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हे भारत के विपक्ष! माना तुम खलिहर हो पर ‘राजा का डंडा’ नहीं है सेंगोल, भारत की स्वतंत्रता का वह प्रतीक है जिसे तुष्टिकरण के लिए नेहरू ने कर दिया था दफन; विपक्ष क्यों भारतीय इतिहास से डर रहा है?

                                                           सेंगोल से विपक्ष को क्या समस्या?
यह कटु सत्य है कि इतिहास दोहराया जाता है, जिसे आज(जून 27) विपक्ष के नाम पर लोक सभा में सांसद के रूप में पहुंचे जयचन्द वंशज साकार करने का प्रयत्न कर रहे हैं। अगर जयचन्द नहीं होता, देश से हिन्दू साम्राज्य नहीं जाता। यह देश का दुर्भाग्य है कि जब संसद में सेंगोल की स्थापना की गयी थी, तब इसका इतिहास भी बताया गया था, उसके बावजूद जब सांसद ही हटाने की आवाज़ उठाएं, मतलब जनता को समझ जाना चाहिए और ऐसे लोगों को वोट देकर संसद में पहुँचाने का खेद व्यक्त करना चाहिए। इन्हीं जैसों की वजह से गौरवशाली हिन्दू साम्राज्य को धूमिल कर गाज़ियों, जिन्हें मुग़ल बादशाह कहलवाया  जाता है, के खुनी अत्याचारों को पर्दा डाल महान बता दिया गया। एक गाज़ी और बादशाह में बहुत गहरा फर्क होता है। या चालू भाषा में पूछा जाए कि क्या ISIS को क्या कहोगे? सेंगोल का विरोध करने सांसदों को भारत के वास्तविक इतिहास को पढ़ने की उसी तरह जिस तरह किसी अनपढ़ को शिक्षित होने के लिए स्कूल जाने की। जब सांसद ही भारत के वास्तविक इतिहास से अज्ञान होगा, देश का क्या हित करेगा?  

लोकसभा सदन शुरू होने के बाद विपक्ष द्वारा हाल में सेंगोल को संसद से हटाने की माँग उठाई गई है। बहस छेड़ने वाले समाजवादी पार्टी के सांसद आर के चौधरी हैं। उन्होंने सेंगोल को ‘राजा का डंडा’ बताया है और पूछा है कि क्या इससे सरकार चलेगी। उन्होंने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा कि सेंगोल संसद में नहीं होना चाहिए। संसद लोकतंत्र का मंदिर है किसी राजे-रजवाड़े का महल नहीं। इसे हटाकर वहाँ भारतीय संविधान की विशालकाय प्रति स्थापित की जानी चाहिए।

सपा सांसद द्वारा उठाए गए इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं द्वारा इस माँग का समर्थन किया गया है। इसी तरह सेंगोल को हटाने की माँग आरजेडी लीडर मीसा भारती ने भी की। उन्होंने कहा कि ये लोकतंत्र है राजतंत्र नहीं… सेंगोल हटना चाहिए। उद्धव ठाकरे की शिवसेना के नेता संजय राउत ने इस मुद्दे पर कहा कि वो अपने गठबंधन के साथ बैठ इस पर निर्णय लेंगे। संविधान अहम है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने विपक्ष की ऐसी बातों को सुन हैरानी जताई और ‘बेतुकी’ बताते हुए कहा कि सेंगोल किसी कीमत में संसद से नहीं हट सकता।

अब पक्ष-विपक्ष में सेंगोल पर छिड़ी बहस में आगे बढ़ने से पहले समझते हैं कि आखिर ये है क्या और इसकी महत्वता क्या है, भारत के प्राचीन इतिहास में इसे क्यों इतना जरूरी माना गया और क्यों इसे स्वतंत्रता का प्रतीक कहते हैं।

सेंगोल का प्राचीन इतिहास

सेंगोल का इतिहास भारत में चोल वंश के साथ जुड़ा हुआ है। चोल साम्राज्य भारत के सबसे प्राचीन और सबसे लंबे समय तक राज करने वाले राजवंशों में से एक रहा है। 300 ईसापूर्व में भी इसका वर्णन मिलता है। 1500 से भी अधिक वर्षों तक इस राजवंश ने शासन किया। बताया जाता है कि चोल राजा शिवभक्त होते थे इसीलिए इनके राजदंड यानी सेंगोल में सबसे ऊपर भगवान शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा है।
सेंगोल को शुरुआती काल से ही सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक माना जाता रहा है। पुराने सय में पुरोहितों द्वारा इसे उस शासक को सौंपा जाता था जब उसके शासन का शुभारंभ होता था। भारत में इसकी महत्वता उसी काल से थी। बीच में मुगल काल और अंग्रेजों का राज शुरू होने के बाद इस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जैसे ही देश को स्वतंत्रता मिली ‘सेंगोल’ दोबारा प्रासंगिक हुआ।

