मुस्लिम पुरुष की मूर्ति पूजक या अग्नि की पूजा करने वाली महिला से शादी ना तो वैध (Valid) है और ना अमान्य (Void) है बल्कि ये शादी एक अनियमित (Irregular) शादी है। लेकिन इस शादी से पैदा होने वाली संतान को  अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा पाने का हक़ है

अभी 30 मई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी कुछ ऐसा ही फैसला देते हुए कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मतांतरण बिना शादी अवैध है एक हिंदू लड़की सारिका सेन और मुस्लिम लड़के सफीक खान ने कोर्ट में यह कहते हुए कि उन्होंने शादी कर ली है, विवाह के पंजीकरण और पुलिस सुरक्षा की मांग के लिए याचिका लगाई थी इसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की तो बात की जिसमें शादी के लिए लड़की को धर्म परिवर्तन करना जरूरी है लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट की बात नहीं की जिसमें भी दोनों का हिंदू होना अनिवार्य है, यानी इसमें भी मतांतरण की जरूरत है मुस्लिम लड़के के लिए

सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद भी कल इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस ज्योत्स्ना शर्मा ने फैसला सुनाया कि धर्म बदले बिना भी हो सकती है अंतरधार्मिक शादी क्योंकि Special Marriage Act किसी को बिना धर्म बदले विवाह बंधन में बंधने से प्रतिबंधित नहीं करता और विपरीत धर्म में आस्था रखने वाले इस एक्ट के तहत शादी कर सकते हैं जस्टिस ज्योत्सना को मुस्लिम पर्सनल लॉ और हिन्दू मैरिज एक्ट को भी देखना चाहिए था

लेकिन जस्टिस ज्योत्सना के फैसले का मतलब है कि जस्टिस एन वी रमना और जस्टिस एम् एम् शांतानागौदर को Special Marriage Act (SMA) का पूरा ज्ञान नहीं था जो उन्होंने हिंदू महिला की मुस्लिम पुरुष से शादी को अवैध करार दे दिया वैसे हो सकता है मोहम्मद इलियास और वल्लियम्मा की शादी का SMA में पंजीकरण का मामला नहीं था लेकिन सैद्धांतिक रूप से उनकी शादी को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित कर दी थी लगता है अब फिर 5 जजों की संविधान पीठ पंचायत लगाएगी और नया फैसला आएगा