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कमालिस्तान स्टूडियो पर लगेगा ताला, दबी रहेंगी 'पाकीजा' की यादें

RK Studio के बाद कमालिस्तान स्टूडियो पर लगेगा ताला, दबी रहेंगी 'पाकीजा' की यादें
आर.बी.एल.निगम, फिल्म समीक्षक 
कहते हैं, समय बड़ा बलवान होता है, एक समय था जब फिल्म जगत में सम्वाद लेखक-निर्माता-निर्देशक कमाल अमरोही की तूती बोलती थी, बड़े जतन और मेहनत से कमालिस्तान स्टूडियो बनाया था, लेकिन कमाल साहब के वंशज उस विरासत को सँभालने में नाकाम हो रहे हैं। इस स्टूडियो से मेरे पिताश्री एम.बी.एल.निगम का भी गहरा सम्पर्क था। 
71 साल पुराना आरके स्‍टूडियो के बंद होने के बाद अब 60 साल पुराने कमालिस्‍तान स्‍टूडियो पर भी ताला लगने वाला है। इस स्टूडियो को 1958 में कमाल अमरोही द्वारा स्‍थापित किया गया था खबर है कि स्टूडियो को तोड़कर अब बिजनेस पार्क बनाया जाएगा कमाल स्टूडियो में हिंदी की कई क्लासिक फिल्मों का निर्माण किया गया है यहां महल (1949), पाकीजा (1972), रजिया सुल्तान, अमर अकबर एंथनी और कालिया जैसी फिल्में बनी थीं। अब केवल इस स्टूडियो की यादें सिनेमा प्रेमियों के जेहन में रह जाएंगी
15 एकड़ में फैली इस जमीन पर जल्द ही देश का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट ऑफिस तैयार किया जाएगा।इस विशाल कॉर्पोरेट ऑफिस का नाम एस्पायर रखा जाएगा इस प्रोजेक्ट की कीमत 21 हजार करोड़ रुपये बताई जा रही है डीबी रियलिटी और बेंगलुरु स्थित RMZ कॉर्पोरेशन ने मिलकर इस जमीन को नए सिरे से डेवलप करने का फैसला किया है
यारों के यार थे कमाल अमरोही
बॉलीवुड के मशहूर फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही का जन्म 17 जनवरी 1918 को यूपी के अमरोहा में हुआ था
 लोग कहते हैं कि वे काफी सख्त स्वभाव के थे। लेकिन मेरे पिताश्री एम.बी.एल.निगम के विचार एक भिन्न थे। कमाल साहब ने अपने करियर के दौरान केवल 5 फिल्मों का ही निर्देशन कियाकमाल को फिल्म महल में लिखे सम्वादों ने बहुत प्रसिद्दि दिलवाई थी। 
कमाल ने मुग़ल-ए-आजम फिल्म के डायलॉग लिखे थे। कमाल अमरोही और मीना कुमारी के निकाह की कहानी भी दिलचस्‍प है। दो घंटे के भीतर दोनों का निकाह हुआ था। माना जाता है कि मीना कुमारी की शोहरत देख कर कमाल उनसे जलने लगे थे दोनों के रिश्ते में खटास बढ़ती गई 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी ने दुनिया को अलविदा कहा 11 फरवरी, 1993 में कमाल अमरोही का निधन हो गया था
महल पिक्चर्स और कमालिस्तान स्टूडियो से जुड़े संस्मरण 
पिताश्री एम.बी.एल.निगम 
50 के दशक में पिताश्री दिल्ली-यूपी-ईस्ट पंजाब के जाने-माने फिल्म वितरक और exhibitor थे। प्रीमियर पिक्चर्स के नाम से भगीरथ पैलेस, चाँदनी चौक, दिल्ली में ऑफिस था। पिताश्री के मित्र-मंडल में कमाल अमरोही, मीना कुमारी, कुमार(उस समय के चर्चित अभिनेता-निर्माता-निर्देशक), डॉ धीश(रेलवे बोर्ड के सदस्य और दिल्ली में तत्कालीन इर्विन हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिंडेंटेंट) और जज सरदार सिंह धूपिया आदि सम्मिलित थे। 
