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गीता जलाने की करते थे बातें, लेकिन ‘रंगीला रसूल’ के लेखक को मार डाला: नूपुर शर्मा के लिए मौत माँग रहे कट्टरपंथी, भाईचारे की बात कर इतिहास दोहराएगा हिन्दू?

                           पहले भी एक किताब की वजह से कट्टरपंथियो को मिला था एक विशेष कानून
‘टाइम्स नाऊ’ की एक डिबेट में हिस्सा लेते हुए भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपूर शर्मा पर पैगंबर मुहम्मद के अपमान का आरोप लगा दिया गया, जिसके बाद उनकी जान खतरे में है। उनके विरुद्ध ‘ऑल्ट न्यूज’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर जैसे भारतीय मुसलमानों ने स्थिति को भड़काया और देखते ही देखते वह पैगंबर का अपमान करने वाली घोषित कर दी गईं। इसके बाद अब तमाम इस्लामी संगठन और तालिबान-अलकायदा जैसे आतंकी नुपूर के सिर काटने की माँग कर रहे हैं। वहीं भारत के कुछ संगठन सामने आए हैं जिन्होंने इस्लाम के खिलाफ बोलने वालों को दंड देने के लिए विशेष कानून बनाने की माँग की है। जबकि वही बात इस्लामिक स्कॉलर द्वारा कहे जाने पर मुंह में दही जमाकर बैठ जाते हैं। 
कट्टरपंथियों को सिर उठाने के लिए ज़िम्मेदार महात्मा गाँधी है, अगर  "रंगीला रसूल" के लेखक महाशय राजपाल की हत्या होने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों को संरक्षण नहीं दिया होता। यही नहीं जब हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करने का विरोध करने वाले स्वामी श्रद्धानन्द की मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा हत्या करने पर महात्मा गाँधी ने हत्यारों को अपना भाई कहकर उनका बचाव किया था। गाँधी की कट्टरपंथियों से यह विरोध करने का साहस नहीं हुआ कि कृष्णा तेरी गीता जलानी पड़ेगी  जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को लेकर अभद्र और अश्लील टिप्पणियाँ की हुई थी, इसके बाद अगली किताब थी उन्नीसवीं सदी का महर्षि क्यों लिखी? यही कारण है कि देश में तुष्टिकरण और कट्टरपंथी अपने पैर पसारे है। 
जी हैं, इसीलिए महाश्य राजपाल को याद करना जरूरी है। उन्होंने रंगीला रसूल नाम से किताब छापी थी और अंत में इसके लिए वो मार दिए गए थे। हमने ज्यादातर इस किताब को लेकर बस यही सुना कि चूँकि महाशय राजपाल ने पैगंबर मोहम्मद पर ‘रंगीला रसूल’ नाम से व्यंग्य प्रकाशित किया था, इसलिए उन्हें मार दिया गया। लेकिन हम ये नहीं जानते कि उन्होंने ऐसा क्यों किया था। दरअसल 1923 में मुस्लिमों ने दो किताब प्रकाशित की थी। एक का नाम था- कृष्णा तेरी गीता जलानी पड़ेगी। इसमें उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को लेकर अभद्र और अश्लील टिप्पणियाँ की हुई थी। इसके बाद अगली किताब थी- उन्नीसवीं सदी का महर्षि। ये किताब आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती पर अभद्र टिप्पणी करते हुए लिखी गई थी।
अपनी TRP बढ़ाने में नूपुर मुद्दे को सुलगाने में हमारी मीडिया भी पीछे नहीं रही। किसी ने यह नहीं पूछा कि इस्लामिक किताब में लिखी बात को जब ज़ाकिर नाइक ने कही क्या तब नहीं हुआ पैगम्बर का अपमान? यदि नहीं, फिर नूपुर द्वारा बात कहने पर अपमान किस बात का, सिर्फ इसलिए नूपुर एक हिन्दू है और कोई हिन्दू इस्लामिक किताबों में लिखी बातों को सार्वजनिक मंच से क्यों बोल रहा है? क्यों नहीं मीडिया चर्चा में बैठे इस्लामिक विद्वानों से नूपुर को उकसाने वाले तस्लीम रहमानी और हिन्दू घृणा वाले लेख लिखने वाले altnews के मोहम्मद ज़ुबैर पर बात करते? क्यों नहीं हिन्दुत्व और शिवलिंग पर अभद्र टिप्पणी करने वालों के विरुद्ध चर्चा करते, यह कहते हैं कि नूपुर  ने जो कहा गलत कहा?
इस विवाद का अंत करने का सबसे आसान तरीका यही है कि नुपूर शर्मा पर सीधे सुप्रीम कोर्ट में केस चले। नुपूर के वकील अदालत में साबित करें कि क्या उनकी मुवक्किल ने जो बयान दिया था, वो हदीस में लिखा है कि नहीं।
वहीं जबाव में मुस्लिम पक्ष के कपिल सिब्बल जैसे वकील, ये साबित करें कि हदीस में ऐसा लिखा है कि नहीं। कोर्ट में विस्तार के साथ एक सारगर्भित बहस हदीस पर हो। एक-एक पन्ने पर चर्चा हो।
फिर सुप्रीम कोर्ट ये फैसला दे कि बुखारी की हदीस में क्या लिखा है और उसके मायने क्या हैं। हदीस की पूरी व्यख्या हो। क्या नुपूर ने मनगढ़ंत बात बोली या फिर ये बात सही में हदीस में लिखी है।
जब 100 करोड़ हिंदुओं के देश में कोर्ट में प्रभु श्रीराम के अस्तित्व पर बहस हो सकती है... जब श्रीराम को अदालत में काल्पनिक बताया जा सकता है। और तो और अदालतें श्री राम के जन्म स्थान की धार्मिक मान्यताओं पर फैसला करने के लिए 150 साल सुनवाई कर सकती है तो हदीस में क्या लिखा है और क्या नहीं लिखा है, इस पर कोर्ट क्यों सुनवाई नहीं कर सकता?
हदीस की सीखों को छुपाना क्यों? पूरी मानवता को हदीस के ज्ञान से क्यों वंचित करना? आखिर अपने धार्मिक ग्रन्थ को लेकर इतना डर क्यों? दूसरे धर्म के लोग तो अपने धार्मिक ग्रन्थ का प्रचार प्रसार करते हैं... आप अपनी हदीस को छुपाना क्यों चाहते हैं? कोर्ट में बहस के दौरान 36 साल पहले दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट द्वारा 31 जुलाई 1986 को दिए फैसला पर होनी चाहिए।
Court Ruling: Some Ayats in the Quran cause Communal Riots | IndiaFacts
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Court Ruling: Some Ayats in the Quran cause Communal Riots | IndiaFacts

