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‘अंग्रेज भी इसे राम का जन्मस्थान मान चुके थे, रिकॉर्ड में घपला कर जोड़ा बाबरी मस्जिद’

मंदिर निर्माण कार्यशालाइतिहासविद् और लेखिका मीनाक्षी जैन ने अयोध्या विवाद पर दो किताबें Rama and Ayodhya (2013) और The Battle for Rama: Case of the Temple at Ayodhya (2017) लिखीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में इतिहास की एसोसिएट प्रोफ़ेसर और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद की सदस्या डॉ. जैन ने ऑपइंडिया के संपादक अजीत भारती से बातचीत में इस विवाद को लेकर कई ऐतिहासिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। इस मामले में डीएन झा, रोमिला थापर जैसे वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका, सरकारी दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ जैसे मुद्दों पर विस्तार से बात की। साक्षात्कार का अंश;
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) पर मुस्लिम पक्ष के वकीलों से लेकर वामपंथी इतिहासकारों द्वारा उठाए गए सवालों को जैन ने सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने साफ़ किया कि कमल का फ़ूल, वराहमूर्ति, संस्कृत में दीवारों पर शिलालेख आदि से साफ़ तौर पर उस स्थल के हिन्दू होने को प्रमाणित करते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि न तो ASI के खुदाई और सर्वेक्षण कार्य में कोई कमी थी, न ही उनकी रिपोर्ट में। खुदाई इलाहबाद उच्च न्यायालय के आदेशानुसार हिन्दू और मुस्लिम पक्षों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में की गई थी। खुदाई में मिली एक-एक चीज़ का हिसाब उसी दिन रजिस्टर में लिखा गया, और उस दिन के अंत में दोनों पार्टियों ने उस पर हस्ताक्षर किए हैं।
वामपंथी इतिहासकारों ने किसके कहने पर इतिहास को छेड़ा 
जैन के मुताबिक खुदाई में मिले साक्ष्यों से यह साफ़ है कि न केवल मस्जिद मंदिर तोड़कर बनी, बल्कि यह स्थल मस्जिद के सैकड़ों, हज़ारों साल पहले से धार्मिक स्थल यानी मंदिर रहा है। उस स्थान पर लगातार किसी-न-किसी मंदिर के उपस्थित होने के सबूत ASI की खुदाई ने दिए हैं।
उन्होंने बताया कि वामपंथी इतिहासकार इरफ़ान हबीब की इस विवाद को बढ़ने में अहम भूमिका रही। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उस समय कार्यरत हबीब ने खटराग अलापना शुरू किया कि यह शिलालेख एक ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, जिसे बाबरी ध्वंस के समय गुपचुप वहाँ ‘तस्करी कर’ लाया गया और मलबे के बीच रख दिया गया। मीनाक्षी जैन बतातीं हैं कि जब हबीब से सवाल पूछा गया कि वह शिलालेख आखिर किस व्यक्ति के ‘निजी संग्रह’ का हिस्सा है, तो उन्होंने रंग बदल कर इसे ‘त्रेता के ठाकुर’ नामक अयोध्या में ही स्थित एक दूसरे मंदिर से मिला शिलालेख बता दिया। (‘त्रेता के ठाकुर’ मंदिर हालाँकि अयोध्या में ही स्थित है,लेकिन उसका जन्मभूमि से कोई सरोकार नहीं है। यह औरंगज़ेब द्वारा तोड़ा गया एक दूसरा मंदिर है/) उनके मुताबिक लखनऊ संग्रहालय से ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख को जन्मभूमि स्थल पर लाया गया और मलबे में ‘विष्णु हरि’ शिलालेख के नाम से ‘प्लांट’ कर दिया गया।
