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‘जजों को कम बोलना चाहिए’: जिस ‘ओरल ऑब्जर्वेशन’ से बचने की पूर्व CJI काटजू दे रहे नसीहत, जानिए उसके नाम पर कैसे हिंदुओं और PM मोदी को बनाया गया ‘निशाना’

   पूर्व CJI मार्केंडेय काटजू, सुप्रीम कोर्ट, मौजूदा सीजेआई बी आर गवई (साभार: AI Grok/Jagran/Times Now Navbharat)

भारत की न्यायपालिका को लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ माना जाता है, लेकिन हाल के सालों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की कोर्ट रूम में की गई मौखिक टिप्पणियाँ (ओरल ऑब्जर्वेशंस) विवादों का केंद्र बन गई हैं। ये टिप्पणियाँ अक्सर फैसले का हिस्सा नहीं होतीं, लेकिन इनके कारण पूरे देश में हंगामा मच जाता है। ताजा उदाहरण है मौजूदा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बी.आर. गवई की एक टिप्पणी, जिसने हिंदू समाज को आहत किया और एक वकील को इतना गुस्सा दिलाया कि उसने कोर्ट में ही जूता फेंक दिया।

पूर्व सीजेआई मार्कंडेय काटजू ने इस पर अपनी राय देते हुए कहा है कि जजों को कोर्ट में कम बोलना चाहिए और सिर्फ कानूनी पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि अनावश्यक बयानबाजी करनी चाहिए।

पूर्व सीजेआई मार्कंडेय काटजू ने अपने एक लेख में लिखा है कि जजों का काम सुनना है, फैसला देना है, न कि लेक्चर देना। वे कहते हैं, “एक ज्यादा बोलने वाला जज एक बेसुरे बाजे की तरह होता है।” यह बात उन्होंने इंग्लैंड के पूर्व लॉर्ड चांसलर सर फ्रांसिस बेकन के हवाले से कही।

काटजू ने गवई की टिप्पणी को अनुचित बताया और कहा कि अगर कोई जज मस्जिद के मामले में पैगंबर मोहम्मद से जाकर प्रार्थना करने की बात कहे, तो क्या होगा? शायद ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगने लगें। यह बात सोचने वाली है कि क्या जजों की ऐसी टिप्पणियाँ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं और समाज में अशांति फैलाती हैं?

सुप्रीम कोर्ट में कुछ समय पहले एक याचिका आई थी, जिसमें मध्य प्रदेश के खजुराहो में भगवान विष्णु की क्षतिग्रस्त मूर्ति को बहाल करने की माँग की गई थी। याचिकाकर्ता ने खुद को विष्णु भक्त बताया। सुनवाई के दौरान सीजेआई गवई ने कहा, “तुम कहते हो कि तुम विष्णु के कट्टर भक्त हो। जाओ और खुद देवता से कहो कि कुछ करे। जाओ और प्रार्थना करो।”

यह टिप्पणी केस के कानूनी मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं रखती थी, लेकिन इसने हिंदू समाज में गुस्सा भड़का दिया। कई लोगों ने इसे सनातन धर्म पर हमला माना। नतीजा? एक गुस्साए वकील ने कोर्ट में ही गवई पर जूता फेंक दिया। काटजू ने जूता फेंकने की निंदा की, लेकिन कहा कि जज की अनावश्यक बातों ने यह न्योता खुद दिया।

यह पहली बार नहीं है जब जजों की मौखिक टिप्पणियों ने देश में अव्यवस्था पैदा की हो। पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ जजों ने हिंदू धर्म से जुड़े मुद्दों पर ऐसी टिप्पणियाँ कीं, जो फैसले में शामिल नहीं हुईं, लेकिन समाज में तूफान ला दिया। आइए, इनमें से कुछ प्रमुख मामलों पर नजर डालते हैं।