उत्तर प्रदेश के दारुल उलूम ने माँग की है कि नुपूर शर्मा को दंड दिया जाए। उनका कहना है कि जो कोई इस्लाम के प्रतीकों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके देश में नफरत फैलाने की कोशिश करे उन पर सख्ती से कार्रवाई हो। लेकिन हिन्दू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी करने वालों पर चुप्पी लगाने को दोगलापन न कहा जाये तो क्या कहा जाये? देखिए वीडियो :-

अब ये बयान तो ऐसा है कि किसी भी इस्लामी संगठनों से इसकी अपेक्षा की जा सकती है लेकिन दारुल देवबंद के मौलाना मुफ्ती ने कहा है कि वो ऐसा कानून चाहते हैं जिसमें इस्लाम का अपमान करने वालों को सजा दी जाए।

कथिततौर पर मौलाना ने कहा, “मैं हमारे प्रिय पैगंबर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की कड़ी निंदा करता हूँ। किसी भी धर्म के अनुयायियों की मजहबी भावनाओं को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर नहीं आहत किया जा सकता। पैगंबर का अपमान मुस्लिम नहीं सहेंगे।” अपने बयान में उन्होंने कहा कि भारत सरकार को ऐसा विशेष कानून लाना चाहिए जो उन लोगों को सजा दे जो मुस्लिमों के प्रतीकों को निशाना बनाते हों”

मौलाना ने सामाजिक सौहार्दता पर बात करते हुए कहा कि भारत के मुसलमानों को एक विशेष कानून की जरूरत है। उनके मुताबिक, “भारत एक सेकुलर देश है और लोग यहाँ साथ में सदियों से रह रहे हैं। ऐसे में सांप्रदायिक और चरमपंथी न केवल देश की शांति को बिगाड़ रहे हैं बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को भी छेड़ रहे हैं।”

