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नहीं गली दाल तो पुतिन को ‘पागल’ बताने लगे डोनाल्ड ट्रंप, कहा- वे निर्दोषों का खून बहा रहे, हड़पना चाहते हैं पूरा यूक्रेन: 3+ साल से जारी जंग को चुटकी में खत्म करवाने का कर रहे थे दावा

                    डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्वीट कर रूस के राष्ट्रपति पुतिन को कहा 'पागल' (साभार : द हिंदू)
अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप लगातार कोशिश कर रहे हैं कि यूक्रेन पर रूसी हमला बंद हो जाए। इसके लिए वो टेंपररी सीजफायर से लेकर पूर्ण युद्धविराम तक की गुहार लगा चुके हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को दोस्त बताने से लेकर उनसे कई बार बातचीत कर चुके हैं, यहाँ तक कि यूक्रेनी राष्ट्रपति को सार्वजनिक तौर पर हड़का भी चुके हैं। इसके बावजूद रूसी हमले नहीं रुक रहे, जिसकी वजह से डोनाल्ड ट्रंप अब गुस्से में आ चुके हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने व्लादिमीर पुतिन को पागल तक कह दिया है।

अब इसे डोनाल्ड की बौखलाहट कहे या गिरगिट की तरह रंग बदलना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दोस्त कहे जाने वाला ट्रम्प ही उसी मोदी के बढ़ते कद से बैचैन होकर भारत के ही विरुद्ध बयानबाज़ी तक करने लगे हैं। पाकिस्तान के साथ आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में दुश्मन की कमर टूटने पर उसके ही DGMO द्वारा सफ़ेद झंडा दिखाने का श्रेय ट्रम्प लेने से नहीं चुके। लेकिन जब फजीहत होनी शुरू हुई तो एक के बाद एक बयान बदलते रहे। ट्रम्प अपनी वाहवाही के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं चाहे जितनी बार गिरगिट की तरह रंग ही क्यों न बदलना पड़े।  

खैर, इस दौरान ट्रंप ये बताना नहीं भूले कि इनकी पुतिन से बहुत बनती है, लेकिन साथ ही जोड़ा कि बीते कुछ समय से पुतिन बदल चुके हैं। अब वो यूक्रेन का सिर्फ एक टुकड़ा नहीं, बल्कि पूरे का पूरा यूक्रेन ही कब्जाना चाहते हैं। हालाँकि ट्रंप ने ये भी जोड़ दिया कि अगर रूस यूक्रेन को पूरा कब्जाता है, तो ये रूस के पतन की शुरुआत होगी, यानी वो बर्बादी की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा है।

ट्रम्प को यह भी बताना चाहिए कि अगर रूस यूक्रेन को हथियाना चाहता तो क्या अमेरिका बांग्लादेश और पाकिस्तान पर अपना अधिकार करना नहीं चाहा रहा? मुंह से आतंकवाद के विरुद्ध लेकिन अंदरखाने आतंकवाद को समर्थन, ताकि हथियारों की बिक्री होती रहे।   

ट्रंप ने अपने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्रुथ पर रविवार (25 मई 2025) को एक पोस्ट डाला और पुतिन पर जमकर भड़ास निकाली। ट्रंप ने अपनी पोस्ट में कहा, “रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मेरे हमेशा से बहुत अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन शायद उनके साथ कुछ ऐसा हुआ है। वह बिल्कुल पागल हो गए हैं! वह बेवजह बहुत से लोगों को मार रहे हैं, और मैं सिर्फ सैनिकों की बात नहीं कर रहा हूँ। यूक्रेन के शहरों में बेवजह मिसाइल और ड्रोन दागे जा रहे हैं।”

ट्रंप ने कहा, “मैंने हमेशा कहा है कि वे यूक्रेन का सिर्फ एक टुकड़ा नहीं, बल्कि पूरा यूक्रेन चाहते है, और शायद यह सही साबित हो रहा है, लेकिन अगर वह ऐसा करते हैं, तो इससे रूस का पतन हो जाएगा!”

