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‘Disease X’ को लेकर WHO की चेतावनी : दुनिया पर कोरोना से 20 गुना खतरनाक महामारी का साया

                          कोविड-19 से 20 गुना खतरनाक है डिजीज-एक्स (साभार इंडिया.कॉम)
दुनिया पर कोविड-19 से भी 20 गुना अधिक घातक बीमारी का खतरा मंडरा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चेताया है कि डिजीज एक्स (Disease X) को लेकर पहले से सावधानी नहीं बरती गई तो ये कहर बरपाएगी।

एक पुरानी कहावत है कि ‘रोकथाम इलाज से बेहतर है’ और ये डिज़ीज़ एक्स पर सटीक बैठती है। डिजीज एक्स इस बात का प्रतिनिधित्व करता है कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय महामारी एक रोगज़नक़ (Pathogen) की वजह से हो सकती है। हालाँकि, वर्तमान में इंसानों में बीमारी पैदा करने वाला ये रोगजनक अज्ञात है। आइए इसी खतरनाक बीमारी के बारे में यहाँ जानने की कोशिश करते हैं।

डिज़ीज़ X ने हिला दिया मेडिकल जगत को

कॉलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेयर्डनेस इनोवेशन (सीईपीआई) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) रिचर्ड हैचेट ने डिजीज एक्स के बारे में कहा, “यह साइंस फिक्शन की तरह लग सकता है, लेकिन डिजीज एक्स एक ऐसी चीज है जिसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए।”
उन बीमारियों की सूची में जिन्हें WHO अनुसंधान और विकास के मामले में सबसे अधिक प्राथमिकता देता है उन रोगों में डिजीज एक्स ने इबोला, जीका और कोरोनो वायरस 2019 (कोविड-19) जैसी बीमारियों के बीच अपनी जगह पक्की कर ली है। संक्रामक रोग (डिज़ीज़ एक्स) के अप्रत्याशित प्रकोप ने बार-बार चिकित्सा जगत के विश्वास को हिलाने के साथ ही हैरानी में डाल दिया है।
कुछ विशेषज्ञों ने यहाँ तक कहा है कि गंभीर सांस के रोग वाला कोरोना वायरस, वायरस-2 (SARS-CoV-2) की वजह से होने वाला COVID-19, पहली डिजीज X.4 के मानकों पर खरा उतरता है।
वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये जीका डिजीज X.5 है। ऐसे में एक संभावना यह भी है कि COVID-19 और अन्य हालिया महामारियों में डिजीज X सबसे खतरनाक होने जा रही है।
तीन साल से अधिक की छोटी और बड़ी लहरों के साथ कोरोनो वायरस अब काफी कम हो गया है और एक जानी पहचानी सेहत संबंधी फिक्र वाली लिस्ट में आ गया है।
ऐसा माना जाता है कि डिजीज X “डिजीज X” की वजह से होता है। ऐसा रोगज़नक़ एक ज़ूनोसिस होने की उम्मीद है यानी ऐसी बीमारी जो जानवरों से इंसानों में फैल सकती है। सबसे अधिक संभावना इसके एक आरएनए वायरस होने की है।
आरएनए वायरस ऐसा वायरस होता है जिसके अनुवांशिक जीनोम का निर्माण आरएनए नाभिकीय अम्ल से हुआ हो। यह नाभिकीय अम्ल आमतौर पर एक रेशे में संगठित होता है।
यही वजह है कि आरएनए वायरस की उत्परिवर्तन दर (Mutation Rate) डीएनए वायरस के मुकाबले काफी अधिक होती है। जिसकी वजह से इसमें आनुवंशिक विविधता आ जाती है और इसके खिलाफ प्रभावी टीके का निर्माण करना काफी मुश्किल हो जाता है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि कोरोना वायरस में आनुवंशिक तौर से एक “प्रूफरीडिंग मेकनिज़्म” (Proofreading Mechanism) पाया जाता है जो प्रतिकृति (Replication) के दौरान की गई कुछ गलतियों को ठीक कर म्यूटेट होता रहता है।
उभरते हुए ज़ूनोटिक रोगज़नक़ एक खतरा हैं जिनकी निगरानी करने की जरूरत है। इस महामारी रोगज़नक़ की संभावना को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
डिज़ीज़ एक्स जैसे रोगज़नक़ों की रिलीज या तो प्रयोगशाला दुर्घटनाओं के जरिए से या जैव आतंकवाद के तौर पर विनाशकारी हो सकती है। इस वजह से भी डीजीज एक्स को एक वैश्विक विनाशकारी जोखिम के तौर पर मार्क किया गया है।
डीएनए वायरस में एक जीनोम होता है जो डीऑक्सीराइबोन्यक्लिक अम्ल से बना होता है। ये वायरस में आमतौर पर डबल-स्ट्रैंडेड डीएनए (डीएसडीएनए) और शायद ही कभी सिंगल-स्ट्रैंडेड डीएनए (एसएसडीएनए) होता है। ये वायरस डीएनए-निर्भर डीएनए पोलीमरेज़ का इस्तेमाल करके कॉपी बनाते हैं।
यही वजह है कि अब, यूनाइटेड किंगडम में स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर संभावित नई महामारी ‘डिज़ीज़ एक्स’ के लिए तैयारी कर रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ये नया वायरस कोविड-19 से भी अधिक घातक हो सकता है और इसका असर स्पैनिश फ़्लू की तरह हो सकता है।