बात लगभग 1955 की है, जब पिताश्री ने बड़े बजट की "लाल दुपट्टा" क्या रिलीज़ की, दफ्तर में ताला ही लग गया। साझी सी.बी.सक्सेना चुपचाप बैंक खाता खाली कर एक-दो तीन हो गए। सिर पर भारी कर्जा। दिल्ली के परेड ग्राउंड में चल रहे प्रेम टॉकीज पहले ही बंद हो चूका था, क्योकि सरकार ने सड़क बनाने के लिए सिनेमा घर को हटवा दिया था, और सिनेमा के बदले मिले धन को बड़े बजट की 3 फिल्मों में लगा दिया था। दुर्भाग्यवश, फिल्में कभी पूरी ही नहीं हो पायीं, क्योकि तीनो ही फिल्मों के निर्माता पाकिस्तान भाग गए। फिल्मों में किया निवेश भी डूब गया, जो उस समय के लगभग सवा लाख रूपए थे। जिसका रहस्योघाटन पिताश्री ने मृत्यु से लगभग 3/4 दिन पूर्व ही किया था। उस संकट की घडी में केवल कमाल और कुमार साहब ही संकटमोचक बन कर आए। कुमार साहब की "पंजाबी","दो बातें","प्यार की बातें" आदि फिल्मों के अधिकार पिताश्री के पास थे, जिन्हें बेच कर्जे का अधिकांश भाग कम करने में सहायता की। जब पिताश्री ने कुमार साहब से कहा कि "आखिर कर्जा अब आपका रहेगा।" लेकिन कुमार साहब ने कहा "निगम साहब पैसे माँग कौन रहा है, आखिर ये दोस्ती किस दिन काम आएगी।" दूसरे, कमाल साहब ने मुंबई तत्कालीन बम्बई आकर महल पिक्चर्स का कार्यभार सँभालने के लिए बुलवा लिया। कुमार साहब के दो पत्नियाँ थी, पहली पत्नी लखनऊ रहती थी, लेकिन बम्बई(वर्तमान मुम्बई) से लखनऊ और लखनऊ से वापस बम्बई वाया दिल्ली होकर आते-जाते थे। और दिल्ली में किसी होटल में रुकने की बजाए अपने दोस्त निगम के घर, पहाड़ी इमली, पर ही रुकते थे। 
प्रीमियर पिक्चर्स की प्रसिद्धि में कमाल साहब का योगदान 
फिल्म 'शोले' के निर्माता जी.पी. सिप्पी ने उन दिनों देव आनन्द और निम्मी अभिनीत फिल्म "सजा" प्रथम रिलीज़ में असफल हो गयी थी, और वितरक ने सप्ताह पूरा होने से पूर्व ही फिल्म अनुबन्ध समाप्त कर दिया था। उन दिनों एक वितरक अन्य वितरक बंधुओं को प्रथम दिवस की टिकट भेजता था। कमाल ने पिताश्री को कहा कि "फिल्म हर दृष्टि से ठीक-ठाक है, अगर सिप्पी इसका tragic end की बजाए happy end करने को तैयार हो तो देख लो। फिल्म आपके लिए बुक करवा देता हूँ, फिल्म भी मिटटी के भाव मिल जाएगी।" कमाल साहब ने सिप्पी से दिल्ली, यूपी और ईस्ट पंजाब के लिए फिल्म बुक करवाने की बात की। सारी बातें लिखत होते ही शर्त रख दी कि "फिल्म का end बदल दो, देव और निम्मी की शादी दिखा दो।" कोई चर्चित सम्वाद लेखक कोई सुझाव दे, किसी में कहाँ साहस मना करने का। उसके बाद पिताश्री को अनुबन्ध को स्वीकार करने बम्बई बुलवा लिया। वहाँ बैठ दोनों मित्रों के बीच एक असफल फिल्म से चाँदी बटोरने की युक्ति पर योजना के अनुरूप काम करते ही फिल्म सफल हो गयी। फिल्म का "तुम न जाने किस जहाँ में खो गए..." गीत भी चर्चित गीतों में शुमार है। 