इसी साल 2025 में पूर्व जस्टिस रोहिंटन नरीमन की ‘डिवाइन ऑर बोवाइन इंटरवेंशन‘ वाली टिप्पणी को ही रख लीजिए। नरीमन ने एक कार्यक्रम में पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा या चंद्रचूड़ के राम मंदिर फैसले पर प्रार्थना करने के संदर्भ में कहा कि अगर कोई जज फैसला ‘डिवाइन इंटरवेंशन’ (दैवीय हस्तक्षेप) से देता है, तो वह अपनी शपथ का उल्लंघन करता है। उन्होंने मजाक में कहा, ‘चाहे डिवाइन हो या बोवाइन (गाय जैसा) इंटरवेंशन।’

लोगों ने इसे हिंदू धर्म का मजाक उड़ाना माना, क्योंकि ‘बोवाइन’ गाय से जुड़ा है, जो हिंदुओं के लिए पवित्र है। इस टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी और कई ने इसे एंटी-हिंदू बताया। नरीमन की बात का मकसद शायद न्यायपालिका की निष्पक्षता पर जोर देना था, लेकिन शब्दों का चुनाव गलत साबित हुआ।

दूसरा मामला 2022 का है, जब सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर शर्मा पर टिप्पणी की। उस समय बीजेपी की प्रवक्ता रही नूपुर शर्मा ने एक टीवी डिबेट में पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी की थी। इसके बाद देश में हिंसा भड़क गई, जिसमें उदयपुर में एक हिंदू दर्जी कन्हैयालाल की सरेआम हत्या कर दी गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में नूपुर की याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्या कांत और जेबी पारदीवाला ने कहा कि नूपुर की ‘लूज टंग’ ने पूरे देश को आग लगा दी। उन्होंने कहा, “वह उदयपुर हत्याकांड के लिए जिम्मेदार हैं” और “उन्हें पूरे देश से माफी माँगनी चाहिए।”

ये टिप्पणियाँ फैसले का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन इन्होंने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। बीजेपी समर्थकों ने जजों की आलोचना की, जबकि विपक्ष ने इसे सही ठहराया। नूपुर को पार्टी से सस्पेंड कर दिया गया, और समाज में धार्मिक तनाव बढ़ गया। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी टिप्पणियाँ ट्रायल से पहले किसी को दोषी ठहराने जैसी हैं, जो न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।

तीसरा मामला साल 2008 का है। इसमें दिल्ली हाई कोर्ट में एम.एफ. हुसैन पर मामला चल रहा था। मशहूर पेंटर एम.एफ. हुसैन पर हिंदू देवी-देवताओं की नग्न पेंटिंग्स बनाने के आरोप थे। कई जगहों पर उनके खिलाफ केस दर्ज हुए। दिल्ली हाई कोर्ट ने इन केसों को खारिज करते हुए कहा कि शिकायतकर्ताओं की सोच “प्यूरिटनिज्म” (कट्टर नैतिकता) वाली है।

जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा, “हमें उन विचारों की आजादी देनी चाहिए जिनसे हम नफरत करते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब तब तक नहीं अगर अपमान करने की आजादी न हो।” इस टिप्पणी को कई हिंदुओं ने अपनी धार्मिक भावनाओं का अपमान माना। हुसैन को देश छोड़ना पड़ा और हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किए। हालाँकि कोर्ट का फैसला कला की आजादी के पक्ष में था, लेकिन मौखिक टिप्पणी ने विवाद बढ़ाया।

ये चार मामले (दो 2025 के, एक 2022 का, एक 2008 का) दिखाते हैं कि जजों की टिप्पणियाँ कैसे हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं और देश में अशांति फैलाती हैं। लेकिन बात सिर्फ हिंदू-विरोधी टिप्पणियों तक सीमित नहीं। अब देखते हैं गुजरात दंगों से जुड़े चार मामलों को, जहाँ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर कड़ी टिप्पणियाँ कीं। ये टिप्पणियाँ भी मौखिक थीं और फैसलों में शामिल नहीं हुईं, लेकिन इन्होंने राजनीतिक माहौल गरमा दिया।

