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राष्ट्रवाद का दम भरने वाली बीजेपी और शिवसेना की मौजूदगी में सना मलिक ने महाराष्ट्र विधानसभा में गूंज दिया ‘भारत में शरिया कानून और बहुविवाह…’ और ‘पाकिस्तान प्रेम’

       नवाब मलिक की बेटी सना मलिक ने भारत में शरिया कानून लागू करने की माँग की (फोटो साभार : Loksatta)
ये महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश के लिए डूब मरने की बात है जब अपने आपको राष्ट्रवादी बताने वाली बीजेपी और शिवसेना की मौजूदगी में विधायक सना मलिक ने शरिया, तीन तलाक और बहुविवाह की बात करते पाकिस्तान का उदाहरण दे दिया। सब चुप लेकिन अगर यही बात कांग्रेस या INDI गठबंधन के किसी विधायक ने बोल दी होती विधानसभा से लेकर सड़क तक हंगामा हो रहा होता। लेकिन यह मिसाल दी अजित पवार गुट की NCP की विधायक ने। क्या राष्ट्रवादी मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री में सना के विरुद्ध कार्यवाही करने की हिम्मत है? एक मुस्लिम महिला पत्रकार की बात याद आ जाती कि जब पूछा कि "गैर-मर्द के हमबिस्तर होने पर औरत पाक कैसे हो जाती है?" जवाब मिला "हलाला हमारा होता है और दर्द दूसरों को होता है।"      
महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र में NCP (अजीत पवार गुट) की विधायक सना मलिक के एक बयान पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने सदन में चर्चा के दौरान भारत में भी कुरान पर आधारित कानून लागू करने की माँग की। सना मलिक ने तीन तलाक और बहुविवाह (पॉलिगेमी) का जिक्र करते हुए पाकिस्तान का उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि जब पाकिस्तान कुरान के नियमों को अपना कानून बना सकता है, तो भारत को भी ऐसा ही करना चाहिए। उनके इस बयान के बाद बीजेपी विधायकों ने सदन में जमकर हंगामा किया और सोशल मीडिया पर भी इसका विरोध हो रहा है।

कौन हैं सना मलिक? अब्बू का सियासी बैकग्राउंड

सना मलिक महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया और चर्चित चेहरा हैं। वह मुंबई के अणुशक्ति नगर विधानसभा क्षेत्र से साल 2024 में पहली बार विधायक चुनी गई हैं। सना मलिक वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व मंत्री नवाब मलिक की बेटी हैं। नवाब मलिक मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, जो बाद में मुंबई आकर राजनीति में सक्रिय हुए।

राजनीति में कदम रखने से पहले सना मलिक एक आर्किटेक्ट और वकील के तौर पर काम कर चुकी हैं। साल 2024 के चुनाव में नवाब मलिक ने अपनी सीट से बेटी सना को उम्मीदवार बनाया था। सना अपनी पार्टी में अल्पसंख्यक और मुस्लिम महिलाओं के मुद्दों पर काफी आक्रामक रुख रखती हैं।

विधानसभा में क्यों शुरू हुई बहुविवाह और तीन तलाक पर बहस?

विधानसभा सत्र के दौरान BJP विधायक देवयानी फरांडे ने तीन तलाक कानून को सख्ती से लागू करने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने सदन को बताया कि पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को आज भी प्रताड़ित किया जा रहा है। देवयानी ने इसके लिए पाकिस्तान का उदाहरण दिया था।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में दूसरे निकाह के लिए पहली बीवी की लिखित अनुमति और एक काउंसिल की मंजूरी जरूरी है। इसी सख्त नियम के कारण पाकिस्तान में बहुविवाह की दर सिर्फ एक प्रतिशत है। उन्होंने महाराष्ट्र में भी ऐसे ही कड़े कानून और समान नागरिक संहिता (UCC) लाने की माँग की।

सना मलिक का विवादित तर्क और ‘पाकिस्तानी प्रेम’

BJP विधायक के बयान पर पलटवार करते हुए सना मलिक ने आक्रामक रुख अपना लिया। उन्होंने दलील दी कि बहुविवाह सिर्फ मुस्लिम समाज में नहीं होता, बल्कि हर धर्म में है। सना मलिक ने कहा कि पाकिस्तान ने कुछ नया नहीं किया, उसने सिर्फ कुरान में लिखे मुस्लिम पर्सनल लॉ को ही कानून का रूप दिया है।

सना मलिक ने आगे कहा, “हम इस्लाम में कुरान की शिक्षाओं को मानते हैं। अगर पाकिस्तान इसे लागू कर सकता है, तो भारत को भी कुरान पर आधारित कानून लाना चाहिए, हम इसकी माँग करते हैं।” उनके इस बयान को लोगों ने हिंदुओं और भारतीय व्यवस्था के खिलाफ एक कट्टरपंथी सोच माना।

BJP का करारा पलटवार: ‘देश संविधान से चलेगा, शरिया से नहीं’

सना मलिक के इस बयान पर BJP विधायक अतुल भातखलकर ने सदन में तीखी आपत्ति जताई। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा कि यह देश केवल भारत के संविधान से चलता है, किसी मजहबी ग्रंथ या कुरान से नहीं। उन्होंने साफ किया कि सदन में पाकिस्तान और शरिया की वकालत करने की कोई जरूरत नहीं है।

वहीं, महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने भी सना मलिक को सीधे जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी कानून किसी धर्मग्रंथ के आधार पर नहीं बनता। कानून समाज में हो रहे अन्याय को रोकने के लिए बनता है, किसी धर्म को निशाना बनाने के लिए नहीं।

नितेश राणे की दो टूक: ‘शरिया चाहिए तो पाकिस्तान चले जाओ’

