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नार्वे की पत्रकार हेले के बहाने राहुल गांधी के सवाल नहीं, सुनियोजित नैरेटिव का खेल


अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में शब्दों का चयन, मंच की मर्यादा और संवाद की प्रकृति बहुत मायने रखती है। दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों या प्रधानमंत्रियों की आधिकारिक बैठकों के दौरान होने वाली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कोई टीवी डिबेट नहीं होती, जहां अचानक सवालों की बौछार कर दी जाए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को इतने सालों तक सांसद रहने और राजनीतिक जीवन जीने के बावजूद इतनी भी जानकारी नहीं है कि इन कार्यक्रमों का स्वरूप पहले से तय होता है। वक्तव्य निर्धारित होते हैं और कई बार प्रश्न पूछने की व्यवस्था भी सीमित या नियंत्रित रहती है। दुनियाभर के लगभग सभी बड़े लोकतांत्रिक देशों में यह सामान्य प्रक्रिया है। इसके बावजूद नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के बहाने राहुल गांधी ऐसे नकारात्मक ट्वीट करते हैं तो साफ पता चलता है कि वे भी इस सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा हैं। क्योंकि जब बात भारत और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आती है, तब कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रकार और भारत के भीतर बैठे राजनीतिक विरोधी हर सामान्य प्रक्रिया को “लोकतंत्र के संकट” का रंग देने लगते हैं। पत्रकार हेले लिंग का विवादित सवाल इसी रणनीति का ताजा उदाहरण है।
                                                                                                    साभार : सोशल मीडिया 

कूटनीतिक मंच को राजनीतिक रंग देने की कोशिश

दरअसल, नॉर्वे में आयोजित संयुक्त प्रेस कार्यक्रम के दौरान पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से अचानक सवाल पूछा कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते?” पहली नजर में यह सामान्य प्रश्न लग सकता है, लेकिन सवाल का तरीका, उसका समय, उसके पीछे की मंशा और उसके बाद हेले के ट्वीट सारे सुनियोजित नैरेटिव की ओर साफ-साफ इशारा कर देते हैं। क्योंकि यह कोई स्वतंत्र मीडिया संवाद कार्यक्रम नहीं था। यह दो देशों के बीच आधिकारिक कूटनीतिक कार्यक्रम था। ऐसे आयोजनों में आमतौर पर कई बार कोई प्रश्नोत्तर सत्र होता ही नहीं। अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, जापान समेत दुनिया के अनेक देशों में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहां राष्ट्राध्यक्ष बिना सवाल लिए मंच से चले गए। लेकिन उन मौकों पर “लोकतंत्र खतरे में है” जैसा वैश्विक शोर नहीं मचाया गया। स्पष्ट है कि यहां उद्देश्य जवाब पाना कम और एक राजनीतिक मसौदा तैयार करना ज्यादा था। हेले जिस नार्वे की प्रेस को दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रे बता रही हैं, वहीं के पीएम ने पत्रकारों के सवालों पर चुप्पी साथ ली थी।

सवाल पूछने से ज्यादा ट्विटर पोस्ट का था हेले का मकसद

एक छोटे से जिस अखबार Dagsavisen के लिए पत्रकार हेले लिंग काम करती हैं, उसके फॉलोवर्स 50 हजार भी नहीं हैं। इसलिए साफ है कि ऐसे टुच्चे मीडिया संस्थान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विवादित सवाल पूछकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करते हैं। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि भारत से जुड़े मुद्दों पर पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। यह विवाद तब और गहरा हो गया जब प्रेस कार्यक्रम के बाद हेले लिंग ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की। यदि उनका उद्देश्य सिर्फ पत्रकारिता था, तो सवाल पूछने के बाद मामला वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन सोशल मीडिया पर राजनीतिक शैली में टिप्पणी करना यह संकेत देता है कि पूरा प्रकरण केवल पेशेवर पत्रकारिता तक सीमित नहीं था।