उस समय महंगी फिल्मों में शुमार होती पाकीज़ा      
पिताश्री बताते थे, कि कमाल और मीना के बीच तनाव किसी और कारण से नहीं, बल्कि ड्राइवर द्वारा शूटिंग के दौरान होते दृश्यों के दौरान होते रोमांचक क्षणों को नमक-मिर्च लगा कर बताना था। जिसका विस्तार से अपनी पुस्तक "भारतीय फिल्मोद्योग--एक विवेचन" में किया है। हाँ, फिल्म 'पाकीज़ा' का निर्माण जरूर रुक गया था। लेकिन मीना जी की अपने जीवनकाल में पूरा करने की इच्छा थी। दूसरे, फुर्सत क्षणों में बातचीत के दौरान मीना जी का कहना था कि "मरते वक़्त मेरे शौहर का नाम कमाल अमरोही हो।" जब तक पिताश्री मुंबई रहे, दोनों के सम्बन्ध विच्छेद नहीं होने दिए। पिताश्री के किन्हीं कारणों से दिल्ली वापस आने पर गुस्से में कमाल साहब के मुँह से निकले "तलाक" ने मीना जी को तोड़ दिया था। लेकिन गलती अहसास होने पर कमाल साहब ने जब मीना जी को स्वीकार करने के लिए हलाला करवाने ने मीना जी बिल्कुल ही तोड़ दिया था। एक चर्चा में हलाला पर मीना ने कहा था कि "हलाला के कारण मुझमें और वैश्या में कोई फर्क नहीं रह गया।" जिसे परमपिता परमेश्वर ने पूरा भी कर दिया। 
पिताश्री बताते थे कि उन दिनों 'पाकीज़ा' पर मीना जी बहुत मेहनत की थी। फिल्म में कब्रिस्तान के दृश्यों में वास्तविकता लाने के लिए अपने आराम के पल कब्रिस्तान में बिताती थीं।  
उस समय यदि फिल्म 'पाकीज़ा' निर्मित हुई होती, शायद उस समय की सबसे महँगी फिल्मों में शुमार होती। क्योकि उस दौरान मीना जी ने फिल्म में घटनाओं के बदलने के साथ दूसरे नायकों को लेने के लिए कहती थीं, और कमाल साहब कभी मना नहीं करते थे। जो दर्शाता है पति-पत्नी के बीच घनिष्ठ प्यार। निश्चित रूप से किसी प्यार के दुश्मन ने ही इन दोनों के बीच जहर घोला है। जब कभी घर-परिवार में कोई मीना का नाम भी ले लेता था, उनकी प्रशंसा में मुँह नहीं थकता था। पति के प्रति उनकी वफ़ादारी का गुणगान करते थे। कभी अकेले भोजन नहीं करती थी। रात को देरी से घर लौटने पर उन्हें खाने की मेज पर बैठे हुए सोते देखा जाता था। अपनी समस्त कमाई शौहर कमाल साहब को देती थीं। 
पाकीज़ा के महूरत पर पण्डित जी भविष्यवाणी 
जब फिल्म पाकीज़ा के निर्माण महूरत के सारे विधि-विधान पूरे करने बाद पंडित जी ने कमाल साहब से कहा कि "फिल्म हिट होगी, लेकिन आपको नुकसान भी होगा..." पंडित जी के इस गूढ़ कथन को कोई नहीं समझ पाया और न ही पंडित जी ने खुलकर बताया। लेकिन घटित घटनाओं ने पंडित जी की वाणी को सार्थक सिद्ध कर दिया। प्रारम्भ में फिल्म निर्माण रुका। लेकिन जब कई वर्षों उपरान्त फिल्म प्रदर्शित हुई, फिल्म का व्यवसाय शुरू के दो सप्ताह अच्छा नहीं होने के हर सिनेमा मालिक बीच में ही अनुबंध कैंसिल कर उतारने को तत्पर था, लेकिन फिल्म तीसरे ही सप्ताह में थी की मीना जी का स्वर्गवास हो गया। देश के सारे सिनेमा बंद हो गए लेकिन जिन सिनेमाओं पर पाकीज़ा प्रदर्शित हुई थी, सब खुले रहे और फिल्म पर ऐसी भीड़ लगी कि फिल्म की सिल्वर जुबली मन गयी।  