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क्रिकेट या दावत-ए-जिहाद? मैदान में इस्लामी विक्टिमहुड घुसाने की साजिश


क्रिकेट मूलतः बल्ला और गेंद का खेल है। टाइमिंग, लाइन-लेंथ और अनुशासन का अनुशासित संघर्ष। यह खेल टीमों की प्रतिस्पर्धा और खेल भावना से गढ़ा जाता है, न कि व्यक्तिगत आस्था के प्रदर्शन से।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से क्रिकेट के इसी मैदान को मजहबी अखाड़े में बदलने के सुनियोजित प्रयास दिखाई दे रहे हैं। पिच से लेकर ड्रेसिंग रूम तक इस्लामी एजेंडा और मुस्लिम विक्टिम कार्ड की घुसपैठ कराई जा रही है। यह बदलाव संयोग नहीं, एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा प्रतीत होते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा का संन्यास की घोषणा करते हुए यह कहना कि ‘पाकिस्तानी मुस्लिम होने के कारण उनके साथ दोहरा बर्ताव हुआ’, या जम्मू-कश्मीर चैंपियंस लीग में फुरकान भट का हेलमेट पर फिलिस्तीन का झंडा लगाकर मैदान में उतरना- ये घटनाएँ किसी निजी ‘स्टेटमेंट’ की श्रेणी में नहीं आतीं। ये क्रिकेट के मंच का उपयोग कर इस्लामी विक्टिमहुड, राजनीतिक इस्लाम और मजहबी एजेंडे को सामान्य बनाने की कोशिशें हैं। यहाँ खेल माध्यम है, संदेश कुछ और।

जिन्हें क्रिकेट की बुनियादी समझ है, वे जानते हैं कि उस्मान ख्वाजा कोई साधारण खिलाड़ी नहीं रहे। एक दशक से अधिक का अंतरराष्ट्रीय करियर, ऑस्ट्रेलिया के लिए 87 टेस्ट, कप्तानी की चर्चाएँ- इस पूरी यात्रा में न उनका मुस्लिम होना बाधक बना, न इस्लामाबाद में जन्म लेना।

डॉन ब्रैडमैन इसलिए महान नहीं हुए कि वे चर्च में प्रार्थना करते थे। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के भगवान इसलिए नहीं बने कि वे संत ​सत्य साईं बाबा के भक्त थे। वसीम अकरम की प्रतिष्ठा नमाज से नहीं, स्विंग से बनी। विराट कोहली की पहचान प्रेमानंद महाराज के आश्रम में जाने से नहीं, कवर ड्राइव से है।

दुनिया इन सबको उनके क्रिकेटीय कौशल के लिए जानती है, उनकी निजी आस्था के लिए नहीं। इन सबकी आस्था व्यक्तिगत है, मैदान से बाहर है। लेकिन जाते-जाते उस्मान ख्वाजा ने क्रिकेट को पीछे धकेलकर पाकिस्तान और इस्लाम को आगे कर दिया। यह केवल खेल भावना का अपमान नहीं है, उस खेल की हत्या है जिसने उन्हें वह मंच दिया, जहाँ से वे यह बयान दे सके।

उस्मान ख्वाजा और फुरकान भट उस प्रवृत्ति की कड़ियाँ हैं जिसे सबसे पहले, सबसे खुलकर पाकिस्तानी क्रिकेट ने बढ़ावा दिया। मैच के दौरान नमाज, कैमरे के सामने मजहबी संकेत, जीत को ‘अल्लाह की देन’ बताने की अनिवार्यता- हर बार इसे ‘व्यक्तिगत आस्था’ कहकर बचाने की कोशिश की गई।

लेकिन जब यह बार-बार, योजनाबद्ध और कैमरा-फ्रेंडली ढंग से हो, तो वह निजी नहीं रह जाता। वह संदेश बन जाता है। वही संदेश फुरकान भट जैसे नवोदित खिलाड़ियों को प्रेरित करता है कि क्रिकेटीय पहचान से पहले मजहबी पहचान स्थापित की जाए।