स्वतंत्रता का प्रतीक है सेंगोल, जवाहरलाल नेहरू ने तुष्टिकरण के चलते नहीं दी तवज्जो

1947 में जब देश को आजादी मिली उस समय में एक विडंबना ये खड़ी हुई कि आखिर सत्ता हस्तांतरण होगा कैसे? इसका प्रतीक क्या होगा? कैसे पता चलेगा कि अंग्रेजों ने भारत को छोड़ दिया है? इसी समस्या के समाधान के लिए अंग्रेजों के अंतिम गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू के पास गए। उन्होंने उनसे पूछा कि आखिर आपके देश में सत्ता हस्तांतरण को लेकर क्या रीति-रिवाज हैं, वो उसके मुताबिक आगे की प्रक्रिया करेंगे।
अब जवाहरलाल नेहरू, इस सवाल का जवाब कैसे देते, उन्होंने तो देखा ही सिर्फ अंग्रेजों का रहन-सहन था। यही वजह है कि सत्ता हस्तांतरण के बारे में जानकारी लेने की जगह वह ‘स्वतंत्रता पार्टी’ के संस्थापक रहे चक्रवर्ती राजगोपालचारी से इस बारे में पूछा, जो भारतीय संस्कृति की गहरी समझ रखते थे।
उन्होंने नेहरू को पुरानी संस्कृति के बारे में बताया और समस्या का समाधान ‘सेंगोल’ के रूप में किया। इसके बाद करीबन 15 हजार रुपए में इसे मद्रास के प्रसिद्ध ज्वैलर्स वुम्मिडी बंगारू चेट्टी एंड सन्स द्वारा तैयार किया गया। फिर आखिर में विधि अनुष्ठान करवाकर, वैदिक मंत्रोच्चार के बीच ये सेंगोल जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया और 14 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण का अनुष्ठान पूरा हुआ … भारत में लोकतंत्र कायम हुआ। आगे देश का दुर्भाग्य कहिए या फिर सेकुलर नेताओं की हिंदूविरोधी मानसिकता कि आजादी के इस प्रतीक को न तो नेहरू ने खुद तवज्जो दी न कि कॉन्ग्रेस ने।

PM मोदी ने पता लगते ही सेंगोल को दिया सम्मान

साल 2021 में प्रधानमंत्री मोदी को एक खत के जरिए सेंगोल के बारे में पता चला। यह खत चर्चित डांसर पद्म सुब्रमण्यम ने उन्हें लिखा था। अपने लेटर में उन्होंने पीएम मोदी को सेंगोल के बारे में बताया था। पीएमओ ने इस लेटर को गंभीरता से लिया और संस्कृति मंत्रालय इस सेंगोल की खोज में जुटी। आखिरकार पता चला कि ये सेंगोल इलाहाबाद के म्यूजियम में रखा हुआ है। सेंगोल के अस्तित्व को कंफर्म करने के लिए मंत्रालय की टीम वुम्मिडी बंगारू चेट्ठी परिवार से भी मिली जिन्होंने कंफर्म किया कि सेंगोल तैयार किया गया था।
सेंगोल की महत्वता जानने के बाद ही पीएम मोदी ने इसे संसद में अहम स्थान देने का संकल्प लिया और 2023 में नए संसद के उद्घाटन के साथ इसे भी वहाँ स्थापित किया गया और जन-जन को मीडिया के जरिए इसकी महत्वता के बारे में पता चला।