यहाँ पंडितजी की बात स्पष्ट रूप से समझ आयी। फिल्म हिट हो गयी, लेकिन कमाल साहब को व्यक्तिगत नुकसान दे गयी। यदि उस समय बनकर प्रदर्शित हो गयी होती, Production Controller में पिताश्री का नाम फिल्म होता।   
कमाल अमरोही की दरियादिली 
और जो कहते हैं कि कमाल अमरोही सख्त स्वभाव के थे, उनको जवाब। गलती पर हर कोई बोलेगा। जब फिल्म पाकीज़ा का निर्माण रुका था, तो कुछ दृश्यों में अभिनेता अरुण(गोबिन्दा के पिताश्री) ने काम किया था, उनके 600 रूपए शेष थे। किसी फिल्म के दौरान अरुण और नायिका निर्मला के बीच परवान चढ़ा इश्क विवाह सूत्र में बदल गया। कुछ समय बाद, अरुण साहब ने अपनी पत्नी निर्मला को फिल्म के शेष रूपए लाने भेज दिया। कमाल साहब ने उन्हें पिताश्री के पास भेज दिया, लेकिन निर्मला जी के पास अरुण साहब की कोई लिखत न होने के कारण रूपए देने से मना कर देने पर विवाद कमाल तक पहुँच गया। कमाल साहब ने पिताश्री को बुलाकर रूपए देने को कहा, परन्तु रूपए न देने के तर्क सुन दोनों (कमाल साहब और निर्मला जी) चुप्पी साध गए। आखिर निर्मला जी की बात सुन कमाल साहब ने कहा "निगम बाबू बेचारी औरत है, ऐसा है 10/20 रूपए ही दे दो।" पिताश्री ने कहा "आप दे दीजिए, मै एक रूपया भी नहीं दूंगा।" आखिर में विवाद को समाप्त करने के लिए 10 रूपए अपने पास से देकर उनको कहा "बाकी रुपयों के लिए अरुण साहब को ही भेज दिए या उनसे लिखवाकर ले आइये।" अगले दिन अरुण साहब स्वयं आये और पिताश्री से बोले, "निगम साहब आपने मेरी पत्नी को रूपए देने से क्यों मना किया?" पिताश्री ने कहा,"दोनों की फ़िल्मी शादी है, मुझे क्या मालूम दोनों साथ रहते हैं।" इतना सुनते ही अरुण साहब की हँसी रुके नहीं रुकी। हँसी के ठाहकों से पूरा ऑफिस गूंज गया, कमाल साहब भी। 
अगर कमाल साहब सख्त स्वभाव के होते, निगम बाबू को बोलते "मेरे आदेश को न मानने से इंकार करने की हिम्मत कर रहे हो, निकल जाओ।" लेकिन कमाल साहब ने ऐसा नहीं किया। जब तक पिताश्री मुंबई में रहे, किसी भी विवाद पर मित्र के नाते पिताश्री से विचार-विमर्श करते थे। 
पिताश्री द्वारा अचानक बम्बई छोड़ दिल्ली आने से कमाल साहब इतने विचलित हुए, समस्त ऑफिस और मीना जी सबसे हर तरीका अख्तयार कर कारण जानने की कोशिश की कि "आखिर क्या वजह है जो वापस बम्बई न आने के लिए लिखा है?" दिल्ली आये कारण जानने बाद, पिताश्री को अपने साथ लेकर जाने की जिद्द छोड़ कर, अकेले चले गए, लेकिन वहाँ पहुँच कर तीन महीने का वेतन दिल्ली भेज दिया।           
गोदरेज ने खरीदा आरके स्टूडियो