इस विवाद के बाद महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और BJP नेता नितेश राणे ने सना मलिक पर बेहद तीखा हमला बोला। नितेश राणे ने कहा कि सना मलिक शायद भूल गई हैं कि वह एक हिंदू बहुसंख्यक देश में बैठी हैं। वह भारत की विधायक हैं, पाकिस्तान की संसद में नहीं बैठी हैं।

नितेश राणे ने साफ कहा कि हमारे देश के संविधान में ही समान नागरिक संहिता (UCC) का जिक्र है। जो लोग संविधान की दुहाई देते हैं, वे ही आज धर्म के नाम पर इसका विरोध कर रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर किसी को भारत का कानून पसंद नहीं है और शरिया कानून ही चाहिए, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देकर पाकिस्तान चले जाना चाहिए।

चौतरफा घिरने के बाद सना मलिक ने दी सफाई

चारों तरफ से घिरने और सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल होने के बाद सना मलिक ने अपने बयान पर सफाई जारी की है। सना मलिक ने दावा किया कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। सना ने कहा कि वह पाकिस्तान को कोई आदर्श नहीं मानती हैं।

उन्होंने सिर्फ देवयानी फरांडे के पाकिस्तान वाले संदर्भ पर जवाब दिया था। सना ने कहा कि भारतीय मुसलमान होने के नाते उनका पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं है। भारत का संविधान उन्हें अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है और उन्होंने केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बात रखी थी।

एक्स मुस्लिम पहुँची सुप्रीम कोर्ट : जिसने छोड़ दिया इस्लाम, उस पर भी शरिया कानून क्यों?

                                             सफिया (बाएँ) की यह लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच चुकी है
कहते है 'ज्यादा होशियारी हमेशा नुकसानदेय ही होती है', मतलब नूपुर शर्मा के दिए जवाब को इस्लाम के विरुद्ध बताना मुस्लिम कट्टरपंथियों को इतना भारी पड़ेगा, उन्होंने कभी सोंचा नहीं होगा। सोशल मीडिया पर बहुचर्चित Jaipur Dialogue, Sach, Face To Face आदि कई चैनलों पर नूपुर के समर्थन उतरे Ex-Muslim द्वारा उन इस्लामिक विद्वानों, मौलानाओं और मौलवियों को उनके सामने पस्त देखा, जिन्हे मुसलमान अपना रहनुमा मानते हैं। AC कमरों बैठे होने के बाद भी उन्हें पसीना पोंछते देखा। 

इन चर्चाओं को सुन लगता है कि जिस दिन Ex-Muslims बहुसंख्यक हो गए कोई मौलाना, मौलवी या फिर कोई इस्लामिक विद्वान फालतू बोलने की हिम्मत नहीं कर पाएगा। यह भी शंका व्यक्त की जा रही है कि कई इस्लामिक रस्मों(कुरीतियां) पर चल रही गलत फ़हमियों का भी हल निकलेगा। जो हिन्दू-मुस्लिम के बीच बनी दीवार को भी तोड़ेगी।       

सुप्रीम कोर्ट में इस्लामी कानून के हिसाब से विरासत को चुनौती देने वाली सफिया ने महिलाओं के अधिकारों के कई सवाल पूछे हैं। सफिया अपनी बेटी को अपनी पूरी सम्पत्ति देना चाहती हैं लेकिन शरिया उन्हें यह करने की इजाजत नहीं दे रहा है।

सफिया ने अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रास्ता अख्तियार किया है। उनका कहना है कि वह इस्लाम को छोड़ चुकी हैं, ऐसे में उनके निजी मामले संविधान के हिसाब से तय होने चाहिए, ना कि शरिया से।

सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस याचिका को लेकर केंद्र सरकार से जवाब माँगा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है। केंद्र सरकार को इस विषय में 4 सप्ताह के भीतर अपना जवाब कोर्ट के सामने रखना होगा।

इस मामले की सुनवाई मई माह में अब होगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे एक गंभीर मामला बताया है। वहीं सफिया ने इस बीच महत्वपूर्ण प्रश्न इस्लाम और उसके विरासत को लेकर नियमों पर उठाए हैं।

केरल के अलप्पुझा की रहने वाली सफिया पी एम जन्म से मुस्लिम थीं। लेकिन उन्होंने कुछ वर्षों पहले इस्लाम छोड़ दिया था और ‘एक्स मुस्लिम ऑफ़ केरल’ नाम के एक संगठन की सदस्यता ले ली थी। सफिया का कहना है कि वह इस्लाम में अब विश्वास नहीं रखतीं।

सफिया के पिता भी एक कम्युनिस्ट हैं। सफिया का तलाक हो चुका है। उनके एक 25 वर्ष की बेटी है। सफिया का कहना है कि चाहते हुए भी उनके पिता सम्पत्ति का 50% सफिया को नहीं दे सकते क्योंकि शरिया में मात्र 33% हिस्सा ही बेटी को दिया जा सकता है।

सफिया का कहना है कि वह जब इस्लाम में विश्वास नहीं रखती तो उनके विरासत के मामले क्यों इससे तय किए जाए। उनका कहना है कि इसी शरिया के चलते वह अपनी बेटी को भी अपनी पूरी सम्पत्ति नहीं दे सकतीं।

इस बात को लेकर भी सफिया ने प्रश्न उठाए हैं कि क्यों सम्पत्ति का बाकी हिस्सा रिश्तेदारों को दिया जाना चाहिए, जबकि कोई ऐसा ना करना चाहता हो। सफिया का कहना है कि इस्लाम छोड़ने के बाद तो किसी को सम्पत्ति का कोई हिस्सा ही नहीं मिल सकता।