मुद्दे नहीं बचे तो सेंगोल के पीछे पड़ा विपक्ष

आज सदन में संख्या बढ़ने के बाद विपक्ष नेता जो सवाल खड़े कर रहे हैं कि ये ‘सेंगोल’ राजतंत्र में इस्तेमाल होता था लोकतंत्र में इसकी जरूरत नहीं, उन्हें ये सारा इतिहास पढ़ने-समझने की जरूरत है, ताकि उन्हें भी पता रहे कि भारत की संस्कृतियों से नफरत करने में वो इतना न गिरें कि स्वतंत्रता के प्रतीक को संसद से हटाने की बात छेड़ें। उनके लिए इस चिन्ह से नफरत केवल इसलिए है क्योंकि इसका संबंध प्राचीन भारत से है जहाँ वेदों का महत्व था।
विपक्ष द्वारा अचानक सदन की शुरुआत होने के बाद सेंगोल हटाने की माँग उठना सिर्फ ये दिखाती है कि उनके पास राष्ट्रहित से जुड़े या जनता से संबंधिक कोई मुद्दा नहीं बचा है। वो सत्ताधारी पक्ष को जनता के हित में काम करने की सलाह या तरीके बताने की बजाय अपने में ही उलझे हुए हैं। हाल में उन्होंने इमरजेंसी का विरोध करने पर संसद के बाहर जाने का प्रयास किया। मानो वो ठहरा रहे हो कि इमरजेंसी लोकतंत्र पर धब्बा नहीं था। उस मुद्दे के बाद वो अब सेंगोल का मुद्दा लेकर आए हैं। वो सेंगोल, जिसे लेकर सारी पार्टियों को कॉन्ग्रेस से सवाल करना चाहिए कि उन्होंने इतने वर्ष उसपर क्यों ध्यान नहीं दिया, वो पार्टियाँ अब एकजुट होकर आजादी के प्रतीक को गलत दिखाने की कोशिशों में हैं।

तमिल मैग्जीन, मशहूर डांसर और एक चिट्ठी… संसद भवन में लगने वाले ‘सेंगोल’ से इनका क्या है कनेक्शन

                                               सेंगोल की जानकारी देने वाली पद्मा सुब्रमण्यम
नए संसद भवन में लोकसभा स्पीकर की कुर्सी के पास लगने वाले ‘सेंगोल‘ पर रोज कोई न कोई नई जानकारी सामने आ रही है। इसी क्रम में ये पता चला है कि पीएम मोदी को स्वतंत्रता के इस प्रतीक के बारे में मशहूर डांसर पद्मा सुब्रमण्यम द्वारा पता चला था।

दरअसल, दो साल पहले साल 2021 में मशहूर डांसर पद्मा को सेंगोल के बारे में एक तमिल मैग्जीन ‘तुगलक’ के जरिए मालूम चला। इसके बाद उन्होंने उस मैग्जीन के आर्टिकल को तमिल से अंग्रेजी में अनुवाद करके पीएम मोदी को भेजा। उन्होंने चिट्ठी में पीएम मोदी से अपील की कि वह इसके बारे में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सभी देशवासियों को बताएँ।

वह कहती हैं कि सेंगोल सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि जो आर्टिकल पढ़कर उन्हें सेंगोल के बारे में पता चला उसमें बताया गया था कि कैसे कांची महा स्वामी (चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती) ने अपने शिष्य मेट्टू स्वामीगल को सेंगोल के बारे में बताया और फिर इसका जिक्र डॉ सुब्रमण्यम की एक पुस्तक में हुआ। उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में इस सेंगोल की महत्वता के बारे में बताया।

वह बताती हैं कि तमिल संस्कृति में छत्र, राजदंड और सिंहासन ये तीन चीजें सत्ता हस्तांतरण के वक्त दी जाती हैं। इनमें सेंगोल न केवल ताकत का बल्कि न्याय का भी प्रतीक है। इसका महत्व हजारों वर्ष पुराना है। इसके बाद उन्होंने सेंगोल नेहरू को कैसे मिला…इस विषय पर बात की। उन्होंने कहा कि वह एक राष्ट्रवादी हैं और पीएमओ के समक्ष सेंगोल की जानकारी देकर उन्होंने रामायण की उस गिलहरी जैसे अपना फर्ज निभाया है।

बता दें कि पीएम मोदी के कार्यालय में पद्मा की ये चिट्ठी रिसीव होने के बाद सेंगोल की खोजबीन शुरू हुई। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के विशेषज्ञों की मदद ली और राष्ट्री अभिलेखागार से लेकर उस वक्त तमाम अखबारों और डॉक्यूमेंट्स में इसके बारे में खँगाला गया। लेकिन इसका पता तब चला जब सूचना संग्रहालयों में भेजी गईं और जानकारी आई कि सेंगोल इलाहाबाद के म्यूजियम में रखा हुआ है।