चेंबूर स्थित आरके स्टूडियो को भी रियलिटी क्षेत्र के दिग्गज मालिक गोदरेज प्रॉपर्टीज लिमिटेड ने खरीद लिया है
 यह क्षेत्र यहां 16 सितंबर 2017 को लगे आग में जलकर खाक हो गया था। आरके स्टूडियोज की स्थापना 1948 में की गईबॉलीवुड के कपूर खानदान से आरके स्टूडियो खरीदने वाले जीपीएल ने अब यहां 350,000 वर्ग फीट में अत्याधुनिक आवासीय परिसर और एक लक्जरी रिटेल केंद्र बनाने का फैसला किया है

हलाला ने ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी को तोड़ दिया था

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आर.बी.एल.निगम, फिल्म समीक्षक 
तीन तलाक से करोड़ों मुस्लिम  महिलाओं को आजादी तो मिल गई, लेकिन इस मौके पर यह याद दिलाना जरूरी है कि कैसे इस्लाम की इस दकियानूसी परंपरा ने लाखों मुस्लिम महिलाओं से जिंदगी जीने का उनका अधिकार तक छीने रखा था। इन लाखों आम महिलाओं के अलावा कई खास महिलाएं भी हैं जो तीन तलाक का शिकार बन चुकी हैं। इनमें सबसे बड़ा नाम है बीते दौर की सुपरस्टार मीना कुमारी का। उनका निकाह उस दौर के जाने-माने फिल्म संवाद लेखक-डायरेक्टर कमाल अमरोही से हुई थी। कमाल अमरोही मीना कुमारी की सुपरहिट फिल्म ‘पाकीज़ा’ के डायरेक्टर भी थे। मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था। दोनों की शादी इस्लामी तौर-तरीके से हुई थी। 

मीना कुमारी का हुआ था हलाला!

Image result for meena kumariएक दिन कमाल अमरोही ने किसी बात पर गुस्से में आकर मीनाकुमारी को ‘तीन तलाक’ कह दिया। बाद में पछतावा होने पर उन्होंने फिर मीना कुमारी से निकाह करना चाहा, लेकिन तब इस्लामी मौलवी बीच में आ गए। कहा गया कि दोबारा निकाह करने लिए पहले मीना कुमारी का हलाला करवाना पड़ेगा। हलाला यानी महिला की शादी किसी गैर-मर्द से कर दी जाएगी। मीना कुमारी इसके लिए कतई तैयार नहीं थीं। इसके बावजूद कमाल अमरोही ने जबर्दस्ती मीनाकुमारी का निकाह ने अपने ही दोस्त अमानुल्ला खान से करवा दिया। अमानुल्ला ख़ान अभिनेत्री जीनत अमान के पिता थे। मीना कुमारी को अपने नए शौहर अमानुल्ला ख़ान के साथ हमबिस्तर होना पड़ा और फिर इद्दत यानी मासिक आने के बाद उन्होंने नए शौहर से तलाक़ लेकर दोबारा कमाल अमरोही से निकाह कर लिया।

हलाला के बाद टूट गईं मीना कुमारी

Image result for meena kumariImage result for meena kumariमीनाकुमारी ने एक जगह लिखा है कि “जब मुझे मजहब के नाम पर, अपने जिस्म को किसी दूसरे मर्द को सौंपना पड़ा तो फिर मुझमें और किसी वेश्या में क्या फर्क रहा? इस घटना ने मीना कुमारी को मानसिक तौर पर तोड़कर रख दिया था और इसी तनाव में उन्होंने शराब पीनी शुरू कर दी। वो लगातार भारी डिप्रेशन में रहीं और शराब पी-पीकर उन्होंने अपनी सेहत भी खराब कर ली। 
मजहब के नाम पर, अपने जिस्म को किसी दूसरे मर्द को सौंपना पड़ा तो फिर मुझमें और किसी वेश्या में क्या फर्क रहा?