उन्होंने मीडिया से कहा, “मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण है और यह संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। जिस व्यक्ति ने मजहब त्याग दिया है, उसके उत्तराधिकार के मामले भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से तय हों।”

सफिया ने समान नागरिक संहिता (UCC) का भी समर्थन किया है। सफिया ने कहा कि अगर इस कानून से महिलाओं के अधिकार सुरक्षित होते हैं तो वह इसकी पूरी तौर से समर्थक हैं। सफिया के इस मामले ने शरिया कानून की बंदिशों को एक बार फिर सामने ला दिया है।

मजहबी आतंक खतरनाक… MP हाई कोर्ट ने ISIS आतंकी मोहम्मद शाहिद को जमानत देने से किया इनकार: जिहाद से भारत में शरीयत लागू करने का सपना, हिन्दू देवी-देवताओं का करता था अपमान

2024 लोकसभा चुनावों में मोदी विरोधियों ने जहर परोसा कि 'मोदी सरकार संविधान बदल देगी' जिसे महामूर्ख जनता ने सच्चाई को जाने बिना सच मान लिया। हकीकत यही है कि संविधान बदलने का समय आ गया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आतंकी को जमानत से इंकार करने पर जो कहा उसे हर हिन्दू को अपना दिल और दिमाग खोलकर कटु सच्चाई को समझ अपनी वोट की ताकत से मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों को धूल चटानी होगी। 

संविधान क्यों बदलने की जरूरत है? क्योकि आज जिस संविधान को विपक्ष लिए घूम रहा है वह संविधान निर्माताओं द्वारा लिखित संविधान नहीं है। मुस्लिम वोट बैंक पर अपनी तिजोरियां भरने और कुर्सी की खातिर शरीयत को बढ़ावा देने संशोधन कर हिन्दुओं को मूर्ख बनाया गया। 

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि मजहबी आतंक खतरनाक और त्रासद है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ एक ISIS आतंकी को जमानत देने से इनकार करते हुए की हैं। आतंकी अपने साथियों के साथ भारत समेत पूरी दुनिया में शरिया का राज लाना चाहता था। वह हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के मिशन में जुट गया था। वह इस्लामी आतंकी संगठन ISIS और जाकिर नाइक से प्रभावित था। वह जबलपुर की हथियार फैक्ट्री पर हमला करके देश में इस्लामी कानून लागू करना चाहता था। उसने हिन्दू देवी-देवताओं का भी अपमान किया।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “मजहबी आतंकवाद एक त्रासद और खतरनाक सोच है जो मजहब की सच्ची शिक्षाओं को विकृत करती है और लोगों तथा समाज को भारी नुकसान पहुँचाती है। मजहबी आतंकवाद की जड़ें गहरी और जटिल हैं, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी धर्म असल रूप में हिंसा या आतंक का समर्थन नहीं करता।” हाई कोर्ट ने कहा कि हम उस आदमी के प्रति कोई दया नहीं दिखा सकते जिस पर आतंक के गंभीर आरोप हैं।

जमानत ना पाने वाले इस ISIS आतंकी का नाम मोहम्मद शाहिद खान है। उसे NIA ने मई, 2023 में पकड़ा था। मोहम्मद शाहिद खान ने NIA की गिरफ़्तारी से जमानत के लिए कोर्ट का रास्ता अख्तियार किया था। लेकिन यहाँ से उसकी जमानत याचिका खारिज हो गई थी। इसके बाद वह मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुँचा था। यहाँ पर उसने दलील दी कि उसे इस केस में फंसाया गया है और उन लोगों ने कोई अपराध नहीं किया है। हालाँकि, NIA ने उसका सारा कच्चा चिट्ठा कोर्ट के सामने रख दिया।

NIA ने उसके साथ 2 और आतंकी आदिल खान और सैयद मामूर अली पकड़े थे। बाद में अगस्त, 2023 में उनका एक और साथी मोहम्मद काशिफ खान पकड़ा गया था। NIA ने अपनी जाँच में पाया कि यह सभी 2020 के कोविड लॉकडाउन के दौरान जाकिर नाइक को देखते थे। इसके बाद इन्होने जिहाद और ISIS के आतंक के बाद बारे में पढ़ना चालू किया। इन चारों ने यह ठान लिया कि भारत में दुनिया में शरीयत का राज और इस्लामी कानून लाना है। इन लोगों ने हिन्दुओं को इस्लाम में धर्मांतरित होने के लिए भी उकसाया।

इसके अलावा यह चारों अपनी ISIS वाली विचारधारा के प्रसार के लिए एक मस्जिद के बाहर पर्चे भी बाँटते रहे। उन्होंने ISIS और अल कायदा के झंडे वाले पर्चे भी बाँटे। इसके अलावा इन्होने एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया जाता था। इसमें ISIS से सम्बन्धित सामग्री शेयर होती थी। पूरी तरह से आतंकी सोच में पड़ने के बाद इन चारों ने आतंक के जरिए भारत में इस्लामी राज कायम करने का प्लान बनाया। इस काम के लिए हथियार जुटाने को उन्होंने जबलपुर हथियार फैक्ट्री पर हमले की योजना बनाई थी।

इन चारों का प्लान था कि यह जबलपुर फैक्ट्री में ब्लास्ट करेंगे और वहाँ से बड़ी मात्रा में हथियार लूटेंगे। इसके लिए उन्होंने विस्फोटक भी जुटाने चालू कर दिए थे। इस मामले में NIA ने घटना से पहले ही इन्हें गिरफ्तार कर लिया था और इनके मॉड्यूल का भंडाफोड़ कर दिया।

ममता बनर्जी के MLA के सीने में धधक रहा ‘मुस्लिम राष्ट्र’, वही हर ताजेमुल के सीने में तालिबानी राज


पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर स्थित चोपरा में एक महिला और एक पुरुष की सरेआम पिटाई की गई। वहाँ एक बड़ी भीड़ जमा दी, जब ‘त्वरित न्याय’ हो रहा था तब चारों तरफ से देख रही भीड़ इसके मजे ले रही थी। ताजेमुल नाम का ‘न्यायाधीश’ हाथ में डंडा लेकर ‘न्याय’ कर रहा था। वीडियो वायरल होने के बाद देश भर में इसकी कितनी भी निंदा हुई हो, स्थानीय TMC विधायक हमीदुल रहमान ने ‘इस्लामी मुल्क के अचार-विचार’ का हवाला देते हुए इस घटना का बचाव किया और पीड़िता को ही ‘दुष्ट जानवर’ बता दिया।

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल CV आनंद बोस ने इस मामले पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से रिपोर्ट तलब की है। उन्होने इसे एक बर्बर घटना करार दिया है। हिम्मत देखिए कि सत्ताधारी दल के विधायक को इस तक का भरोसा था कि उक्त महिला या उसके परिजन इस मामले में पुलिस तक नहीं जाएँगे, उन्होंने कह दिया कि सिर्फ मीडिया हल्ला मचा रहा है। इसका अर्थ है कि शरिया के अंतर्गत होने वाले इस न्याय से पीड़ित भी ‘संतुष्ट’ हैं, इसमें प्रशासन-न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

शरिया के सामने सरकार-कानून की कोई हैसियत नहीं

इसका दूसरा मतलब ये भी समझिए कि शरिया के कारण सब कोई खौफ में रहें और मुस्लिमों के लिए भारत सरकार, यहाँ की पुलिस या अदालतें सब ‘बाहरी ताकतें’ हैं। ताजेमुल पहले भी इस तरह के ‘न्याय’ कर चुका है। वीडियो में देखा जा सकता है कि उसने हाथ में बाँस से बनी छड़ी ले रखी है। उक्त महिला और पुरुष प्रेम संबंध में थे, इसीलिए उन्हें ये ‘सज़ा’ दी गई। ताजेमुल हक़ को गिरफ्तार कर के इस्लामपुर में ACJM की अदालत में पेश किया गया।

सचमुच पीड़िता की तरफ से कोई मामला नहीं दर्ज कराया गया, वीडियो देश भर में वायरल होने के बाद पुलिस ने ही स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज की। वैसे भी चुनावी हिंसा से पीड़ित भाजपा कार्यकर्ताओं की शिकायतों के साथ पुलिस क्या करती है, ये सबको पता है। उल्टे पीड़ित कार्यकर्ताओं को डराया-धमकाया जाता है, अतः उन्हें पलायन को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में पश्चिम बंगाल में इस्लामी ताकतों के खिलाफ FIR दर्ज कराने वालों को छोड़ दिया जाता, ये शायद ही संभव हो।

भाजपा भी कह रही है कि जंगलराज कैसा होता है, ये हम पश्चिम बंगाल में देख सकते हैं। पार्टी का कहना है कि ताजेमुल हक़ उर्फ़ JCB संविधान को टुकड़े-टुकड़े कर रहा है। ऐसे समय में जब कॉन्ग्रेस और I.N.D.I. गठबंधन ने पूरा का पूरा चुनाव ही संविधान बचाने के नाम पर लड़ा हो, पश्चिम बंगाल में भारत के कानून को धता बता कर शरिया के तहत ‘सज़ा’ दिए जाने वाली घटना पर विपक्षी नेताओं की चुप्पी समझ में आती है। अगर वो कुछ बोलेंगे तो पता चल जाएगा कि कौन संविधान बदल रहा है।

सीरिया से लेकर तमिलनाडु तक, शरिया से शासन नई बात नहीं

ऐसा नहीं है कि शरिया अदालतों के उदाहरण हमारे पास नहीं हैं। हमने सीरिया में ISIS को देखा है कि वो कैसे अमेरिकी बंदियों को घुटने के बल बिठा कर उनका गला काट डालते हैं। हमने अफगानिस्तान में तालिबानियों को देखा है कि कैसे वो महिलाओं पर सरेआम कोड़े बरसाते हैं। हमने पाकिस्तान में देखा है कि कैसे ईशनिंदा के नाम पर किसी शख्स को ज़िंदा जला दिया जाता है। हमने बांग्लादेश में देखा है कैसे दुर्गा पूजा के पंडालों को ध्वस्त करते हुए भीड़ ‘काफिरों को सज़ा’ देने के लिए निकल पड़ती है।
और विदेश से उदाहरण क्यों लें? संविधान तो हमारे देश में भी बदला जा रहा है, शरिया चल रही है बहुत जगह। तमिलनाडु के तिरुचिरपल्ली स्थित श्रीरंगम के तिरुचेंदुराई में तो पूरे के पूरे गाँव पर ही वक्फ बोर्ड ने दावा कर दिया। गाँव में मंदिर भी था, उसको भी वो अपनी संपत्ति बताने लगे। कावेरी नदी के तट पर स्थित 1500 वर्ष पुराना सुंदरेश्वर मंदिर भी उनका हो गया, जिनका मजहब ही उतना पुराना नहीं है। सोचिए, कानून का ये लोग किस तरह दुरूपयोग करते हैं।
एक हिन्दू बेचारा जब अपनी जमीन बेचने चला तो प्रशासन से उसे एक नई बात पता चली – उसकी पूरी की पूरी 1.20 एकड़ जमीन वक्फ बोर्ड की है। उसे 20 पन्नों का दस्तावेज थमा दिया गया। तमिलनाडु का ही एक और उदाहरण लीजिए। पेरम्बलूर स्थित V कलाथुर गाँव में मुस्लिमों ने ‘अपने एरिया’ में हिन्दू शोभा यात्राओं पर ही प्रतिबंध लगा दिया। जहाँ वो बस गए, वो ‘उनका इलाका’ हो गया। वर्षों से ये वार्षिक त्योहार चला आ रहा था, लेकिन 2012 से मुस्लिमों को इससे आपत्ति हो गई और इसे बंद करा दिया गया।
मद्रास हाईकोर्ट को कहना पड़ा कि किसी खास क्षेत्र में कोई खास मजहब बहुलता में है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि दूसरे धर्मों को अपना त्योहार न बनाने दिया जाए या शोभा यात्रा न निकालने दिया जाए। उच्च न्यायालय को धार्मिक असहिष्णुता की बात करनी पड़ी। क्या आपने कभी ये खबर सुना है कि किसी हिन्दू बहुल इलाके में ईद, गुरुपर्व या क्रिसमस मनाने से रोका गया हो? आखिर एक ही वर्ग को बार-बार सहिष्णुता का पाठ क्यों पढ़ाना पड़ता है, जब नैरेटिव बनाया जाता है एकदम इसका उलटा।