पहला साल 2004 का सुप्रीम कोर्ट का ‘मॉडर्न-डे नीरोज‘ वाला बयान। 2002 के गुजरात दंगों में बेस्ट बेकरी केस में सभी आरोपित बरी हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार को ‘मॉडर्न-डे नीरोज’ कहा। नीरो रोमन सम्राट थे, जो शहर जलते देखते रहे। कोर्ट ने कहा, “जब निर्दोष बच्चे और असहाय महिलाएँ जल रही थीं, तो सरकार ने आँखें फेर लीं।” इस टिप्पणी ने मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। कॉन्ग्रेस और विपक्ष ने इसे मोदी के खिलाफ हथियार बनाया। हालाँकि बाद में 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट दी, लेकिन 2004 की टिप्पणी का असर सालों तक रहा।

दूसरा मामला 2003 का है, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गुजरात सरकार में कोई विश्वास नहीं है। दंगों की जाँच पर सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार निष्पक्ष जाँच नहीं कर रही। अभियोजन और राज्य के बीच नेक्सस (साँठगाँठ) की बात कही गई। इसने दंगों की जाँच को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में डाल दिया। विपक्ष ने इसे मोदी की विफलता बताया और देश में बहस छिड़ गई कि क्या राज्य सरकार दंगों में शामिल थी?

तीसरा मामला सितंबर 2003 का है, जहाँ एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार पर टिप्पणी की थी कि उसमें कोई भरोसा नहीं। यह दंगों के कई केसों की जाँच से जुड़ा था। कोर्ट ने एसआईटी गठित की, क्योंकि राज्य की जाँच पर शक था। इस टिप्पणी ने राजनीतिक पार्टियों को हमले का मौका दिया और मोदी की छवि पर विपरीत असर पड़ा।

चौथा मामला फरवरी 2012 का है, जब गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की अपर्याप्त प्रतिक्रिया और निष्क्रियता के कारण दंगे दिनों तक चले। यह ‘अराजक स्थिति’ वाली टिप्पणी थी। हाई कोर्ट ने सरकार की आलोचना की कि उसने दंगों को रोकने में ढिलाई बरती। यह टिप्पणी भी फैसले का हिस्सा नहीं थी, लेकिन मीडिया में सुर्खियाँ बनी और विपक्ष ने मोदी को घेरा।

ऐसा ही एक मामला किसान आंदोलन के समय का है, जब सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में कहा कि सरकार ने कानून बनाते समय सही तरीके से राय तक नहीं ली। जबकि सरकार इस मामले में अपना पक्ष विस्तार से रख चुकी थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का देश में गलत मतलब से इस्तेमाल किया गया।

ये मामले दिखाते हैं कि मौखिक टिप्पणियाँ कैसे समाज को बाँटती हैं। कानूनी रूप से इनका कोई महत्व नहीं होता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में कहा है कि हाई कोर्ट मौखिक निर्देश नहीं दे सकते, सिर्फ लिखित आदेश बाध्यकारी होते हैं। एक केस में कोर्ट ने कहा, “जजों को अपने फैसलों से बोलना चाहिए, मौखिक बातें रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं।” लेकिन व्यावहारिक रूप से ये टिप्पणियाँ मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए फैलती हैं और जनता की राय बनाती हैं।

जैसे गुजरात मामलों में मोदी को सालों तक ‘दंगाई’ कहा गया, जबकि बाद में क्लीन चिट मिली। इसी तरह नूपुर शर्मा को ट्रायल से पहले दोषी ठहराया गया।

अब बात करते हैं सोशल मीडिया की भूमिका की। आज के दौर में सोशल मीडिया ने सबकी जवाबदेही तय कर दी है। चाहे सीजेआई हो या कोई नेता, अगर कोई गलत बोलता है, तो जनता तुरंत प्रतिक्रिया देती है। गवई की टिप्पणी का मामला देखिए। जैसे ही यह बात बाहर आई, एक्स (पूर्व ट्विटर) पर #ImpeachTheCJI और #GavaiMustResign जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।

हजारों यूजर्स ने गुस्सा जाहिर किया। एक यूजर ने लिखा, “यह हिंदू आस्था का अपमान है, क्या मुस्लिम पिटीशनर से ऐसा कहते?” दूसरा बोला, “मोदी सरकार क्यों चुप है? सॉलिसिटर जनरल ने तो बचाव किया!” कई ने इसे ‘टू-टियर ज्यूडिशियरी’ कहा, मतलब हिंदुओं के लिए अलग न्याय।