लेकिन उनका यह प्रोपेगंडा भी उनके दुर्भाग्य और हिन्दुओं के अच्छे कर्मों से तब ध्वस्त हो गया, जब किशोर कुणाल नामक एक संस्कृत विद्वान और रिटायर्ड आईपीएस ने लखनऊ के संग्रहालय में से वह शिलालेख खोज निकाला और उसकी तस्वीर प्रकाशित कर दी। ‘त्रेता के ठाकुर’ शिलालेख बेहद टूटा-फूटा और क्षतिग्रस्त है, जिसमें से बमुश्किल 2-3 शब्द पढ़े जा सकते हैं। वहीं ‘विष्णु हरि’ शिलालेख न केवल स्पष्ट और ठीक-ठाक हालत में है, बल्कि उसका अधिकाँश भाग पूरी तरह सुरक्षित और पठनीय भी है।
मीनाक्षी जैन कुछ चौंकाने वाले खुलासे भी करतीं हैं। वह बतातीं हैं कि 1857 के विद्रोह के बाद बने ब्रिटिश राजस्व रिकॉर्डों में विवादित स्थल को केवल ‘जन्मभूमि’ के नाम से दर्ज किया गया था, जो बाद में (अदालत में रिकॉर्ड मँगाए जाने पर?) बदला गया। जहाँ-जहाँ पुराने रिकॉर्ड में केवल जन्मभूमि का उल्लेख था, वहाँ “*” लगाकर ऊपर की ओर “और बाबरी मस्जिद” लिखा गया, ताकि यह दिखाया जा सके कि मुसलमानों का भी उस भूभाग पर दावा उतना ही पुराना रहा है, जितने समय पहले से हिंदू इसे मंदिर स्थल बताते हैं। उन्होंने बताया कि न केवल वामपंथी इतिहासकारों ने ही मुस्लिमों को झूठा “तुम ये मुकदमा जीत सकते हो” का दिलासा देकर सुलझते-सुलझते मामले को दोबारा उलझा दिया, बल्कि उन्होंने अदालत को भी अपनी ‘राय’ को तथ्य बताकर बरगलाने की कोशिश की। हाई कोर्ट के पास समय की कमी नहीं थी, क्योंकि उस समय मामला ‘गर्म’ नहीं था- इसलिए उच्च न्यायालय ने उन्हें आराम से सुनकर ख़ारिज कर दिया और वहीं सुप्रीम कोर्ट ने समय की कमी के चलते उन्हें दो टूक किनारे कर दिया।
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इसके अलावा डॉ. जैन ने 1947 के बाद के भारतीय इतिहास लेखन के “Big Four” माने जाने वाले रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा और डीएन झा के प्रपंच की भी पोल-पट्टी खोली। उन्होंने बताया कि कैसे ये चारों खुद अदालत में अपने झूठ की लानत-मलालमत से बचने के लिए अपने छात्रों को भेजते रहे, और खुद ‘निष्पक्षता’ का चोला ओढ़कर अख़बारों के कॉलम से लेकर किताबें तक लिख-लिख कर बिना पाँव के झूठ की पालकी ढोते रहे। एक ट्विटर यूज़र के सवाल के जवाब में डॉ. जैन ने यह भी बताया कि वह अयोध्या की ही तरह मथुरा और काशी पर भी वह अध्ययन कर रहीं हैं। इन मामलों पर भी वे किताब लिखेंगी। इसके अलावा एक दूसरे सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि हालाँकि तथाकथित ‘दक्षिणपंथ’ ने राजनीतिक लड़ाई जीत ली है, लेकिन भाजपा की सरकार में भी अकादमिक जगत जस-का-तस है। आज भी बौद्धिक वर्ग पर कब्ज़ा वामपंथियों का है, और दक्षिणपंथी या हिंदूवादी होना तो दूर, उनसे भिन्न, गैर-वामपंथी मत वाला तक होना आज भी अकादमिक जगत में मुश्किल है।(साभार)

मंदिर के मलबे पर ही बनी थी बाबरी मस्जिद

