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जनेऊधारियों के साथ जाने से यही होता है: गुलाम नबी पर ओवैसी का तंज


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अध्‍यक्ष पद को लेकर कांग्रेस के भीतर की कलह खुलकर सामने आ चुकी है। पार्टी के 23 वरिष्‍ठ नेताओं ने जिस लहजे में अंतरिम अध्‍यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा। और फिर जिस तेजी से कई मुख्‍यमंत्रियों समेत दिग्‍गज कांग्रेसियों ने सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्‍व में भरोसा जताया, उससे साफ है कि पार्टी में दो गुट बन चुके हैं। कांग्रेस का एक गुट जहां सोनिया गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने के पक्ष में है, तो वहीं दूसरा गुट राहुल गांधी को ही अगले अध्‍यक्ष के रूप में देखना चाहता है। उधर प्रियंका गांधी कह चुकी हैं कि कोई गैर गांधी अब पार्टी का मुखिया बनना चाहिए।
कपिल सिब्बल राहुल गाँधी
थोड़ा पीछे मुड़कर देखने ज्ञात होगा की कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर उठा मुद्दा कोई नया नहीं है। पूर्व में भी कई बार उठा था मामला, लेकिन ठंठे बस्ते में डाल दिया गया। सोनिया के नेतृत्व में कमजोर पड़ रही पार्टी को नया जोश देने के लिए राजेश पायलट और माधवराव सिंधिया का कई बार नाम उछला, लेकिन विपक्ष कमजोर होने के कारण दोनों में से किसी के हाथ अध्यक्ष पद नहीं आया और परिवार की गुलामी कर रहे नेताओं की जीत निश्चित होती रही। उस समय विपक्ष कमजोर था और मौके को भुना न सका, परन्तु आज स्थिति एकदम विपरीत है। 
दूसरे, कांग्रेस को भी अच्छी तरह आभास हो चूका है कि पार्टी पंचायत, नगर निगम और बहुत से बहुत विधानसभा तक सीमित रह गयी है। और कई क्षेत्रों में तो दलीय पार्टियों से भी कमजोर। दरअसल, सोनिया गाँधी ने अपने आगे, कभी किसी की नहीं सुनी। 
"बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होएं" अर्थात 2014 में मोदी लहर को रोकने के लिए जब सोनिया अपनी सलाहकार समिति के सदस्यों--अरविन्द केजरीवाल, योगेंद्र यादव, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, प्रशांत भूषण आदि को तन, मन और धन से आम आदमी पार्टी के रूप में चुनावी मैदान में उतारने के लिए कटिबद्ध थी--उस समय पार्टी के बुद्धिजीवी वर्ग ने विरोध किया था, लेकिन सोनिया के दिमाग में तो खिचड़ी सरकार घूम रही थी।(उस समय एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते शीर्षक "कांग्रेस के गर्भ से निकली आप" और "कांग्रेस और आप का Positive DNA" लेख लिखा था।) चुनाव परिणाम आने पर बाज़ी पलट गयी, वहीं से कांग्रेस उस पतन मार्ग पर अग्रसर हो गयी, जहाँ से वापसी की दूर तक कोई सम्भावना नहीं। देखा जाए तो बीजेपी से कहीं अधिक कांग्रेस को नुकसान केजरीवाल की पार्टी ने पहुँचाया है। देख लो किसी भी चुनाव के नतीजे। कांग्रेस को मिलने वाला 90 प्रतिशत वोट आप को मिला। हालांकि दिल्ली और पंजाब के अलावा कई स्थानों पर NOTA आप से आगे रहा। यानि राज्यों ने आप को ठुकरा जरूर दिया, लेकिन तब भी कांग्रेस को ही नुकसान पहुँचाया।    
सोनिया को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने की अपील