सोशल मीडिया ने गुस्से को पनपाया। लोग वीडियो शेयर करने लगे मीम्स बने, और बहस छिड़ गई। पूर्व आईपीएस अधिकारी भास्कर राव ने जूता फेंकने वाले वकील की हिम्मत की तारीफ की, हालाँकि गलत बताया। काटजू का ट्वीट वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने जजों को कम बोलने की सलाह दी।

सोशल मीडिया की वजह से सीजेआई जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को भी सोच-समझकर बोलना पड़ता है। पहले ऐसी टिप्पणियां कोर्ट रूम तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब लाइव स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया से तुरंत फैल जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने खुद सोशल मीडिया को ‘बेलगाम’ कहा है।

जस्टिस पारदीवाला ने एक कार्यक्रम में कहा कि सोशल मीडिया पर जजों पर व्यक्तिगत हमले खतरनाक हैं, इससे जज कानून की बजाय मीडिया की सोचते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर जज अनावश्यक टिप्पणियाँ करेंगे, तो जनता चुप क्यों रहे? गवई मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सोशल मीडिया अतिरंजित प्रतिक्रिया दे रहा है, लेकिन क्या यह सही है?

हिंदू समाज ने महसूस किया कि उनकी आस्था का मजाक उड़ाया गया। सोशल मीडिया ने इसे आवाज दी और अब सरकार से इम्पीचमेंट की माँग हो रही है।

कुल मिलाकर जजों की मौखिक टिप्पणियाँ न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं। ये समाज में अव्यवस्था पैदा करती हैं, क्योंकि ये राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं को भड़काती हैं। कानून कहता है कि सिर्फ लिखित फैसले मायने रखते हैं, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में मौखिक बातें भी महत्वपूर्ण हो गई हैं। जरूरत है कि जज संयम बरतें, जैसा काटजू साहब कहते हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ऐसी घटनाएँ बढ़ेंगी और न्यायपालिका पर जनता का भरोसा कम होगा। क्या समय आ गया है कि कोर्ट रूम में बोलने के लिए गाइडलाइंस बनें? यह विचार करने का समय है।(साभार) 

हिजाब वाली महिला मंत्री के मर्दों को टिप्स : बीवी जिद्द करे तो उसके साथ 3 दिन न सोएँ, करें पिटाई

कर्नाटक में बुर्के पर चल रहे विवाद  के बीच मलेशिया की हिजाब पहनने वाली एक महिला मंत्री के बयान की चौतरफा आलोचना हो रही है। महिला मंत्री ने ​मर्दों को सलाह दी है कि यदि उनकी पत्नी ‘उचित व्यवहार’ न करें तो वे उसकी पिटाई करें। इतना ही नहीं मर्दों को जिद्दी बीवी के साथ तीन दिन तक नहीं सोने की भी सलाह दी है।

मलेशिया की इस महिला मंत्री का नाम है- सिती जैला मोहम्मद युसॉफ (Siti Zailah Mohd Yusoff)। वे पैन इस्लामिक मलेशियन पार्टी की सांसद हैं। महिला, परिवार और सामुदायिक विकास विभाग की उपमंत्री हैं। जैला मोहम्मद युसॉफ ने इंस्टाग्राम पर दो मिनट का एक वीडियो पोस्ट किया। उन्होंने इसे ‘मदर टिप्स’ का नाम दिया। इस वीडियो में उपमंत्री ने जिद्दी पत्नियों को अनुशासित करने के लिए पतियों को ‘टिप्स’ दिए हैं। इसके बाद उन्होंने महिलाओं को भी पति के साथ रहने के तौर-तरीकों के बारे में ‘सलाह’ दी है।   

वीडियो में वह कहती हैं कि पति पहले अपनी जिद्दी पत्नियों के साथ बात करके उन्हें अनुशासित करें। अगर उनकी पत्नियाँ फिर भी अपना व्यवहार नहीं बदलती हैं, तो पति तीन दिनों तक उनके साथ नहीं सोएँ। सिती जैला ने आगे कहा कि इसके बावजूद अगर पत्नी सलाह लेने से इनकार करती है या अलग सोने के बाद भी अपना व्यवहार नहीं बदलती हैं, तो पति सख्ती दिखाए। वे अपनी पत्नियों की पिटाई करें। उनके इस वीडियो के बाद उन पर घरेलू हिंसा (Domestic Violence) को सामान्य करने का आरोप लगाया जा रहा है। लोगों का कहना है कि वह मर्दों को अपनी पत्नियों को पीटने के लिए कहकर घरेलू हिंसा को बढ़ावा दे रही हैं।