Image result for k k mohammedअयोध्या विवादपुरातत्व बताता है कि अयोध्या सिर्फ हिंदुओं की मान्यता नहीं है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात कोरी आस्था नहीं है। जिन पुरातात्विक सबूतों से बाबरी मस्जिद का दावा कमजोर होता है और जिसे हाई कोर्ट ने भी प्रमाणिक माना था, उन्हें जुटाने वालों में 53 मुसलमान थे। इनमें सबसे प्रमुख नाम केके मुहम्मद का है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के क्षेत्रीय निदेशक रहे केके मुहम्मद मलयालम में लिखी अपनी आत्मकथा ‘जानएन्ना भारतीयन’ में बताते हैं कि 1976-77 में ही इस बात के सबूत मिल चुके थे कि बाबरी मस्जिद असल में मंदिर है। उनकी आत्मकथा हिंदी में ‘मैं भारतीय हूॅं’ नाम से है। वैसे, ब्रिटिश राज में पीटर कारनेगी ने भी लिखा था, “यह बात स्थानीय तौर पर पुष्ट होती है कि मुसलमानों की विजय के वक्त अयोध्या में तीन महत्वपूर्ण हिंदू मंदिर थे। जन्मस्थान मंदिर, स्वर्गद्वार मंदिर और ठाकुर मंदिर। पहले पर बाबर ने मस्जिद बनवा दी, जिस पर अभी भी उसका नाम खुदा है। दूसरे मंदिर के साथ औरंगजेब ने वैसा ही किया। तीसरे पर भी बाद में मस्जिद बना दी गई। ये सब इस्लाम के उस मशहूर सिद्धांत के आधार पर किया गया, जिसके तहत उन सभी पर धर्म थोप दिया जाता है, जिन्हें जीत लिया गया हो।” कारनेगी फैजाबाद का पहला ब्रिटिश कमिश्नर था। उसने ही अवध का पहला गजेटियर तैयार किया था। कारनेगी के लिखे से जाहिर है कि बाबरी मस्जिद उसी जगह पर बनाई गई थी, जो जन्मस्थान है।
Image result for k k mohammedImage result for k k mohammedयदि कारनेगी के दावों को नकार दें तो भी खुदाई से मिले साक्ष्य बार-बार इस सत्य को दुहराते हैं कि बाबरी मस्जिद असल में मंदिर के मलबे पर खड़ा किया गया था। मुहम्मद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “हमें विवादित स्थल से 14 स्तंभ मिले थे। सभी स्तंभों में गुंबद खुदे हुए थे। ये 11वीं और 12वीं शताब्दी के मंदिरों में मिलने वाले गुंबद जैसे थे। गुंबद में ऐसे 9 प्रतीक मिले हैं, जो मंदिर में मिलते हैं।”
1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के लिए अयोध्या में प्रो. बीबी लाल की अगुवाई में खुदाई हुई थी। इस टीम में मुहम्मद भी थे। बकौल मोहम्मद, “खुदाई के लिए जब हम वहॉं पहुॅंचे तो मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।”
Image result for k k mohammedएक इंटरव्यू में मोहम्मद ने बताया था कि उस समय इन साक्ष्यों पर उतनी बात नहीं हुई। जब अयोध्या का विवाद गहराया तो उस उत्खनन की रिपोर्ट को लेकर संदेह जताए गए। इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश पर एएसआई ने 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 के बीच राम जन्मभूमि परिसर की खुदाई की। खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुसलमान थे।
खुदाई के बाद एएसआई ने 22 सितंबर 2003 को अपनी 574 पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपी। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर हाई कोर्ट के तीन जजों ने माना कि विवादित स्थल का केंद्रीय स्थल रामजन्मभूमि ही है। खास बात यह रही कि तीनों जज गर्भगृह के सवाल पर एकमत थे।
हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ में इन घटनाओं का विस्तार से ब्यौरा दिया है। वे लिखते हैं, “एएसआई ने कुल 90 खाइयाँ खोदीं। पूरे क्षेत्र को पॉंच हिस्सों में बॉंटा। इनमें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी क्षेत्र और उभरा हुआ प्लेटफॉर्म शामिल था। सभी क्षेत्रों में क्रमवार खुदाई हुई, जिससे ढॉंचों की प्रकृति और उसकी सांस्कृतिकता का अंदाजा लगे। जो अवशेष मिले, उससे साबित होता था कि वहाँ 11वीं शताब्दी का हिंदू मंदिर था।”