शुरू करने से पहले यहाँ थोड़ा अचंभित हो जाते हैं कि देखो कैसे इस्लामी कट्टरपंथी की नफरत भी सामाजिक ताने-बाने की बात कर रही है। जबकि सच ये है कि यही लोग समाज की शांति और लोकाचार को आगजनी, दंगों, प्रदर्शनों और ‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक सजा- सिर तन से जुदा’ जैसा नारा देकर छिन्न-भिन्न करते हैं, फिर अपने उसी शिकार को समाज सौहार्दता बिगाड़ने का दोषी देते हैं जिसका ये लोग भावना आहत होने के कारण सिर कलम करना चाहते हैं। इन लोगों का ऐसा ढंग वाकई हैरान करने वाला है क्योंकि ये हर बार यही करते हैं। पहले ये खुद ही किसी बात से आहत होते हैं, फिर दंगों के लिए दौड़ते हैं, हिंसा करते हैं, फिर शांति भंग करने का इल्जाम दूसरे इंसान पर लगाते हैं। ये सब बिलकुल ब्लैकमेल करने के हथकंडों की तरह है। जैसे क्या हम आपका देश जलाकर आप पर इल्जाम लगा दें क्या?

                                           कोएनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक ‘डीकोलोनाइजिंग द हिंदू माइंड’

हर बार दोहराए जाने वाले हुए उसी एक पैटर्न के बावजूद ‘विशेष कानून की माँग’ केवल ये है कि मुस्लिम समुदाय की भावनाओं की रक्षा हो सके। कट्टरपंथियों की हिंसा के लिए पीड़ित को दोष देते हुए मौलाना मुफ्ती अब्दुल कासिम ने विशेष कानून को लाने की माँग की है ताकि उन लोगों को सजा हो सके जो मुस्लिमों के प्रतीकों का अपमान करते हैं, उनकी भावनाओं को आहत करते हैं। यही माँग अन्य संगठनों से भी आई है। यहाँ तक बॉलीवुड अभिनेता नसीरुद्दीन शाह तक ने ये कह दिया कि इस्लामी राज्यों में ईशनिंदा करने पर मौत की सजा मिलती है लेकिन भारत में कोई कार्रवाई तक नहीं हुई। भले ही शाह के इस बयान में प्रत्यक्ष रूप से विशेष कानून या मौत की माँग नहीं की गई लेकिन उनकी भावनाएँ साफ थीं कि आज का मुसलमान तभी ज्यादा खुश हो पाएगा जब देश में अलग से सख्त कानून आएगा जो मुस्लिमों की भावना आहत करने वालों को सजा देगा।

अवलोकन करें:-

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शायद किसी को ये विशेष कानून की माँग गैर-हानिकारक और गैर-जरूरी लग सकती है जिस पर शायद अभी हम ध्यान न दें। लेकिन इस दौरान ये पता होना चाहिए कि ये जो भी हो रहा है वह उन्हीं घटनाओं की पुनरावृत्ति है जिसके कारण भारत टूटा।

इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा लिखी गई इन्हीं किताबों के बदले पंडित चामूपति लाल जो कि महाशय राजपाल के अच्छे दोस्त थे उन्होंने पैगंबर मोहम्मद पर एक व्यंग लिखा और राजपाल से यह वादा लिया कि वो कभी भी इस किताब के लेखक यानी कि उनका नाम किसी को नहीं बताएँगे। शायद वह परिणाम जानते थे। किताब बिन किसी नाम के पब्लिश की गई। लेखक के नाम की जगह लिखा गया- “दूध का दूध, पानी का पानी।”

इस किताब के पब्लिश होने के बाद मुस्लिम समुदाय भड़क उठा। मोहनदास करमचंद गाँधी ने अपनी ‘यंग इंडिया’ में एक तरफा भाईचारे को दर्शाते हुए इस किताब की निंदा की और इस बात को एक सिरे से नजरअंदाज किया गया कि कैसे पहले मुस्लिमों ने हिंदुओं को भड़काया। 1924 में ब्रिटिशों ने इस किताब को बैन कर दिया। किताब के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए के तहत तमाम केस दर्ज हुए। 1927 में महाश्य राजपाल को ये सबूत देख छोड़ दिया गया कि किताब में जो लिखा था वो सब तथ्यों पर आधारित था, इसलिए ये नहीं कह सकते कि इसने दो गुटों में नफरत बढ़ाई। जब इस किताब को लेकर फैसला कोर्ट ने सुनाया तो मुस्लिम भीड़ तिलमिला गई। उन्होंने दंगे शुरू कर दिए और महाश्य राजपाल का सिर तन से जुदा करने की माँग उठाई गई। नारों में बताया गया कि कैसे महाश्य राजपाल की हत्या शरीया में हलाल है।