बाद में यही मीनाकुमारी बेहद गरीबी बेमौत मरीं। सिर्फ 39 साल की उम्र में 31 मार्च 1972 को मीनाकुमारी का निधन हो गया। उनके जैसी खूबसूरत और कामयाब हीरोइन की जिंदगी को तीन तलाक और हलाला ने बर्बाद कर दिया।
गुरुदत्त निर्मित सदाबहार फिल्म "साहब, बीवी और गुलाम" का चर्चित गीत "ना जाओ सइयां, छुड़ाकर कर बहियाँ" गीत मीना कुमारी की निजी ज़िन्दगी को दर्शा रहा था कि गुरुदत्त से गीत का फिल्मांकन शराब पीकर करने की ज़िद्द करने पर गुरु ने फिल्मांकन उपरान्त देने को कहा। लेकिन मीना कुमारी ने कहा "नहीं, अगर गाने का फिल्मांकन शराब पीकर ही होगा, वरना नहीं।" अंत में गुरुदत्त को मीना की आगे झुकना पड़ा था। 
फिल्म "पाकीज़ा" के निर्माण से आया जीवन में उबाल   
दरअसल, फिल्म " पाकीज़ा" के महूरत के समय पंडित जी कहा था "कमाल साहब, फिल्म एकदम हिट होगी, लेकिन आपको नुकसान होगा।" कमाल साहब ने पहेली पर से पर्दा हटवाने के लिए बहुत प्रयास किया, लेकिन पंडितजी महाराज ने केवल इतना ही कहा, "वह आपका अपना नुकसान होगा, फिल्म या कम्पनी को नहीं।" घर की फिल्म होने के कारण मीना ने हर रोल को जीवंत करने, परिश्रम भी खूब किया था। कब्रिस्तान के दृश्य फिल्माने से पहले ही, अपने खाली समय में कब्रिस्तान जाकर स्वयं अभिनय करने का प्रयास करती थी। उस समय अगर फिल्म बन गयी होती, बड़े बजट की फिल्म बनती। क्योकि उस समय मीना कुमारी ने कई अभिनेता अनुबंदित करवाए थे, अभिनेता गोबिंदा के पिताश्री अरुण भी उनमे से एक थे। मीना-कमाल के बीच पनपे विवाद के कारण फिल्म बीच में ही रुक गयी, जो पंडितजी की एक बात तो पूरी कर रही थी, यानि नुकसान और दूसरी, जब कई वर्षों उपरान्त फिल्म पूरी होने उपरांत प्रदर्शन के तीसरे सप्ताह में ही मीना कुमारी के निधन ने असफल हो रही फिल्म को हमेशा के लिए अमर कर गयीं। यानि पंडितजी महाराज के सत्य होते वचन। 
इतना ही नहीं घरेलू नौकर द्वारा घर में चोरी कर भाग गया, जिसे जयपुर में पकड़ा गया। पुलिस द्वारा बुलाने पर कमाल साहब ने पिताश्री को ही मामला सुलझाने के लिए भेज दिया।     
कमाल अमरोही एक नेक इन्सान थे 
पिताश्री एम.बी.एल.निगम 
वैसे कमाल साहब यारों के यार थे। बहुत ही नेक दिल इंसान थे। मेरे पिताश्री एम.बी.एल.निगम, जो 50 के दशक के नामी फिल्म वितरकों में से एक थे। फिल्म "लाल दुप्पट्टा" ने रिलीज़ होते ही उनके कार्यालय प्रीमियर पिक्चर्स पर ताला लग गया था। इस फिल्म के प्रदर्शन से पूर्व पिताश्री  तीन बड़े बजट की फिल्मों में लगभग एक लाख रूपए निवेश कर चुके थे। दुर्भाग्यवश, तीनो मुसलमान निर्माता भारत छोड़  पाकिस्तान चले गए। जिस कारण पिताश्री की कम्पनी गंभीर आर्थिक संकट में थी। इस बात का रहस्योघाटन 17 मार्च 2005 को अपनी जीवनलीला पूर्ण होने से लगभग एक सप्ताह पूर्व किया था। कर्जे में डूबे पिताश्री के लिए कमाल साहब और अभिनेता-निर्माता-निर्देशक कुमार साहब ने डूबते को तिनका का सहारा देकर किया।
अवलोकन करिए:--

PROFILE SINCE the Indian films came into existence, so many film distributors,producers and directors came and will come on the scene but...