मोदी विरोधी द वायर को फोलो करती है हेले

यहीं से यह मामला एक सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा दिखाई देने लगता है। पहले सार्वजनिक मंच पर सवाल उछालो। जहां पहले से ही पता है कि इसका जवाब देने प्रोटोकॉल में ही नहीं है। फिर सोशल मीडिया पर उसे वैचारिक रंग दो और उसके बाद भारत विरोधी समूहों तथा राजनीतिक दलों द्वारा उसे amplify कराया जाए। यही पैटर्न वर्षों से दिखाई देता रहा है। हालांकि नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने मंगलवार को नॉर्वे की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई अपनी टिप्पणियों के बाद हुई आलोचना और ऑनलाइन हमलों का जवाब देते हुए कहना ही पड़ा कि वह “किसी भी तरह की विदेशी जासूस नहीं हैं”। यह भी तथ्य है कि हेले ट्वीटर पर जिनको फोलो करती है, उनमें एकमात्र भारतीय डिजिटल कंपनी द वायर भी है, जिसके मोदी विरोधी होने पर कोई शक नहीं है। The Wire ने नरेंद्र मोदी सरकार की कई नीतियों जैसे नागरिकता कानून, मीडिया स्वतंत्रता, पेगासस जासूसी विवाद, चुनावी बॉन्ड, नोटबंदी, संस्थागत स्वायत्तता आदि पर लगातार नेगेटिव रिपोर्टिंग की है।

राहुल गांधी की राजनीति और विदेशी मंचों का सहारा

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को तुरंत राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने विदेशी मंचों, विदेशी रिपोर्टों या अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियों का सहारा लेकर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं, केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाने की कोशिश की हो। राहुल गांधी कभी विदेशी विश्वविद्यालयों में जाकर भारतीय लोकतंत्र पर टिप्पणी, कभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों का हवाला, तो कभी विदेशी पत्रकारों के बयान, यह सब एक लगातार चलने वाली राजनीतिक रणनीति बन चुकी है।

भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करते हैं राहुल गांधी

विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना जरूर है, लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर हों और उस समय विदेशी मीडिया द्वारा उठाए गए राजनीतिक नैरेटिव को भारत के भीतर का विपक्ष और राहुल गांधी आगे बढ़ाने लगें, तब सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं। क्या यह सिर्फ सरकार का विरोध है या फिर भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास भी है? वास्तविकता यह है कि भारत में प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना प्रतिदिन टीवी बहसों, अखबारों, यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया पर खुले तौर पर होती है। विपक्ष सरकार पर लगातार हमले करता है। सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र है, चुनाव आयोग सक्रिय है और जनता हर चुनाव में अपना निर्णय खुलकर देती है। ऐसे देश को “लोकतंत्र संकट” के फ्रेम में फिट करने की कोशिश वस्तुतः वैचारिक पूर्वाग्रह को दर्शाती है।

अवलोकन करें:-

नॉर्वेजियन पत्रकार Helle Lyng के फेर में यूट्यूबर दलाल पत्रकार अभिसार शर्मा की पोल खुली, गौतम अडानी स
हेले का सवाल नहीं एजेंडा, उसका पिछला ट्वीट दो साल पहले

नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल पूछने पर विवाद शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वो पत्रकारिता नहीं बल्कि भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैला रही हैं। उनका सवाल एजेंडे से प्रेरित था। जबकि कुछ लोग इसे प्रेस की आजादी बता रहे हैं। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पश्चिमी देशों के कुछ मीडिया संस्थान भारत की छवि को लेकर पहले से तय नैरेटिव के साथ काम करते हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि पत्रकार हेल्ले लिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आखिरी पोस्ट 10 अप्रैल 2024 को किया था। इसके बाद उनका अगला पोस्ट प्रधानमंत्री मोदी को लेकर ही था।

हेले की नीयत पर भी सवाल कि पत्रकारिता या प्रोपेगेंडा?

पत्रकार हेले लिंग भले ही कुछ भी सफाई दे लेकिन वो भारत को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित महसूस हो रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे भारत में भी कई पत्रकार पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं। क्योंकि हेले लिंग ने जहां प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछा असल में वो एक पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं था बल्कि वो एक ऐसा प्रेस कॉन्फ्रेंस था जहां दोनों देशों के नेता समझौतों के बारे में आधिकारिक बातें बताते हैं। किसी भी देश में ऐसे कार्यक्रम में अमूमन सवाल जवाब नहीं होते हैं। इसीलिए हेले लिंग की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उन्होंने सवाल पूछने के लिए एक ऐसे मंच को क्यों चुना जहां पारंपरिक तौर पर सवाल जवाब नहीं होते हैं।

वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी

यह भी समझना होगा कि नरेंद्र मोदी आज केवल भारत के प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक मंचों पर उसकी मजबूत उपस्थिति, जी-20 की सफल मेजबानी, रूस-यूक्रेन जैसे मुद्दों पर संतुलित कूटनीति और विकसित भारत का विजन, इन सबने भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को मजबूत किया है। ऐसे समय में भारत विरोधी नैरेटिव खड़ा करने की कोशिशें भी तेज हुई हैं। कभी मानवाधिकार के नाम पर, कभी प्रेस स्वतंत्रता के नाम पर, तो कभी लोकतंत्र के नाम पर। उद्देश्य एक ही दिखाई देता है कि भारत की उभरती हुई वैश्विक छवि को संदेह के घेरे में खड़ा करना। भारत को लेकर पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से का रवैया लंबे समय से चयनात्मक रहा है। जिन देशों में प्रेस पर खुला नियंत्रण है, वहां अक्सर यही मीडिया बेहद नरम दिखाई देता है। लेकिन भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र, जहां हजारों समाचारपत्र, सैकड़ों टीवी चैनल, अनगिनत डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकार की आलोचना करने वाले असंख्य पत्रकार सक्रिय हैं, वहां “प्रेस की आजादी खत्म” होने का नैरेटिव गढ़ा जाता है।

पत्रकारिता और राजनीतिक एक्टिविज्म के बीच की महीन रेखा

यह सही है कि पत्रकारिता का उद्देश्य सवाल पूछना है, लेकिन पत्रकारिता और राजनीतिक एक्टिविज्म के बीच एक महीन रेखा भी होती है। जब कोई पत्रकार प्रश्न पूछने के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करने लगे और उसका उपयोग विपक्षी दल अपने एजेंडे के लिए करने लगें, तब निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं है। बल्कि इसमें राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने के सुनियोजित साजिश भी नजर आती है। लोकतंत्र में सवाल पूछना आवश्यक है, लेकिन सवालों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रोपेगेंडा के औजार की तरह करना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है। दुर्भाग्य यह है कि आज दुनिया के कुछ हिस्सों में भारत को देखने के लिए उसी चश्मे का इस्तेमाल करते है, जिसे राहुल गांधी ने धारण किया हुआ है।

भारत को लेकर बदली हुई वैश्विक मानसिकता

दुनियाभर के सामने अब यह शीशे की तरह साफ हो गया है कि आज का भारत 15 साल पहले वाला भारत नहीं है। भारत अब दबाव में आने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि अपने हितों और अपनी आवाज को मजबूती से रखने वाला आत्मविश्वासी देश है। यही आत्मविश्वास कई वैश्विक शक्तियों और वैचारिक समूहों को असहज करता है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। यही कारण है कि भारत विरोधी नैरेटिव बनाने की हर छोटी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। हेले लिंग प्रकरण भी उसी कड़ी का हिस्सा प्रतीत होता है, जहां एक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया को “लोकतंत्र बनाम तानाशाही” जैसी अतिरंजित बहस में बदलने की कोशिश की गई। 

शराब घोटाले में पूछताछ से कब तक भागेंगे केजरीवाल? 7 समन पर 7 बहाने, ईडी ने भेजा 7वां समन; गिरफ़्तारी से कब तक बचेंगे?

कहावत है कि बकरे कि माँ कब तक खैर मनाएगी, एक दिन तो छुरी के नीचे आएगी, ठीक वही स्थिति अरविन्द केजरीवाल की है। इस बात को आम आदमी पार्टी से लेकर देश की समस्त पार्टियां भलीभांति जानती हैं। और कांग्रेस सूत्रों के अनुसार केजरीवाल को कम से कम 2 साल पहले गिरफ्तार कर लेना चाहिए था। I.N.D.I. गठबंधन में कांग्रेस से समझौता एक सोंची-समझी राजनीति है। यह भी संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं कि केजरीवाल अपने आपको निर्दोष साबित करने सारा आरोप मनीष सिसोदिया और संजय सिंह पर डाल दे, क्योकि केजरीवाल के पास एक भी मंत्रालय नहीं।  

