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मंदिर निर्माण पर हो रही थी बात, आरफा खानम ने रखी ‘मस्जिद’ की डिमांड: हिंदू महिलाओं ने लताड़ा तो RSS को देने लगीं गाली

             मंदिर निर्माण की माँग को आरफा ने दिया सामप्रदायिक रंग (फोटो साभार : YT_@TheWireNews)
प्रोपेगेंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फँस गई हैं। नोएडा की एक पॉश सोसाइटी में मंदिर निर्माण के सीधे-साधे मुद्दे को ‘सांप्रदायिक’ रंग देने और अपना पुराना ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ चमकाने पहुँची आरफा को वहाँ की जागरूक हिंदू महिलाओं ने ऐसा करारा जवाब दिया कि उन्हें वहाँ से उल्टे पाँव भागना पड़ा।

आरफा, जो हिंदू महिलाओं को ‘गैसलाइट’ करने और उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराने गई थीं, खुद ट्रोल होकर लौटी हैं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आरफा खानम की पत्रकारिता का मकसद जमीन की हकीकत दिखाना नहीं, बल्कि हर मुद्दे में बीजेपी, RSS और मुस्लिम एंगल घुसाकर समाज में दरार पैदा करना है।

वीडियो की हकीकत: आरफा के ‘मस्जिद कार्ड’ पर महिलाओं का जवाब

सोशल मीडिया पर आरफा खानम का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे नोएडा के सेक्टर 15ए की महिलाओं से बातचीत कर रही हैं। इस वीडियो में महिलाओं अपनी माँग को बताती है कि उन्हें मंदिर सोसाइटी में चाहिए, जिससे काफी दूर आना-जाना, ट्रैफिक में फँसना बंद हो जाएगा और बुजुर्गों के लिए सुविधा हो जाएगी। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कोई भी महिला आरफा से ना तो बदतमीजी से बातचीत कर रही है, ना ही तेज आवाज में चिल्ला रही है और ना ही धक्का-मुक्की कर रही हैं।

आरफा ने जितने भी सवाल वहाँ खड़ी हिंदू महिलाओं से पूछे है उनके जवाब उन्हें बेहद शांतिपूर्ण तरीके से मिला है। अपना मुस्लिम और मस्जिद विक्टिम कार्ड घुसाने पर भी महिलाओं ने उन्हें ये ही कहाँ है कि आप अपना एजेंडा यहाँ मत लाओ। मंदिर की बात है, मंदिर तक रहने दो। वीडियो में आप सुन सकते हैं कि जब मंदिर की माँग ज्यादा कर रही लोगों की तादाद ज्यादा थी, तो प्रोपेगेंडाई पत्रकार आरफा ने मस्जिद बनवाने पर भी सवाल कर डाला। आरफा महिलाओं से कहने लगी कि फिर तो मस्जिद भी बनना चाहिए।

इस सवाल का जवाब महिलाओं ने बेहत लहजे से दिया कि जब सोसाइटी में 99.99 प्रतिशत हिंदू लोग है तो मस्जिद बनवाना या ना बनवाना कहाँ से आ जाता है। फिर आरफा ने महिलाओं की तादात को ‘मेजोरिटिज्म’ शब्द से नवाजा, जिसका जवाब भी हिंदू महिलाओं ने बेहद तरीके और करारा दिया। वहाँ खड़ी एक हिंदू महिला ने आरफा को कहा- “हमें ऐसा लग रहा है कि अपने ईश्वर का नाम लेने में क्रिमिनल करार दिया जा रहा है।”

महिला ने आरफा को सीधा मुँह यह भी जवाब दिया कि यह महीने आज से 40 साल पहले नोएडा के मास्टर प्लान में मंदिर के लिए डेजिग्नेटिड यानि नामित थी। 40 साल पहले इतना ट्रैफिक नहीं हुआ करता था और लोग आसानी से दूर मंदिर जा सकते हैं। लेकिन आज ट्रैफिक बढ़ रहा है, समय नहीं है, लोग बुजुर्ग है, कुछ दिव्याँग है, तो कुछ लोगों के पास गाड़ी चलाने के लिए ड्राइवर नहीं है कि वह उन्हें मंदिर तक ले जाए।

वहाँ खड़ी एक महिला ने तो साफ कहा कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, ये हम लोगों की माँग है। इसके अलावा भी आरफा को हिंदू महिलाओं ने उनके कट्टरपंथी एजेंडे पर काफी बढ़िया जवाब दिया है, जिसे आप वीडियो में सुन सकते हैं। महिलाओं ने आरफा को ये ही कहा कि आप अपने एजेंडा यहाँ मत थोपिए… महिलाओं ने साफ कहा कि हमें पता है आपका एजेंडा क्या होता है, आप एक Biased साइड के लिए रिपोर्टिंग करती है। सोशल मीडिया पर भी नेटिजन्स ने आरफा के इस वीडियो पर काफी हँसी उड़ाई। कुछ लोगों ने लिखा कि जनता अब नफरत भरे एजेंडे पर यकीन नहीं कर रही है। अब जनता झगड़े के बजाय फैक्ट्स पर यकीन कर रही है।

