सफिया (बाएँ) की यह लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच चुकी है
कहते है 'ज्यादा होशियारी हमेशा नुकसानदेय ही होती है', मतलब नूपुर शर्मा के दिए जवाब को इस्लाम के विरुद्ध बताना मुस्लिम कट्टरपंथियों को इतना भारी पड़ेगा, उन्होंने कभी सोंचा नहीं होगा। सोशल मीडिया पर बहुचर्चित Jaipur Dialogue, Sach, Face To Face आदि कई चैनलों पर नूपुर के समर्थन उतरे Ex-Muslim द्वारा उन इस्लामिक विद्वानों, मौलानाओं और मौलवियों को उनके सामने पस्त देखा, जिन्हे मुसलमान अपना रहनुमा मानते हैं। AC कमरों बैठे होने के बाद भी उन्हें पसीना पोंछते देखा।
इन चर्चाओं को सुन लगता है कि जिस दिन Ex-Muslims बहुसंख्यक हो गए कोई मौलाना, मौलवी या फिर कोई इस्लामिक विद्वान फालतू बोलने की हिम्मत नहीं कर पाएगा। यह भी शंका व्यक्त की जा रही है कि कई इस्लामिक रस्मों(कुरीतियां) पर चल रही गलत फ़हमियों का भी हल निकलेगा। जो हिन्दू-मुस्लिम के बीच बनी दीवार को भी तोड़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट में इस्लामी कानून के हिसाब से विरासत को चुनौती देने वाली सफिया ने महिलाओं के अधिकारों के कई सवाल पूछे हैं। सफिया अपनी बेटी को अपनी पूरी सम्पत्ति देना चाहती हैं लेकिन शरिया उन्हें यह करने की इजाजत नहीं दे रहा है।
सफिया ने अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रास्ता अख्तियार किया है। उनका कहना है कि वह इस्लाम को छोड़ चुकी हैं, ऐसे में उनके निजी मामले संविधान के हिसाब से तय होने चाहिए, ना कि शरिया से।
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस याचिका को लेकर केंद्र सरकार से जवाब माँगा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है। केंद्र सरकार को इस विषय में 4 सप्ताह के भीतर अपना जवाब कोर्ट के सामने रखना होगा।
इस मामले की सुनवाई मई माह में अब होगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे एक गंभीर मामला बताया है। वहीं सफिया ने इस बीच महत्वपूर्ण प्रश्न इस्लाम और उसके विरासत को लेकर नियमों पर उठाए हैं।
केरल के अलप्पुझा की रहने वाली सफिया पी एम जन्म से मुस्लिम थीं। लेकिन उन्होंने कुछ वर्षों पहले इस्लाम छोड़ दिया था और ‘एक्स मुस्लिम ऑफ़ केरल’ नाम के एक संगठन की सदस्यता ले ली थी। सफिया का कहना है कि वह इस्लाम में अब विश्वास नहीं रखतीं।
सफिया के पिता भी एक कम्युनिस्ट हैं। सफिया का तलाक हो चुका है। उनके एक 25 वर्ष की बेटी है। सफिया का कहना है कि चाहते हुए भी उनके पिता सम्पत्ति का 50% सफिया को नहीं दे सकते क्योंकि शरिया में मात्र 33% हिस्सा ही बेटी को दिया जा सकता है।
सफिया का कहना है कि वह जब इस्लाम में विश्वास नहीं रखती तो उनके विरासत के मामले क्यों इससे तय किए जाए। उनका कहना है कि इसी शरिया के चलते वह अपनी बेटी को भी अपनी पूरी सम्पत्ति नहीं दे सकतीं।
इस बात को लेकर भी सफिया ने प्रश्न उठाए हैं कि क्यों सम्पत्ति का बाकी हिस्सा रिश्तेदारों को दिया जाना चाहिए, जबकि कोई ऐसा ना करना चाहता हो। सफिया का कहना है कि इस्लाम छोड़ने के बाद तो किसी को सम्पत्ति का कोई हिस्सा ही नहीं मिल सकता।
उन्होंने मीडिया से कहा, “मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण है और यह संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। जिस व्यक्ति ने मजहब त्याग दिया है, उसके उत्तराधिकार के मामले भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से तय हों।”
सफिया ने समान नागरिक संहिता (UCC) का भी समर्थन किया है। सफिया ने कहा कि अगर इस कानून से महिलाओं के अधिकार सुरक्षित होते हैं तो वह इसकी पूरी तौर से समर्थक हैं। सफिया के इस मामले ने शरिया कानून की बंदिशों को एक बार फिर सामने ला दिया है।