इतिहास में भी शरिया के कारण हुआ हिन्दुओं का नरसंहार

ऐसा आज से नहीं हो रहा है भारत में भी, यानी ये कोई नई बात नहीं है। आपको केरल में मोपला मुस्लिमों द्वारा बड़े पैमाने पर हिन्दुओं के नरसंहार वाला इतिहास पता होगा। ये हिन्दू समृद्ध थे, लेकिन उनका कत्लेआम हुआ, उनकी बहन-बेटियों का बलात्कार हुआ। उस दौरान केरल में ‘खिलाफत आंदोलन’ का एक नेता था वरियाकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी नाम का, जिसे स्वतंत्रता संग्राम का नायक बता कर पेश किया गया। जबकि वो शरिया कोर्ट चलाता था, कई गाँवों में इस्लामी नियम-कानून चलाता था।
यानी मोपला से लेकर चोपरा, तक – सोच वही है, समूह वही है और परिणाम वही हैं। ये वही पश्चिम बंगाल हैं, जहाँ की लगभग एक तिहाई जनसंख्या मुस्लिम हो चुकी है। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ बांग्लादेश और म्यांमार से बड़ी संख्या में घुसपैठिए लेकर बसाए जा रहे हैं। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ एक महिला विदेशी घुसपैठिया होने के बावजूद सरपंच बन जाती है। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ की सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते हैं।
ज़्यादा पीछे न जाएँ तो ये वही पश्चिम बंगाल है जहाँ बसीरहाट के संदेशखाली में शाहजहाँ शेख नाम का सत्ताधारी पार्टी का गुंडा अपने गुर्गों के साथ जनजातीय समाज की महिलाओं का यौन शोषण करता था। ये सब TMC के दफ्तर में किया जाता था। शाहजहाँ शेख का नाम राशन घोटाले में भी आया था, उसे गिरफ्तार करने गई ED टीम पर ही हमला कर के उसे भगा दिया गया। यही तो है ‘शरिया अदालत’, जहाँ पुलिस-प्रशासन या जाँच एजेंसियों का कोई काम नहीं।
और ज़्यादा पीछे भी चल ही लेते हैं। ये वही बंगाल है जिसका विभाजन ही मजहबी हिंसा की नींव पर हुआ था। 1946 के ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ में 10,000 से अधिक हिन्दुओं को मौत के मुँह में भेज दिया गया था। उस समय भी दंगाइयों को ‘मुस्लिम लीग’ के मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी का समर्थन प्राप्त था। चूँकि तब बंगाल में 54% मुस्लिम थे और 44% हिन्दू, बहुमत में आकर वो क्यों भला अपना अलग मुल्क न बनाएँ, ये तो उनके खून में है। मार-काट कर उन्होंने अपना एक अलग मुल्क ले लिया।
16-19 अगस्त, 1946 के ये दिन कलकत्ता के लिए कत्ल के दिन थे। 16 अगस्त को ही ‘मुस्लिम लीग’ ने पाकिस्तान के गठन के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान किया था। सुहरावर्दी पर आरोप लगा कि लालबाजार पुलिस थाने में जाकर उसने खुद ये सुनिश्चित किया कि दंगाइयों पर कार्रवाई न हो, पुलिस भी हिन्दुओं के खिलाफ हो। गोपाल पाठा जैसे वीर अगर उस वक्त इन दंगों के खिलाफ खड़े न होते और हिन्दुओं को प्रेरित न करते तो शायद आज बंगाल हिन्दूविहीन हो जाता।