जैसे ही मुस्लिम भीड़ उपद्रव पर उतरी उसके बाद 295 ए भी भीड़ की भावनाओं के मद्देनजर उसी साल ले आया गया। उससे पहले महाशय राजपाल को मारने की दो कोशिशें हो चुकी थीं। 

6 अप्रैल, 1929 को वो दिन आया जब एक 19 साल के इल्मुद्दीन नामक बढ़ई ने महाश्य राजपाल के सीने में 8 बार चाकू घोंपकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। जिस समय उन्हें मारा गया वो अपनी दुकान के बाहर बैठे हुए थे। इस घटना से पहले कोर्ट कार्रवाई के दौरान उन्हें ऑफर दिया गया था कि पंडित चामुपति लाल का नाम बता दें। हालाँकि उन्होंने ऐसा करने से मना किया और बाद में मुँह बंद रखने की कीमत चुकाई। महाशय राजपाल के साथ जो हुआ वो सिर्फ किताब प्रकाशित करने के कारण हुआ, वो भी तब जब कोर्ट ने उन्हें रिहा कर दिया था और मुस्लिमों को उनकी भावनाओं के लिए एक कानून भी दे दिया गया था।

घटना के कुछ ही समय बाद ही देश का विभाजन हुआ और देश को तोड़ने वाले वो थे जिन्हें लगा था कि वो मुस्लिमों को शांत करवा लेंगे। ‘रंगीला रसूल’ विवाद के बाद हिंदुओं ने खिलाफत आंदोलन देखा, जिसे कॉन्ग्रेस और मोहनदास करमचंद गाँधी द्वारा समर्थन प्राप्त था। हिंदुओं ने मोहम्मद अली जिन्ना जैसे मुस्लिम नेताओं का उदय भी देखा जिनके कारण देश के टुकड़े हुए।

अब देखें तो रंगीला रसूल ने विभाजन की वजह नहीं था, लेकिन इसे पीछे और विभाजन के पीछे एक सामान्य तार जरूर था- मोहम्मद अली जिन्ना। जिन्ना ने ही महाशय राजपाल के हत्यारे की पैरवी कोर्ट में की थी जिनकी तारीफों के कसीदे आज भी वामपंथियों द्वार पढ़े जाते हैं और उनके सम्मान में गीत लिखे जाते है। पाकिस्तान ने तो जिन्ना का गाजी कहकर भी नवाजा था।

देश का विभाजन मजहबी आधार पर हुआ। ये इसलिए नहीं था कि हिंदुओं ने मुस्लिमों की माँगों को स्वीकार नहीं किया था। ये इसलिए था क्योंकि मुसलमानों को लगने लगा था कि वे यहाँ उत्पीड़ित हो रहे हैं। मुस्लिम समुदाय ने एकजुट होकर आवाज उठाई थी कि वे अपने लिए एक राष्ट्र चहते हैं और अब काफिरों के साथ आगे नहीं रह सकते। इस्लामी राष्ट्रवाद के विचार ने जनमानस को मुख्य रूप से प्रभावित किया, जहाँ उम्माह के प्रति मुस्लिमों का झुकाव भारत की ओर से बहुत ज्यादा था। ये कहा जाने लगा कि मुस्लिम लोग अपनी विशिष्ट मजहबी, सांस्कृतिक और राजनीतिक विचारधारा के साथ एक जगह नहीं रह सकते, इसलिए उन्हें एक अलग राज्य चाहिए।

क्या दो राष्ट्र सिद्धांत मुस्लिम समुदाय द्वारा महसूस की जा रही उत्पीड़न और अलगाव की भावना थी, जैसा कि कई वामपंथी इतिहासकारों ने हमें बताया? या इसे वीर सावरकर द्वारा चलाया गया जैसा कि वो दावा करते हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सैयद अहमद खान ने 1876 में कहा था, “मैं ये बात मान चुका हूँ कि हिंदू और मुसलमान कभी भी एक राष्ट्र में नहीं रह सकते क्योंकि इनका मजहब और जीने का तरीका दोनों एक दूसरे अलग है।”  इस कथन के 7 वर्षों बाद सैयद अहमद ने दोबारा अपने बोल दोहराए। उन्होंने कहा, “दोस्तों, भारत में दो महत्वपूर्ण समूह रहते हैं, जिन्हें हिंदुओं और मुसलमान नाम से जाना जाता है। हिंदू या मुसलमान होना आंतरिक विश्वास का मामला है जिसका आपसी संबंधों और बाहरी स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए ऊपर वाले का हिस्सा उसपर छोड़ दें और अपने हिस्से की चिंता करें। भारत हम दोनों का घर है। भारत में लंबे समय से रहने के कारण दोनों का खून बदल चुका है।”