ट्रंप ने यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की की भी आलोचना की और कहा कि उनके बोलने का तरीका समस्याएँ खड़ी करता है और इससे उनके देश को कोई भी फायदा नहीं होता। उन्होंने जेलेंस्की को सलाह दी कि वे इस तरह की बयानबाजी बंद करें। इसके साथ ही ट्रंप ने दावा किया कि अगर वे अमेरिका के राष्ट्रपति होते तो रूस-यूक्रेन युद्ध कभी शुरू ही नहीं होता।

ट्रंप ने कहा, “यह जेलेंस्की, पुतिन और बाइडेन की लड़ाई है, ‘ट्रंप’ की नहीं। मैं केवल एक बड़ी और भयानक आग को बुझाने में मदद कर रहा हूँ।” राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि यूक्रेन में रूस का हालिया हमला और राष्ट्रपति जेलेंस्की की बयानबाजी शांति के प्रयासों के लिए भी बाधा बन रही है।

राष्ट्रपति पुतिन के खिलाफ डोनाल्ड ट्रंप का तीखा बयान यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की के उस आरोप के बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिकी चुप्पी ने पुतिन को और अधिक ताकतवर बना दिया है। जेलेंस्की ने रूसी नेतृत्व पर दबाव बढ़ाने की अपील करते हुए कहा, “रूस की क्रूरता को रोका नहीं जा सकता, अगर इसे नजरअंदाज किया गया तो यह और बढ़ेगी।” उन्होंने अमेरिका और अन्य देशों की चुप्पी को पुतिन के लिए प्रोत्साहन बताया।

इस बीच, ट्रंप लगातार पुतिन के शांति वार्ता को लेकर बदलते रुख पर निराशा जताते रहे हैं। उनकी पुतिन को लेकर निराशा अब सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे रूस के खिलाफ कुछ व्यापारिक प्रतिबंध लगाने पर भी विचार कर रहे हैं।

वैसे, पहले ट्रंप रूस पर नए प्रतिबंध लगाने के लिए इच्छुक नहीं थे, पुतिन के साथ दोस्ताना रवैया अपनाते थे और जेलेंस्की को फटकार लगाते थे, लेकिन अब उन्होंने पुतिन को ‘पागल’ तक कह दिया है और रूस के खिलाफ सेकंडरी बैन लगाने पर विचार कर रहे हैं। 

कुछ समय पहले ट्रंप का रूस के प्रति नरम रुख भी देखने को मिला था, जब उन्होंने पुतिन से टेलीफोन पर बातचीत के बाद मॉस्को पर नए प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया था। लेकिन अब उनकी हालिया टिप्पणियाँ, जिसमें उन्होंने पुतिन पर शांति प्रयासों को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाया है, अमेरिका की नीति में अस्थिरता को दिखाती हैं।

गौरतलब है कि बीते साल चुनाव अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि यदि वे सत्ता में आए तो 24 घंटे में रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त करा देंगे। लेकिन अब तो करीब पाँच महीने बीत चुके हैं और उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद रूस-यूक्रेन युद्ध में कोई कमीं नहीं आई है।

दिलचस्प बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप खुद को वैश्विक शांतिदूत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में भारत-पाकिस्तान के तनाव के दौरान, जब भारत ने पाकिस्तानी आतंकी ठिकानों और सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचाया, तब ट्रंप ने बार-बार व्यापार के जरिए इस संघर्ष को सुलझाने का दावा किया। हालाँकि उनका यह दावा भी विवादित ही रहा, क्योंकि भारत ने उनके दावे को सार्वजनिक तौर पर खारिज कर दिया।

रूस की फंडिंग पर चल रही कांग्रेस, इसलिए यूक्रेन पर चुप्पी? इंदिरा गाँधी का जमाना, सूटकेसों में भरकर विदेश से आता था माल

यूक्रेन और रूस युद्ध के संबंध में भारत सरकार बिना कोई विवादित बयान दिए लगातार अपने नागरिकों को यूक्रेन से निकालने में जुटी है। इस काम के लिए उनकी तारीफ और आलोचना दोनों हो रही है। इस बीच विपक्ष भी लगातार भारत की मोदी सरकार पर हमलावर है लेकिन वे यूक्रेन की स्थिति पर कुछ नहीं बोल रहे। अब इसी बात को हाईलाइट करते हुए पुष्पम प्रिया की द प्लूरल्स पार्टी ने कांग्रेस पर निशाना साधा है और उनकी इस चुप्पी के पीछे रूसी फंडिंग को जिम्मेदार बताया है।

अपने ट्वीट में पुष्पम प्रिया चौधरी की द प्लूरल्स पार्टी ने लिखा, “यूक्रेन आक्रमण पर सरकार की दुविधा तो फिर भी समझ में आती है। लेकिन लिबरल होने का ढोंग रचने वाले कांग्रेस सहित विपक्ष की चुप्पी हास्यास्पद है। बौद्धिक और नैतिक दरिद्रता है या चुनाव के लिए रूसी फ़ंडिंग का असर?”

