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‘…भिंडरावाले मोदी को गले से पकड़ लेता’: सिंघू बॉर्डर पर खालिस्तानी आतंकियों का गुणगान करता बैनर

                                           किसान प्रदर्शन स्थल पर लगा खालिस्तानी पोस्टर
सितंबर 2020 में केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर लगभग 8 महीनों से कथित किसानों का प्रदर्शन जारी है। अगर यह आंदलोन वास्तव में कृषि कानूनों के खिलाफ होती तो इसका समाधान हो चुका होता और चीजें सुलझ गई होती, लेकिन अलगाववादी तत्वों और प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठनों के हस्तक्षेप ने चीजों को और अधिक अस्पष्ट बना दिया है।

कृषि कानूनों की आड़ में मोदी विरोधियों द्वारा तथाकथित किसान आंदोलन की नीयत उस समय ही स्पष्ट हो गयी थी, जब प्रदर्शन स्थलों पर खालिस्तान नारे और दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में गिरफ्तार दंगाइयों को रिहा करने की मांग होने के अलावा 26 जनवरी को लाल किला कांड ने हर बात एकदम खुलकर सामने ला दी है, जिस कारण वास्तविक किसान इस आंदोलन से पीछे हट गया है। वह समझ गया कि कृषि कानूनों की आड़ में देश अराजकता फैलाना है इन संगठनों का उद्देश्य है।  

अब तक देश ने इतने आंदोलन देखे, लेकिन किसी भी आंदोलन में बिरयानी, कोरमा, पिज्जा, ड्राई फ्रूट्स और अन्य स्वादिष्ट व्यंजनों के अलावा मसाज एवं भीड़ इकठ्ठा करने बार-बालाओं का नाच नहीं देखा, जो स्पष्ट रूप से प्रमाणित कर रहा है कि विरोध कृषि कानूनों का नहीं, बल्कि मोदी का हो रहा है। 

हाल ही में, ऑपइंडिया ने उन कारणों को सूचीबद्ध किया जिनके खिलाफ इन तथाकथित किसानों ने विरोध किया, जिसमें कट्टर अपराधियों और नक्सलियों को मुक्त करने की माँग शामिल थी।

विरोध प्रदर्शन के शुरुआती दिनों से ही एक बात स्पष्ट हो गई है कि खालिस्तानियों सहित अलगाववादी शक्तियों ने आंदोलन में घुसपैठ की है। पत्रकार स्वाति गोयल ने 18 जुलाई को सिंघू बॉर्डर पर बने पिंड अखाड़े की तस्वीर शेयर की। इन ‘अखाड़ों’ की स्थापना इसलिए की गई है ताकि किसान केंद्र सरकार के विरोध में रहकर व्यायाम कर सकें। सुनने में काफी दिलचस्प लगता है न?

चीजें अपेक्षा से अधिक गंभीर हैं। अखाड़े के बैनर में पंजाबी में एक कोटेशन है, जिसमें लिखा गया है, “आज हुंदा भिंडरांवाला जे, मोदी नु गल टन फड़ लंदा” जिसका अर्थ है “अगर भिंडरावाले यहाँ होता, तो वह मोदी को गले से पकड़ लेता।”

पंजाब में भिंडरांवाले के लिए भावनाएँ कभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुईं और पिछले कुछ सालों से राजनीतिक तत्वों और विदेशी संगठनों द्वारा लगातार यही भावनाएँ भड़काई गई हैं। ये किसान विरोध पोस्टर, बैनर, भाषणों और भिंडरांवाले और अन्य की प्रशंसा करने वाले गीतों से भरे हुए हैं, जिन्हें उस समय भारतीय सेना और पंजाब पुलिस ने मार गिराया था।

बैनर पर लिखे लिरिक्स उसी एक गीत से प्रेरित हैं। गाना सितंबर 2020 के आसपास लॉन्च किया गया था जब पूरे पंजाब में विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे थे। यूके के जगोवाला जत्था द्वारा रिलीज किए गए इस गाने में भिंडरांवाले की तारीफ की गई है। इसमें लिखा है, “वह राजसी नेता, जिसमें अकेले सिस्टम से लड़ने की हिम्मत थी, आज अगर वह जिंदा होता तो पीएम मोदी को गले से पकड़ लेता।”

गाने में आगे कहा गया है कि भिंडरांवाले निडर था और उसने भारत सरकार की बात पर ध्यान नहीं दिया। अगर वह वहाँ होता तो मोदी सरकार के साथ भी ऐसा ही करता। इसमें कहा गया है, ”उसने विरोध का रास्ता नहीं चुना होता। अगर उन्होंने हथियार उठाकर अपने अनुयायियों को बुलाया होता, तो सरकार कोठरी में छिप जाती।”

