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दुबई में हिंदू मंदिर देख भड़के कट्टरपंथी : काफिर, तुझे शहर के बीच काट देना चाहिए

दुबई में हिंदू मंदिर (तस्वीर साभार: हसन सजवानी का ट्विटर)
दुबई के जेबल अली में हिंदू मंदिर बनकर तैयार हो रहा है। सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें वायरल हैं। जानकारी के मुताबिक मंदिर के दरवाजे श्रद्धालुओं के लिए 5 अक्टूबर 2022 से खुलेंगे। इसमें 16 देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित होंगी। भीतर एक ज्ञान कक्ष होगा और अन्य क्रियाकलापों के एक सामुदायिक भवन भी।

सिंधु गुरु दरबार मंदिर के ट्रस्टी राजू श्रॉफ ने खलीज टाइम्स से पुष्टि की कि मंदिर 5 अक्टूबर को हिंदुओं का प्रमुख त्योहार दशहरा है। ऐसे में उसी दिन आधिकारिक तौपर पर जनता के लिए दरवाजे खोले जाएँगे। श्रॉफ के अनुसार, ये मंदिर दो चरणों में खुलेगा। पहले में तो केवल श्रद्धालु के लिए पूजा पाठ के लिए द्वार खोले जाएँगे। दूसरे में जो कि 14 जनवरी 2023 को होगा उसमें समुदाय भवन और ज्ञान कक्ष खोला जाएगा।

इस मंदिर में 1000-2000 श्रद्धालु पूजा कर पाएँगे। हिंदू त्योहारों और वीकेंड में ये संख्या और बढ़ने के अनुमान हैं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए क्यूआर कोड भी इंस्टॉल किया गया है। यहाँ अपॉइंटमेंट बुक हो सकेगी। मंदिर का समय सुबह 6 से रात के 9 बजे तक रहेगा। हर हिंदू त्योहार यहाँ मनेगा और अच्छे भोग के लिए रसोई व कोल्ड स्टोरेज का भी इंतजाम हैं। मंदिर के भीतर एलसीडी लगाई जाएँगी जहाँ श्लोक होंगे और ज्ञान आदि की बातें होंगी।

कट्टरपंथियों को मंदिर देख आया गुस्सा

दुबई में बन रहे इस हिंदू मंदिर के लिए विश्व भर से हिंदू दुबई को आभार जता रहे हैं जबकि कट्टरपंथी दुबई में मंदिर को देख आग बबूला हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर इन लोगों ने गुस्सा जाहिर किया है।
हरीथ महसूद ने कहा, “जब वो अपने देशों में इस्लाम बैन कर रहे हैं। हम उनके फर्जी भगवानों के लिए मंदिर बना रहे हैं और फिर पूछते हैं कि हमारी गती हैं। हम सबको एक दिन अल्लाह के आगे जवाब देना होगा।”
हमजा ने कहा, “मुस्लिमों की गिराई जाने वाली हर मस्जिद के बदले तुम अरब की जमीन पर एक मंदिर बनाने को तैयार रहना। क्या एक्सचेंज ऑफर चला रखा है तुम लोगों ने।”
एक यूजर कहता है, “16 बुतों का घर… अरब राष्ट्र में रहते हुए सोचो ये सब बकवास देखना पड़े।” वहीं दूसरा ये पूछता है कि आखिर ऐसे मुस्लिमों के लिए क्या हुक्म है जो मंदिर बनाकर शिर्क करते हैं?”
कट्टरपंथियों को सिर्फ इस बात से दिक्कत नहीं है कि दुबई में हिंदू मंदिर बन गया। उन्हें उस मुस्लिम से भी समस्या है जो इसे एक अच्छी पहल मान रहा है। अली नाम का यूजर हसन सजवानी(जिन्होंने तस्वीरें शेयर की) उन्हें कहता है, “16 बुतों का घर- अल्लाह की कसम तुम काफिर और तुम्हें तो शहर के बीच लाकर काटा (चाकू का निशान बनाकर) जाना चाहिए।”

न्यूयॉर्क : इस्लाम अमनपसंद मजहब है, यह बताने के लिए मुस्लिमों ने ब्लॉक कर दी सड़क

                              न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर पर पढ़ी गई नमाज (फोटो साभार: @HSajwanization)
अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित विश्व प्रसिद्ध टाइम्स स्क्वायर (Times Square) पर पहली बार नमाज पढ़ी गई। शनिवार (3 अप्रैल 2022) को बड़ी संख्या में यहाँ मुस्लिम तरावीह की नमाज (Tarawih Prayers) अदा करने को पढ़े। इसकी वजह से व्यस्त टाइम्स स्क्वायर का रास्ता बंद होने को लेकर विवाद हो गया है। इसके कई वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हैं।