कांग्रेस पर विदेशी फंडिंग का भार

कांग्रेस पर विदेश से फंड लेने के आरोप कोई नई बात नहीं हैं। पार्टी का इतिहास देख कर ही समय-समय पर लोग कांग्रेस को विदेशी फंडिंग पर घेरते हैं। और ये जानना दिलचस्प है कि ये खेल इंदिरा काल से चला आ रहा है। 
ऑपइंडिया ने अपनी पहले की रिपोर्ट में बता ही रखा है कि कैसे इंदिरा गाँधी के समय में सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी केजीबी (कोमितेत गोसुदर्स्त्वेन्नोय बेज़ोप्स्नोस्ति) कांग्रेस नेताओं को पैसा मुहैया कराती थी। इस संबंध में खुद अमेरिकी एजेंसी सीआईए ने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक करके दावा किया था कि इंदिरा गाँधी के जमाने में कांग्रेस के 40 फीसद सांसदों को सोवियत संघ से पैसा मिलता था।
इसके अलावा, साल 2005 में केजीबी के ही एक पूर्व जासूस वासिली मित्रोकिन (Vasili Mitrokhin) की किताब आई थी। इसमें तो बकायदा बताया गया है कि खुद इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर पैसे भेजे गए थे। वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने कुछ वक्त पहले ऑपइंडिया को बताया था कि जो तथ्य सार्वजनिक हैं उससे जाहिर होता है कि 1967 के आम चुनाव के वक्त कॉन्ग्रेस सहित देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों को विदेश से पैसा मिला था। उन्होंने बताया था कि शीत युद्ध के जमाने में कम्युनिस्ट देश जहाँ भारत में साम्यवाद के फैलाव के लिए पैसे खर्च कर रहे थे, तो पूँजीवादी देश साम्यवाद को रोकने के लिए। ऐसे में जब सत्ताधारी दल का नेता ही बिकने को तैयार हो तो विदेशी ताकतों के लिए चीजें आसान हो जाती है।
                                                    मित्रोकिन ने खोले इंदिरा काल के राज

सोवियत संघ से फंडिंग का कैसे खुला राज

मित्रोकिन की किताब के चलते सबसे दिलचस्प बात इतने सालों बाद ये हुई कि वर्षों तक जिन तथ्यों को कांग्रेस छिपाती रही उसे मित्रोकिन ने 2005 में दुनिया के सामने ला दिया। बताया जाता है कि मित्रोकिन सोवियत संघ जमाने के हजारों गोपनीय दस्तावेज चुराकर देश से बाहर ले गए थे। बाद में इसके आधार पर क्रिस्टोफर एंड्रयू (Christopher Andrew) के साथ मिलकर किताबें लिखी। द वर्ल्ड वॉज गोइंग आवर वे (The World Was Going Our Way) नामक किताब में कहा गया है कि केजीबी ने 1970 के दशक में पूर्व रक्षा मंत्री वीके मेनन के अलावा चार अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी चुनाव प्रचार के लिए फंड दिया था।
इंदिरा काल के बाद भी विदेश से पैसा लेने की कांग्रेस की आदत में सुधार नहीं आया  सोवियत संघ से पैसा लेने का जो सिलसिला इंदिरा गाँधी के जमाने में शुरू हुआ था वह राजीव गाँधी के जमाने में भी जारी रहा। हालॉंकि इस दौर में सोवियत संघ का प्रभाव कुछ सीमित करने की कोशिश भी हुई थी। लेकिन सोवियत संघ की पकड़ सिर्फ राजनीति में नहीं थी। उन्होंने मीडिया पर भी अपना कब्जा किया हुआ था। मित्रोकिन की किताब अनुसार भारत में सोवियत संघ का प्रोपेगेंडा चलाने के लिए 40-50 पत्रकार थे जो बाद में 200-300 हो गए थे।

विदेशी फंडिंग का मुद्दा उठाने वाली पुष्पम प्रिया कौन हैं?