महिलाओं को दी ये हिदायत

मंत्री सिती जैला ने महिलाओं को सलाह दी कि अगर वे पतियों का दिल जीतना चाहती हैं, तो वे अपने शौहर के कहने पर ही बातचीत करें। सिती ने महिलाओं से कहा कि अपने शौहर से तब बात करें जब वे शांत हों, खाना खा चुके हों, प्रार्थना कर चुके हों और आराम कर रहे हों। उनका कहना था कि जब वह बोलना चाहती हैं, तो पहले अपने शौहर से इजाजत लें। मलेशिया की मंत्री की इन बयानों को लेकर उनकी हर तरफ आलोचना हो रही है और कई संगठनों ने कहा है कि उन्हें अब अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए।

एक साल में रिपोर्ट हुए 9015 घरेलू हिंसा के मामले

महिला अधिकार समूहों के एक गठबंधन, ज्वाइंट एक्शन ग्रुप फॉर जेंडर इक्वेलिटी ने सिती जैला पर घरेलू हिंसा को सामान्य करने का आरोप लगाया और माँग की कि वह उप महिला मंत्री के पद से इस्तीफा दें। एक संयुक्त बयान में कहा गया कि उप मंत्री को घरेलू हिंसा को सामान्य करने का प्रयास किया, जो कि मलेशिया में एक अपराध है। संगठन ने कहा कि 2020 और 2021 के बीच, घरेलू हिंसा की 9015 पुलिस रिपोर्टें दर्ज की गईं। इसन ने कहा कि हो सकता है कि असल में ये आँकड़े और भी ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि कुछ महिलाएँ अपने साथ हुई ज्यादतियों को रिपोर्ट नहीं करवाती है, जिसकी वजह से वह रिकॉर्ड में नहीं आ पाता है।

नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की नसीहत की धज्जियां उड़ाईं

कांग्रेस में परिवार के विरुद्ध बोलने या चलने वाले को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है, लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू के सोनिया गाँधी की सलाह के विरुद्ध जाने पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं किए जाने पर हर कोई हैरान है। 
पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद के इस्तीफा देने और फिर नाटकीय तरीके से उसे वापस लेने वाले नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस में किसी के काबू में नहीं आ रहे हैं। उन्होंने हाल ही में पार्टी की पूर्णकालिक ‘स्वयंभू’ अध्यक्ष बनीं सोनिया गांधी की नसीहतों की भी धज्जियां उड़ाकर रख दीं।

कांग्रेस के पुनरुद्धार का यह आखिरी मौका

सिद्धू ने मीडिया के जरिए संवाद न करने की सख्त चेतावनी को खुलेआम चैलेंज कर दिया। नवजोत ने सोनिया की सीख को दरकिनार करते हुए न सिर्फ पार्टी अध्यक्ष को चिठ्ठी भेजी, बल्कि इसे ट्वीटर पर साझा भी कर दिया। उन्होंने लगभग चेतावनी भरे लहजे में लिखा है कि पंजाब में कांग्रेस के पुनरुद्धार का यह आखिरी मौका है।

अमरिंदर सिंह के सियासी लड़ाई जारी है

यह पहला मौका नहीं है, जबकि सिद्धू ने नाफरमानी की हो। अपनी मर्जी के मालिक सिद्धू पहले भी ऐसा कर चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर की बात तो वह कई बार काट चुके हैं। अमरिंदर के काफी सियासी लड़ाई के बाद पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए सिद्धू कुछ समय बाद ही रूठ गए। हाईकमान को बगैर विश्वास में लिए उन्होंने अचानक अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे डाला। इससे खुद कांग्रेस का थिंक टैंक सकते में आ गया।