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से कुछ घंटे पहले मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने सोनिया गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने की बात कही। दोनों नेताओं ने एक के बाद एक ट्वीट कर अपना समर्थन जताया। कमलनाथ ने ट्वीट किया, ”सोनिया गांधी के नेतृत्व पर कोई भी सुझाव या आक्षेप बेतुका है। मैं सोनिया गांधी से अपील करता हूं कि वे अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस पार्टी को मजबूती प्रदान करें और कांग्रेस का नेतृत्व करें।”


 
दिग्विजय सिंह ने कहा कि वह नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना नहीं कर सकते हैं और पार्टी का एक साधारण कार्यकर्ता किसी और को पार्टी अध्यक्ष के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, “सोनिया गांधी का नेतृत्व सर्वमान्य है। यदि सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ना ही चाहती हैं तो राहुल गांधी को अपनी जिद छोड़कर अध्यक्ष का पद स्वीकार कर लेना चाहिए। देश का आम कांग्रेस कार्यकर्ता और किसी को स्वीकार नहीं करेगा।”
पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमले को लेकर मतभेद
मई 2019 में लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद राहुल ने जिस कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अध्यक्ष पद से इस्तीफे की घोषणा की थी और उसकी एक और मीटिंग इस साल जून में हुई थी। तब कुछ सदस्यों ने राहुल से दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभालने का निवेदन किया था। राहुल ने दोनों मौकों पर पार्टी के दिग्गजों को कहा कि वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला नहीं करना चाहते हैं और वो ऐसा करने से डरते हैं।

 पीएम मोदी को निशाना बनाने की रणनीति फेल
राहुल की इन टिप्पणियों से कई नेताओं को आघात पहुंचा और उन्होंने कहा कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के खिलाफ 2014 से ही मिल रही लगातार हार के बावजूद कांग्रेस पार्टी की रणनीति की समीक्षा नहीं की गई है। उन बुजुर्ग नेताओं ने अपने बचाव में कहा कि मोदी पर व्यक्तिगत हमला करने और राफेल जैसे तथाकथित घोटालों को उठाने की रणनीति बुरी तरह नाकाम रही है। वरिष्ठ नेताओं का मत है कि मोदी को हर वक्त निशाना बनाने की जगह मुद्दे के आधार पर घेरने की कोशिश होनी चाहिए।

कपिल सिब्बल ने ट्विटर के जरिए कांग्रेस के प्रति अपने सेवा और भक्ति के बारे में ट्विटर पर लिखा है, “राहुल गाँधी कहते हैं कि हमारी बीजेपी के साथ साँठ-गाँठ है, राजस्थान हाईकोर्ट में पार्टी को सफलता दिलाई। मणिपुर में बीजेपी के खिलाफ पूरी ताकत से पार्टी का बचाव किया। पिछले 30 सालों में बीजेपी के पक्ष में एक भी बयान नहीं दिया। फिर भी हम पर बीजेपी से साँठ-गाँठ का आरोप लग रहा है।”
वहीं, कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कार्यकारिणी की बैठक में कहा है कि अगर राहुल गाँधी इन आरोपों को प्रमाणित कर सकते हैं तो वे इस्तीफा दे देंगे। गौरतलब है कि कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद उन 23 नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमिटी से पहले पत्र लिखा था।
असदुद्दीन ओवैसी
जनेऊधारियों के साथ जाने से यही होता है: गुलाम नबी पर ओवैसी का तंज
राहुल गाँधी द्वारा कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर भाजपा से मिलीभगत होने के आरोप के बाद कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने अपना इस्तीफा देने तक की बात कही। इसके बाद AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने गुलाम नबी आजाद पर कटाक्ष करते हुए ट्वीट किया है।