गल्‍फ टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब सैकड़ों मुस्लिमों ने टाइम्‍स स्‍क्‍वायर पर नमाज पढ़ी है। इस कार्यक्रम के आयोजकों ने स्थानीय मीडिया को बताया कि अमेरिका में रहने वाले मुसलमान चाहते थे कि रमजान को न्‍यूयॉर्क सिटी के इस बहुचर्चित स्‍थान पर मनाया जाए और लोगों को यह बताया जाए कि इस्‍लाम एक शांतिपूर्ण मजहब है। आयोजकों ने यह भी कहा कि इस्‍लाम को लेकर पूरी दुनिया में कई गलत धारणाएँ हैं।

आयोजकों ने कहा, “हम सभी लोगों को अपने मजहब के बारे में बताना चाहते थे, जो इसके बारे में भली-भाँति नहीं जानते। इस्‍लाम शांति का मजहब है।” रमजान का महीना शनिवार से शुरू हुआ है। चाँद दिखाई देने के बाद रमजान का ऐलान किया गया था। टाइम्‍स स्‍क्‍वायर पर नमाज पढ़ने को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया यूजर्स इसकी कड़ी आलोचना भी कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर खासा एक्टिव रहने वाले यूएई के हसन सजवानी लिखते हैं, “इस तरह से भीड़-भाड़ वाली जगह पर नमाज पढ़ने से अन्य लोगों को असुविधा होती है। केवल न्यूयॉर्क सिटी (NYC) में ही 270 से अधिक मस्जिदें हैं, और इबादत करने के लिए उचित स्थान हैं। अपने मजहब का प्रदर्शन करने के लिए लोगों का रास्‍ता रोकने की कोई जरूरत नहीं है। इस्‍लाम हमें यह नहीं सीखाता है।”

खलीफा नाम के एक अन्य यूजर ने लिखा, “मैं एक मुसलमान हूँ, लेकिन टाइम्‍स स्‍क्‍वायर पर नमाज पढ़ने का समर्थन नहीं करता हूँ। यह गलत संदेश दे सकता है कि इस्‍लाम ‘आक्रमण’ या घुसपैठ करने वाला है। इसलिए मस्जिदों में ही नमाज पढ़ें।”

कुछ ऐसे भी हैं जो टाइम्‍स स्‍क्‍वायर पर नमाज पढ़ने का समर्थन कर रहे हैं। इनमें से एक सलमान निजामी भी हैं, जो न्यूज चैनलों पर कॉन्ग्रेस का पक्ष रखते नजर आते हैं। ट्विटर पर वीडियो शेयर कर उन्होंने लिखा है, “दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के विश्‍व प्रसिद्ध टाइम्‍स स्‍क्‍वायर की सड़कों पर मुसलमानों ने तरावीह की नमाज अदा की। सहिष्णुता तो तब होती है, जब आप अपनी विविधता का जश्न मनाते हैं। बीजेपी का गुरुग्राम में नमाज पढ़ने से रोकना उनकी कट्टरता को दर्शाता है।”

नसीरुद्दीन के भाई जमीर उद्दीन शाह ने की हिंदू-मुस्लिम के बीच शांति की वकालत, भड़के इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें ट्विटर पर घेरा

जमीर उद्दीन शाह (बाएँ) और उनके भाई नसीरुद्दीन शाह
हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने वाले बॉलीवुड एक्टर नसीरुद्दीन शाह के भाई और एक्स इंडियन आर्मी ऑफिसर जमीर उद्दीन शाह (Zameer Uddin Shah) को हिंदू-मुस्लिमों के बीच सौहार्द के लिए बातचीत की सलाह देना भारी पड़ गया है। इस सुझाव के बाद सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी इस्लामिस्ट उनके खिलाफ लगातार बयानबाजी कर रहे हैं।

दरअसल, पिछले साल सेना के पूर्व अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल लिखा था। जिसका शीर्षक था, “क्यों मोहन भगत की हिंदू-मुस्लिम संचार की अपील सही रास्ते में एक कदम है।” बस उसी लेख को लेकर अब वो कट्टरपंथियों को निशाने पर आ गए हैं। उनकी आलोचना की शुरुआत मुस्लिम स्पेसेस नाम के एक ट्विटर यूजर ने की।

इसके बाद कई अन्य इस्लामवादियों ने भी उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया। पूर्व सैन्य अधिकारी को ट्रोल करते हुए ट्विटर पर इस्लामवादियों ने कहा कि उनकी यह ‘मंकी बैलेंसिंग’ की कोशिश ही उन्हें आगे ले जाएगी।