‘डिज़ीज़ एक्स’ क्या है?

डब्ल्यूएचओ ने संभावित अगली महामारी को डिजीज एक्स करार दिया और कहा कि ये पहले से ही फैलने की राह पर हो सकती है। साल 2020 में मई से दिसंबर तक यूके के वैक्सीन टास्कफोर्स की अध्यक्षता करने वाली स्वास्थ्य विशेषज्ञ केट बिंघम के मुताबिक, डिजीज एक्स में कोविड-19 के मुकाबले 20 गुना अधिक मौत (लगभग 50 मिलियन यानी 5 करोड़ मौत) की क्षमता हो सकती है।
उन्होंने आगे कहा, “1918-19 फ्लू महामारी ने दुनिया भर में कम से कम 50 मिलियन लोगों की जान ले ली, जो प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए लोगों की तुलना में दोगुना है।”
बिंघम ने कहा, “दुनिया को बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान के लिए तैयार होना होगा और रिकॉर्ड समय में खुराक देनी होगी। कल्पना करें कि रोग एक्स इबोला (67 फीसदी) की मृत्यु दर के साथ खसरे जितना ही संक्रामक है। दुनिया में कहीं न कहीं ये रूप ले रहा रहा है और देर-सबेर इससे कोई न कोई बीमार महसूस करने लगेगा।”
बिंघम का कहना है कि मौजूदा वक्त में ‘डिज़ीज़ एक्स’ के लिए कोई स्वीकृत टीका नहीं है। वैज्ञानिकों द्वारा प्रत्येक खतरनाक वायरस परिवार के लिए अलग-अलग प्रोटोटाइप टीकों का एक संग्रह विकसित करने के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि घातक वायरस के लिए टीकों पर एक शुरुआत ही इसकी विशिष्ट विशेषताओं को टारगेट करने में मदद कर सकती है।
केट ने उस खतरे के बारे में बात की जो करीब दस लाख अनदेखे वायरस इंसानों पर डाल सकते हैं। उनके के अनुसार, वैज्ञानिकों ने 25 वायरस परिवारों की पहचान की है, जिसमें हजारों व्यक्तिगत वायरस शामिल हैं जबकि लाखों अन्य वायरस अभी भी खोजे जाने बाकी हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने कहा कि इससे बचने के लिए उठाए जाने वाले शुरुआती कदमों में से एक जरूरी चीज वित्तीय संसाधनों का निर्धारण करना है।
उनका कहना था कि अगर इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया तो इसकी मौद्रिक लागत भूकंप से होने वाले नुकसान के बराबर होगी। जब डिज़ीज़ एक्स से भी हल्का वायरस कोविड-19 अन्य नुकसानों के साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च दोनों में 16 डॉलर ट्रिलियन का बिल बैठाने में कामयाब रहा है तो डिज़ीज़ एक्स से होने वाला नुकसान उससे भी कई गुना अधिक हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ केट बिंघम ने जानवरों से मनुष्यों में वायरस के फैलने पर भी प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया, “एक वायरस का पूरा उद्देश्य जितना संभव हो उतने मेजबानों में जितनी बार संभव हो अपनी कॉपी बनाना है। इसलिए वे लगातार म्यूटेशन कर रहे हैं और अलग-अलग जानवरों पर हमला कर रहे हैं। वास्तव में, कुछ सबसे खतरनाक वायरस – जैसे कि चेचक, खसरा, इबोला और एचआईवी जानवरों में उत्पन्न हुए और बाद में मनुष्यों के बीच अत्यधिक संक्रामक हो गए।”