ओवैसी ने अपने ट्वीट में लिखा, “आदर्श न्याय, गुलाम नबी साहब मुझ पर यही आरोप लगाते थे। अब आप पर भी यही आरोप लगा है। 45 साल की गुलामी सिर्फ इसलिए? अब ये साबित हो गया है कि जनेऊधारी लीडरशिप का विरोध करने वाला बी-टीम ही कहलाया जाएगा। मुझे उम्मीद है कि मुस्लिम समुदाय के लोग समझेंगे कि कांग्रेस के साथ रहने से क्या होता है।”
ओवैसी के इस तंज में दम है, जहाँ नेता कोट पर जनेऊ पहने, सत्ता में रहते हिन्दू होते हुए जो "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" कर हिन्दुत्व को अपमानित करने वाले जब अपनी जीत के लिए यज्ञ करवाते हों, अपने ही भगवान श्रीराम को काल्पनिक कहा जाता हो, खुदाई में मिले मन्दिर के सबूतों को कोर्ट से छुपाया जाता हो, उस पार्टी का न कोई ईमान है और न ही कोई धर्म। अयोध्या में श्रीराम मन्दिर पता नहीं कब का बन गया होता, अगर कांग्रेस और वामपंथियों ने हिन्दुओं की जीत में अवरोध न किये होते। फिर मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की भी अयोध्या जैसी ही स्थिति करने वाली कांग्रेस ही है। 1964 तक आये छह के छह निर्णय श्रीकृष्ण मंदिर के पक्ष में आने के बावजूद मुस्लिम वोट बैंक के हाथ से निकल जाने के डर से कांग्रेस ईदगाह हटाने में नाकाम रही। 
ओवैसी का ट्वीट करना ही था कि ट्विटर पर ही प्रवचन शुरू हो गए

दरअसल अगस्त 24 की सुबह ही राहुल गाँधी ने कांग्रेस CWC की बैठक में कथित तौर पर आरोप लगाया कि कांग्रेस के नेतृत्व में बदलाव की माँग करने के लिए लिखे गए इस इस पत्र के पीछे कांग्रेस के नेताओं का भाजपा से साँठ-गाँठ है। राहुल गाँधी के इस बयान से कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद ने खुलकर अपनी नाराजगी प्रकट की है। गुलाम नबी आजाद ने इस्तीफे तक की बात कह डाली।
इस पर कपिल सिब्बल ने ट्विटर के जरिए कांग्रेस के प्रति अपने सेवा और भक्ति के बारे में ट्विटर पर लिखा है, “राहुल गाँधी कहते हैं कि हमारी बीजेपी के साथ साँठ-गाँठ है, राजस्थान हाईकोर्ट में पार्टी को सफलता दिलाई। मणिपुर में बीजेपी के खिलाफ पूरी ताकत से पार्टी का बचाव किया। पिछले 30 सालों में बीजेपी के पक्ष में एक भी बयान नहीं दिया। फिर भी हम पर बीजेपी से साँठ-गाँठ का आरोप लग रहा है।”
वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने CWC की बैठक के दौरान ही यह ट्वीट किया है। लेकिन, इसके कुछ ही देर बाद एक और ट्वीट में कपिल सिब्बल ने लिखा कि उन्होंने राहुल गाँधी से इस बारे में ग़लतफ़हमी को दूर कर लिया है और वह ट्वीट वापस लेते हैं।
कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कार्यकारिणी की बैठक में कहा है कि अगर राहुल गाँधी इन आरोपों को प्रमाणित कर सकते हैं तो वे इस्तीफा दे देंगे। गौरतलब है कि कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद उन 23 नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी से पहले पत्र लिखा था।
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आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, "साझे की हांड़ी चौराहे पर ही फूटती है", लेकिन परिवार समर्पित बन चुकी कांग्रेस .....
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इस पाक्षिक को सम्पादित करते अपने बहुचर्चित स्तम्भ में यूपीए सरकार के कार्यकाल में लाल किले पर उठाया प्रश्न था जिस....