माँ काली की भूमि को संतों ने सींचा, आज रामनवमी मनाना भी दूभर

थोड़ा और पीछे चलें, ताकि हम समझें कि पश्चिम बंगाल क्या से क्या हो गया। माँ काली की ये वही भूमि है जहाँ रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकाकंद का जन्म हुआ। ये वही भूमि है जहाँ 16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु जैसे महान कृष्णभक्त का जन्म हुआ। श्री अरविन्द ने अपने हिन्दू दर्शन से जिस भूमि को समृद्ध किया, लाहिरी महाशय के चमत्कारों की चर्चा जहाँ गूँजी, जहाँ हरिचंद ठाकुर ने भेदभाव मिटाया, जहाँ स्वामी प्रणवानन्द जैसे योगी की कर्मभूमि रही।
आज स्थिति अलग है। घुसपैठ और हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल में आज रामनवमी जैसा त्योहार शांति से नहीं मनाया जा सकता। 2018 में रानीगंज, 2019 में आसनसोल, 2022 में शिवपुर और 2023 में हावड़ा के अलावा इस साल शक्तिपुर क्षेत्र में दंगे हुए। यानी, हिन्दू अपना त्योहार तक ठीक से नहीं बना सकते। शायद पश्चिम बंगाल में स्थिति अभी और भयंकर होने वाली है। हमीदुल रहमान जैसे लोग सत्ता में रहे तो कई ताजेमुल पैदा हो जाएँगे।
और भारत में जहाँ संविधान है, कानून है, यहाँ की पुलिस है, केंद्र-राज्य की सरकारें हैं और न्यायपालिका है – लेकिन इन सबके बावजूद वहाँ के विधायक बात करते हैं ‘इस्लामी मुल्क के अचार-विचार’ की बात करते हैं तो ये सवाल पूछा ही जाएगा कि क्या पश्चिम बंगाल इस्लामी मुल्क है? या फिर सत्ता में बैठे मुस्लिम ही एक और विभाजन का सपना देख रहे हैं। हर जगह इनकी सोच वही है, शिक्षा या सामाजिकता से ये बदलने वाली नहीं है – ये साबित हो चुका है।
अवलोकन करें:-
आतंकियों में डॉक्टर-इंजीनियर का पकड़ा जाना इसका उदाहरण है कि शिक्षा से इस्लामी सोच नहीं बदल सकती। जब संसद में शपथग्रहण के दौरान असदुद्दीन ओवैसी जैसे 5वीं बार सांसद चुने जाने के बावजूद ‘जय फिलिस्तीन’ कहते हैं तो हमें खिलाफत की बरबस ही याद आ जाती है। तुर्की में कौन खलीफा बैठे, इसका भारत से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन इसके बावजूद खून हिन्दुओं का बहाया गया। इस सोच से लड़ने की रणनीति क्या है, इसमें हर तरफ कन्फ्यूजन ही है, सैकड़ों वर्षों से यही संशय का माहौल हमारी भूमि को खंडित करता रहा है।

गैर-मुस्लिमों(Ex-Muslims) पर शरिया लागू होगा या नहीं? अब सुप्रीम कोर्ट करेगा फैसला, याचिका में बोली केरल की महिला – हमें भारत के सेक्युलर कानून के तहत आने का मौका मिले

केरल की महिला की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट लेगी निर्णय - गैर-मुस्लिमों पर शरिया लागू होगा या नहीं (फोटो साभार: BarAndBench/BingAI)
शाहबानो प्रकरण से लेकर तीन तलाक पर मुस्लिम कट्टरपंथी और मौलाना/मौलवी शरिया में दखल कर इस्लाम पर प्रहार बता आम मुसलमानों को भड़काते नज़र आए। और मुसलमान भी सरकार को मुस्लिम विरोधी मान सच्चाई से दूर रहे। शाहबानो मुद्दे पर तो राजीव गाँधी ने मुस्लिम महिलाओं पर हो रहे अन्याय को नज़रअंदाज़ कर कट्टरपंथियों के पैरों में सिर टिका कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही शून्य कर दिया। लेकिन मोदी सरकार नहीं। टीवी पर खूब परिचर्चाएं हुई, सारे चैनल अपनी TRP के चक्कर में सच्चाई को छुपाते नज़र आए। किसी भी चैनल ने Ex-Muslims को परिचर्चा में नहीं बुलाया, क्योकि इनको बुलाकर इनकी TRP नहीं बढ़ती। क्योकि Ex-Muslims के तर्कों के आगे कोई मौलाना/मौलवी टिक नहीं पता, शो बीच में छोड़कर भागते नज़र आते, जिससे जलेबी और रसगुल्ले की तरह मीठी-मीठी बातों से हिन्दू ही नहीं मुसलमानों को गुमराह करने वाले इन कट्टरपंथी मौलानाओं/मौलवियों की सच्चाई सामने आने पर कोई इन्हे नहीं पूछता।

  
भारत में Ex-Muslims की संख्या बराबर बढ़ रही है, जो कट्टरपंथियों के लिए सबसे बड़ा सिर दर्द बन रहे हैं। इन्होंने कट्टरपंथियों द्वारा गाज़ियों(मुग़ल) द्वारा चलाये इस्लाम का घोर विरोध करते नज़र आए। Ex-Muslims चर्चा में आए नूपुर शर्मा विवाद में, जो Jaipur Dialogue और News Nation के 'इस्लाम क्या कहता है' पर मौलानाओं और मौलवियों पर ऐसे तीखे प्रश्नों के तीर छोड़ते थे, कि वातानुकूलित कमरों में बैठे होने के बावजूद उनके पसीने छूट जाते थे। यदि वही प्रश्न किसी हिन्दू ने पूछ लिए होते नूपुर की तरह उसके पीछे भी 'सर तन से जुदा' गैंग पड़ गया होता। इस गैंग की बाढ़ आ गयी होती। ठीक से आयतें न पढ़ने पर भी  मौलानाओं/मौलवियों को इनके गुस्से का सामना करना पड़ता था। इन परिचर्चाओं में कई ऐसे विवादों से इन चैनलों को देखने वाले दर्शक-हिन्दू या मुस्लिम-रूबरू हुए उन्हें सुन हर मुसलमान तक हैरान रह गया। कई ऐसी कुरीतियां है जिन्हे हर मुसलमान इस्लाम के डर से नहीं बल्कि मौलानाओं/मौलवियों के फतवे के डर से मानने को मजबूर हैं। अनवर शेख की पुस्तकों में पढ़ने के बाद नूपुर शर्मा विवाद में हुई चर्चाओं में कुरीतियां ताजी हो गयीं। अनवर शेख ने खुलकर उन कुरीतियों पर लिखा, लेकिन किसी में शेख के विरुद्ध फतवा या किसी भी किताब को बैन करने की हिम्मत तक नहीं की। निजामुद्दीन, नई दिल्ली से प्रकाशित होने उर्दू साप्ताहिक ने उन पुस्तकों के विरुद्ध आवाज़ उठाने की कोशिश जरूर की, लेकिन नगाड़े की आवाज़ के आगे तूती की आवाज़ दबकर रह गयी यानि इस्लाम के किसी ठेकेदार ने नहीं की परवाह। लेकिन अनवर शेख की किताबें पड़ने का मौका जरूर मिल गया। तस्लीमा और रश्दी के विरुद्ध फतवा देने वाले अनवर के खिलाफ हिम्मत नहीं कर पाए।   

