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सहिष्णु हिंदू खुद के लिए खतरा? : तिरुपति बालाजी प्रसाद में चर्बी: 189 साल पहले रची गई साजिश का नतीजा, आज भी भोग रहा हिंदू समाज


गुरुकुल पद्धति को तहस-नहस कर कॉन्वेंट शिक्षा पद्धति की नींव रखा था लॉर्ड मैकाले ने। क्यों उसने ऐसा किया था, यह इतिहास की बात है। वर्तमान में भी उसका कितना असर पड़ रहा है, यह सीखने-समझने की जरूरत है। उसके द्वारा लिखे पत्रों से इस बात का खुलासा होता है कि अपनी शिक्षा पद्धति के माध्यम से वह कौन से विष बीज बो रहा था भारतीय समाज में, जिनकी फसल निकट भविष्य में आनी ही थी, वो आज दिख भी रही है।

मैकाले लिखता है कि आने वाले वक्त में भारतीय समाज शरीर से हिन्दुस्तानी होगा लेकिन आत्मा उसकी एक अंग्रेज की होगी। आज वही सब परिलक्षित होता दिखाई दे रहा है।

सनातन आस्था के सबसे बड़े केन्द्र तिरुपति बालाजी के प्रसादम् में गाय और सुअर की चर्बी की मिलावट का मामला बेहद निंदनीय और गहरा षड्यंत्र है। यह सनातन आस्था पर गहरी चोट करता है। बड़ी चिंता का विषय लेकिन यह है कि ऐसे घृणित मामले पर समाज के उस बड़े तबके से विरोध के जो स्वर उठने चाहिए थे, वह नज़र नहीं आते।

ऐसे ही मसले पर इतिहास में हिंदू समाज की क्या प्रतिक्रिया थी, वह जानने लायक है। 1857 में एक अफ़वाह उठी थी (जिसके पुख़्ता प्रमाण नहीं हैं) कि अंग्रेज कारतूसों में चर्बी मिलाते थे। इस एक अफवाह पर पूरी क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठी थी। तब की क्रान्ति की तुलना वर्तमान मामले से कर लेते हैं। तिरुपति बालाजी प्रसादम् में चर्बी वाली बात लैब टेस्टिंग में प्रमाणित हो चुकी है। बावजूद इसके एक सन्नाटा पसरा है हिंदू समाज में।

सेकुलरिजम का रोग, नेताओं से अधिक पॉलिटिकल करेक्टनेस का भूत शायद हिंदू समाज पर हद से ज्यादा हावी है। अफसोस यह कि इस समाज को चुनाव भी नहीं लड़ना है। फिर भी विदेशी शिक्षा के संंस्कार शायद इस कदर घर कर चुके हैं कि हम गंभीर से गंभीर मामले का भी सरलीकरण करने के अभ्यासी हो चुके हैं।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह हमारे पूर्वजों का पौरुष और बलिदान ही था कि गुरु गोविन्द सिंह जैसे तपस्वियों ने अपने दो पुत्रों को बलि वेदी पर जाते हुए भी धर्म नहीं बदला। वंदा वैरागी को उनके पुत्र का सीना चीरकर उसके धड़कते हृदय को खाने पर मजबूर किया लेकिन फिर भी उन्होंने मतांतरण स्वीकार नहीं किया। ऐसे बलिदानियों के बदौलत ही आज भी यह समाज सनातन है!

एक समाज के तौर पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज कई तरह के खतरों की आहट है। आज के समय में भी ताड़का और पूतना की राक्षसी वृत्तियाँ निगलना चाहती हैं हमको। एक का औज़ार हथियार है और दूसरे का प्यार। फिलहाल पूतना वक्ष में विष लपेटकर निकली है मातृत्व के दिखावे के साथ।

वक्त है अभी चेत जाने का। विरोधी स्वर बुलंद करने का। अन्यथा आने वाला वक्त यह अवसर भी छीन लेगा। सेकुलरिज्म का रोग दीमक बन कर खा रहा है। अब सेकुलर नहीं, मुखर होने की माँग कर रहा वक्त आपसे और हमसे। यहाँ रूसी विचारक लियोन ट्रॉट्स्की का विचार  प्रसंगिक है: “You may not be interested in war, but war is interested in you.”