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
कमाल साहब ने पिताश्री को अपने प्रोडक्शन महल पिक्चर्स का कार्यभार सम्भालने बम्बई (वर्तमान मुंबई)बुला लिया। जहाँ लगभग पांच वर्ष कार्य करते काफी कर्ज उतारने में सफल हुए। लेकिन वहां रहते मीना जी को बहुत नजदीक से देखा था। उस समय हज़ारों रूपए प्रतिदिन कमाने वाली मीना जी में घमण्ड लेशमात्र  नहीं था, एक पैसा अपने पास नहीं रखती थी। कमाल साहब की गैरहाजिरी में भोजन तक नहीं लेती थी। खाने की मेज पर प्रतीक्षा करते बैठे-बैठे सो जाती थीं। इस बात का विस्तार में अपने लेख शीर्षक "एक ड्राइवर ने बर्बाद कर दी थी मीना की ज़िंदगी", में विस्तार से लिखा था, जिसे अपनी पुस्तक "भारतीय फिल्मोद्योग-- एक विवेचन" में भी समाहित किया है।  
मरते दम तक कमाल साहब की ही बीबी कहलवाना चाहती हूँ 
एक दिन फुर्सत के क्षणों में, पति-पत्नी के बीच चल रहे रोज़ के झगड़ों पर चल रही चर्चा के दौरान पिताश्री को मीना जी ने बताया कि "निगम बाबू कई लोग कहते हैं, कमाल से तलाक लेकर किसी और से निकाह कर लो।" पिताश्री द्वारा दूसरों की बातों का समर्थन करना ही था कि तुरन्त मीना जी ने कहा "निगम बाबू मै हर सितम सहने को तैयार हूँ, लेकिन तलाक नहीं। मै मरते दम तक कमाल अमरोही की बीबी कहलवाना चाहती हूँ, किसी और की नहीं।" उस पर पिताश्री ने कहा "अगर तलाक की बात सुनते ही अमरोही साहब हो सकता है, सब झगड़ों पर खाक डाल दें।" मीना जी ने कहा " निगम बाबू आप हिन्दू हैं, नहीं जानते कि कभी गलती से भी तलाक देकर दुबारा उसी से निकाह आसान नहीं। मुझे हलाला करना पड़ेगा, जो मै नहीं चाहती कि फिल्मों के अलावा कोई मेरे जिस्म को भी छुए।" खैर, जब तक पिताश्री मुंबई रहे, दोनों एक ही छत के नीचे रहे। यदि पिताश्री के रहते पाकीज़ा रुकने की बजाए पूरी हो गयी होती, प्रोडक्शन कंट्रोलर में पिताश्री का ही नाम होता। मीना जी को हलाला करना पड़ा वास्तव में उनकी आत्मा रो पड़ी होगी। हकीकत में हलाला होने पर अंदर से टूट गयीं होंगी। काश ! उस समय पिताश्री दिल्ली आने की बजाए वहीँ रह रहे होते। तलाक देने से पहले कमाल साहब को रोकने का पिताश्री में साहस था।  
अब जब तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदी लगा दिया है ये और इससे जुड़ी हलाला की परंपरा भी खुद-ब-खुद खत्म हो गई है। अगर मुस्लिम समाज ने पहले इसे खत्म करने की पहल की होती तो लाखों मुस्लिम महिलाओं को जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर नहीं होना पड़ा होता।