12 साल बाद उन्होंने कहा, “मान लो, अंग्रेजी साम्राज्य और सेना देश छोड़ दे। अपने साथ सबी तोपें, उनके शानदार हथियार और अन्य सभी चीजें लेकर चला जाए तो भारत का शासक कौन होगा? क्या ये संभव है कि इन परिस्थितियों में दो समूह मुसलमान और हिंदू एक सिंहासन पर बैठ सकें और सत्ता में बराबर रहें? निश्चित रूप से नहीं। यह आवश्यक है कि उनमें से कोई एक, दूसरे के ऊपर विजय प्राप्त करे। यह सोचना कि दोनों साथ में रह सकेंगे असंभव और अकल्पनीय है। जब तक एक समूह दूसरे समूह के ऊपर विजय प्राप्त नहीं कर लेता, उसे अपने अधीन नहीं बना लेता तब तक देश में शांति का शासन नहीं होगा।”

जिन्ना ने कहा था, “ये एक ख्वाब ही है कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ राष्ट्र बनाएँगे।” जिन्ना ने महाशय राजपाल के हत्यारे की पैरवी के कुछ सालों बाद ही 1940 में मुस्लिम लीग को संबोधित करते हुए कहा था, “हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग धार्मिक दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाजों और साहित्यिक परंपराओं से जुड़े हैं। वे न तो अंतर्विवाह करते हैं और न ही एक साथ खाते हैं, और वास्तव में वे दो अलग-अलग सभ्यताओं से संबंधित हैं जो मुख्य रूप से परस्पर विरोधी विचारों और धारणाओं पर आधारित हैं।”

महाशय राजपाल की हत्या ही दो राष्ट्र सिद्धांत थी जिसे एक व्यक्ति के खून से विस्तृत रूप से लिखा गया था। मुस्लिम समुदाय वाकई ये मानता था कि हिंदू और मुसलमानों का रहन-सहन इतना अलग है कि वो लोग कभी शांति से एक साथ नहीं रह सकते। रंगीला रसूल के मामले में देखें जिन्होंने हिंदू देवी-देवताओं के विरुद्ध भड़काऊ बातें लिखीं उसे कभी कोई नुकसान नहीं हुआ। जो शुरुआत में नाराजगी थी उसे भी महात्मा गाँधी और बुद्धिजीवियों द्वारा दबा दी गई। ज्यादातर लोग आज भी नहीं जानते हैं कि रंगीला रसूल हिंदू धर्म पर व्यंग्य करने की एक प्रतिक्रिया थी, न कि कोई मुस्लिमों के विरुद्ध नफरत।

वैसी स्थितियों में मुस्लिमों ने खुद सोच लिया कि हिंदुओं का अपमान स्वीकार्य है लेकिन ‘गुस्तान-ए-रसूल की सजा, सिर तन से जुदा’ है चाहे कानून में इसकी इजाजत हो या न हो। मुस्लिम समुदाय  शरीया के मुताबिक जीना चाहते थे फिर चाहे राज्य उन्हें ये अनुमति दे या न दे, उनका इरादा इस इसे छीनना और लागू करके वो करने का था जो होता है- यानी चाकू लेकर महाशय राजपाल की हत्या।

सच्चाई यह है कि जिन्ना ने राजपाल के हत्यारे की पैरवी की थी और ये बताया कि ये कारनामा तो इस्लामी जगत में बहादुरी का प्रमाण है। ये उसी नेता द्वारा किया गया जिसने बाद में मुसलमानों की पाक जमीन तैयार की क्योंकि वो मानते थे काफिरों के लिए मौत की सजा ही जायज है। कोएनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक ‘डीकोलोनाइजिंग द हिंदू माइंड’ में इसका उल्लेख किया है।

आज जब नुपूर शर्मा मामले में दोबारा भावनाओं को आहत होने से बचाने के लिए विशेष कानून की माँग की जा रही है तो हमें इतिहास से सबक लेना होगा।