The Wire का खेल: एडिटिंग का मायाजाल और फर्जी हेडलाइन

जब ग्राउंड पर आरफा का एजेंडा बुरी तरह फेल हो गया, तो उनके संस्थान ‘The Wire’ ने डैमेज कंट्रोल के लिए अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो डाला। इस वीडियो का टाइटल दिया गया- ‘मंदिर का समर्थन पर ‘लोकतंत्र’ से समस्या, उग्र महिलाओं ने आरफ़ा के साथ की धक्का-मुक्की’।

इस टाइटल और वीडियो की एडिटिंग को गौर से देखें तो ‘The Wire’ का प्रोपेगेंडा बेनकाब हो जाता है। वीडियो की शुरुआत में ही आरफा इसे ‘अमीर लोगों की सोसाइटी’ और ‘BJP वोटर्स’ का गढ़ बताकर नफरत फैलाना शुरू कर देती हैं। वे कहती हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव पास हैं और RSS पूरी हरकत में आ गई है, हमारे समाज का हिंदूकरण कम पड़ गया था जो अब घर तक मंदिर की बात आ गई है।”

आरफा ने जानबूझकर इसे ‘RSS का प्रोजेक्ट’ करार दिया और अपने दर्शकों से कहा कि ‘आप 100 साल के RSS को देख रहे हैं कि वे कैसे घुसपैठ कर रहे हैं।’ ‘The Wire’ ने वीडियो को इस तरह से काट-छाँट कर पेश किया है ताकि हिंदू महिलाएँ ‘उग्र’ दिखें, जबकि असल में आरफा खुद महिलाओं को उकसा रही थीं और उन्हें अपराधी साबित करने पर तुली हुई थीं। वीडियो में कहीं भी वह धक्का-मुक्की नहीं है जिसका दावा हेडलाइन में किया गया है। लेकिन आरफा अपनी आदत के मुताबिक ‘डोंट टच मी’ कहकर खुद को पीड़ित दिखाने का नाटक करती रहीं।

क्या है पूरा मामला? क्यों हो रही है मंदिर की माँग?

नोएडा के सेक्टर 15A का यह पूरा मामला कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों की बुनियादी सुविधा और उनके अधिकारों का मामला है। इस सोसाइटी में रहने वाले लगभग 99 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू लोग चाहते हैं कि उनकी सोसाइटी के भीतर एक मंदिर बन जाए। इसके पीछे बहुत ही साधारण वजहें हैं।

पहली वजह यह है कि सोसाइटी के पास कोई मंदिर नहीं है, जिसके कारण बुजुर्गों को पूजा-पाठ के लिए काफी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। दूसरी समस्या ट्रैफिक और जाम की है, मुख्य मंदिर दूर होने की वजह से लोगों को घंटों जाम में फँसना पड़ता है, जिससे समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी होती है। साथ ही, वहाँ की महिलाओं का कहना है कि 40 साल पहले जब इस इलाके का नक्शा बना था, तभी यह जमीन मंदिर के लिए ही तय की गई थी।

लेकिन इस सीधी-सादी माँग को पत्रकार आरफा खानम ने एक अलग ही रंग दे दिया। उन्हें इसमें ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश और जमीन हड़पने जैसा गंभीर मामला नजर आने लगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे एक खतरे की घंटी (वेक-अप कॉल) बताया। जबकि हकीकत यह है कि वहां के निवासी सिर्फ अपनी ही जमीन पर अपनी आस्था और सुविधा के लिए मंदिर बनवाना चाहते हैं, जो उनका अधिकार है।

एजेंडा पत्रकारिता की हार

आरफा खानम की पूरी रिपोर्टिंग का मकसद यह था कि सेक्टर 15A को ‘RSS की प्रयोगशाला’ साबित किया जाए। उन्होंने जानबूझकर बातचीत में नरेंद्र मोदी और BJP को घुसाया ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मैजोरिटी टेररिज्म’ का नैरेटिव सेट कर सकें। वे वहाँ रिपोर्टिंग करने नहीं, बल्कि महिलाओं को डराने और उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ साबित करने गई थीं।

आरफा खानम वही चेहरा हैं जिन्होंने शाहीन बाग के समय मुस्लिमों को सलाह दी थी कि ‘विचारधारा न बदलें, बस रणनीति बदलें।’ नोएडा में भी वे इसी ‘रणनीति’ के साथ आई थीं, पहले निष्पक्ष पत्रकार होने का ढोंग करना और फिर धीरे से ‘मस्जिद’ और ‘मुस्लिम अधिकार’ का रोना रोकर हिंदुओं को दबाना।

लेकिन नोएडा की इन महिलाओं ने उनकी इस चाल को भांप लिया और उन्हें साफ कह दिया ‘अपना एजेंडा यहाँ मत चलाइए।’ जब आरफा का ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ नहीं चला, तो वे आक्रामक हो गईं और बाद में सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने लगीं।