इसमें आगे दावा किया गया है कि हालाँकि किसान अपना सारा जीवन खेतों में बिता देते हैं, लेकिन उन्हें उपज का सही मूल्य नहीं मिलता है। जाहिर है, खालिस्तान आंदोलन भी किसानों के विरोध और उपज के सही मूल्य की माँग के कारण शुरू हुआ माना जाता है। ऐसा लगता है कि गोली चलाने के लिए किसानों के कंधों का इस्तेमाल करना भारत विरोधी ताकतों के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का सबसे आसान तरीका है।

विडंबना यह है कि तीन किसान कानून किसानों को अपनी उपज कहीं भी और किसी को भी बेचने का अधिकार देते हैं, उन्हें मंडियों के चंगुल से मुक्त करते हैं और उन्हें मूल्य निर्धारण और बातचीत के संबंध में शक्ति भी देते हैं।

भिंडरांवाले के गुणगान करने वाले गीतों की पहुँच

चौंकाने वाली बात यह है कि ये गाने सिर्फ Youtube या WhatsApp पर फॉरवर्ड करने तक ही सीमित नहीं हैं। ये Spotify, Amazon Music, Gaana, Hungama और Wynk जैसे कई म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर ‘कानूनी रूप से’ उपलब्ध हैं।

किसान आंदोलन में शामिल संत राम सिंह ने खुद को मारी गोली

नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन जारी है। इस बीच खबर आ रही है कि सिंघु बार्डर पर किसानों के धरने में शामिल संत राम सिंह ने खुद को कथित तौर पर गोली मार ली है, जिससे उनकी मौत हो गई है। बाबा राम सिंह करनाल के रहने वाले थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक पंजाबी में लिखा एक सुसाइड नोट भी छोड़ा है। बताया जा रहा है कि संत राम सिंह दिल्ली बॉर्डर पर किसानों को कंबल बाँटने गए थे।

इस आत्महत्या पर लोगों को यह भी शंका है कि "क्या यह आत्महत्या किसी षड़यंत्र का हिस्सा है?" कोई कम्बल बाँटने आये और आत्महत्या कर ले, समझ से बाहर है। क्योकि जिस वक़्त वह अपने आपको गोली मार रहा था, वहां उपस्थित लोगों ने क्या रोकने का प्रयास किया था? फिर जहाँ धरने के नाम पर पिकनिक का वातावरण हो, वहां आत्महत्या, सरकार पर दबाब बनाने का कोई षड़यंत्र ही जान पड़ता है। जबकि नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में हुए शाहीन बाग़-1 में तो बिरयानी, चाय और नाश्ता  था, जबकि यहाँ पिज़्ज़ा, मेवा, परांठे, नैपकिन, मसाज, फल आदि मिल रहे हैं, ऐसे में आत्महत्या, वह भी सार्वजनिक? ये वही कहानी हो गयी कि जिस तरह जंतर मंतर पर अरविन्द केजरीवाल की मीटिंग में पेड़ पर लटक कर गजेंद्र नाम का किसान आत्महत्या कर लेता है।    

मृतक राम सिंह ने प्रदर्शन के दौरान कुंडली बॉर्डर पर गाड़ी में बैठकर कर पिस्टल से खुद को गोली मारी। जिसके बाद वहाँ मौजूद लोगों ने उन्हें पानीपत के पार्क अस्पताल ले गए, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उन्होंने सुसाइड नोट में किसान आंदोलन का जिक्र करते हुए किसानों के हक की बात कही है।

इस आत्महत्या पर लोगों ने अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं:-

संत बाबा राम सिंह हरियाणा एसजीपीसी के नेता थे। पीटीसी न्यूज के अनुसार, सुसाइड नोट में बाबा राम सिंह ने लिखा है कि वे किसानों की हालत नहीं देख सकते हैं। उन्होंने लिखा कि केंद्र सरकार विरोध को लेकर कोई ध्यान नहीं दे रही है, इसलिए वे किसानों, बच्चों और महिलाओं को लेकर चिंतित हैं। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच में जुटी है। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने खुदकुशी पर दुख जाहिर किया है।

बाबा राम सिंह ने सुसाइड नोट में लिखा है, “किसानों का दुख देखा, वो अपने हक लेने के लिए सड़कों पर हैं। बहुत दिल दुखा है। सरकार न्याय नहीं दे रही। जुल्म है, जुल्म करना पाप है, जुल्म सहना भी पाप है। और उसे बर्दाश्त करना भी पाप है, मैं किसान भाइयों से कहना चाहता हूँ कि मैं इस स्थिति को देख नहीं पा रहा हूँ।”

सुसाइड नोट में आगे लिखा है, “किसी ने किसानों के हक में और जुल्म के खिलाफ अपने सम्मान लौटाए किसी ने पुरस्कार वापस किया। आज मैं किसानों के हक में और सरकारी जुल्म के रोष में आत्महत्या करता हूँ। यह ज़ुल्म के खिलाफ आवाज है और किसान के हक में आवाज है। वाहेगुरु जी का खालसा ते वाहेगुरु जी की फतेह।”