जाँच में सामने आया कि ये सेंगोल को बंगलौर के फेमस वुम्मिडी बंगारू चेट्टी एंड सन्स ज्वैलर्स एंड डायमंड मर्चेंट्स ने तैयार किया था और 1947 में इसे बनाने में 15000 की लागत आई थी। आज जब सेंगोल की महत्वता पर हर जगह बात हो रही है तो डांसर कहती हैं कि लोकतंत्र के मंदिर में सेंगोल की स्थापना से उनका सपना पूरा हो रहा है। यह अपने अआप में खास है क्योंकि इसके बारे में किसी ऐतिहासिक किताब तक में जिक्र नहीं है।

जो था भारत का राजदंड, उसे बना दिया नेहरू की ‘स्वर्ण छड़ी’: मोदी की नजर में आया ‘सेंगोल’ का गुमनाम इतिहास


नए संसद भवन के उद्घाटन की खबर के साथ चर्चा में आए ‘सेंगोल’ को कुछ समय पहले कोई जानता तक नहीं था। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से अब इसकी महत्वता और इसका इतिहास सब मुख्यधारा मीडिया में है। साल 1947 में स्वतंत्रता के समय आखिरी वायसराय माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर ‘सेंगोल’ पंडित नेहरू को सौंपा था। इसके बाद इसे इलाहाबाद संग्राहलय में ‘नेहरू को तोहफे में मिली स्वर्ण छड़ी’ बताकर रख दिया गया।

आज जनता संसद के नए भवन के उद्घाटन पर हो रहे विरोध की वास्तविकता को समझना होगा, विरोध इसलिए नहीं हो रहा कि उद्घाटन नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, बल्कि देश की सत्ता हस्तांतरण धरोहर को बताया गया उपहार किसी म्यूज़ियम से निकालना है। यह किसी की व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्र की धरोहर है। क्यों 'सत्ता हस्तांतरण प्रतीक' को 'नेहरू को तोहफे में मिली स्वर्ण छड़ी' बताकर जनता को सनातन धर्म की सच्चाई से छुपाकर गुमराह किया गया। और सच्चाई सामने आने पर इन समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्षों की रोटी-पानी हराम हो गया है। इन छद्दमों से पूछा जाए कि क्या नंदी अंकित मात्र एक छड़ी है? देश का वास्तविक इतिहास बाहर आना शुरू हो चुका है। जैसे-जैसे पृष्ठ खुलते जाएंगे, आन्दोलनजीवियों के माध्यम से अशांति फैलाते रहेंगे।  

प्रश्न ये नहीं होना चाहिए की कौन करेगा नए संसद भवन का उद्घाटन! बल्कि प्रश्न होना चाहिए 1947 से इसे क्यों छुपाया गया? बाद में परंपरा का पालन क्यों नहीं किया जाता है? इसे गायब किसने किया? क्या यह विशेष पंथों को खुश करने के लिए है? ऐसी और कितनी बातें छिपी हैं? और क्यों?

प्नधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसकी सूचना कुछ साल पहले एक वीडियो से लगी। 5 फीट लंबे सेंगोल पर वीडियो ‘वुम्मिडी बंगारू ज्वेलर्स (VBJ)’ ने बनाई थी। इसके मैनेजिंग डायरेक्टर आमरेंद्रन वुम्मिडी ने कहा कि उन्हें सेंगोर के बारे में खुद भी नहीं पता था। वो तो 2018 में एक मैग्जीन में इसका जिक्र देखा और जब खोजा तो 2019 में उन्हें ये इलाहाबाद के एक म्यूजियम में रखा हुआ पाया।

इसके बाद उन्होंने म्यूजियम के अधिकारियों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की सोची। हालाँकि महामारी के कारण ऐसा नहीं हो पाया, और सेंगोल पर एक वीडियो बनाई गई। बाद में यह वीडियो पीएम मोदी के संज्ञान में आई। पीएम कार्यालय ने एक टीम नियुक्त की जिसने वुमुड्डी ग्रुप से संपर्क किया। खोजबीन में सामने आया कि ये सेंगोल को बंगलौर के फेमस वुम्मिडी बंगारू चेट्टी एंड सन्स ज्वैलर्स एंड डायमंड मर्चेंट्स ने ही तैयार किया था। उनके परिवार के पास सेंगोर की एक तस्वीर भी है।