क्यों बढ़ रही हैं महामारियाँ?

केट बताती हैं कि वैश्वीकरण के साथ शहरीकरण और प्रकृति का विनाश महामारी की बढ़ती घटनाओं में योगदान दे रहा है। वह इस बात पर जोर देती हैं कि वनों की कटाई, आधुनिक कृषि विधियों का उपयोग और आर्द्रभूमि का विनाश जानवरों से मनुष्यों में संक्रामक रोगों के फैलने के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि जानवरों के आवासों का नुकसान उनको मानव बस्तियों के करीब जाने के लिए प्रेरित कर रहा है।

कोरोना : दिल्ली सरकार को कोर्ट से सीरो सर्वे की रिपोर्ट छिपाने पर लगी फटकार

कोरोना गाइडलाइंस से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने सीरो सर्वे की रिपोर्ट को कोर्ट से छिपाने और मीडिया में पहले रखने पर दिल्ली की केजरीवाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई। रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने केजरीवाल सरकार से सवाल किया कि वह अपनी टेस्टिंग कैपेसिटी को क्यों बर्बाद कर रही है?

दिल्ली सरकार का पक्ष रखते हुए अडिशनल सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली सरकार ने सीरो सर्विलांस की रिपोर्ट मीडिया को नहीं दी। उन्होंने दिल्ली सरकार का बचाव करते हुए कहा कि ऐसा नहीं माना जाना चाहिए कि दिल्ली सरकार की आरटीपीसीआर टेस्ट करने की इच्छा नहीं है। सरकार अपनी क्षमता के हिसाब से ज्यादा से जयादा टेस्ट करवा रही है। 

हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि सरकार तीसरी सीरो सर्वे रिपोर्ट को पहले कोर्ट के सामने रखेगी। इसके बाद ही रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाएगा। लेकिन मीडिया में तीसरे सीरो सर्वे की रिपोर्ट से जुड़ी खबरें आने के बाद कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और सरकार से नाराजगी जतायी। दिल्ली में 1 से 7 सितंबर तक तीसरा सीरो सर्वे किया गया था। इसमें प्रत्येक वार्ड से 17 हजार से ज्यादा नमूने लिए गए थे। इससे पहले सीरो सर्वे में 23 प्रतिशत और दूसरे सीरो सर्वे में 29 प्रतिशत लोगों में कोरोना एंटीबॉडी पाई गई थी।

दिल्‍ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्‍येंद्र जैन ने कहा था कि सरकार ने हर महीने सीरो सर्विलांस कराने का फैसला किया है। हर महीने एक से पांच तारीख के बीच, चुनिंदा इलाकों में रैंडमली लोगों का ऐंटीबॉडी टेस्‍ट किया जाएगा। इससे दिल्‍ली में कोरोना के प्रसार को समझने में आसानी होगी।

संक्रामक बीमारियों के संक्रमण को मॉनिटर करने के लिए सीरो सर्वे कराए जाते हैं। इन्हें एंटीबॉडी सर्वे भी कहते हैं। इसमें किसी भी संक्रामक बीमारी के खिलाफ शरीर में पैदा हुए एंटीबॉडी का पता लगाया जाता है। कोरोनावायरस या SARS-CoV-2 जैसे वायरस से संक्रमित मामलों में ठीक होने वाले मरीजों में एंटीबॉडी बन जाती है, जो वायरस के खिलाफ शरीर को प्रतिरोधक क्षमता देती है।