 

इन एक्स-मुस्लिम का ज्वलंत प्रश्न 

अल्लाह एक,

कुरान एक,

नबी एक।

फिर भी शिया, सुन्नी, अहमदिया, सूफी, मुजाहिद्दीन जैसे 13 फिरके एक दुसरे के खून के प्यासे। सबकी अलग मस्जिदें। साथ बैठकर नमाज नहीं पढ़ सकते। कब्रिस्तान अलग। मजहब के नाम पर एक-दूसरे का कत्ल करने को सदैव आमादा।

पूर्व मुस्लिमों(Ex Muslims) पर शरिया कानून लागू होना या नहीं? अब सुप्रीम कोर्ट इस बड़े मुद्दे पर सुनवाई करने वाला है। सवाल है कि क्या Ex Muslims 1937 के शरीयत कानून के तहत ही प्रशासित किए जाते रहेंगे या फिर उन पर भारत का धर्मनिरपेक्ष कानून लागू होगा? खासकर, संपत्ति और वसीयत के संबंध में। केरल की एक महिला द्वारा दायर रिट याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस भी जारी किया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस DY चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाले 3 सदस्यीय पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की।

साफिया पीएम ने ये याचिका दायर की है। ‘एक्स मुस्लिम्स ऑफ केरल’ संगठन की जनरल सेक्रेटरी सफिया ने सुप्रीम कोर्ट से ये आदेश पारित करने का निवेदन किया है कि इस्लाम मजहब छोड़ चुके जो लोग शरीयत की जगह भारत के सेक्युलर कानून के अंतर्गत आना चाहें, उन्हें इसकी अनुमति दी जाए। यानी, संपत्ति एवं वसीयत के मामले में उन्हें इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 के अंतर्गत आया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे महत्वपूर्ण मसला बताते हुए अटॉर्नी जनरल से कहा कि वो एक कानूनी अधिकारी को नियुक्त करे, जो सुप्रीम कोर्ट की सहायता करे।

पहले तो सुप्रीम कोर्ट की पीठ इस मामले को सुनने से हिचक रही थी, साथ ही ये भी कहा कि जब तक अपनी वसीयत बना रहा शख्स ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन एक्ट’, 1937 के सेक्शन-3 के तहत खुद घोषणा न की हो तब तक ये कानून लागू होगा। एडॉप्शन में भी शरिया ही लागू होगा। अगर घोषणा नहीं की गई तो फिर पर्सनल लॉ के तहत ही चीजों का फैसला होगा। पीठ में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस JB पार्डीवाला भी शामिल थे।

CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने साफिया के वकील प्रशांत पद्मनाभन से सहमति जताते हुए कहा, “यहाँ एक समस्या है। क्योंकि, अगर आप घोषणा नहीं करते हैं तो तब भी यहाँ एक शून्य है क्योंकि सेक्युलर लॉ अप्लाई होगा ही नहीं। जब हमने पढ़ना शुरू किया तो कहा कि ये भला किस तरह की याचिका है। अब जब आप इसके भीतर घुस चुके हैं, ये एक महत्वपूर्ण बिंदु है। हमलोग नोटिस जारी करेंगे।” याचिकाकर्ता का कहना है कि उसका जन्म इस्लाम में हुआ था, उसके अब्बा एक नॉन-प्रैक्टिसिंग मुस्लिम हैं।

याचिका के मुताबिक, उसके मुस्लिम अब्बा ने आधिकारिक रूप से मजहब नहीं छोड़ा है, ऐसे में वो अपनी बेटी के अधिकारों को सुरक्षित रखने में समस्या का सामना कर रहे हैं। वो चाहती है कि उस पर शरिया न लागू हो, लेकिन कानून में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है। यानी, एक शून्य है जिस पर न्यायपालिका ही कुछ कर सकती है। अगर वो नो-रिलिजन या नो-कास्ट सर्टिफिकेट ले ले, तब भी भारत के धर्मनिरपेक्ष कानून के तहत विरासत और वसीयत का अधिकार उसे नहीं मिलेगा।

सिर्फ 4 शादी के लिए शरिया क्यों… शरिया-हदीस से जीना है तो चोरी करने वाले के हाथ काटो, बलात्कारी के ऊपर पत्थर बरसाओ: गृह मंत्री अमित शाह

देश के गृह मंत्री अमित शाह ने इस्लामी कानूनों के बहाने समान नागरिक संहिता (UCC) का विरोध करने वालों पर करारा हमला बोला है। उन्होंने कहा है कि सिर्फ 4 शादी और तलाक के लिए ही क्यों शरिया मानी जा रही है, अपराध की सजा भी शरिया और हदीस के हिसाब से दी जानी चाहिए। 

गृह मंत्री अमित शाह ने यह बात समाचार चैनल न्यूज18 द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कही। उनसे उत्तराखंड में लागू किए गए समान नागरिक कानून को लेकर प्रश्न पूछा गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा देश में समान नागरिक संहिता लागू करने को लेकर प्रतिबद्ध है।