इस दौरान यह भी पता चला कि 1947 में सत्ता के हस्तांतरण को दर्शाने के लिए सी राजगोपालाचारी के अनुरोध पर तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी) में तिरुववदुथुरई अधिनाम द्वारा राजसी 5 फीट लंबा सेंगोल का निर्माण किया गया था। इसे बनाने के लिए वुम्मिदी बंगारू चेट्टी को मिली थी।

बंगारू चेट्टी द्वारा सेंगोल को 100 से अधिक सोने के गहनों से बनाया गया था। जिन्होंने उस समय इसे बनाने के केवल 15000 रुपए लिए थे और 30 दिन से भी कम का समय में इसे तैयार कर दिया था। उनके साथ इसे बनाने में इसे बनाने में उनके बेटों वुम्मिदी एथिराजुलू और वुम्मिदी सुधाकर ने एक प्रमुख भूमिका निभाई थी। लेकिन इनका परिवार वक्त के साथ सेंगोल को भूल गया।

आमरेंद्रन कहते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि सेंगोल कैसा दिखता है और उसे कैसे बनाया गया। वुम्मिडी परिवार की मानें तो वो खुद उस सेंगोल को भुला चुके थे। ये भी नहीं पता था सेंगोल लंबे समय से कहा था। सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक है। इसकी प्रथा तमिलनाडु में शासन करने वाले चोल, पांडियार, पल्लव राजवंशों के समय से है। उन्होंने सेंगोर को नेहरू की स्वर्ण छड़ी बताने पर कहा कि हाँ मैंने म्यूजियम में रखे सेंगोर की कुछ तस्वीरें देखीं, गलती हुई है।

वहीं इंडिया टुडे से बातचीत में वुम्मिदी एथिराजुलू के बेटे उजय वुम्मिदी ने बताया वो कहते हैं कि उन्हें नहीं पता था सेंगोल लंबे समय से कहाँ था। अगर आज ये दोबारा मिला तो इसके लिए मीडिया और पीएम मोदी का आभार। पीएम मोदी ने हमें ढूँढकर इसके बारे में पूछा और हमारी स्मृतियों को जिंदा किया। वैसे ये सेंगोल कहीं खोया नहीं था। बस यादों से धूमिल हो गया था। कुछ समय पहले उनके मार्केटिंग हेड को ये छड़ी के रूप में इलाहाबाद म्यूजियम में मिला। इसे बॉक्स में रखा गया था और लिखा कि ये स्वर्ण छड़ी नेहरू को तोहफे में मिली थी।

सेंगोल 1947 में नेहरू को मिलने के बाद से गायब हो गया था। लेकिन 15 अगस्त 1978 में कांचीपुरम के कांची कामकोटि पीतम के 68वें संत श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती स्वामिगल जिन्हें महा पेरियावा नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने इसके बारे में एक आयोजन में अपने अनुयायी डॉ बी आर सुब्रमण्यम को बताया और उन्होंने इसका जिक्र अपनी किताब में किया। इसके बाद इसी किताब के हवाले से मीडिया में लेख प्रकाशित हुए और उन्हीं लेखों की बदौलत आजाद भारत में पंडित नेहरू को मिले सेंगोल की कहानी हमारे सामने है।

मीडिया में यह भी बताया जा रहा है कि सेंगोर की जानकारी पीएम मोदी को प्रसिद्ध डांसर पद्मा सुब्रमण्यम ने एक चिट्ठी के जरिए भी दी गई थी। उन्होंने अपनी चिट्ठी में एक तमिल मैग्जीन ‘तुगलक’ में प्रकाशित एक लेख का हवाला देते हुए ‘सेंगोल’ के बारे में पीएम को बताया। साथ ही माँग उठाई की पीएम इस बारे में जानकारी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सभी देशवासियों के साथ साझा करें।

पीएम मोदी कार्यालय में ये चिट्ठी रिसीव होने के बाद भी सेंगोल की खोजबीन शुरू हुई। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के विशेषज्ञों की मदद ली और राष्ट्री अभिलेखागार से लेकर उस वक्त तमाम अखबारों और डॉक्यूमेंट्स में इसके बारे में खँगाला गया। हालाँकि बाद में पता चला कि ये सेंगोल प्रयागराज के आनंद भवन में है।