खुदाई के दौरान निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल नहीं उठे, इसके भी बकायदा इंतजाम किए गए थे। हेमंत शर्मा ने इसका ब्यौरा देते हुए लिखा है, “समूची खुदाई और ढॉंचों के अभिलेखीकरण की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई। खुदाई न्यायिक पर्यवेक्षकों, वकीलों और संबंधित पक्षों या उनके नामित व्यक्तियों की मौजूदगी में संपन्न हुई। खुदाई में पारदर्शिता हो, इस खातिर सारी उत्खनित सामग्री दोनों पक्षों की मौजूदगी में ही सील की जाती थी। इसे उसी दिन फैजाबाद के कमिश्नर की ओर से उपलब्ध कराए गए स्ट्रांग रूम में रखा जाता था। हर रोज इस स्ट्रांग रूम को बंद करने के बाद सील किया जाता था।”
एएसआई की रिपोर्ट में खुदाई के दौरान पाए गए अभिलेखों के तीन हिस्सों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी भी है। इनमें एक नागरी में और दो अरबी में पाए गए थे। अरबी अभिलेख में एक 16वीं शताब्दी की नस्ख शैली में था। इसमें कुरान की एक आयत खुदी थी। दूसरा अरबी अभिलेख भी 16वीं शताब्दी के शुरुआत की शैली में था। इसमें अल्लाह शब्द खुदा था। एएसआई के मुताबिक नागरी का पॉंच वर्णों वाला अभिलेख 11वीं शताब्दी का था। मुहम्मद बताते हैं कि विवादित ढॉंचा विध्वंस के बाद मलबे से ‘विष्णु हरिशिला पटल’ मिला था। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है, “यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।”
दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, एएसआई की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि विवादित ढॉंचे के ठीक नीचे एक बड़ी संरचना मिली है। जो अवशेष मिले हैं वह ढॉंचे के नीचे उत्तर भारत के मंदिर होने का संकेत देते हैं। यही नहीं 10वीं शताब्दी के पहले उत्तर वैदिक काल तक की मूर्तियाँ और अन्य वस्तुओं के खंडित अवशेष मिले हैं। इनमें शुंग काल की चूना पत्थर की दीवार और कुषाण काल की बढ़ी संरचना शामिल है।
एएसआई रिपोर्ट में कहा गया है कि विवादित ढांचे के नीचे मिली विशाल संरचना में नक्काशीदार ईंटें, देवताओं की युगल खंडित मूर्तियाँ, नक्काशीदार वास्तुशिल्प, पत्तों के गुच्छे, अमालका, कपोतपाली, दरवाजों के हिस्से, कमल की आकृति जैसी चीजें मिली हैं। विवादित मस्जिद के ठीक नीचे मिले इमारत का आकार 50 गुना 30 मीटर उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम था। इसके 50 खम्भों के आधार मिले हैं। इसके केंद्र बिंदु के ठीक ऊपर विवादित मस्जिद के बीच का गुंबद है, जहाँ अस्थायी मंदिर में भगवान राम की मूर्तियॉं रखी होने की वजह से खुदाई नहीं हो सकी।
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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को ....

तीन अभिलेख। दो अरबी में और एक नागरी में। अरबी के दोनों अभिलेख 16वीं शताब्दी के। पॉंच वर्णों का नागरी अभिलेख 11वीं शताब्दी का। 16वीं शताब्दी के बाद का इतिहास तो आपको वामपंथी इतिहासकारों ने खूब पढ़ाया है। और ये भी कि मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद नहीं बनाई गई थी!