एक बार फिर से कांग्रेस पार्टी पर फंडिंग के आरोप मढ़ने वाली द प्लूरल्स पार्टी की अध्यक्ष पुष्पम प्रिया चौधरी हैं जो साल 2020 में बिहार चुनावों में खासी चर्चा में थीं। उन्होंने विदेश में डेवलपमेंट स्टडीज की पढ़ाई की। साल 2019 में वह बिहार लौटीं इस आशा के साथ कि राजनीति में आकर वह पूरे बिहार की सूरत को बदल देंगी। हालाँकि ऐसा नहीं हो सका। बिहार को 2025 तक भारत की और 2030 तक विश्व की सबसे बेहतर बनाने का उनका सपना 2020 के बिहार चुनाव के समय धराशायी हुआ जब तमाम प्रचार के बाद भी उनकी पार्टी को राज्य में जगह बनाने में असफल हुई। अपनी हार देखते हुए पुष्पम प्रिया ने इसका जिम्मा ईवीएम पर लगाया और वोट न मिलने पर दावा किया कि जहाँ उनके कार्यकर्ता उनके सामने बूथ में गए वहाँ भी उन्हें जीरो वोट मिले।

हमले से पहले चेतावनी पर यूक्रेनी सैनिकों ने ललकारा, रूस ने 13 को उड़ाकर किया आइलैंड पर कब्जा

                                                       स्नैक आइलैंड (फोटो साभार: आजतक)
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध (Russia Ukraine War) के दूसरे दिन शुक्रवार (25 फरवरी) को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडमिर जेलेंसकी ने बंकर में शरण ले ही है। रूस के सरकारी चैनल रशिया टुडे का दावा है कि कीव के नजदीक रूसी सेना के पहुँचते ही राष्ट्रपति को बंकर में ले जाया गया। वहीं, रूस विरोधी हैकरों ने रूस की कई सरकारी वेबसाइट को निशाना बनाया है।

खबर यह है कि अमेरिका ने यूक्रेन के सीमा के निकट रोमानिया में अपने F35 फाइटर जेट को तैनात कर दिया है। हालाँकि, गुरुवार (24 फरवरी) को ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्ट कर दिया कि यूक्रेन की सेना की मदद के लिए वह अमेरिकी सेना को नहीं भेजेंगे। उधर इटली ने यूक्रेन का समर्थन किया है और कहा कि नाटो की ताकत को बढ़ाने के लिए वह अपने सैनिक भेजने को तैयार है।

वहीं, रूस के विदेश के मंत्री सर्गेई लावरोव ने एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर यूक्रेन के सैनिक युद्ध करना बंद कर दे तो रूस यूक्रेन के साथ बातचीत करने के लिए तैयार है। हालाँकि, रूस सरेंडर करने के कतई तैयार नहीं दिख रहा है। उसके सैनिक भी बहादुरी के साथ मुकाबला कर रहे हैं। इसका एक वीडियो सामने आया है, जिसमें रूस के चेतावनी के बावजूद यूक्रेन के सैनिक पीछे नहीं हटे और रूस का निशाना बनकर शहीद हो गए।

सोशल मीडिया वीडियो में दिख रहा है कि चेतावनी के बाद 13 यूक्रेनी सैनिकों ने रूसी सेना को ललकारते हुए कहा कि ‘भांड़ में जाओ’ और अपने हथियार डालने से इनकार करते हुए मारे गए। आत्मसमर्पण करने पर रूस के युद्धपोत से इन पर हमला किया गया और स्नेक आइलैंड के रूप में भी पहचाने जाने वाले द्वीप पर तैनात इन यूक्रेनी सैनिकों की मौत हो गई। इस हमले के बाद रूस ने स्नेक आइलैंड को भी अपने कब्जे में ले लिया है।

स्नेक आइलैंड यूक्रेन के दक्षिण में काला सागर में स्थित है और इसे Zmiinyi Island के नाम से भी पहचाना जाता है। हमले से पहले चेतावनी देते हुए रूसी सैनिकों ने कहा कि यह रूस का युद्धपोत है और आप लोग अपने हथियार रखकर आत्मसमर्पण कर दें, ताकि किसी भी तरह का रक्तपात न हो। रूसी सैनिकों ने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो बम बरसाए जाएँगे। इसके जवाब में यूक्रेनी सैनिकों ने सरेंडर करने से साफ मना कर दिया और रूसी अधिकारियों को कहा, Go F**k Yourself (जाओ अपनी….)।

इस हमले के बाद रूस ने अपने युद्धपोत को Moskva और Vasily Bykov आईलैंड की तरफ भेजा है। इस घटना के बाद यूक्रेन ने इन 13 सैनिकों को ‘Hero of Ukraine’ सम्मान से सम्मानित किया है। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने ट्वीट किया, “रूस ने यूक्रेन के Zmiinyi (Snake) आईलैंड पर कब्जा कर 13 बॉर्डर गार्ड्स को मार दिया है। उन्होंने सरेंडर करने से मना कर दिया था। उनको ‘Hero of Ukraine’ सम्मान से सम्मानित किया जाता है।”