अपने आर्टिकल में जमीर उद्दीन शाह ने 4 जुलाई 2021 को गाजियाबाद में मेवाड़ संस्थान में RSS प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) द्वारा मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के ख्वाजा इफ्तिखार अहमद की पुस्तक, ‘द मीटिंग ऑफ माइंड्स-ए ब्रिजिंग इनिशिएटिव’ के विमोचन के दौरान किए गए संबोधन का जिक्र किया था। भागवत के भाषण का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा था कि वो भी दोनों समुदायों के बीच शांति स्थापित करने के लिए हिंदू-मुस्लिम बातचीत के पक्षधर हैं।

हालाँकि, जमीर उद्दीन शाह के द्वारा लिखा गया उनका ये पुराना आर्टिकल अब उनकी मुसीबतें बढ़ा रहा है। ट्विटर पर उनके ही समुदाय के लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शायद इस्लाम में शांति और सुधार की बात करना इस्लामवादियों के लिए सच्चा मुस्लिम नहीं है।

बहरहाल उन्होंने मुस्लिम स्पेसेस के ट्वीट का जबाव देते हुए ट्वीट किया, “मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच लगातार वार्ता ही सौहार्द और प्रगति की कुंजी है। दुर्भाग्य से दोनों तरफ हार्ड लाइनर्स हैं। लेकिन ये अधिक उत्साहजनक है कि समझदार लोगों की बढ़ती जमात कट्टरता से नफरत करती है।”

इसके बाद मुस्लिम स्पेस ने जमीर उद्दीन शाह के ट्वीट का जबाव देते हुए उनके द्वारा 11 अक्टूबर, 2019 को लिखे गए दूसरे आर्टिकल का स्क्रीनशॉट शेयर किया। जिसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति ने कहा था, “स्थायी शांति के लिए मुस्लिमों को अयोध्या की जमीन हिंदुओं को सौंप देनी चाहिए।”

फिर क्या था जमीर उद्दीन शाह ने अपने बयान ट्विटर पर सही ठहराया। उन्होंनें लिखा, “मेरे पास ऐसा कहने के अच्छे कारण थे। मुझे पता था कि न्यायाधीश शायद ही कभी जनता की राय के खिलाफ जाते हैं और मुझे यकीन था कि अयोध्या का फैसला क्या होगा। हम मस्जिद को फिर से हासिल नहीं करते, लेकिन हारे नहीं होते। अब हम न केवल केस हार चुके हैं बल्कि चौतरफा हार चुके हैं।”

जमीरुद्दीन शाह पर बरसे कट्टरपंथी

अपने आर्टिकल के जबाव में ज़मीर उद्दीन शाह कल से ऐसे कई कट्टरपंथी इस्लामवादियों को जवाब दे रहे हैं, जिनके मन और मस्तिष्क में लंबे वक्त से हिंदुओं के लिए नफरत भरी हुई है।
ये बड़ी ही दिलचस्प बात है कि कट्टरपंथी इस्लामी नसीरुद्दीन शाह के भाई को निशाना बना रहे हैं, क्योंकि वो उनकी चरमपंथी विचारधारा के खिलाफ हैं। लेकिन इन चरमपंथियों ने उस वक्त चुप्पी साध ली थी, जब उन्होंने 2002 के गोधरा दंगों को लेकर गुजरात की तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार के बारे में झूठ बोला था।

जमीरुद्दीन शाह ने गुजरात दंगे पर बोला था झूठ

नसीरुद्दीन शाह के भाई लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत) जमीर उद्दीन शाह की आगामी पुस्तक ‘द सरकार मुसलमान’ के कुछ अंश 6 अक्टूबर 2018 में प्रकाशित किए गए थे। इसमें उन्होंने दावा किया था कि फरवरी 2002 में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के नरसंहार के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे थे। अयोध्या से लौटने वाले तीर्थयात्रियों को जिंदा जला दिया गया था। लेकिन, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार सेना को तत्काल परिवहन प्रदान नहीं करा पाई थी, जिससे दंगा प्रभावित राज्य में सेना की तैनाती में देरी हुई थी।
उन्होंने दावा किया था कि अगर मोदी सरकार आवश्यक साजो-सामान मुहैया कराती तो जानमाल की हानि को कम किया जा सकता था। हालाँकि, उसके बाद ऑपइंडिया ने इस बात खुलासा किया था कैसे लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) के दावे बिल्कुल निराधार और अनुचित थे।