नुपूर शर्मा ने न केवल देश के कट्टरपंथियों की बल्कि कई इस्लामी देशों की नींव हिला कर रख दी है। उन्होंने जो टिप्पणी की वो लगातार ज्ञानवापी के शिवलिंग का मजाक उड़ता देखने के बाद की। कई मौलानाओं ने शिवलिंग को लेकर कहा था कि हिंदू लिंग की पूजा क्यों करते हैं। कुछ ने सड़क में खड़े किसी भी ढाँचे को शिवलिंग से जोड़ उसका अपमान किया और हिंदू धर्म को एक बर्बर पंथ के रूप में प्रदर्शित करने का प्रयास किया। ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि हिंदू अपना धार्मिक स्थल वापस चाहते हैं जिन्हें मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तोड़ा। रंगीला रसूल मामले की तरह लगता है कि हिंदू समुदाय पर हुए शुरुआती हमले फिर भुला दिए गए थे। हालाँकि नुपूर शर्मा की टिप्पणी ने इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। जगह जगह गुस्ताख ए रसूल की एक सजा सिर तन से जुदा बोला जाने लगा, नुपूर के पुतले लगाए गए, उन्हें बीच रास्ते में फाँसी पर लटका दिखाया गया आदि।

ये सड़कों पर उतरती भीड़ बिलकुल वैसी है जैसी रंगीला रसूल का पहला संस्करण देख उतरी थी। ये लोग सच में मानते हैं कि देश का कानून जो काफिरों के राज्य में काफिरों ने बनाया है उससे बड़ा शरीया है।

यदि रंगीला रसूल विवाद और महाशय राजपाल की हत्या टू नेशन थ्योरी का एक एक्शन थी, तो नूपुर शर्मा की घटना इसका एक्शन रीप्ले है।

कम्युनिज्म के जनक माने जाने वाले कार्ल मार्क्स ने सन् 1854 कुरान और इससे निकलने वाले ‘मुस्लिम कानून’ के विषय में कहा था, “ये लोगों के नस्ल और भूगोल को स्पष्ट शब्दों में सिर्फ दो वर्गों में विभाजित कर देता है – इस्लाम में विश्वास रखने वाले, अर्थात मुस्लिम और दूसरा काफिर। काफिर, मतलब उनका दुश्मन। इस्लाम ‘काफिर’ के विषय में जो सिद्धांत देता है, उससे मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों के बीच अनंत काल तक दुश्मनी की व्यवस्था बनी रहेगी।”

उस समय में मोहनदास करमचंद गाँधी ने महाशय राजपाल की निंदा की लेकिन उपद्रवी भीड़ की नहीं। इसके बाद गाँधी ने मोपला मुसलमानों को सराहा और खिलाफत को समर्थन देकर हिंदुओं को उनके ही नरसंहार का जिम्मेदार ठहरा दिया। उस समय भी हमने देखा था कि इस्लामवादियों की भावना के मद्देनजर कैसे कानून ले आया गया।

आज हम लिबरलों को कट्टरपंथी भीड़ की निंदा करने की बजाय नुपूर शर्मा की निंदा करते देखते हैं। हमारे पास ऐसे राजनेता हैं जो नुपूर शर्मा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं ताकि इस्लामी देशों से उनके संबंध न खराब हों जिसके बाद मुस्लिम भीड़ सड़कों पर आती है और जुमा नमाज के बाद दंगे करती है। आज हमारे पास वो लोग हैं जो इस्लामी कट्टरपंथ के अस्तित्व को नकारते हैं जिससे भारत जूझ रहा है और दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों को मुस्लिमों के विरुद्ध रची गई साजिश बताते हैं। आज हमें कट्टरपंथी भावना को दूर भगाने के लिए विशेष कानून की जरूरत लगती है।

भारत एक बहुत संवेदनशील मुकाम पर खड़ा है। हमने पहले भी दो राष्ट्र सिद्धांत के एक्शन में होने को नकारा था और आँख मूंदे रहना चुना था और अगर आज भी हम दोबारा भाईचारे, बहुलवाद, समकालिक संस्कृति जैसे शब्दों पर विचार को केंद्रित करके गलती दोहराना चुनते हैं तो वो समय दूर नहीं जब दोबारा से माँ भारती पर खतरा मंडराएगा। एक समय आएगा जब हम सोचेंगे कि काश हम भारत के पहले विभाजत से सीख ले लेते – और उस दिन हम अपने बच्चों की ओर देखेंगे और उन्हें ये समझाना कठिन होगा कि हमने उस चीज के लिए कुछ भी क्यों नहीं किया जिसे हम रोक सकते थे।

(साभार : आर्टिकल ऑपइंडिया की चीफ एडिटर नुपूर शर्मा के मूल लेख पर आधारित है।)