हमने जर्सी पर ‘Victory belongs to Allah’ जैसे संदेश देखे हैं। यह खेल की भाषा को एक विशेष मजहब की शब्दावली में ढालने का प्रयास है। यही भाषा पाकिस्तानी खिलाड़ियों की मैच के बाद प्रस्तुतियों में सुनाई देती है, टीवी स्टूडियो में दोहराई जाती है। याद करिए क्रिकेट विश्लेषण के बीच आपने कितनी बार यूसुफ योहाना के मोहम्मद यूसुफ बनने को ‘टर्निंग पॉइंट’ के रूप में सुना है? सईद अनवर के कवर ड्राइव से अधिक उनके मौलवी बनने के बाद आए कथित ‘चमत्कारों’ पर चर्चाएँ सुनी हैं?

2014 का वह वीडियो भी याद कीजिए, जब पाकिस्तानी क्रिकेटर अहमद शहजाद श्रीलंकाई खिलाड़ी तिलकरत्ने दिलशान से यह कहते पाए गए कि अगर आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो जीवन में कुछ भी करें, अंततः जन्नत तय है। यह साथी क्रिकेटर से संवाद नहीं था। यह एक मजहबी दखल था।

ICC ने कुछ मामलों में चेतावनियाँ दीं, लेकिन वह घुसपैठ रोकने में विफल रही है। दानिश कनेरिया का प्रकरण बताता है कि यह जहर मैदान से बाहर निकलकर ड्रेसिंग रूम तक पहुँच चुका है। उन्होंने खुलकर बताया कि कैसे धार्मिक पहचान के आधार पर उन्हें अलग-थलग किया गया, धर्मांतरण का दबाव डाला गया। यह किसी एक खिलाड़ी की पीड़ा नहीं, उस मानसिकता का प्रमाण है जहाँ ‘टीम’ से पहले ‘मजहब’ आता है।

यहाँ प्रश्न आस्था का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या क्रिकेट टीम किसी मजहबी एजेंडे का विस्तार है? यदि नहीं, तो यह दबाव क्यों?

उस्मान ख्वाजा का बयान इसी प्रवृत्ति का अगला चरण है। जब उम्र, फिटनेस और अनुशासन पर सवाल उठें, तो मजहब को ढाल बना लो। पाकिस्तान इस कला में पारंगत है। वर्षों से वह अपनी असफलताओं को ‘साज़िश’, आलोचना को ‘ईमान-विरोध’ और अनुशासन को ‘आस्था का दमन’ बताकर टालता आया है।

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट विशुद्ध जेंटलमैन गेम है। उसने कई विवाद देखे हैं। जैसे केरी पैकर सीरीज, मैच-फिक्सिंग, मंकीगेट…। लेकिन मजहब कभी एजेंडा नहीं बना। जब मजहब एजेंडा बन जाता है, तब खेल की तटस्थता समाप्त हो जाती है। टीम-स्पिरिट टूटती है। साझा लक्ष्य की जगह साझा मजहब हावी हो जाता है। अनुशासन ढीला पड़ता है और दर्शकों का भरोसा गिरता है।

इसका समाधान स्पष्ट और कठोर होना चाहिए। मैदान पर किसी भी राजनीतिक-मजहबी प्रदर्शन को पूर्णतः अस्वीकार्य घोषित किया जाए। ड्रेसिंग रूम में मजहबी दबाव पाए जाने पर पूरी टीम को दंडित किया जाए। आवश्यकता पड़े तो उस देश को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से प्रतिबंधित किया जाए।

स्मरण रहे क्रिकेट सभ्यताओं को जोड़ने का खेल है। उन्हें विभाजित करने का मैदान नहीं। जब खिलाड़ी जर्सी से पहले एजेंडा पहनने लगें, तो खेल हारता है। दर्शक हारते हैं।

आवश्यक है कि क्रिकेट को क्रिकेट रहने दिया जाए। इस्लाम के बोझ से मुक्त। ऐसा नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं, जब मैदान पर बल्ला–गेंद नहीं, विचारधाराएँ टकराएँगी।