इस पत्र में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल खड़े किए गए और कहा गया कि इस वक्त एक ऐसे अध्यक्ष की जरूरत है जो स्थायी नेतृत्व दे सके। CWC बैठक की शुरुआत में पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा कि मुझे रिप्लेस करने की प्रक्रिया शुरू करें।
अगस्त 24, 2020 को हुई इस बैठक में इस पत्र को लेकर काफी विवाद हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की पेशकश की। हालाँकि, कई वरिष्ठ नेताओं ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। साथ ही, यह पत्र लिखने वालों पर राहुल गाँधी ने अपना गुस्सा व्यक्त किया और इसकी टाइमिंग पर सवाल खड़े किए।

दिल्ली : क्या कांग्रेस और आप के बीच गुप्त समझौता हो गया है?


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली विधानसभा चुनाव के मतदान की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, सियासी तस्वीर स्पष्ट होती जा रही है। बीते एक हफ्ते में दिल्ली की चुनावी हवा का रूख पूरी तरह बदल चुका है। बीजेपी से मिल रही कड़ी टक्कर को देखते हुए आम आदमी पार्टी ने भी अपनी रणनीति बदल दी है और कांग्रेस से अंदरूनी साठगांठ कर ली है। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि इस चुनावी शोरगुल में कांग्रेस की आवाज कहीं गुम हो गई है या फिर ये कहें कि ‘गुम’ कर दी गई है।
यदि इस समाचार में जरा भी सच्चाई है, तो वास्तव में ये पुनः कांग्रेस का आत्मघाती कदम होगा। 2014 में भी गुप्त समझौता होने के कारण कांग्रेस की क्या दुर्गति हुई, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। सेवानिर्वित होने उपरांत एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते विस्तार से शीर्षक "कांग्रेस के गर्भ से निकली आप", प्रकाशित करने पर धमकी मिलने पर अगले ही अंक में शीर्षक "कांग्रेस और आप का  Positive DNA " प्रकाशित की थी। परिणाम सबके सामने हैं कि जिस कांग्रेस के भ्रष्टाचार के विरुद्ध चुनाव लड़ा था, बहुमत न होने पर कांग्रेस ने बिन मांगे अपना समर्थन दे दिया। जबकि दूसरी ओर केजरीवाल अपने बच्चों की कसम खाते हुए कहते थे कि "कांग्रेस का समर्थन नहीं लूंगा", यानि जिस पार्टी के भ्रष्टाचार के विरुद्ध चुनाव लड़ा, भाजपा को सरकार से दूर रखने के लिए बच्चों की कसम को ताक पर रख, समझौता कर लिया। उसका बदला कांग्रेस द्वारा किए घोटालों को दरकिनार कर दिया। 
फिर चुनाव घोषित होने पर कांग्रेस ने भी केजरीवाल सरकार के घोटालों को उजागर करना शुरू कर अपना प्रभुत्व दिखाने का प्रयास किया,  लेकिन CAA के विरोध करने पर जनाधार खिसकते देख, केजरीवाल से गुप्त समझौते की चर्चाएं सुर्ख़ियों में हैं। वैसे CAA के विरोध में कांग्रेस तो क्या समस्त मोदी विरोधियों की हालात ठीक नहीं। विरोध करके इन्होने यह  सिद्ध कर दिया कि घुसपैठियों को घर में घुसाकर उनके आधार, राशन कार्ड और वोटर कार्ड बनवा उन्हीं के वोट के दम पर भारतीयों में अपना रौब दिखाते रहे। 
एक बात और गौर करने की है कि जिस तरह केजरीवाल ने दिल्ली को मुफ्तखोर बनाकर सरकार बनाई और उसी तर्ज पर दुबारा सरकार बनाने का संकल्प लिया है, जबकि देश के अन्य राज्यों ने केजरीवाल की इस मुफ्तखोरी को पूर्णरूप से नकार देने के कारण अधिकांश की जमानत जब्त होने के अलावा कई जगह तो आप को नोटा से भी कम वोट मिले। जो दर्शाता है कि दिल्ली से बाहर आम आदमी पार्टी को कोई स्वीकार करने को तैयार नहीं। 
अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस ने मानी हार    
दिल्ली कांग्रेस के इंचार्ज पीसी चाको केजरीवाल को मार्केटिंग गुरु बता रहे हैं। यानी कांग्रेस, गुरु केजरीवाल के आगे नतमस्तक हो गई है और हथियार डाल दिए हैं। बात सीधी और साफ़ है। चुनाव के सबसे निर्णायक क्षणों में कांग्रेस का अरविंद केजरीवाल को गुरु कहना भर उसका मॉरल बूस्ट करता नजर आ रहा है। बात तब होती जब केजरीवाल से लड़ने के लिए उन्हीं के अंदाज में कांग्रेस अपनी रणनीति बनाती और चुनावों में उनसे कड़ा मुकाबला करती।
टिकट वितरण से पहले दिल्ली प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको का ये बयान गौर करने वाला है कि वो चुनाव से पहले तो नहीं, लेकिन चुनाव के बाद जरूर आप के साथ जरूरत पड़ने पर कोई गठबंधन कर सकते हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि चाको पूर्व में भी आप के साथ जाने पर जोर देते रहे हैं।
भाजपा के लिए अच्छे संकेत 
चाको के आप की ओर झुकाव को देखते हुए, पूर्व में भी शीला दीक्षित से लेकर वरिष्ठ नेता तक विरोध कर रहे थे, लेकिन नगाड़े की आवाज़ के आगे तूती की किसी ने नहीं सुनी। परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस को जाने वाला वोट केजरीवाल की झोली में जाने के ही कारण 67 सीटें मिली थी। परन्तु अब जनता तो क्या कांग्रेस कार्यकर्ता भी खिन्न हो चुके हैं, जो भाजपा के लिए अच्छे संकेत माने जा रहे हैं। मोदी विरोधियों द्वारा CAA विरोध ने वोटों का ध्रुवीकरण कर दिया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। क्योकि विरोध केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही हो रहा है, जबकि समस्त गैर-मुस्लिम भारत से घुसपैठियों को बाहर का रास्ता दिखाने के पक्ष में हैं।   
Image may contain: one or more peopleदूसरे, जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में देश-विरोधी नारे लगाने वालों पर पुलिस द्वारा की कार्यवाही को दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने कोई समर्थन नहीं दिया। एक कानूनी प्रक्रिया है कि देशद्रोह के मुक़दमे को चलाने में राज्य सरकार की अनुमति जरुरी होती है, जो केजरीवाल सरकार ने आज तक नहीं दी, उसी का परिणाम है शाहीन बाग़ और जामिया इस्लामिया। 
दिल्ली विधानसभा चुनाव-2020 को लेकर नामांकन प्रक्रिया खत्म होने के बाद कांग्रेस पार्टी ने 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, शशि थरूर, नवजोत सिंह सिद्धू, शत्रुघ्न सिन्हा को इस सूची में शामिल किया गया है। इसके अलावा, स्टार प्रचारकों की सूची में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को रखा गया है।
चुनावी सरगर्मी के बीच राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी गायब नजर आ रहे हैं। राहुल और प्रियंका दोनों के ही ऑफिस से इस बात की पुख्ता जानकारी सामने नहीं रही है कि उनका दिल्ली में चुनाव रैली का शेड्यूल क्या है। वहीं, राहुल का हाल ही में जयपुर रैली के लिए जाना और अब रैली के लिए केरल जाना संकेत दे रहा है कि कांग्रेस दिल्ली में अपनी हार का अपना मन बना चुकी है।
