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कमलेश तिवारी होते हुए कन्हैया लाल तक पहुँचा हकीकत राय से शुरू हुआ सिलसिला, कातिल ‘मासूम भटके हुए जवान’: जुबैर समर्थकों के पंजों पर लगा है खून

वीर हकीकत राय से जो सिलसिला शुरू हुआ था, वो कमलेश तिवारी पर आकर रुका नहीं। वो आगे बढ़कर अब कन्हैयालाल तक पहुँच गया है। दो मुस्लिमों ने एक निहत्थे-बेगुनाह दर्जी की बेरहमी से हत्या केवल इसलिए कर दी है क्योंकि उसने नुपुर शर्मा को समर्थन देने का व्हाट्स-एप्प स्टेटस लगाया था। बिरियानी में बोटियाँ ढूँढने वाला हर कुत्ता जो कल ईद की सेवइयों पर अश-अश कर रहा था, इस क़त्ल का जिम्मेदार है। गिरफ़्तारी होते ही मुहम्मद जुबैर को पत्रकार घोषित करने की जल्दी पर उतरे हर लिबटार्ड के खूनी पंजों पर कन्हैयालाल का खून लगा है। दंगे के लिए भड़का रहे, दंगाइयों को भटका हुआ मासूम नौजवान बता रहे हर धूर्त के दाँतों में फँसा गोश्त उसके कातिल होने की गवाही दे रहा है।
कमलेश तिवारी 

ये हत्या इसलिए हुई है क्योंकि उन्हें पता है कि सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें फैलाने वाली कोई ओम थानवी जैसी किराए की कलम उनके पक्ष में लम्बे लेख लिखने उतर आएगी। उन्हें मालूम है कि कोई दूसरा कातिलों को मासूम भटका हुआ नौजवान बता देगा। उन्हें मालूम है कि गहलोत जैसा कोई मुख्यमंत्री कहने लगेगा कि वीडियो न निकालें क्योंकि इससे समाज में नफरत फैलाने का “उनका” मकसद सफल हो जाएगा।

सफल तो ये लोग 1947 से हैं। हिन्दू-मुसलमान के बीच नफरत के बीज बोने वाले हमारे नेता हैं, जिन्होंने अपनी कुर्सी की खातिर देश के गौरवशाली इतिहास को भुलाकर आतताई मुगलों को महान बताकर  भयंकर भूल की है। जो देश अपनी ही संस्कृति और इतिहास को भुला दे, ऐसे हालात रोज होंगे। आतताई मुगलों को महान बताने से ही कट्टरपंथियों को बल मिला है और हर बीतते दिन वह और मजबूत होते जा रहे हैं। जिसका शिकार सिर्फ हिन्दू ही नहीं आम मुस्लिम भी हो रहा है। कुर्सी को भूल नेता जनता को बताएं की 'क्या वास्तव में मुग़ल महान थे?' क्यों देश के वास्तविक इतिहास को छुपाया गया? जिन इतिहाकारों ने देश के गौरवशाली इतिहास को दरकिनार किया, उन्हें ब्लैकलिस्ट किया जाये। इन कुर्सी के भूखे नेताओं को मालूम होना चाहिए कि विश्व में भारतीय संस्कृति और इतिहास से  अधिक महान कोई नहीं। अब कोई दूसरा कमलेश तिवारी और कन्हैया लाल हादसा न हो, उसके लिए सभी राजनीतिक पार्टियों को एकजुट होना पड़ेगा। देश के गौरवशाली वास्तविक हिन्दू इतिहास को सामने लाने के लिए एकजुट होना पड़ेगा। हर मुसलमान पाकिस्तानी या हिन्दू विरोधी नहीं हैं, उनकी तो वही स्थिति है जो चने के साथ घुन के पिसने की होती है। धरने प्रदर्शन में 'सर तन से जुदा' नारे लगाने वालो को जल्द से जल्द पकड़ा जाये और इनके परिवार को मिलने वाली हर सरकारी सुविधा से हमेशा के लिए वंचित किया जाए।  

उसे मालूम है कि सरयू में अश्लील बर्ताव करने पर सख्ती से मना कर दिए जाने पर जो लोग नाराज होकर तीस प्रतिशत संतुष्टों से निकलकर सत्तर प्रतिशत असंतुष्टों में जा बैठे थे, वो इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेंगे। कुछ गिरे हुए मानवाधिकार के प्रवक्ता ऐसे भी होंगे जिन्हें इसी मौके पर सामाजिक सरोकार भूलकर, कला-साहित्य-संगीत की चर्चा करनी जरूरी लगने लगेगी।

राजस्थान की ये घटना राज्य की कोई पहली घटना भी नहीं है। रामनवमी के शांतिपूर्ण जुलूसों पर इस राज्य में पथराव किए गए थे। इसी राज्य में जब धरोहर की तरह सहेजे जाने योग्य, एक शिवमंदिर को शासन-प्रशासन के जोर पर तुड़वा दिया गया था। यहीं ओम थानवी जैसे लोगों की सत्ता पक्ष की सहायता से कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पद हथियाने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। प्राचीन शिवमंदिर को तोड़े जाने की निंदनीय घटना के बाद ओम थानवी जो कि कॉन्ग्रेसी सरकार की वजह से पत्रकारिता पढ़ाते भी हैं, उनके कई चेले-चपाटी तो फ़ौरन इस सरकारी हुक्म के समर्थन में भी उतर आए थे। पता नहीं क्यों उस वक्त वो अपना प्रिय तर्क, जिसमें कहा जाता है कि पत्रकार तो हमेशा सत्ता के विपक्ष में होता है, भूल गए थे। ऐसे लोगों के शिक्षा के संस्थानों में होना ही तो नई पीढ़ी को बरगलाने की उनकी क्षमता सुनिश्चित करता है!

शिक्षण संस्थानों में ऐसी क्षमता होने से ये तय होता है कि हिन्दुओं की पीढ़ी दर पीढ़ी को जब कुछ लोग ये बताएँगे कि आप सभ्यताओं के युद्ध के बीच में फँसे हैं तो आपको सफलता कम मिलेगी। ऐसे लोग ही वो लोग हैं जो बच्चे को कहते हैं “वो देखो कौवा”, और उसी वक्त नीचे से कन-कौव्वा काट लिया जाता है। काटने वाले से बचाना, कटने से बचाना तो जरूरी है ही, साथ ही “वो देखो कौवा” कहकर जिसने ध्यान भटकाया था, उसकी पहचान भी जरूरी है। इनके चेहरे से शराफत का नकाब नोचकर जबतक इनके भेड़िए जैसी लपलपाती जीभ और पैने दाँतों के बीच फँसे इंसानी गोश्त को बेनकाब न कर दिया जाए, सुरक्षा तो अधूरी ही रहेगी। एक कट्टरपंथी जमात है जो आपका सर काटती है, दूसरी लिबटार्ड जमात है जो कहती है नहीं-नहीं कुछ भी तो नहीं हुआ! दोनों से लड़ाई बराबर ही लड़नी होगी।

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बाकी लड़ाई हो रही है और आगे लड़ाई तेज ही होने वाली है तो आप सोचिए कि लड़ने के लिए धन चाहिए, हथियार चाहिए, सिपाही भी चाहिए। आपने सभी का इंतजाम किया है या सिर्फ ये सोच रहे हैं कि आपकी ओर से सिपाही बिना हथियार, बिना धन, भूखा लड़ता रहेगा?