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मथुरा : राजा पटनीमल, जिनके वंशजों ने 112 साल लड़ा श्रीकृष्ण जन्मभूमि का केस: कर्जदार हो गए लेकिन नहीं मानी हार

                                          श्रीकृष्ण जन्मभूमि (फाइल फोटो साभार: IndiaTV News)
मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि से शाही ईदगाह मस्जिद हटाने को लेकर कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट ने मई 2022 में याचिका स्वीकार की थी। हालाँकि, श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर केस की शुरुआत साल 1832 में यानी 190 साल पहले ही हो गई थी। वाराणसी के राजा पटनीमल ने पहला केस लड़ा था। इसके बाद, उनके वारिसों ने 112 साल केस लड़ा। केस लड़ते-लड़ते राजा पटनीमल के वारिसों के सिर पर कर्ज हो गया था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

दरअसल, साल 1803 में अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के नेतृत्व में मराठा शासक दौलत राव सिंधिया को हराकर मथुरा में कब्जा कर लिया था। इसके बाद, साल 1815 में अंग्रेजों ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि की जमीन को नीलाम कर दिया। नीलामी में वाराणसी के राजा पटनीमल ने इसे खरीद लिया।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर पहला केस साल 1832 ईदगाह मस्जिद के मुअज्जिन अताउल्लाह खातिब ने किया था। खातिब ने कलेक्टर के सामने बिक्री रद्द करने और मस्जिद को रिपेयर कराने की अर्जी लगाई। हालाँकि, कलेक्टर ने यह कहते हुए केस खारिज कर दिया कि मराठा शासन के दौरान मुअज्जिन मस्जिद छोड़कर भाग गया था।

इसके बाद, अगला केस साल 1897 में अहमद शाह नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पास की रोड को रिपेयर कर रहे गोपीनाथ पर केस कर दिया। उसने आरोप लगाया था कि यह जमीन मुस्लिमों की है। लेकिन मजिस्ट्रेट ने उसकी अपील खारिज कर दी और कहा कि ये साबित नहीं होता कि जमीन मुस्लिमों की है।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर अगला केस साल 1920 में अंजुमन इस्लामिया के सेकेट्री काजी मुहम्मद अमीर ने दायर किया। अमीर ने कोर्ट में कहा था कि मस्जिद के आसपास प्रह्लाद नामक व्यक्ति मंदिर बनवा रहा है। यह जमीन मुस्लिमों की है। इस अपील को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा था कि यह जमीन राजा पटनीमल ने खरीदी थी। साथ ही, यहाँ कोई नया मंदिर नहीं बन रहा है। क्योंकि यहाँ सालों से पुराना मंदिर था।

इसके बाद, इस मामले में मुस्लिम पक्ष की ओर से साल 1928 में मोहम्मद अब्दुल खाँ नामक व्यक्ति ने एक और केस दायर किया गया। लेकिन, साल 1935 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस विवाद का निपटारा किया और राजा राय कृष्णदास के पक्ष में फैसला सुनाया। तमाम केस लड़ते हुए राजा राय कृष्णदास पर कर्ज हो गया था। हालाँकि, उन्होंने कर्ज के बोझ तले दबने के बाद भी लड़ाई लड़ने का ही फैसला किया। दरअसल, वह नहीं चाहते थे कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुस्लिमों के पास जाए।

हालाँकि, विवादों और उलझनों के बीच 8 फरवरी, 1944 को राजा राय कृष्णदास और उनके पुत्र आनंदकृष्ण ने पंडित मदन मोहन मालवीय, गणेश दत्त और भीखनलाल आत्रेय को इस संकल्प के साथ यह भूमि बेच दी कि वे यहाँ मंदिर निर्माण कराएँगे।

‘श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान’ के सचिव कपिल शर्मा राजा पटनीमल के वारिसों को लेकर कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की जमीन के लिए लड़ते-लड़ते पैरोकारों पर 13,400 रुपए का कर्ज हो गया था। उन्होंने जब बेची तब केवल कर्ज उतारने के लिए 13,400 रुपए ही लिया। उनके इस कर्ज पर ब्याज करीब दस हजार रुपए हो गया था। लेकिन, राजा पटनीमल के वारिसों ने ब्याज धीरे-धीरे अपने पैसों से चुकाने की बात कही थी।