चुनाव प्रचार में कांग्रेस की टॉप लीडरशिप की खामोशी कांग्रेसी प्रत्याशियों के लिए मुसीबत बनी हुई है। हाल ये है कि प्रत्याशियों के निजी रिश्तों के आधार पर कांग्रेस के कुछ लीडर प्रचार के लिए पहुंच रहे हैं। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा कालकाजी से अपनी बेटी के चुनाव प्रचार में ज्यादा वक्त दे रहे हैं। वहीं, कांग्रेसी नेता राज बब्बर और जितिन प्रसाद ने कुछ जगह जरूर प्रचार किया है। हालांकि कांग्रेस की ओर से टॉप लीडरशिप के बचाव में बार-बार ये कहा जा रहा है कि सीनियर चुनाव अभियान के अंतिम चरण में प्रचार करेंगे।
चुनाव एक्सपर्ट की नजर में कांग्रेस रणनीतिक रूप से बीजेपी को मात देने के लिए ऐसा कर रही है। गौरतलब है कि 2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत दो अंकों तक भी नहीं पहुंचा था, जबकि बीजेपी का वोट प्रतिशत 30 प्रतिशत से ऊपर तब भी रहा था। साफ है कि आप का बढ़ा वोट प्रतिशत दरअसल अधिकतर कांग्रेस के हिस्से से आया था। कांग्रेस पार्टी जानती है कि उसके वोट प्रतिशत में जरा भी उछाल आने का सीधा मतलब है कि आप की सीटें कम होना और बीजेपी की सीटें बढ़ना है, जो वो चाहती नहीं है। इसलिए दिल्ली में कांग्रेस मौन है। इसका फायदा आम आदमी पार्टी को मिलेगा यानी दिल्ली के इस चुनाव में कांग्रेस आप को परदे के पीछे से समर्थन दे रही है ताकि वो बीजेपी से मुकाबला करे।
उधर आम आदमी पार्टी चुनाव प्रचार में आगे नजर आ रही थी, लेकिन जैसे ही बीजेपी मुकाबले में आई केजरीवाल ने अपनी रणनीति बदल दी। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि केजरीवाल के निशाने पर सिर्फ बीजेपी है। वह बीजेपी पर लगातार हमले कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के खिलाफ उन्होंने कोई बयान नहीं दिया है। 
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अरफा खानुम किस प्रकार प्लान बता रही है वो आपको गौर से सुनना चाहिए, इन दिनों कट्टरपंथी तत्व जो तिरंगा लहरा रहे है, राष्ट्रगान गा रहे है वो इनकी स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, सुनिए क्या कहती है अरफा।
इस देश में काफी सारे सेक्युलर हिन्दू अरफा खानुम और इनके जैसे लोगों का मोदी विरोध में जमकर साथ दे रहे है, अरफा खानुम इन सेकुलरों के सामने तो भाईचारे, दलित, आदिवासी की बात करती है, पर मुस्लिम भीड़ के आगे वो पूरी प्लानिंग समझाती है।
अरफ़ा की इस बात से देश समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्षों को अपनी आंखें खोलने चाहिए, जो सेकुलरिज्म का हर वक़्त राग अलापते रहते हैं। वास्तव में हिन्दुओं का छद्दम धर्म-निरपेक्षों द्वारा मूर्ख ही बनाया जा रहा, बल्कि ये लोग स्वयं गजवा हिन्द बनाने में इन कट्टरपंथी स्लीपर सैल्स की मदद कर, भारत को पुनः गुलाम बनाने की ओर धकेल रहे हैं, जो अरफ़ा के बयानों से स्पष्ट झलक रहा है।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने शनिवार (25…
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार कांग्रेस संस्थापकों ने कभी सपनों में भी नहीं सोंचा होगा कि कांग्रेस के मुकाबले NOTA अधि....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शाहीन बाग़ का आंदोलन शुरू तो हुआ था सीएए विरोध के नाम पर लेकिन जिन भी नेताओं और पार्टिय.....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल हमेशा मोदी सरकार पर ध्रुवीकरण की राजनीति करने का झूठ....
इस बार के चुनाव में जैसा रुख बीजेपी का है वो ये साफ़ बता रहा है कि उसने अपनी पुरानी गलतियों से प्रेरणा ली है। बीजेपी इस बात को भली प्रकार से समझती है कि बिना उग्र हुए चुनाव नहीं लड़ा जा सकता और अपनी नीतियों को अमली जामा पहनाने में वो कोई कसर नहीं छोड़ रही है।