गृह मंत्री शाह से जब पूछा गया कि क्या वह देश भर में अगले पाँच वर्षों में UCC लागू करेंगे तो उन्होंने कहा, “UCC 1950 से हमारा मुद्दा है। यह मुद्दा तबसे है जब पार्टी जनसंघ के रूप में थी। हम इससे हट नहीं सकते हैं। हमारा मानना है कि देश में एक समान कानून होना चाहिए, इसमें कोई मतभेद नहीं है। उत्तराखंड सरकार UCC लाई है और अब इसकी समीक्षा होगी।”

उनसे जब पूछा गया कि क्या देश के मुस्लिम शरिया और हदीस के हिसाब से नहीं रह सकते तो उन्होंने कहा, “देखिए ये एक प्रकार की भ्रान्ति है। 1937 से ही देश का मुस्लिम शरिया के हिसाब से नहीं रह रहा है। अंग्रेजों ने जब 1937 जब मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाया तो उसमें से आपराधिक तत्व को लेकर बातें निकाल दी। वरना चोरी करने वाले के हाथ काट दो, बलात्कार करने वाले की सड़क पर पत्थर मार कर हत्या कर दो। कोई मुस्लिम बचत खाता ना खोले, कर्ज ना ले। शरिया और हदीस से जीना है तो पूरी तरीके से जीना चाहिए।”

गृह मंत्री अमित शाह ने आगे कहा, “सिर्फ चार शादी करने के लिए शरिया क्यों आता है। इस देश का मुस्लिम अंग्रेजों के समय से शरिया और हदीस से कटा हुआ है और कई मुस्लिम देश भी इसे छोड़ चुके हैं। यह कॉन्ग्रेस की वोट बैंक की राजनीति है। देश का अल्पसंख्यक इससे बाहर आए।”

उन्होंने इस बात को आगे ले जाते हुए कहा, “आज भी कोई दीवानी का मुकदमा होता है तो मुस्लिम अदालत में जाते हैं काजी के पास नहीं। राहुल गाँधी क्या यह लागू करना चाहते हैं कि चोरी करने वाले के हाथ काटे जाएँ, बलात्कार करने वाले को पत्थर मारे जाएँ और देशद्रोह करने वाले को चौराहे पर फाँसी पर लटकाया जाए।”

भाजपा लगातार अपने मेनिफेस्टो में कहती आई है कि वह देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करेगी। हाल ही में उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने UCC को विधानसभा में पास किया था। इसको राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई है। अंदाजा लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में और भी भाजपा शासित राज्य इस पर अमल कर सकते हैं।

इस्लामी देश मलेशिया में ‘रद्द’ हुए शरिया के 16 कानून

                           मलेशिया में कोर्ट ने शरिया कानून किया रद्द (तस्वीर साभार: Reuters)
मलेशिया की सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए केलंतन राज्य में शरिया आधारित आपराधिक कानूनों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह संघीय सरकार का अधिकार है और इस तरह के कानून उस पर अतिक्रमण करते हैं। इस फैसले के बाद मलेशिया में इस्लामी कट्टरपंथी नाराज हो रखे हैं।

जानकारी के मुताबिक, कोर्ट में यह केस 2022 में दो मुस्लिम महिलाओं की ओर से दायर किया गया था जिस पर सुनवाई करते हुए 9 फरवरी 2024 को नौ सदस्यीय संघीय न्यायालय ने 8-1 के बहुमत से फैसला सुनाया। फैसले में 16 कानूनों को अमान्य करार दिया गया।

इन कानूनों में कुकर्म, यौन उत्पीड़न, अनाचार और ‘क्रॉस ड्रेसिंग’ (विपरीत लिंग से संबंधित कपड़े पहनना) से लेकर झूठे सबूत देने तक के अपराधों के लिए दंड का प्रावधान किया गया था। कोर्ट ने इन कानूनों को रद्द करते हुए कहा कि इन (उक्त) विषयों के लिए इस्लामी कानून नहीं बना सकते, क्योंकि ये विषय मलेशियाई संघीय कानून के अंतर्गत आते हैं।

इस फैसले को सुनाते वक्त कोर्ट के बाहर सिक्योरिटी टाइट थी क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी इस केस के विरोध में पहले से थे। द स्ट्रेट टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि निर्णय आने के वक्त 1000 से अधिक कट्टरपंथी लोग पुतराज्य में कोर्ट के बाहर प्रदर्शन करने के लिए कोर्ट के बाहर थे। निर्णय आने के बाद वह सब नाराज हो गए।

उन्होंने कहा, “इस तरह का निर्णय इस्लामी मुल्क में नहीं लिया जाना चाहिए। ये हमारी आँखों के आगे हो रहा है। हम मुस्लिमों को लग रहा है कि हमें चुनौती दी जा रही है। अगर हमारे मुल्क में कानून नहीं होगा तो मुश्किल हो सकती है। देश मुश्किल में पड़ जाएगा।”

कुछ प्रदर्शनकारियों ने इस फैसले के लिए नेताओं को दोषी बताया। वहीं कुछ ने माँग की कि शरिया को वापस से वैसे ही राज्य में लागू किया जाए जैसे वो पहले था। उसमें कोई बदलाव न हो।

गौरतलब है कि मलेशिया में 1990 से कट्टरपंथी पैन मलेशियाई इस्लामिक पार्टी या PAS का राज है। वहाँ दो स्तरीय कानून प्रणाली चलती है। इसके तहत शरिया के तहत मुस्लिमों के व्यक्तिगत और पारिवारिक मामले आते हैं और साथ ही यहाँ सिविल कानून भी चलता है। जिस राज्य की अदालत ने इस फैसले को सुनाया है वहाँ की 97 फीसद आबादी मुस्लिमों की है।