मतलब समाज में कुछ सड़-गल रहा हो, कुछ अनैतिक हो रहा हो… और आप यह सोच कर बैठ जाएँ कि उसका प्रभाव आप तक नहीं होगा, यह मूर्खतापूर्ण है। आपके इर्द-गिर्द जो भी हो रहा है, आप उसकी चपेट में परोक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर आएँगे ही, यह निश्चित है। 

आप भले ही किसी से जलन न रखें, उन्हें नुक़सान न पहुँचाएँ, लेकिन कुछ विचार धाराएँ हैं, जो आप पर आघात करने को आतुर हैं। इसीलिए हों सावधान, रहें सतर्क… और सबसे जरूरी – रहें एकजुट!

आंध्र प्रदेश : लैब रिपोर्ट ने किया कन्फर्म : जिस घी से बनता था तिरुपति का मशहूर लड्डू, उसमें मिला था बीफ-सूअर की चर्बी और मछली का तेल


तिरुपति के लड्डू में इस्तेमाल होने वाले घी की गुणवत्ता पर उठाए गए सवाल सच थे। जाँच नतीजों में पता चला है कि जगन सरकार ने तिरुपति मंदिर में जिस घी से लड्डू बनाने की अनमुति दी थी उसमें हकीकत में जानवरों की चर्बी थी। उसमें बीफ फैट, मछली का तेल और लार्ड (सूअर की चर्बी), ताड़ का तेल और अन्य चीजें शामिल थीं।

गुजरात स्थित राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की “पशुधन एवं खाद्य विश्लेषण एवं अध्ययन केंद्र” (सीएएलएफ) प्रयोगशाला की रिपोर्ट के अनुसार, प्रसाद तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाले घी में जानवर की चर्बी थी। रिपोर्ट में देख सकते हैं साफ-साफ इन सारी चीजों का जिक्र है। रिपोर्ट में लिखा है- घी में सोयाबीन, सूरजमुखी, जैतून, रेपसीड, अलसी, गेहूं के बीज, मक्का के बीज, कपास के बीज, नारियल, पाम कर्नेल फैट और पाम ऑयल के अलावा बीफ टैलो, लार्ड और मछली का तेल आदि है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद इस हरकत से हिंदू आहत हैं।

इस मामले को जहाँ स्वयं प्रदेश मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू द्वारा उठाया गया तो वहीं केंद्रीय मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बंदी संजय ने कहा, “तिरुमाला के लड्डू को बहुत ही ‘पवित्र प्रसाद’ माना जाता है, इसे दूषित करना अक्षम्य पाप है… पिछली सरकार के कार्यकाल में, अन्य धर्मों के कुछ लोगों को टीटीडी (तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम) बोर्ड में शामिल किया गया था… इसलिए ऐसी घटना हुई। मैं आंध्र प्रदेश सरकार से तुरंत जाँच करने और सख्त कार्रवाई करने का अनुरोध करता हूँ।”

तिरुपति मंदिर और लड्डू का महत्व

आंध्र प्रदेश के तिरुमाला में स्थित तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित हिंदू मंदिरों में से एक है। यह मंदिर तिरुमाला पहाड़ियों के ऊपर स्थित है। दुनिया भर से भक्त प्रार्थना करने और आशीर्वाद लेने के लिए मंदिर आते हैं, जिससे यह भारत के सबसे समृद्ध और व्यस्ततम तीर्थ स्थलों में से एक बन गया है। इस मंदिर को तिरुमला तिरुपति देवस्थानम(एक स्वतंत्र ट्रस्ट) द्वारा मैनेज किया जाता है। मंदिर जितना अपनी रीतियों के लिए प्रसिद्ध है उतना ही लड्डू के लिए है। यहाँ रोजाना 3.5 लाख लड्डू बनते हैं जिनके लिए 400-500 किलो घी लगता है, 750 किलो काजू, 500 किलो किशमिश और 200 किलो इलायची लगती है।
हालिया विवाद के बाद टीटीडी ने एक कमेटी बनाई है जो लड्डुओं के लिए गुणवत्तापूर्ण घी खरीदने के लिए नियम व शर्तों पर सलाह देगी। वहीं आम हिंदू इस खबर को सुन हैरान हैं। उनका कहना है कि भगवान और भगवान के भक्तों के साथ किया गया ये ऐसा पाप है जिसकी कोई क्षमा नहीं है। भगवान इसका फल YSRCP को जरूर देंगे।