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इधर कोयले की डिमांड उधर थर्मल पावर बंद करने की माँग: केजरीवाल सरकार ने लगातार लगाया केंद्र-राज्य संबंधों को पलीता

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जो किसी समस्या को सुलझाने की बजाये उसे विवादित बनाने में शायद महारत हासिल किये हुए हैं। ताकि जनता उनकी कमी की बजाए केंद्र में मोदी सरकार को ही आरोपित करती रहे। लेकिन केजरीवाल भूल रहे हैं कि जिस दिन जनता ने उनकी मुफ्त की रेवड़ियों को दरकिनार कर, सत्ता से बाहर किया, तब शायद उनको अपनी इस गन्दी मानसिकता का हो, ऐसी कल्पना करना भी लगता है भूल होगी। 
इस महीने देश में कोयले की कमी हुई। कोयला केंद्र का विषय है इसलिए इस कमी का राजनीतिकरण भी किया गया। वक्तव्य वगैरह दिए गए। अलग-अलग मंचों पर उसकी चर्चा हुई और इस कमी से उभरने वाली संभावित परिस्थितियों को लेकर चिंता प्रकट की गई। ऊर्जा की कमी की वजह से लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक है पर इस चिंता को व्यक्त करने के लिए जो वक्तव्य दिए गए उनमें से कुछ धीरे-धीरे शोर में परिवर्तित हो गए। जिन लोगों ने आने वाले संभावित संकट को लेकर शोर मचाया उनमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सबसे आगे थे। वैसे यह आश्चर्य की बात नहीं थी। केजरीवाल भारत के सबसे बड़े शोर मचाऊ मुख्यमंत्री हैं।

मानसून के बाद कोयले की कमी पावर सेक्टर के लिए सामान्य बात है। ऐसा हर वर्ष होता है। इस वर्ष मानसून के दौरान बारिश की अधिकता के कारण यह कमी सामान्य से अधिक रही। केंद्र सरकार की ओर से बार-बार आश्वासन के बावजूद कोयले की कमी को लेकर लगातार शोर मचाया गया। बाद में जब सरकारी कोयला कंपनियों की ओर से वक्तव्य आने लगे तब यह खुलासा हुआ कि कैसे बार-बार अनुरोध के बावजूद कुछ राज्य सरकारों ने अपने हिस्से का कोयला या तो उठाया नहीं या फिर सरकारी कोयला कंपनियों को बकाया राशि का भुगतान नहीं करने की वजह से नहीं उठा सके। इन खुलासों के बाद लगातार चल रहा शोर शांत हो गया।

सबसे दिलचस्प खुलासा दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी को लेकर हुआ। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष अक्टूबर में ही पार्टी ने दिल्ली और आस-पास के इलाकों में थर्मल पावर प्लांट बंद करवाने की माँग की थी। एक वर्ष पहले यह माँग करने वाले केंद्र सरकार द्वारा लगातार दिए जा रहे आश्वासन के बावजूद कोयले की कमी को लेकर शोर मचा रहे थे। उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने तो इस कमी को ऑक्सीजन की कमी से तुलना करते समय यह भी भूल गए कि कैसे न्यायालय द्वारा ऑक्सीजन की ऑडिट की बात कहे जाने के बाद अचानक दिल्ली में ऑक्सीजन की उपलब्धता न केवल बढ़ गई थी बल्कि दिल्ली सरकार पड़ोसी राज्यों को ऑक्सीजन देने के लिए उतारू थी।

दिल्ली सरकार द्वारा ऑक्सीजन की कमी का शोर जब मचाया जा रहा था तब न केवल केंद्र सरकार बल्कि विशेषज्ञों के बातों की भी परवाह नहीं की गई थी। ठीक उसी तरह कोयले की तथाकथित कमी पर भी केंद्र सरकार के वक्तव्य और आश्वासनों को दरकिनार करके शोर मचाया गया और मंत्रियों द्वारा बयान जारी किए गए।

मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के द्वारा शोर मचाए जाने के बाद अब एक नया खुलासा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार कोयले की कमी पर शोर मचाने और ऊर्जा संकट की भविष्यवाणी करने के कुछ दिनों बाद ही दिल्ली सरकार ने पावर एक्सचेंज पर 635 मेगावॉट बिजली की बिक्री की। यह भी तब जब बिजली की बिक्री करने वाले अन्य राज्य जैसे पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ या ओड़ीसा की तरह दिल्ली के पास बिजली उत्पादन की सुविधा नहीं है। इन सबके ऊपर केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने राज्यों को यह हिदायत दी थी कि वे अपने यहाँ बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने के बाद ही बिजली की बिक्री करें। दिल्ली में बिजली के सीमित उत्पादन को पावर एक्सचेंज पर बिजली की इस बिक्री के आड़े नहीं आने दिया गया।

ये खुलासे दिल्ली सरकार और उन्हें चलाने वालों के बारे में जो भी कहते हैं, अब यह किसी को आश्चर्यचकित नहीं करता। केजरीवाल जब से ‘दिल्ली के मालिक’ बने हैं, प्रदेश की समस्याओं के लिए उन्होंने केंद्र सरकार से लेकर पंजाब और हरियाणा सरकार तक को जिम्मेदार ठहराया है। प्रश्न यह है कि राजनीति क्या शासन का विकल्प हो सकता है? एक प्रश्न यह भी है कि सरकार में संवैधानिक पदों पर बैठे लोग जब इस तरह का आचरण करते हैं तब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न लोगों को कैसा सन्देश जाता है और उनके ऐसे बयानों का इस्तेमाल किस तरह से किया जाता है? यह समझना क्या असंभव है कि ऐसी घटनाओं, बयानों या आचरण में बाहर के लोग अपने-अपने तरीके से फॉल्ट लाइन खोजते होंगे ताकि उनका इस्तेमाल भारत के विरुद्ध किया जा सके?

आम आदमी पार्टी के नेताओं और दिल्ली सरकार के मंत्रियों के ऐसे आचरण से केंद्र सरकार के काम करने के तरीकों के प्रति लोगों के मन में भ्रम पैदा करने का काम बार-बार किया जा रहा है। पार्टी और उसके नेता जो आरोप पहले उप राज्यपाल के विरुद्ध इस्तेमाल करते हुए वहीं तक सीमित रखते थे वे सारे आरोप अब केंद्र सरकार के विभागों पर बड़ी आसानी से लगाए जाते हैं। केंद्र के विभागों और मंत्रालयों की प्रतिकूल कार्रवाई को बदले की भावना से किया जाने वाला बता दिया जाता है। बात-बात पर शासन और प्रशासन में राजनीति किए जाने से केंद्र-राज्य के संबंधों को जो नुकसान पहुँचता है उस पर न केवल बहस होनी चाहिए बल्कि उसका हिसाब भी किया जाना चाहिए। देश के संघीय ढाँचे की रक्षा और उसे सुदृढ़ करने के लिए यह आवश्यक है।