दिल्ली शराब घोटाले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर गिरफ्तारी तलवार लटकी हुई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उन्हें सातवां समन जारी किया है और 26 फरवरी को पूछताछ के लिए बुलाया है। इससे पहले उन्हें छह समन जारी किए जा चुके हैं लेकिन वे ईडी के सामने पूछताछ के लिए पेश नहीं हुए। वे हर बार नए-नए बहाने बनाकर पेशी के लिए खुद को अनुपलब्ध बताते रहे। झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हेमंत सोरेन को भी 10 समन जारी किया गया था और अंततः उन्हें ईडी के सामने सरेंडर करना पड़ा। दिल्ली शराब घोटाले में दिल्ली सरकार किस तरह लिप्त है उसे इस बात से समझा जा सकता है कि केजरीवाल के करीबी मनीष सिसोदिया करीब एक साल से जेल में हैं और उन्हें जमानत नहीं मिल रही है।

केजरीवाल को ED का 7वां समन

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को ईडी का 7वां समन मिला है। ईडी ने 22 फरवरी 2024 को उन्हें समन भेजते हुए पूछताछ के लिए 26 फरवरी 2024 को बुलाया है। इससे पहले अरविंद केजरीवाल को 19 फरवरी 2024 को ED के सामने पेश होना था, लेकिन वह हाजिर नहीं हुए और हर बार नया बहाना बनाते रहे। अब देखना है कि सातवें समन पर केजरीवाल कौन सा बहाना बनाते हैं।