एक सप्ताह में ही उड़ा डालीं धज्जियां
काफी लम्बे समय के बाद हाल ही में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में सोनिया गांधी ने पार्टी में आंतरिक अनुशासन बनाने पर जोर दिया और पार्टी में मीडिया प्लेटफार्म के जरिए संवाद न करने की सख्त नसीहत दी। सिद्धू ने एक सप्ताह के अंदर ही इस नसीहत की धज्जियां उड़ा डालीं। सिद्धू ने सोनिया गांधी को भेजी चिठ्ठी जस की तस सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्वीटर पर साझा कर दी।

अब फिर बोला चन्नी सरकार पर हमला
सिद्धू ने अपने 13 सूत्री एजेंडे में फिर चरणजीत सिंह चन्नी सरकार पर हमला बोला है। सिद्धू ने आरोप लगाया कि चन्नी सरकार ने मंत्रिमंडल में पिछड़ी जातियों की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि सिर्फ अनुसूचित जाति का सीएम बनाने से कुछ नहीं होगा, अनुसूचित जाति को सरकार में बराबर का प्रतिनिधित्व भी मिलना चाहिए।

कैप्टन ने कहा था-सिद्धू स्थिर व्यक्ति नहीं है
सिद्धू को जानने वाले यह जानते हैं कि वह बड़बोले और विवादित व्यक्तित्व के है. विवादों से उनका गहरा नाता है. अपने बयानों, चुटकुलों और अजब-गजब कारनामों से सिद्धू हमेशा चर्चा के केंद्र में रहे हैं. या यह कहा जा सकता है कि सिद्धू चर्चा में रहने का गुर जानते हैं. सिद्धू के इस्तीफा देने पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उनपर हमला बोला था। कैप्टन ने ट्वीट कर कहा कि मैंने तुमसे कहा था…वह स्थिर व्यक्ति नहीं है और पंजाब के सीमावर्ती राज्य के लिए उपयुक्त नहीं है.

  • बयानवीर सिद्धू की फितरत है विवादों में रहना
    नवजोत सिंह सिद्धू 2004 में अमृतसर से लोकसभा पहुंचे थे. उन पर उस वक्त एक पुराना मुक़दमा चल रहा था।
  • उन्होंने कथित तौर पर पाटियाला गुरनाम सिंह को पार्किंग को लेकर हुए विवाद के दौरान पीटा। सिंह की अस्पताल में मौत हो गई।
  • इस मामले में 2006 में सिद्धू को हाईकोर्ट ने तीन साल क़ैद की सज़ा सुनाई थी। सिद्धू को तब अमृतसर के सांसद पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा।
  • सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे अरुण जेटली ने सिद्धू की ओर से पैरवी की थी और सिद्धू को जमानत मिली थी।
  • 2016 में सिद्धू राज्य सभा के सांसद बनाए गए, लेकिन उन्होंने तीन महीने बाद इस्तीफ़ा दे दिया।
  • सिद्धू आम आदमी पार्टी का दामन थामने वाले थे, इस बीच 2017 के विधानसभा चुनावों से कुछ सप्ताह पूर्व कांग्रेस का दामन थाम लिया।
  • 2017 में कांग्रेस पंजाब में सत्ता में आयी और सिद्धू कैबिनेट मंत्री बने। कुछ महीनों के बाद उन्होंने अमृतसर के मेयर चुनाव पर नाराज़गी जाहिर कर दी।
  • 2018 में इमरान ख़ान पाक के प्रधानमंत्री बने। कैप्टन अमरिंदर ने सिद्धू से पाकिस्तान नहीं जाने की अपील की। लेकिन सिद्धू पाकिस्तान गए। यही नहीं पाक सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से गले भी मिले।
  •  2019 में कैप्टन सिंह ने कैबिनेट में बदलाव करते हुए सिद्धू का मंत्रिमंडल बदल दिया। इसके विरोध में सिद्धू ने पदभार ग्रहण किए बिना इस्तीफ़ा दे दिया।
  •  सिद्धू ने कई मुद्दों पर सरकार की आलोचना की। इन मामलों को देखने के लिए आलाकमान ने एक समिति बनायी।
  • सिद्धू के कहने पर कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से इस्तीफा ले लिया।