केजरीवाल को 7 समन और 7 बहाने

 केजरीवाल को छठा समन

दिल्ली शराब घोटाले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी ने छठा समन 14 फरवरी को भेजा था और 17 फरवरी को पेश होने के लिए कहा था।
बहाना- समन गैर कानूनी
केजरीवाल ED के छठे समन पर भी पेश नहीं हुए। केजरीवाल; AAP ने कहा- समन गैर कानूनी, वैधता का मामला अब कोर्ट में
पांचवां समन
अरविंद केजरीवाल को ED ने 31 जनवरी को पांचवां समन भेजा और दो फरवरी को पूछताछ के लिए बुलाया।
बहाना – राजनीतिक षड्यंत्र 
आम आदमी पार्टी केजरीवाल को पांचवें समन पर कहा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जारी किए गए समन के पीछे एक ‘‘राजनीतिक षड्यंत्र’’ है और विपक्ष के नेताओं को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।
चौथा समन
दिल्‍ली शराब घोटाले मामले में दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय ने चौथा समन 13 जनवरी को जारी किया और 18 जनवरी को पूछताछ के लिए बुलाया।
बहाना- हमने भ्रष्टाचार नहीं किया
केजरीवाल के चौथे समन पर आम आदमी पार्टी ने कहा, “ईडी ने कहा है कि केजरीवाल आरोपी नहीं हैं, फिर उन्हें क्यों बुलाया जा रहा है? भ्रष्ट नेता बीजेपी में जाते हैं, उनके मामले बंद हो जाते हैं। हमने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है, हमारा कोई भी नेता बीजेपी में नहीं जाएगा।”
तीसरा समन
सीएम केजरीवाल को ईडी ने तीसरा समन 22 दिसंबर को जारी किया और उन्हें तीन जनवरी को पेश होने को कहा था। लेकिन केजरीवाल ईडी के सामने पेश होने के बजाय विपश्यना के लिए पंजाब के होशियारपुर पहुंच गए।
बहाना- राज्यसभा चुनाव और गणतंत्र दिवस
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ईडी के तीसरे समन पर 3 जनवरी को जांच एजेंसी को ल‍िख‍ित जवाब भेजा। उन्‍होंने ईडी को अवगत कराया क‍ि फ‍िलहाल राज्यसभा चुनाव और गणतंत्र दिवस की तैयारियों में व्यस्त हैं। वह एजेंसी की किसी भी प्रश्नावली का जवाब देने को तैयार हैं।
दूसरा समन
दिल्ली के शराब घोटाले मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को दूसरा समन 18 दिसंबर 2023 को भेजा और 21 दिसंबर को पूछताछ के लिए बुलाया।
बहाना- समन गैर-कानूनी
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ED (प्रवर्तन निदेशालय) के दूसरे समन पर अपना जवाब दिया। उन्होंने अपने जवाब में लिखा कि मैं हर कानूनी समन मानने को तैयार हूं, लेकिन ईडी का यह समन भी पिछले समन की तरह ही गैर-कानूनी है।
पहला समन
दिल्ली की शराब नीति में हुए घोटाले से जुड़े मामले में ED ने सीएम अरविंद केजरीवाल को पहला समन 30 अक्टूबर 2023 को भेजा था और पूछताछ के लिए 2 नवंबर को बुलाया था।
बहाना- मैं संदिग्ध हूं या गवाह
दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल शराब नीति केस में पूछताछ के लिए जांच एजेंसी ED के सामने पेश नहीं हुए। इसके बदले केजरीवाल ने ED को एक लेटर भेजकर समन को वापस लेने को कहा। साथ ही केजरीवाल ने जांच एजेंसी से सवाल किया कि, आपने समन में मुझे यह नहीं बताया कि मैं संदिग्ध हूं या गवाह।
कोर्ट के समन पर भी बनाया बहाना
दिल्ली शराब घोटाले में ईडी के पांच समन ठुकराने के बाद दिल्ली कोर्ट ने 7 फरवरी को सीएम अरविंद केजरीवाल को समन जारी किया और 17 फरवरी को पेश होने को कहा।
बहाना- विश्वास प्रस्ताव और बजट सत्र
केजरीवाल ने अपनी वर्चुअल पेशी के दौरान कहा, ‘मैं फिजिकली आना चाहता था लेकिन ये अचानक विश्वास प्रस्ताव आ गया। बजट सत्र चल रहा है, 1 मार्च तक चलेगा। इसके बाद कोई भी तारीख दी जा सकती है।’ जिस पर कोर्ट ने कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की पेशी के लिए 16 मार्च की तारीख तय कर दी।
पांच पॉइंट्स पर होनी है पूछताछ
ईडी ने कोर्ट में बताया है कि वह पांच बिंदुओं को आधार बनाकर अरविंद केजरीवाल से पूछताछ करना चाहती है। ईडी के अनुसार जांच में पांच पॉइंट्स सामने आये हैं, जिसमें पहला हिया कि प्रोसीड ऑफ क्राइम के दौरान 338 करोड रुपए आम आदमी पार्टी तक पहुंचे हैं।
1. शराब माफिया से 338 करोड़ रुपए AAP को मिले
मनीष सिसोदिया की बेल पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट ने 338 करोड रुपए की मनी ट्रेल अदालत के सामने रखी थी। जिसमें यह साबित हो रहा था कि आबकारी नीति के दौरान शराब माफिया से 338 करोड़ रुपए आम आदमी पार्टी तक पहुंचा है। पार्टी के संरक्षक अरविंद केजरीवाल है इसलिए उनसे पूछताछ करना जरूरी है। 
2. आरोपियों से केजरीवाल की हुई थी वीडियो कॉल
वहीं ईडी का दूसरा पॉइंट है कि आबकारी घोटाले के आरोपी इंडोस्पिरिट के डायरेक्टर समीर महेंद्रू ने पूछताछ में ईडी को बताया कि अरविंद केजरीवाल के बेहद करीबी विजय नायर ने उसकी मुलाकात फेस टाइम एप्प के जरिये अरविंद से करवाई थी। जिसमें अरविंद केजरीवाल ने उससे बोला था कि विजय नायर उसका आदमी है और उसे नायर पर भरोसा रखना चाहिए।
3. आबकारी नीति की मीटिंग सीएम के आवास पर भी हुई
वहीं तीसरा पॉइंट ईडी ने बताया है कि नई आबकारी नीति को लेकर मीटिंग अरविंद केजरीवाल के घर पर भी हुई थी।
4. शराब नीति बनाने में केजरीवाल की भूमिका
चौथा पॉइंट मनीष सिसोदिया के तत्कालीन सचिव सी अरविंद ने पूछताछ के दौरान बताया कि आबकारी नीति में 6 प्रतिशत का मार्जिन प्रॉफिट था, जिसे अरविंद केजरीवाल की मंजूरी से ही 12 प्रतिशत किया गया था। यानी आबकारी नीति बनाने में अरविंद केजरीवाल की भी भूमिका थी।
5. शराब नीति के लिए कैबिनेट बैठक केजरीवाल ने बुलाई
पांचवां और आखिरी पॉइंट नई आबकारी नीति को लेकर जो कैबिनेट बैठक हुई थी वह कैबिनेट बैठक मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई जाती है। ईडी इन्हीं पांच पॉइंट्स को लेकर अरविंद केजरीवाल से पूछताछ करना चाहती है।